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शनिवार, 31 जनवरी 2026

दिन कुछ ख़ास है!

कविता


गणतंत्र

प्रेम नारायन तिवारी

 

लाखों बलिदानों का प्रतिफल,

यह गणतंत्र हमारा है।

हमको यह गणतंत्र हमारा,

प्राणों से भी प्यारा है।

आओ हम सब उन वीरों की,

याद करें कुछ कुर्बानी,

जिनके दम पे लालकिले पर,

दिखे तिरंगा प्यारा है।।

 

कुँववर,जफर, तात्या नाना संग,

लड़ी थी झांसी की रानी।

अमरकथा मंगल पाण्डेय की,

जिनने बगावत की ठानी।

मुगल ,मराठे लड़े थे मिलकर,

युद्ध घोर सत्तावन में।

छिटपुट युद्ध लड़े हम तबसे,

हार कभी भी न मानी।।

 

बटुकेश्वर, अशफाक, भगतसिंह,

चन्द्रशेखर को याद करें।

लाहिड़ी, रौशन, बिस्मिल्ल जैसे,

वीरों की जय नाद करें।

गाँधी, नेहरू संग जय सुभाष की,

नारा जोर लगाकर हम।

सीमा पर अमर शहीदों का हम,

प्रेम सहित गुणगान करें।।

 

याद करें हम आज उन्हें भी,

जो गुमनाम शहीद हुए।

जिनके लिए मुहर्रम आया,

लेकिन कभी न ईद हुए।

लड़ते- लडते देश की खातिर,

तन का लहू लुटा डाले,

सजी चिता न खुदी कब्र ही,

शव खा पोषित गिद्ध हुए।।

 

आओ करें प्रतिज्ञा हम सब,

अब ना इसे गंवायेंगे।

इसकी खातिर हँसते हँसते,

अपना शीश कटायेंगे।

भ्रस्टाचारी, लुटेरों सुन लो,

प्रेम तुम्हारी खैर नहीं,

जैसे अंग्रेजों को था खदेड़ा,

वैसे तुम्हें भगायेंगे।।

***
 


प्रेम नारायन तिवारी

रुद्रपुर देवरिया

विशेष

 


कविता

डियर दिसंबर, तुम जा रहे हो…

डॉ. अनु मेहता खन्ना

डियर दिसंबर, तुम जा रहे हो,

तो जाते-जाते सारे दर्द, सारे दुख, सारे ग़म लेते जाना,

बहुत ज़्यादा ना ले जा सको तो

थोड़े ही सही-कुछ कम लेते जाना।

 

इस सूने मन की चौखट पर पड़े

अनचाहे पछतावों की धूल भी हटाते जाना,

और बीते साल की कड़वी यादों को

धीरे-धीरे हवाओं में उड़ाते जाना।

 

डियर दिसंबर, तुम था रहे हो

तो जाते-जाते

वास्तविकताओं के कुरुक्षेत्र में घायल बचे चंद सपनों को ज़रा सहलाते जाना,

उनके थके पंखों में थोड़ी-सी उड़ान फिर से सजाते जाना।

 

निराशा, हताशा और कशमकश सेआहत मन को ज़रा-सा बहलाते जाना,

उसके आँगन में हौसलों  की दीपशिखा जलाते जाना।

 

डियर दिसंबर,तुम जा  रहे हो

मगर जाते-जाते कुछ अच्छी यादें

मेरे दामन में छोड़ते हुए जाना,

 

इस आँगन में फूल बिछाकर

काँटों का मुँह मोड़ते हुए जाना।

 

डियर दिसंबर, तुम जा रहे हो तो

आने वाले इस नए साल को भी अपने ढंग से समझाते जाना,

 

थोड़ी नरमी बरते और सख्ती से पेश न आए, जनवरी को यह बतलाते जाना।

 

देखो तुम पहले दिन ही जनवरी के कान में  चुपके से कह देना कि हमें और ना आजमाएँ,

इन थके ठिठुरते दिनों को अब थोड़ी धूप और थोड़ी राहत बख्शी जाए।

 

और हाँ…डियर दिसंबर एक विनती और है तुमसे कि

अगले साल फिर जब तुम लौटकर आओ,

तब हमारी दहलीज पर

आशाओं के फूल और उम्मीद की  शबनम लेकर आना।

खुशियों की बारिश और दुआओं का  मौसम  लेकर आना,

 

डियर दिसंबर

इस बार हम खुली बाहों से अपनाना चाहते हैं,

ए जिंदगी, हम अब खुलकर मुस्कुराना चाहते हैं।

***

डॉ. अनु मेहता खन्ना

प्राचार्य एवं विभागाध्यक्षा,

आणंद इंस्टिट्यूट ऑफ़ पीजी स्टडीज इन आर्टस,

आणंद


कविता



माँ

प्रेम नारायन तिवारी

माँ तेरी याद ऐसी सताई मुझे,

माँ-माँ कहके रो, मुस्कुराने लगा।

लेटे बिस्तर पर निंदिया न आई मुझे,

लोरी गा-गा के खुद को सुलाने लगा।।

जब सुबह होती थी, पास आती थी तुम,

नरम हाथों से मुझको, जगाती थी तुम,

सटी पलकों को आँचल भिगोकर के तुम,

तब छुड़ाती थी, मैं अब सटाने लगा।

माँ तेरी याद ऐसी सताई मुझे,

माँ- माँ कहके रो मुस्कुराने लगा।।

याद मुझको अभी तक, जमाना वो माँ,

मारकर के भी खाना खिलाना वो माँ,

मेरी आँखों मे आँसू दिखा गर तुम्हें,

तुम तो रोती थी तब, अब रुलाने लगा।

माँ तेरी याद ऐसी सताई मुझे,

माँ- माँ कहके रो मुस्कुराने लगा।।

मुझको बचपन में निंदिया न आती थी जब,

देकर थपकी तू लोरी सुनाती थी तब

बात अब तक न भूली मुझे याद है,

थपकियाँ देकर खुद को सुलाने लगा।

माँ तेरी याद ऐसी सताई मुझे,

माँ-माँ कह के रो, मुस्कुराने लगा।।


प्रेम नारायन तिवारी

रुद्रपुर देवरिया

कविता

 


1.

अपना अंबर

दुष्यंत कुमार व्यास

 

हमने देखा अपना अंबर, कितना खाली-खाली है।

कैसे  टाँके चाँद-सितारे, सारी  सुइयाँ खाली  हैं।

 

वशिष्ठ-अरुंधति हमसे रुठे,

ध्रुव तारा भी पास नहीं,

दूर-दुधिया पथ था प्यारा।

उसकी कोई आस नहीं।

 

गुरु-मंगल दोनों अनबोले, शनि तो एक पहेली है।

कैसे  टाँके चाँद-सितारे , सारी  सुइयाँ खाली हैं।।

 

रात-रात भर गिनते तारे,

सोते उनकी छाँव तले।

दो बाहों के आलिंगन में,

खो जाते हम रात ढले।

 

कमल तंतु भी आ जा पाएँ, इतनी जगह न खाली है।

कैसे  टाँके  चाँद-सितारे , सारी  सुइयाँ खाली  हैं।।

 

तेरा  तारा , मेरा  तारा,

तारों का बस जाल बुना।

उसमें अपना तारा चुनते,

जीवन का संग्राम चुना।

 

हम ने कैसा सपना देखा ,  कैसी देखी बदली है।

कैसे  टाँके  चाँद-सितारे , सारी सुइयाँ खाली है।।

 

यह जो दिन है सूरज उसमें,

लगता सब पर भारी है।

सारे चाँद -सितारे छुपते,

उसकी ही बदमाशी है।

 

वह चाहे उसका ही शासन,करें उसी की जय-जय है।

कैसे  टाँके  चाँद-सितारे  , सारी सुइयाँ खाली  है।।

***


2.

सत्या का गौरा पूजन

 

मौन  कहे  कुछ मौन से , मौन सुने रह मौन।

मौन पिया के मन बसा,तब मुखरित हो मौन।।

 

देख  रहा मूँदे नयन , तन अद्भुत व्यापार।

जिसकी जैसी साधना,वैसा उसको प्यार।।

 

सतरंगी  साड़ी  पहन , माथे पर सिन्दूर।

सूरज पूजन को चली ,संग सखी भरपूर।।

 

प्रेम -पत्र प्रेषित किया, पंडित को समझाय।

इतना  कहना  कान्ह से , पत तेरी ही जाय।।

 

रहूँ  सुहागन  मैं  सदा, पूंजूँ  गौरी  मात।

शिव जैसा औढ़र मिले, दे माता सौगात।।

 

कैसा उसका  प्रेम है , कैसी  उसकी  चाह।

शव काँधे लेकर फिरा, मुख से करी न आह।।

 

ऐसा  दुल्हा  चाहती, बाबुल को संदेश।

उसकी आधी देह में, मेरा  हो  परिवेश।।

 

नहीं  राज्य की कामना, रानी पद बेकार।

जहाँ बसे है साँवरा, वह  मेरी  सरकार।।

 ***

दुष्यंत कुमार व्यास

सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्राध्यापक गणित

शिव-हनुमान मंदिर के सामने,

गली नंबर 6, कस्तूरबा नगर

रतलाम (मध्यप्रदेश)- 457001


कविता

नई सुबह

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

नीरस जीवन में भी, भर जाता है रंग।

नूतन की चाह में, साहस और उमंग।।

ब्रह्म मुहूर्त में जाग, पशु-पक्षी, मानव।

नई ऊर्जा से, दिनचर्या में हैं जुट जाते।।

प्रात: स्वच्छ नीले नभ में चमकते तारे।

क्षितिज में लालिमा से सूर्य की आरती उतारे।।

तेज-पुंज, जीवनदाता, नई सुबह लाता।

सूर्यदेव, जड़ चेतन का पिता कहलाता।।

नित्य भोर में सूर्य देता चलने का संदेश।

कभी न रुकना, तभी आगे बढ़ेगा देश।

आलस्य त्याग से ही सदा रहता स्वस्थ तन।

कर्मठता से ही वश में रहे चंचल मन।।

प्रात: बर्फ से ढकी रजताभ चोटियाँ।

सूर्य किरणों से सबका मन मोह लेती।।

नदी-तीर बहती मन्द, सुगन्ध समीर।

घने पेड़ों में, कर्णप्रिय खग कलरव।।

खेतों में, बैलों की घंटियों का संगीत है भाता।

तभी जीवों को अन्न-फल-दूध मिल पाता।।

ओस की बूँदें, फसलों पर हैं लहराती।

प्रात: मोती - सी मनमोहक, भू को सजाती।।

***

डॉ. राजकुमार शांडिल्य

हिन्दी प्रवक्ता

शिक्षा विभाग, चंडीगढ़


कविता

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस

सुरेश चौधरी

शृंगार लिखूँ,  गुणगान  लिखूँ  या

चारण  बन  शाही प्रतिमान लिखूँ

थी सुलगी हुई  दास्य  ज्वाला तब

सुभाष का  तेज स्वाभिमान लिखूँ

 

एक  ओर  गिडगिडाती  राजनीति

और  धधकती थी  अंतस ज्वाला

व्रत   अंग्रेजों   को   दूर   भगाने

मन   मे  संकल्प  सिंह  ने  पाला

वे  नर  थे  नरसिंह  गए  चढ़ जो

बलिवेदी   पी   देशभक्ति   प्याला

गांधी   नेहरू  नरम  नीति  त्याग

कुछ  करने  निकला वो मतवाला

 

पथ  कण्टक  आतंक  भगाने को

पुष्प  बने  सुभाष  का गान लिखूँ

इतना  भर  दे  अंगार  कलम  में

मैं  क्रांति  वीर का बलिदान लिखूँ

शृंगार  लिखूँ,  गुणगान  लिखूँ या

चारण  बन  शाही प्रतिमान लिखूँ

थी  सुलगी  हुई दास्य ज्वाला तब

सुभाष  का तेज स्वाभिमान लिखूँ

 

स्वतंत्रता  मिल  जाय आक्रोश था

जयहिन्द का अमर नाद मुखर था

राष्ट्र  युवा  शक्ति  की शिराऒं मॆं

उष्ण  रुधिर  वेग  प्रवाह प्रखर था

मिली     आज़ादी  प्रेम-शांति से

प्रचण्ड  उसने  यलगार  किया था

आज़ादी   मिले   खून  के  बदले

बोल  बोल  तन  अंगार  दिया था

 

मेरी  कलम  को  प्रखर धार मिले

भूषण  सी  लेखन की शान लिखूँ

नमन  वीर सुभाष  तुझे जयहिन्द

बारम्बार   हिन्द  का  गान  लिखूँ

शृंगार  लिखूँ,  गुणगान  लिखूँ या

चारण  बन  शाही प्रतिमान लिखूँ

थी  सुलगी हुई  दास्य ज्वाला तब

सुभाष का तेज  स्वाभिमान लिखूँ

 

छुप  कर   भागे और  अँग्रेज़ों की

आँखों  में  धुल जिसने झोंका था

जापान   सिंगापुर  से   ला  सेना

खूब  ब्रिटिश ताकत  को रौंदा था

चला  गया,  गया  नहीं,  प्रश्न  है

कहाँ  गया  जो  वीर अनोखा था

तथ्य   सामने   लाने   होंगे  अब

साजिश  हुई  या  हुआ धोखा था

 

अश्रु  बहा  याद  करूँ नायक को

अभिमान लिखूँ भारत शान लिखूँ

नव  पीढ़ी  करे  कर्म  ऐसा  तब

वीर  नेताजी   का  गुमान  लिखूँ

शिवा  तलवार  के  मैं  वार लिखूँ

राणा  का  भाला   अंजान  लिखूँ

पुकार  है  वीर  सुभाष  सा  बनो

तो आज तुम्हारा स्तुति गान लिखूँ

 

शृंगार  लिखूँ,  गुणगान  लिखूँ या

चारण  बन  शाही प्रतिमान लिखूँ

थी  सुलगी  हुई दास्य ज्वाला तब

सुभाष का  तेज स्वाभिमान लिखूँ

*** 

सुरेश चौधरी

एकता हिबिसकस

56 क्रिस्टोफर रोड

कोलकाता 700046


जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...