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शनिवार, 31 जनवरी 2026

चोका

 

ख़ामोशी

प्रीति अग्रवाल

 

कैसे कह दूँ

तुम ही ग़लत थे

बीच हमारे

फासले बहुत थे

कहती रही

नयनों से अपने

जी की बतियाँ

सारे असमंजस

सारे सवाल

न पाकर जवाब

बुझती रही

बिखरती रही मैं

टूटती रही

सुबकती रही मैं

कब जानोगे

कभी तो समझोगे

लंबा जीवन

प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा

नादानी मेरी

क्यों समझ न पाई

तुम ठहरे

मौन के उस पार

शब्दों के आदि

जो मैं कह न सकी

सुनते कैसे

खामोशी बहुत थी

बीच हमारे

ना ग़लत मैं

ना ग़लत तुम थे

सच तो है ये,

ग़लत हम दोनों

हम दोनों सही थे!

 

–0–



प्रीति अग्रवाल

कैनेडा


बुधवार, 30 जुलाई 2025

चोका

 


गुरु पूर्णिमा

प्रीति अग्रवाल

आषाढ़ मास

पूनो शुक्ल पक्ष की

गुरु पूर्णिमा

वेद व्यास जयंती

उत्सव आया

अमूल्य धरोहर

श्रद्धा सुमन

आओ करे अर्पण

महाभारत

श्रीमद्भगवत

रचनाकार

अठारह पुराण

वेदव्यास जी

सनातन धर्म के

गुरु महान

उनका आशीर्वाद

करके प्राप्त

मार्गदर्शन हेतु

कृतज्ञ होवें

पवित्र नदियों में

करके स्नान

पाकर शुभ-लाभ

दान-पुण्य से

जीवन अंधकार

दूर हटाएँ

आध्यात्मिक, शैक्षिक

गुरु प्रणाम

पाएँ शुभ आशीष

करके गुणगान !

-0-

 प्रीति अग्रवाल

कैनेडा

गुरुवार, 26 जून 2025

चोका

 

प्रीति अग्रवाल

1.

एक थी यशोधरा

नीरव रात्रि

एकांत में निकले

खोजने सत्य

सिद्धार्थ महल से

न कोई विदा

यशोधरा से माँगी

न कोई संकेत

जिससे जान पाती

नन्हा राहुल

छोड़ मैया सहारे

यशोधरा के

मन में निरन्तर

यही टीसता

क्या मैं बनती बाधा

साथ न देती

क्या यही सोचकर

निकल पड़े

वो बिना कहे-सुने

क्यों मन मेरा

पहचान न पाए

यही मनाऊँ

पावें ज्ञान प्रकाश

मोक्ष का मार्ग

जनहित दिखाएँ

हूँ बड़भागी

उनकी अर्धांगिनी

प्रेम पात्र बनी मैं!!

2

जिंदगी

 

खुली किताब

कभी बंद मुट्ठी सी

मिश्री की डली

तो कभी सच्चाई सी

बंद तिजोरी

चौराहे, बाजार सी

नई नवेली

बासी अखबार सी

बहती नदी

ठहरे तालाब सी

दबी सिसकी

खुले अट्टहास सी

उनाबी जोड़ा

विधवा लिबास सी

माँ की थपकी

अंधड़ तूफान सी

दुखती रग

कभी मरहम सी

सुख के अश्रु

शोक के चीत्कार सी

गलती शीत

जेठ दोपहरी सी

अमां की रात

पूनम के चाँद सी

सीधी सरल

कभी कृष्ण लीला सी

जिंदगी एक

रूप रंग अनेक

कई बाकी हैं

ए जिंदगी तुझसे

मुलाकात बाकी है!

-o-


प्रीति अग्रवाल

कैनेडा

शनिवार, 30 दिसंबर 2023

काव्यांजलि

 

चोका

उन्हें प्रणाम!

 डॉ. पूर्वा शर्मा

साँसें जिनकी

 सदा ही जपती थी

हिन्दी-प्रेम औ’

कविता-अनुराग

उन्हें प्रणाम!

पिरोती थी सहज

हर्ष-विषाद

जीवन अनुभव

संवेदना को

साहित्य की माला में

उन्हें प्रणाम!

जाने किस तरह!

सरलता से

थी पढ़ती-सुनती

मूक स्वर भी

तरु, पिकी, पृथ्वी के

उन्हें प्रणाम!

यातना के शिविर

हर कदम

मिले उन्हें, फिर भी

थकी न रूकी!

बस चलती रही....

उन्हें प्रणाम!

ज़िंदगी में जो कुछ

उन्होंने पाया

वापस ही लौटाया,

कवितामय

संसार सजाकर

हमें जीने का

फ़लसफ़ा सिखाया

ऐसी विदुषी

को हम करते हैं

बारंबार प्रणाम!

***

 

हाइकु

रिक्त हुआ!.... ‘सुधा’ कलश

 

1

लो रिक्त हुआ

अमृत से भरा वो 

‘सुधा’ कलश।

2

क्या कहा? अस्त ?

ना...ना... कवि रहते

सदा अमर!

3

सदा ही दिया

ज्ञान उन्होंने, आज....

खालीपन भी !

4

कैसे संभव?

सुधा स्वयं ही लीन

पंचतत्त्व में।

5

बड़ा कठिन

ये बताना – ‘क्या खोया’?

‘उन्हें’ खोकर।

6

जाना तो तय

फिर भी घबराता

मन बावरा।

7

रह...रह....के

दिल को कचोटतीं

उनकी यादें!

8

शाख से झड़ा

सर्वश्रेष्ठ गुलाब

उजड़ा बाग ।

9

बिन बताए

चले वे चुपचाप.....

कहीं मिलेंगे?

10

अगली यात्रा!

अपने सूरज को

(वे)ढूँढने चलीं...

11

कहे स्वयं को

प्रबुद्ध होकर भी

‘मैं निर्गुनिया’!

(अंतिम दो हाइकु में जो भाव है वह सुधा जी के स्वयं के भाव है जो उन्होंने अपनी आत्मकथा – ‘एक पाती : सूरज के नाम’ में  व्यक्त किए हैं)



डॉ. पूर्वा शर्मा

वड़ोदरा 

सृजन स्मरण

 


     हाइकु

1

तू रचती जा

मन की कविता को

शब्द पहना ।

2

मिट्टी का घड़ा

बूँद-बूँद रिसता

लो, खाली हुआ ।

3

उड़ा अकेला

कहाँ पहुँचा पंछी

कोई जाने ना ।

4

शीत की मारी

पेट में घुटने दे

सोई है रात

5

नज़र’ लगी

लाल से काली हुई

बेचारी साँझ ।

ताँका

1

बाँस की पोरी

निकम्मी खोखल मैं

बेसुरी, कोरी

तूने फूँक जो भरी

बन गई बाँसुरी।

2

कुछ खिलौने

उम्र छीन ले गई

कुछ वक़्त  ने लूटे,

ख़ाली हाथ हूँ

काश ! कोई लहर

हथेली भर जाए !

3

पावना छाँव

नानी के आँचल की:

फरफराया

रहल’ पे बिराजी

रामायण का  पन्ना ।

(‘रहल’ Xआकार की एक चौकी जिस पर टिकाकर पुस्तक पढ़ी जाती है।)

 

सेदोका

1

यत्न से रखीं

तहाकर जो यादें

अतीत के सन्दूक

खोल बैठी जो,

देखा वक़्त-सितम,

सब चकनाचूर!

2

अलसा गया

दिन का मज़दूर

धूप की ताड़ी पी के

औचक ही आ

अँधेरा छीन भागा

सारी कमाई ले के ।

3

छोड़ पुराना

गहो नवल, मन !

बिसरा कर तम

केंचुल त्यागो

जीर्ण-शीर्ण हो गयी

राह बुलाती नई।

 

 

चोका

1

बाती बोली यूँ

 

बाती बोली यूँ

मुझसे मत पूछो

मैं जलती क्यों

स्नेह भरे दीपक

जा कूदी थी मैं

तन–मन भिगोया

प्रेम–कुण्ड में

ऐसी डुबकी मारी

सुधि बिसरा

हुई ‘उसी’ की सारी

गहरे डूबी

कुछ बूझ न पाई

वजूद खोया

भोला–सा मेरा मन

रूई –उजला

नेह में भीगा तन

लौ’ ने जो छुआ

भक्क से जल उठी

प्रेम–मगन

तन–मन अगन

बस तभी से

रात–दिन जली मैं

मेरा कहना

मानो तुम बहना

प्रेम–प्रीत में

अतिशय डूबना

बहुत बुरा

कभी न डूबो पूरे

नित्य जलोगे

सदा पीर सहोगे

मैं बाती सहती ज्यों

2

मावस भोली

 

मावस भोली

स्याह काली रात की

बुक्कल मार

ख़ुद का रूप दिया

बुझाके दीया

खोजती फिरे पिया

कैसी बावरी !

चढ़ी ऊँची अटारी

उचक ढूँढ़े

कहाँ छिपे प्रीतम ?

न दे दिखाई

निराश हो -होकर

आँसू ढलका

चुनरी भर डाली

जगमगाते

वे बनके सितारे

रो-रो पुकारे-

कहां छिपे हो सोम ?

बड़ा निठुर

छकाता रहे चाँद

पास न आए

सारी रात जगाए

एक पल को

झलक न दिखाए

चाँद-दीवानी

कभी चैन न पाए

देखो तो रीत:

जग की चतुराई

बूझी न जाए

सोम की विरहिणी

सोमवती’ कहाए ।-0-

माहिया

1

वे बचपन की गलियाँ

हम भूल न पाए

जो आज हुईं छलिया ।

2

गरमाहट नातों की

डोरी टूट गई

भेंटों-सौगातों की।


डॉ. सुधा गुप्ता

 

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...