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शनिवार, 31 जनवरी 2026

कविता

नई सुबह

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

नीरस जीवन में भी, भर जाता है रंग।

नूतन की चाह में, साहस और उमंग।।

ब्रह्म मुहूर्त में जाग, पशु-पक्षी, मानव।

नई ऊर्जा से, दिनचर्या में हैं जुट जाते।।

प्रात: स्वच्छ नीले नभ में चमकते तारे।

क्षितिज में लालिमा से सूर्य की आरती उतारे।।

तेज-पुंज, जीवनदाता, नई सुबह लाता।

सूर्यदेव, जड़ चेतन का पिता कहलाता।।

नित्य भोर में सूर्य देता चलने का संदेश।

कभी न रुकना, तभी आगे बढ़ेगा देश।

आलस्य त्याग से ही सदा रहता स्वस्थ तन।

कर्मठता से ही वश में रहे चंचल मन।।

प्रात: बर्फ से ढकी रजताभ चोटियाँ।

सूर्य किरणों से सबका मन मोह लेती।।

नदी-तीर बहती मन्द, सुगन्ध समीर।

घने पेड़ों में, कर्णप्रिय खग कलरव।।

खेतों में, बैलों की घंटियों का संगीत है भाता।

तभी जीवों को अन्न-फल-दूध मिल पाता।।

ओस की बूँदें, फसलों पर हैं लहराती।

प्रात: मोती - सी मनमोहक, भू को सजाती।।

***

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

हिन्दी प्रवक्ता

शिक्षा विभाग, चंडीगढ़


मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

आलेख



दीपावली की प्रासंगिकता और स्वरूप

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

एक जैसी दिनचर्या से जीवन नीरस लगता है उसमें नवीनता और  उल्लास के संचार के लिए भारतीय ऋषि मुनियों ने त्योहारों की परम्परा का आरंभ किया। आजकल की भाग दौड़ भरी जीवन शैली में ये त्योहार अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। ये राष्ट्रीय एकता, भाईचारे तथा समरसता के संदेश के साथ ही हमें अपनी समृद्ध संस्कृति से भी परिचित करवाते हैं।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी के 14 वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या लौटने की खुशी में प्रजा ने घी के दिए जलाकर उनका स्वागत किया था। दीपावली ज्योतिप्रिया श्री की उपासना का पर्व है। श्री व्यक्ति के मुख पर मुखरित होने से वह श्रीमान् कहलाता है। श्री महालक्ष्मी बनकर महासरस्वती की नित्यसंगिनी है। यह प्रकाश का त्योहार अज्ञान का अन्धकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने तथा घर के आस-पास का कूड़ा-कर्कट साफ करने के साथ ही अल्पज्ञता के मल को भी दूर करके हृदय को उज्ज्वल बनाने का प्रतीक है। जहाँ पर सत्य, प्रियदर्शन, सुन्दरता, पुरुषार्थ, विनय, श्रद्धा तथा स्वाध्याय हैं वहीं पर लक्ष्मी का निवास होता है ऐसा स्कन्दपुराण तथा महाभारत में कहा है।

गुरु कृपा और स्वाध्याय से मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान का रहस्य जान लेने से मनुष्य अहंकार त्याग कर विनम्र हो जाता है। ज्ञान संचय से मनुष्य संसार की नश्वरता के विषय में जान लेता है और लोभवश अधिक संग्रह नहीं करता है, मोह और विषय वासनाओं के जंगल में पूरी तरह नहीं उलझता है। यदि हम निर्धन, असहाय और पीड़ित लोगों के जीवन में कुछ प्रकाश की किरणें ला देते हैं तो यह दीपावली का पर्व हमारे जीवन को भी प्रकाशमय बना देता है। छल-कपट के त्याग से हृदय निर्मल हो जाता है। जो मनुष्य देश, धर्म और जाति की सीमाओं से बाहर निकल कर विश्व में बंधुत्व की भावना रखता है उसका जीवन सफल होता है। सत्य से ही संसार में सौन्दर्य है, सत्य में ही कल्याण निहित है। असत्य से विनाश निश्चित है। यह सत्य, धर्म और सदाचार की विजय का पर्व है। अहंकार के कारण स्वयं को सर्वोत्कृष्ट मानने वाला कभी भी श्रद्धालु नहीं बन पाता है। अहंकार ज्ञानशील का भी विनाश कर देता है। जिसके मन में शंका रहती है वह कभी किसी पर विश्वास नहीं कर पाता है।

पुरुषार्थ से ही मनुष्य उन्नति के शिखर पर आरूढ होता है, उसके यश की पताका सब ओर लहराती है और लक्ष्मी भी स्वयं उसके पास आती है।

स्वच्छता से स्वास्थ्य और फिर अपना और देश का भला हो सकता है। यदि मनुष्य के भीतर दैवी प्रवृत्तियों का विकास और पशुता का विनाश हो जाए तो उल्लास होता है। पर्व पर नई वस्तुएँ खरीदने और बंधुजनों में आदान-प्रदान से उल्लास उमंग और भ्रातृत्व की भावना बढ़ती है।

उलूक वाहिनी की उपासना से अवैध और अनैतिक धन की प्राप्ति होती है। यदि हमारा जीवन कीचड़ में पैदा हुए कमल के समान निर्मल और निर्लेप हो जाए और दूसरों के जीवन में खुशियों का संचार हो जाए तो प्रतिक्षण त्योहार ही है।

द्यूतक्रीडा और मदिरा पान से त्योहार की पवित्रता नष्ट होती है। आज धन का प्रदर्शन, मर्यादा विरुद्ध आचरण, लोभ के कारण खाद्य पदार्थों में मिलावट, पटाखों से ध्वनि प्रदूषण, अनुचित तथा असामाजिक कार्यों के लिए नेताओं और अधिकारियों को  उपहार के रूप में घूस से स्वार्थ सिद्धि सभी त्योहारों के स्वरूप को विकृत कर रहे हैं।

हमें मानव तथा समाज के हित के लिए कमल के आसन पर विराजमान लक्ष्मी की ही उपासना करनी चाहिए जिससे सब ओर ज्ञान का प्रकाश फैले, सभी के जीवन में उल्लास और उमंग रहे, प्रत्येक क्षण त्योहार की ही अनुभूति हो। महालक्ष्मी हमें विवेक और सुख समृद्धि प्रदान करें।

***

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

हिन्दी प्रवक्ता

शिक्षा विभाग, चंडीगढ़


मंगलवार, 30 सितंबर 2025

आलेख

भाषा का महत्त्व और हिन्दी

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

भाषा ज्ञान का प्रमुख साधन है यदि भाषा की ज्योति से यह संसार आलोकित न होता तो मानव संसार पशु पक्षियों तथा गूंगों का संसार होता और  उनकी सभ्यता पशुओं की सभ्यता से भिन्न न होती।

ईश्वर ने मनुष्य को सभी प्राणियों में उत्कृष्ट स्थान प्रदान करने के लिए वाणी का वरदान दिया है । यह वाणी मनुष्य का बहुमूल्य आभूषण है, जिससे मनुष्य अपने चारों तरफ अपनी आँखों के माध्यम से जो कुछ भी देखता है तथा कानों से जो कुछ भी सुनता है उसे समझकर अपनी बुद्धि से चिन्तन करके स्पष्ट रूप से अपने भावों और विचारों को ध्वनियों के माध्यम से व्यक्त करता है।

सभी प्राणी भय से बचने के लिए और भूख, प्यास, कामेच्छा आदि प्राकृतिक आवश्यकताओं की सूचना के लिए कुछ ध्वनियों का सहारा लेते हैं लेकिन ईश्वर ने मनुष्य को उनसे भिन्न बनाया है वे स्पष्ट वाणी का प्रयोग करते हैं जिसको सभी एक जैसा समझते हैं। यही स्पष्ट वाणी ही भाषा कहलाती है।

बच्चा अपनी माँ से स्वाभाविक ही जो भाषा सीखता है वह मातृभाषा कहलाती है। यह माँ के दूध के साथ ही बच्चे को मिलती है तथा उसके संवर्धन में सर्वाधिक सहायक होती है। बच्चा अत्यधिक प्रसन्नता, दुःख आदि भावुक क्षणों में अपनी मातृभाषा के प्रयोग में सहज रहता है यहाँ तक कि अर्धचेतन अवस्था में भी उसका सम्बोधन मातृभाषा में ही होता है। बच्चे को मातृभाषा के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान को ग्रहण करना सरल होता है। गणित, विज्ञान, तकनीकी तथा अन्य विषयों को समझने के लिए भी किसी भाषा की आवश्यकता होती है। हमें समाज में कहीं भी सम्पर्क के लिए भाषा की आवश्यकता होती है। भाषा के बिना हमारा दैनिक व्यवहार संभव नहीं होता है। किसी भी देश अथवा समाज की भाषा से हम उसकी मानसिक स्थिति तथा चिन्तन को समझ सकते हैं।

कर्कश वाणी के कारण कृष्ण वर्ण कौआ किसी को भी अच्छा नहीं लगता लेकिन उसी वर्ण वाली कोयल अपनी मधुर ध्वनि से सभी का मन मोह लेती है। भाषा ही मनुष्य के सम्मान अथवा अपमान का कारण बनती है। वाणी में माधुर्य मनुष्य के व्यक्तित्व में निखार ला देता है जिससे मनुष्य अधिक सामाजिक और लोकप्रिय होता है।

आजकल भौतिकता की अंधी दौड़ में विज्ञान तथा तकनीकी विषयों को आर्थिक दृष्टि से लाभकारी माना जाता है इसलिए समाज भाषाओं के महत्त्व को नहीं समझता है, उनकी उपेक्षा करता है। विदेशी भाषा अंग्रेज़ी  के प्रति तो समाज का मोह बना हुआ है लेकिन भारतीय भाषाएँ उपेक्षा का शिकार हो रही हैं जो कि भविष्य में समाज के पतन का संकेत है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, कहकर राष्ट्रभाषा हिन्दी को उन्नति का मूलमंत्र मानकर उसका गौरव ही नहीं बढ़ाया बल्कि अपनी प्रतिभा का परिचय भी दिया है। राष्ट्रभाषा किसी भी राष्ट्र का गौरव और जनता के हृदय की धड़कन होती है। भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति तथा विज्ञान सभी का भण्डार है। यह सरल तथा वैज्ञानिक भाषा है। इसी भाषा ने सम्पूर्ण भारतवर्ष को एकता के सूत्र में बांधकर परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ा, काश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी भारतवासियों को भ्रातृत्व का सन्देश दिया। इसके पास विश्व की सर्वाधिक प्राचीन, समृद्ध तथा वैज्ञानिक व्याकरण सम्मत भाषा संस्कृत का शब्दकोश है। रूस, जर्मनी, इटली तथा फ्रांस में शिक्षा का माध्यम अपने देश की ही भाषा है अंग्रेजी नहीं। फिनलैंड रुमानिया और हंगरी जैसे छोटे छोटे देश भी अपनी भाषा को ही शिक्षा का माध्यम बनाकर आत्मसम्मान से जीते हैं जबकि हम भारतीय हीनभावना से ग्रस्त तथा मानसिक रूप से परतंत्र हैं। हम अंग्रेजी के मोह में पढ़कर बच्चे के शारीरिक तथा मानसिक विकास में बाधा डालते हैं। बच्चे पहले विदेशी भाषा सीखने में सारी शक्ति लगाते हैं फिर ज्ञान विज्ञान से योग्यता दिखाने में। आज विश्व के अनेक देशों के विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों में हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था है। बहुत से देशों में हिन्दी जानने वालों की बड़ी संख्या है।

अंतर्राष्ट्रीय/ विश्व हिन्दी सम्मेलनों की लोकप्रियता तथा सफलता से हिन्दी का सम्मान बढ़ा है।

भारत में शिक्षा का माध्यम हिन्दी न होना भारतीयों के लिए शर्म की बात है। हम सभी का ऐसा  प्रयास होना चाहिए कि विश्व आकाश पर हिन्दी का प्रचण्ड सूर्य अपने आप से अन्य भाषाओं के मुकाबले अधिक देदीप्यमान हो।

हमारा कर्तव्य है कि भारतीय भाषाओं को सम्मान दें उन्हें समृद्ध बनाएँ तथा भावी पीढ़ी की उन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। तभी भारतीय संस्कृति तथा धर्म का संरक्षण होगा। यदि धर्म संस्कृति पुष्पित पल्लवित होगी तभी मनुष्य का जीवन सुखी होगा।



डॉ. राजकुमार शांडिल्य

हिन्दी प्रवक्ता

शिक्षा विभाग, चंडीगढ़

 

शनिवार, 30 अगस्त 2025

आलेख

एक भारत, श्रेष्ठ भारत

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

विविध रंगों तथा प्रजातियों के फूलों के गुलदस्ते की तरह अनेक धर्मों, जातियों, रंग रूप और भाषाभाषी सभी भारतीय कहलाते हैं। सभी से देश की शोभा तथा गौरव है।

शकुन्तला और दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से प्रसिद्ध भारतवर्ष विश्व में प्राकृतिक सौंदर्य और विविध संस्कृति के कारण अनुपम है। धरती पर स्वर्ग कहलाने वाला काश्मीर भारत माता का मुकुट है। कन्याकुमारी में सागर इसका चरणप्रक्षालन करता है। इसके तीन ओर सागर तथा सात पड़ोसी देश हैं।

प्रहरी की तरह अडिग हिमालय हमें हरियाली और खुशहाली देता है । यहाँ नदियाँ, झरने, घने जंगल, फल, शुद्धजल, सुगंधित वायु असीम शांति प्रदान करते हैं। चाँदी जैसी चमकती चोटियाँ आह्लाद से भर देती हैं। यहाँ हाड़ कंपा देने वाली ठंड होती है तो रेगिस्तान में रेत के पहाड़ बनते और नष्ट होते हैं, लू के कारण जीवन कष्टमय होता है। ग्रीष्म में गर्मी से बचने के लिए लोग पर्वतों पर जाते हैं और शीत ऋतु में दक्षिण में धार्मिक तथा सांस्कृतिक भ्रमण का आनंद लेते हुए भारत की श्रेष्ठता से परिचित होते हैं। दक्षिण में प्राय: मौसम सुहावना रहता है। यही ऋतु चक्र ईश्वर का वरदान है और भारत की श्रेष्ठता सिद्ध करता है।

उत्सवप्रिय भरतवासी सभी धर्मों के सांस्कृतिक पर्व तथा राष्ट्रीय पर्व सौहार्द तथा हर्षोल्लास से मनाते हैं।

हमारा जीवन चार आश्रमों तथा चार वर्णों में विभक्त था। बाद में वर्ण व्यवस्था ने जातिप्रथा का रूप ले लिया। यहाँ मनुष्य जीवन का लक्ष्य चार पुरुषार्थों की प्राप्ति माना जाता था। लार्ड मैकाले ने हमारे उच्चादर्शों, नैतिक मूल्यों को देखकर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर हमारी शिक्षा पद्धति को ध्वस्त करने की योजना बनाई। पाश्चात्य शिक्षा में अर्थ और काम की ही प्रधानता होने से समाज का पतन हो रहा है ।

यहाँ प्रत्येक जीव में ईश्वर को देखते हैं तथा ईश्वर स्वयं मानव शरीर धारण करते हैं । ईश्वर ने मनुष्य को ही विवेकी,कल्पनाशील बनाया है तथा वाक् शक्ति भी दी है । संपूर्ण पृथ्वी को ही परिवार मानना’ ‘सभी सुखी, सभी नीरोगतथा कल्याणकारी हों किसी को भी दुःख न भोगने पड़ें जैसे  उच्चविचारों के कारण भारत विश्वगुरु कहलाता है। भारत ने सत्य ,अहिंसा, अस्तेय, दया, सेवा, परोपकार, त्याग, इन्द्रियनिग्रह जैसे उच्च आदर्शों से विश्व को बन्धुत्व और एकता का संदेश दिया है।

ज्ञान-विज्ञान के भण्डार वेद अपौरुषेय हैं और मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के हृदय से वेदों की ऋचाओं का प्रस्फुटन हुआ था। दर्शनशास्त्र का मूल वेद तथा उपनिषद हैं। आयुर्वेद में वैद्य चरक और सुश्रुत लब्धप्रतिष्ठ हैं। खगोल विज्ञान के क्षेत्र में वराहमिहिर, आर्यभट्ट , वैदिकगणित, तथा नक्षत्रों के मानव जीवन पर प्रभाव का वैज्ञानिक विश्लेषण आज भी विश्व को आश्चर्यचकित करता है। रामायणकाल में रामसेतु, पुष्पक विमान और मन्त्रों की शक्ति से युद्धकला ने भारत की श्रेष्ठता सिद्ध की है।

लालकिला, कुतुबमीनार, ताजमहल और कोणार्क आदि की वास्तु कला आश्चर्यचकित करती है। भिन्न-भिन्न खान-पान, लोकनृत्य, लोकगीत तथा रीति-रिवाज भारतीयों को एकता सूत्र में बांधते हैं।

भारत का परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्र बनना ,अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्रों, मिसाइलों का निर्माण ,चंद्रयान सफल परीक्षण और नासा जैसी संस्थाओं में भारतीय प्रतिभा की श्रेष्ठता सिद्ध की है।

शंकराचार्य जी ने धर्म के संरक्षण और संवर्धन के लिए चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की। चार धाम, 51 शक्तिपीठों, 12 ज्योतिर्लिंगों तथा अन्य कुंभ जैसे धार्मिक आयोजनों में देश तथा विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं। पवित्र नदियों में स्नान तथा दान का विशेष महत्त्व है। गंगा हमारी संस्कृति की संवाहिका है। आजीवन उपयोग और मृत्यु के पश्चात इसी में अस्थि विसर्जन तथा तटों पर पिण्डदान इसकी महत्ता सिद्ध करते हैं। संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति की विविधता और श्रेष्ठता से ही भारत की प्रतिष्ठा है। विदेशी भी इनके प्रति उत्सुक रहते हैं ।संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है । देवनागरी लिपि तथा पाणिनि व्याकरण की वैज्ञानिकता के कारण संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है ।भाषा विज्ञान के क्षेत्र में यास्क रचित निरुक्त अनुपम है। योग के महत्त्व के कारण ही 21 जून को विश्व योगदिवस के रूप में मनाया जाता है । वैदिक काल से जीवनदायी पेड़ों को पूज्य बताकर मनुष्य को पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया है।

नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों की ख्याति सम्पूर्ण विश्व में भारत की श्रेष्ठता का उद्घोष करती है। वाल्मीकि, व्यास, विष्णुशर्मा, चाणक्य, विदुर कालिदास आदि ने विश्व को सहज ही लाभान्वित किया है। स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी ने भारत को एकता के सूत्र में बाँधने का कार्य किया। आजकल रोजगार या भ्रमण के लिए संपर्क भाषा हिन्दी ही राष्ट्र को जोड़ती है।


डॉ. राजकुमार शांडिल्य

हिन्दी प्रवक्ता

शिक्षा विभाग 

चंडीगढ़


बुधवार, 30 जुलाई 2025

आलेख

 

मुंशी प्रेमचन्द

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

ऐसा कोई छात्र, अध्यापक और साहित्यकार नहीं होगा जो कहानी-उपन्यास के क्षेत्र में अग्रगण्य उपन्यास सम्राट मुन्शी प्रेमचंद के नाम से परिचित न हो। वे जनमानस के अध्येता चिन्तक और अपने युग की समस्याओं को अपनी सूक्ष्म दृष्टि से समझकर सहज समाधान प्रस्तुत करने वाले विश्वविख्यात  लेखक हैं। वे कालजयी रचनाओं के कारण युगों तक अमर, यशस्वी बने रहेंगे।

इनका जन्म लम्ही ग्राम, वाराणसी, उ . प्र.  में 1880 में हुआ। इनका नाम धनपतराय था लेकिन नवाब राय नाम से उर्दू में लेखन आरम्भ किया।  युग प्रभाव से हिन्दी की ओर आकृष्ट हुए। कुछ पत्रों का सम्पादन किया फिर सरस्वतीप्रेस नाम से अपनी प्रकाशन संस्था की स्थापना की।  देशभक्ति के पथ पर दृढ़ रहने से सरकार का दबाव रहा।  इनकी आत्मा की आवाज़ पाठकों तक पहुँची। पटकथा लेखक थे तो फिल्म निर्माताओं की इच्छा के अनुसार लिखने का बन्धन था इसलिए इन्होंने स्वतन्त्र लेखन का रास्ता चुना।  निरन्तर साहित्य साधना करते हुए जीवनभर अभाव से संघर्ष करते रहे और सन् ई. 1936 में स्वर्गवास हो गया।

सभी वर्ग इनकी रचना का विषय बने।  निर्धन, पीड़ित, पिछड़े वर्ग के प्रति इनकी विशेष सहानुभूति है। शोषक-शोषित दोनों वर्गों का सुन्दर चित्रण हुआ है। वे ग्रामीण जीवन के चित्रण में अप्रतिम हैं।  इनका साहित्य कथात्मक, नाटकीय, वर्णनात्मक तथा स्वाभाविक शैली में रचित है। यहाँ मौलिक चिंतन, गंभीर अध्ययन और सूक्ष्म दृष्टि का परिचय मिलता है। कला की दृष्टि से उच्चस्तरीय साहित्य इनके प्रतिभा सम्पन्न होने का साक्षी है। कथा साहित्य ठोस जीवन पर आधारित मानव जीवन का प्रतिबिंब तथा मानव कल्याण की भावना से ओतप्रोत है। वे साहित्य को जीवन की आलोचना मानते हैं। इसमें उस काल की सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक अवस्था का विशद चित्रण है। इसमें राजनैतिक गतिविधियों और जन मानस उद्वेलन की गूँज सुनाई देती है। वे साहित्य में युग को साथ लेकर चले। उन्होंने जैसा देखा और भोगा वैसा ही कथा साहित्य में अवतरित हुआ और कहीं-कहीं युग को दिशा निर्देश देने का प्रयत्न किया। आश्रमों और सदनों द्वारा समस्या का समाधान देने का प्रयत्न किया है। सुधार वाद के संस्कार लेकर उन्होंने साहित्य जगत् में पदार्पण किया। उपन्यास साहित्य में इसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

उस समय जनता कृषि पर निर्भर थी। प्रेमचंद ने ईमानदारी और सहानुभूति से कृषक वर्ग का चित्रण किया है।

उस समय मध्य वर्गीय समाज दिखावे की भावना से ग्रस्त, झूठी सम्मान की भावना का भक्त, आर्थिक विषमता के कारण उद्विग्न तथा राजनैतिक चेतना के कारण समाज का नेतृत्व करने के लिए लालायित था।

इन्होंने कृषक और मध्य वर्ग दोनों की यथार्थस्थिति का मार्मिक एवं सजीव चित्रण किया है। उच्च वर्ग को अभावों में पलने वाले प्रेमचन्द की सहानुभूति प्राप्त नहीं हो सकी। उन्होंने किसी क्रांति का आह्वान नहीं किया। समाज में फैली कुरीतियों के उन्मूलन से सुधार पर बल दिया है।

उन्होंने समष्टिगत भावनाओं को अधिक महत्वपूर्ण माना है। मानव जीवन के यथार्थ का ही चित्रण संवेदनशीलता के साथ किया है। कहानियों में वैयक्तिक जीवन का चित्रण अधिक हुआ है। समाज से ही व्यक्ति का अस्तित्व है। समाज से विछिन्न होकर उसका मूल्य शून्य ही रह जाता है। वे व्यक्ति को व्यक्ति की दृष्टि से नहीं सामाजिक दृष्टिकोण से आंकते हैं।

उस युग में नारी जीवन ही समस्याओं से भरा हुआ था। विधवा समस्या, वेश्या समस्या, दहेज समस्या, बेमेल विवाह, आर्थिक स्वतंत्रता की समस्या, शिक्षा प्राप्ति की समस्या, सामाजिक और राजनैतिक अधिकार प्राप्ति की समस्याएँ नारी का रास्ता रोके खड़ी थी।

अछूतों की समस्या - छुआछूत, मंदिर प्रवेश, शादी आदि। वे सजग साहित्यकार होने के कारण किसी भी समस्या की उपेक्षा नहीं कर सके।

दहेज प्रथा के कारण अनेक भोली- भाली निर्दोष लड़कियों को जीवन भर दारुण दु:ख भोगना पड़ता है। इन सभी समस्याओं को इन्होंने अपने उपन्यासों में उठाया।

उन्हें हरिजनों( अछूतों) और अन्य लोगों में विवाह संबंध का समर्थन किया। उनके मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष भी करना पड़ा।

इनके साहित्य में मध्य वर्गीय समाज की दिखावे की भावना, ईर्ष्या -द्वेष, आभूषण -प्रियता आदि का चित्रण मिलता है। यहाँ शोषित वर्ग का दारुण क्रंदन सुनाई देता है। स्वार्थ - लिप्सा में फंसे लोगों की नीचता,  सामंत शाही का बोलबाला, धर्म का खोखला पन, शोषण तथा संयुक्त परिवार प्रथा के टूटने का चित्रण भी है। यहाँ साधन हीन, महत्त्वहीन, निम्नवर्ग के पात्रों की सहानुभूति और कुशलता से प्रस्तुति अनुपम है। गोदान में होरी किसान का नायक के रूप में सजीव चित्रण हुआ है।

यथार्थ की भित्ति पर खड़ी स्वतंत्र रचना गोदान कृषक जीवन का महाकाव्य है। इसमें ग्रामीणों की निर्धनता, विवशता, रूढ़िवादिता आदि का सुंदर चित्रण है। ऋण के बोझ से दबा समाज से संत्रस्त  किसान होरी मजदूर बन जाता है । यहाँ नागरिक और ग्राम्य जीवन का तुलनात्मक चित्र प्रस्तुत किया है। यहाँ साहित्य समाज का दर्पण होता है कथन की सत्यता दिखाई देती है।

 

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

हिन्दी प्रवक्ता

शिक्षा विभाग चंडीगढ़


शुक्रवार, 27 जून 2025

कविता

  

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

1.

योग की महिमा

 

योग है अद्भुत-प्रत्यक्ष, वैदिक विज्ञान,

इसी से होगा, मानवमात्र का कल्याण।

पढे़ जो, महर्षि पतंजलि का योग विज्ञान,

चित्तवृत्तियों का निरोध, करे वह इन्सान।

सुख, दु:ख मोह-बन्धन नहीं, सीमित भोग,

सभी अपनाएँ योग, विश्व बने नीरोग।

मन अति चंचल स्वेच्छा से है चलता जाता,

अभ्यास और वैराग्य से ही वश में आता।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,

धारणा, ध्यान, समाधि अष्टांग का व्यवहार।

यम-नियम से होती तन-मन-वाणी शुद्ध,

प्राणायामादि से समाधि तक पहुँचे प्रबुद्ध।

 

शरीर-मन को स्वस्थ रखता है प्राणायाम,

पूरक, रेचक, कुम्भक हैं विविध आयाम।

प्राणायाम असाध्य रोगों को जड़ से मिटाता,

नित्य अभ्यास से दुःख-दर्द जन भूल जाता।

अहिंसा, सत्यास्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह,

अन्तस् वासना शुद्धि से प्रसन्नचित्त रह।

शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान,

नियमों के पालन का हो मानवमात्र को ज्ञान।

***

2.

रक्त दान

रक्त है ईश्वर का वरदान,

इससे बढ़कर नहीं कोई दान।

यह अमूल्य है महान,

लाली है इसकी पहचान।

अब तक नहीं मिला उत्पादन का ज्ञान,

यह नहीं बिकता किसी हाट दुकान।

इसी से जिंदा रहता इंसान,

शरीर में भरपूर रक्त है रोगों का निदान।

दुर्घटना में क्षत-विक्षत चाहता रक्तदान,

उसी से बचते हैं मानव के प्राण।

गंभीर रोगों में शल्य चिकित्सा है निदान,

मृत्यु शय्या पर पड़ा इंसान चाहता रक्तदान।

इसके बाद, रक्त ही देता पुनः प्राण,

समय पर न मिले तो मनुष्य निष्प्राण।

भोजन, वस्त्र, धन, भूमि और ज्ञान,

सबसे बढ़कर दान महान।

प्रतिरोधक क्षमता पुष्टकर बनाता बलवान,

यही है सबसे बड़ा बलिदान।

मनुष्य इससे ही पाता है सम्मान,

वस्तुतः रक्तदान है जीवनदान।

रक्त में गर्मी से ही योद्धा बने महान

तभी सीमा पर शत्रु की कांपे जान।

रक्त में उबाल नहीं तो नर बेजान,

रक्तदाता है मित्र और भगवान, रक्त है ईश्वर का वरदान।

***

3.

नशा करे विनाश

घर में उपेक्षित, असफल और निराश,

अवसाद में भटकें, सुखों की करें तलाश।

सिगरेट, तम्बाकू, सुरा, अफीम और भाँग,

नशा सेवन जो करें, बनते उसी का ग्रास।

उन्मादक, घातक, धन नाश करें ये नाम,

इनके सेवन से बांधवों में हों बदनाम।

दुःखी मनुष्य, जो पहले थोड़ा-सा चख लेता,

क्षणिक सुख लोभ में, मात्रा है बढ़ा देता।

मद्य से क्षणिक आनन्द, मन शिथिल होता,

चिन्तन में असमर्थ, सदा निद्रा है देता।

निर्लज्ज ये, सुरापान जूए में मस्त हो जाते,

दुःखी, त्रस्त, कुटुम्बी, रो-रो दिन बिताते।

कुत्ते मुँह चाटते, जब कहीं भी गिर जाते,

शिक्षा, पद, सम्मान, शून्य ही रह जाते।

स्पर्धा में युवतियाँ भी, करती मद्य-सेवन,

संस्कृति, समाज का क्षरण, होता है पतन।

तीक्ष्ण तम्बाकू सेवन से, होता कैंसर रोग,

जो नहीं समझते, हो जाते हैं मृत्यु का भोग।

पुलिस, नेता, अभिनेता चाहे हों अधिकारी,

आज सभी बने हैं, मादक द्रव्यों के व्यापारी।

स्व हित चाहकर, नशा मुक्ति केन्द्र जो जाता,

दृढ़ निश्चय नर ही, व्यसन मुक्त हो पाता।

विश्व के सुधीजन करें नशा उन्मूलन,

शुद्ध सात्विक भोजन से, हो स्वस्थ तन-मन।

 


डॉ. राजकुमार शांडिल्य

हिन्दी प्रवक्ता

शिक्षा विभाग चंडीगढ़

 

 

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...