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सोमवार, 15 अगस्त 2022

आलेख

 


स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दी साहित्यकारों की भूमिका

डॉ. जयंतिलाल बी. बारीस

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ

चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ

चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि ! डाला जाऊँ !

चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊँ

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक.....

देशभक्ति से ओत-प्रोत यह एक ऐसी रचना है, जिसके जरिए कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने आजादी की बलि-वेदी पर शहीद हुए वीर सपूतों के प्रति अगाध श्रद्धा दिखाई है और बलिदान को सर्वोपरि बताया है। एक फूल के माध्यम से उन्होंने अपनी बातों को जिस सशक्तता व उत्कृष्टता के साथ कहा है, वह बेहद सराहनीय है। इसी तरह जंग-ए-आजादी में अपनी रचनाओं के माध्यम से विशेष भूमिका निभाने वाले साहित्यकारों की एक लंबी फेहरिस्त है।

प्रबुद्ध कवि मैथिलीशण गुप्त ने अपनी रचनाओं में देशप्रेम और जनचेतना की ऐसी लौ जलाई, जिससे प्रेरित होकर समाज के हर वर्ग से लोग स्वतंत्रता संग्राम में कूदने लगे। सोई हुई भारतीयता को जगाते हुए उन्होंने लिखा -

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है

वह नर नहीं, नरपशु निरा है और मृतक समान है....

भारतेन्दु हरीश्चन्द्र ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजों द्वारा निरीह भारतीय जनता पर जुल्मों सितम व लूट-खसोट का उन्होंने बढ़-चढ़कर विरोध किया। उन्हें इस बात का क्षोभ था कि अंग्रेज यहाँ से सारी संपत्ति लूट कर विदेश ले जा रहे थे। इस लूटपाट और भारत की बदहाली पर उन्होंने काफी कुछ लिखा। अंधेर नगरी चौपट राजा नामक व्यंग्य के माध्यम से भारतेंदु ने तत्कालीन राजाओं की निरंकुशता, अंधेरगर्दी और उनकी मूढ़ता का सटीक वर्णन किया है। अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है -

रोबहु सब मिली अबहु भारत भाई

हा-हा भारत दुर्दशा न देखी जाई....

इसी प्रकार राधाकृष्ण दास, बद्री नारायण चौधरी, प्रताप नारायण मिश्रा, पंडि‍त अंबिका दत्त व्यास, बाबू राम किशन वर्मा, ठाकुर जगमोहन सिंह, राम नरेश त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चौहान एवं बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे प्रबुद्ध रचनाकारों ने राष्ट्रीयता एवं देश-प्रेम की ऐसी गंगा बहाई, जिसके तीव्र आवेग से जहाँ विदेशी हुक्मरानों की नींव हिलने लगी, वहीं नौ जवानों के अंतस में अपनी पवित्र मातृभूमि के प्यार का जज्बा गहराता चला गया। एक ओर बंकिमचन्द्र चटर्जी ने आनंद मठ व वन्दे मातरम्‌ जैसी कालजयी रचनाओं का सृजन किया, तो कविवर जयशंकर प्रसाद की कलम भी बोल उठी -

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती....

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद भी स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भागीदारी निभाने में पीछे नहीं रहे और मृतप्राय भारतीय-जनमानस में भी उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए एक नई ताकत, एक नई ऊर्जा का संचार किया। प्रेमचंद की कहानियों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक तीव्र विरोध तो दिखा ही इसके अलावा दबी-कुचली शोषि‍त व अफसरशाही के बोझ से दबी जनता के मन में कर्तव्य-बोध का एक ऐसा बीज अंकुरित हुआ, जिसने सबको आंदोलित कर दिया। प्रेमचंद ने जन जागरण का एक ऐसा अलख जगाया कि जनता हुंकार उठी। सरफरोशी का जज्बा जगाती प्रेमचंद की बहुत सारी रचनाओं को अंग्रेजी शासन के रोष का शिकार होना पड़ा। न जाने कितनी रचनाओं पर रोक लगा दी गई और उन्हें जब्त कर लिया गया। कई रचनाओं को जला दिया गया। परंतु इन सब बातों की परवाह न करते हुए लिखते रहे...अनवरत।

उन पर कई तरह के दबाव भी डाले गए और नवाब राय की स्वीकृति पर उन्हें डराया धमकाया भी गया। लेकिन इन कोशि‍शों व दमनकारी नीतियों के आगे प्रेमचंद  ने कभी हथियार नहीं डाले। उनकी रचना 'सोजे वतन' पर अंग्रेज अफसरों ने कड़ी आपति जताई और उन्हें अंग्रेजी खुफिया विभाग ने पूछताछ के लिए तलब किया। अंग्रेजी शासन का खुफिया विभाग अंत तक उनके पीछे लगा रहा। परंतु प्रेमचंद की लेखनी रूकी नहीं, बल्कि और प्रखर होकर स्वतंत्रता आंदोलन में विस्फोटक का काम करती रही। उन्होंने लिखा-

मैं विद्रोही हूँ जग में विद्रोह कराने आया हूँ

क्रांति-क्रांति का सरल सुनहरा राग सुनाने आया हूँ...

कविवर रामधारी सिंह दिनकर भी कहाँ खामोश रहने वाले थे। मातृभूमि के लिए हँसते-हँसते प्राणोत्सर्ग करने वाले बहादुर वीरों व रणबांकुरों की शान में उन्होंने कहा-

कलम आज उनकी जय बोल

जला अस्थियाँ बारी-बारी

छिटकाई जिसने चिंगारी जो चढ़ गए पुण्य-वेदी पर

लिए बिना गर्दन का मोल

कलम आज उनकी जय बोल...

हिन्दी के अलावा बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, तमिल व अन्य भाषाओं में भी माइकेल मधुसूदन, नर्मद, चिपूलूंठाकर, भारती आदि कवियों व साहित्यकारों ने राष्ट्र-प्रेम की भावनाएँ जागृत की और जनमानस को अंदोलित किया।

कवि गोपालदास नीरज का राष्ट्र प्रेम भी उनकी रचनाओं में साफ परिलक्षित होता है। जुल्मों-सितम के आगे घुटने न टेकने की प्रेरणा उनकी रचनाओं से प्राप्त होती रही। उन्होंने लोगों को उत्साहित करते हुए लिखा है -

देखना है जुल्म की रफ्तार बढ़ती है कहाँ तक

देखना है बम की बौछार है कहाँ तक...

आजादी के बाद के हालातों को स्पष्ट करते हुए नीरज ने कई रचनाएँ लिखी हैं। बतौर बानगी-

चंद मछेरों ने मिलकर सागर की संपदा चुरा ली

काँटों ने माली से मिलकर फूलों की कुर्की करवा ली

खुशि‍यों की हड़ताल हुई है, सुख की तालाबंदी हुई

आने को आई आजादी, मगर उजाला बंदी है...

आज श्यामलाल गुप्त पार्षद का यह गीत, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा,  भले हम गुनगुना रहे हों और इकबाल की यह नज्म भी कि, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्ताँ हमारा... लेकिन देश की मौजूदा परिस्थिति इससे भिन्न है। आज के समय में भी वैसी ही धारदार रचनाओं की जरूरत है, जो जन-जन को आंदोलित कर सके, उनमें जागृति ला सके। भ्रष्टाचार व अराजकता को दूर कर हर हृदय में भारतीय-गौरव-बोध एवं मानवीय-मूल्यों का संचार कर सके।

स्वतंत्रता आंदोलन भारतीय इतिहास का वह युग है जो पीड़ा, कड़वाहट, दंभ, आत्मसम्मान, गर्व, गौरव तथा सबसे अधिक शहीदों के लहू को समेटे है। स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में समाज के प्रत्येक वर्ग ने अपने-अपने तरीके से बलिदान दिए। इस स्वतंत्रता के युग में साहित्यकार और लेखकों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया। अंग्रेजों को भगाने में कलमकारों ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई। क्रांतिकारियों से लेकर देश के आम लोगों तक के अंदर लेखकों ने अपने शब्दों से जोश भरा। प्रेमचंद की ‘रंगभूमि, कर्मभूमि’ उपन्यास हो या भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का ‘भारत -दर्शन’ नाटक या जयशंकर प्रसाद का ‘चन्द्रगुप्त’ सभी देशप्रेम की भावना से भरी पड़ी है। इसके अलावा वीर सावरकर की ‘1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ हो या पंडित नेहरू की ‘भारत एक खोज’ या फिर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की ‘गीता रहस्य’ या शरद बाबू का उपन्यास ‘पथ के दावेदार’ यह सभी किताबें ऐसी है जो लोगों में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने में कारगर साबित हुई।

भारत के स्वतंत्रता के आन्दोलन में हिदी कवियों के ओजस्वी उद्गारों तथा उनसे मिली प्रेरणा ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसे कतई विस्मृत नहीं किया जा सकता। आधुनिक खड़ी बोली हिदी कविता के प्रवर्तक बाबू हरिश्चंद्र ने भारत दुर्दशा का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है ----अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी। पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी।।सबके ऊपर टिक्कस की आफत आई।हा ! हा ! भारत दुर्दशा देखी ना जाई।।राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त अपनी राष्ट्रीय रचनाओं के कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय अत्यंत लोकप्रिय रहे। उनकी ‘भारत-भारती’ सम्पूर्ण भारतवर्ष में गूँज उठी थी। उससे अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने विशेष प्रेरणा प्राप्त की। गुप्तजी को अपनी ओजस्वी कृतियों के लिए जेल-यात्रा भी करनी पड़ी थी। उन्होंने जहाँ स्वतंत्रता आन्दोलन में व्यक्तिगत रूप से भाग लिया वहीँ प्रेरक कविताओं से अनेक भारतीयों को बलि-पथ पर अग्रसर किया। पं. माखन लाल चतुर्वेदी की कविताओं ने भी स्वतंत्रता सेनानियों के ह्रदय में राष्ट्र प्रेम की भावना जाग्रत की। 'एक फूल की चाह; शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ---चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ / चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ / चाह नहीं सम्राटों के सर पर हे हरि ! डाला जाऊँ / चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊँ / मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर देना तुम फ़ेंक / मातृभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जावें वीर अनेक। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने भी अनेक स्वाधीनतापरक कविओताओं का प्रणयन किया। उन्हें पढ़कर पाठकों के ह्रदय में स्वतंत्रता के प्रति सहज अनुराग हुआ है। 'पथिक' खंड काव्य में परवशता और स्वतंत्रता का प्रतिपादन इस प्रकार किया गया है --- एक घड़ी की भी परवशता, कोटि नरक के सम है / पल भर की भी स्वतंत्रता, सौ स्वर्गों से उत्तम है। महाकवि जयशंकर प्रसाद द्वारा प्रस्तुत प्रयाण गीत ने स्वतंत्रता के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा आजादी के दीवानों को दी थी --हिमाद्रि तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती / स्वयंप्रभा समुंज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती /अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ प्रतिज्ञा सोच लो/ प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढे चलो बढे चलो / अराति सैन्य सिन्धु में , सुबाडवाग्नी से जलो / प्रवीर हो जाई बनो, बढे चलो, बढे चलो।श्री जगदम्बा प्रसाद मिश्र "हितैषी" की ये पंक्तियाँ आज भी बड़े गर्व से गायी जाती है -- शहीदों के मजारों पे लगेंगे हर वर्ष मेले / वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा। कविवर श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' का झंडा गीत स्वतंत्रता सेनानियों के लिए शास्त्र ही बन गया था -- विजयी विश्व तिरंगा प्यारा / झंडा ऊँचा रहे हमारा पं.   बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' ने स्वयं सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका निभाई। राष्ट्रकवि पं. सोहनलाल द्विवेदी प्रमुख गाँधीवादी माने जाते हैं। उनकी अनेक रचनाओं का उपयोग स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रभात फेरियों में किया जाता था। श्रीमति सुभद्रा कुमारी चौहान की झाँसी की रानी, रचना का भी स्वाधीनता आन्दोलन में विशिष्ट योगदान रहा है। इनके कवियों के अतिरिक्त अनेक कवियों ने भी अपनी कविता के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। इसमें बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' प्रताप नारायण मिश्र आदि अनेक नाम हैं जिन लोगों ने अपनी कविताओं के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम की अलख जागाने में अपना योगदान देते रहे।

उपन्यास और कहानी के अलावा कवियों ने अपनी कविता से लोगों में देशप्रेम की ऐसी अलख जगाई कि लोग घरों से बाहर निकल आए और क्रांतिकारी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया है। भारत में स्वाधीनता संग्राम का इतिहास उतना ही पुराना है जितना हमारी परतंत्रता का इतिहास। यह देश 1000 वर्ष से भी अधिक समय तक गुलाम रहा,  परंतु इसका सांस्कृतिक स्वरूप अक्षुण्ण बना रहा। भारत की राष्ट्रीयता का आधार राजनीतिक एकता न होकर सांस्कृतिक एकता रही है।

मोहम्मद इकबाल के शब्दों में :- “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा”

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जिस आधुनिक युग का प्रारंभ किया उसकी जड़े स्वाधीनता आंदोलन में ही थी। भारतेंदु और भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों ने युग चेतना को पद्य और गद्य दोनों में अभिव्यक्ति दी। इसके साथ इन साहित्यकारों ने स्वाधीनता संग्राम और सेनानियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए भारत के स्वर्णिम अतीत में लोगों की आस्था जगाने का प्रयास किया। वहीं दूसरी ओर उन्होंने अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया।

द्विवेदी युग के साहित्यकारों ने भी स्वाधीनता संग्राम में अपनी लेखनी द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माखनलाल चतुर्वेदी आदि ने भारतीय स्वाधीनता हेतु अपनी तलवार रूपी कलम को पैना किया। इन कवियों ने आम जनता में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने तथा उन्हें स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा बनने हेतु प्रेरित किया। ‘भारत-भारती’ के रचयिता मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रकवि कहलाए, तो वहीं माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘पुष्प की अभिलाषा’ लिखकर जनमानस में सेनानियों के प्रति सम्मान के भाव जागृत किए। सुभद्रा कुमारी चौहान ने ‘झाँसी की रानी’’ आदि कविताओं के माध्यम से स्वाधीनता आंदोलन को तेज करने में अद्वितीय भूमिका अदा की। मैथिलीशरण गुप्त ने भारत वासियों को स्वर्णिम अतीत की याद दिलाते हुए वर्तमान और भविष्य को सुधारने की बात की:-

“हम क्या थे, क्या है, और क्या होंगे अभी आओ विचारे मिलकर ये समस्याएँ सभी।”

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ में उन्होंने लिखा:- ‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।।’

सुभद्रा कुमारी चौहान की ‘झाँसी की रानी’ कविता ने अंग्रेजों को ललकारने का काम किया:- बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी की रानी थी।’

पं. श्याम नारायण पाण्डेय ने महाराणा प्रताप के घोड़े ‘चेतक’ के लिए ‘हल्दी घाटी’ में लिखा:-

रणबीच चौकड़ी भर-भरकर, चेतक बन गया निराला था, राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था।

गिरता न कभी चेतक तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था, वह दौड़ रहा अरि मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था।।

जयशंकर प्रसाद ने ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ सुमित्रानंदन पंत ने ‘ज्योति भूमि, जय भारत देश।‘ इकबाल ने ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ तो बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने ‘विप्लव गान’ लिखा। इन सबके अलावा बंकिम चन्द्र चटर्जी का देश प्रेम से ओत-प्रोत गीत ‘वन्दे मातरम’ ने लोगों के रगों में उबाल ला दिया। अब किसी कीमत पर देश के लोगों को पराधीनता स्वीकार नहीं था।

“वन्दे मातरम्! सुजलां सुफलां मलयज शीतलां, शस्यश्यामलां मातरम्! वन्दे मातरम्!”

सुभद्रा कुमारी चौहान की “झाँसी की रानी” कविता को कौन भूल सकता है, जिसने अंग्रेज़ों की जड़ें हिला कर रख दी। वीर सैनिकों में देश प्रेम का अगाध संचार कर जोश भरने वाली अनूठी कृति आज भी प्रासंगिक है:-

“सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की, कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,

चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी की रानी थी।”

देशप्रेम की भावना जगाने के लिए जयशंकर प्रसार ने “अरुण यह मधुमय देश हमारा” सुमित्रानंदन पंत ने “ज्योति भूमि, जय भारत देश।” निराला ने “भारती! जय विजय करे। स्वर्ग सस्य कमल धरे।।” कामता प्रसाद गुप्त ने “प्राण क्या हैं देश के लिए के लिए। देश खोकर जो जिए तो क्या जिए।।” इकबाल ने “सारे जहाँ से अच्छा हिस्तोस्ताँ हमारा” तो बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने ‘विप्लव गान’ में लिखा:-

‘‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए

एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर को जाये

नाश ! नाश! हाँ महानाश! ! ! की

प्रलयंकारी आँख खुल जाये।”

कहकर रणबांकुरों में नई चेतना का संचार किया। इसी श्रृंखला में शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, रामनरेश त्रिपाठी,  रामधारी सिंह ‘दिनकर’ राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, राधाकृष्ण दास, श्रीधर पाठक, माधव प्रसाद शुक्ल, नाथूराम शर्मा शंकर, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), माखनलाल चतुर्वेदी, सियाराम शरण गुप्त, अज्ञेय जैसे अगणित कवियों के साथ ही बंकिम चन्द्र चटर्जी का देश प्रेम से ओत-प्रोत “वन्दे मातरम्” गीत:-

“वन्दे मातरम्!

सुजलां सुफलां मलयज शीतलां

शस्यश्यामलां मातरम्! वन्दे मातरम्!

शुभ्र ज्योत्सना-पुलकित-यामिनीम्

फुल्ल-कुसुमित-द्रुमदल शोभिनीम्

सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्

सुखदां वरदां मातरत्। वन्दे मातरम्!”

प्रेमचंद द्वारा रचित 'कर्मभूमि' नामक उपन्यास सन् 1932 में प्रकाशित हुआ था। यह राजनीतिक कथानक पर आधारित उपन्यास है।

प्रेमचन्द का यह उपन्यास पाँच भागों में विभाजित है। इस उपन्यास में लाला समरकांत, उनके पुत्र अमरकांत, पुत्रवधू सुखदा, रेणुकांत (सुखदा का पुत्र), पुत्री नैना सकीना, हाफिज़ हलीम और उनके पुत्र सलीम, धनीराम और उनके पुत्र मनीराम, डॉ. शांतिकुमार और स्वामी आत्मानन्द, गूदड़, प्रयाग, काशी, सलोनी और मुन्नी आदि की कहानी है। कर्मभूमि में परिवारों की कथा है। इसमें प्रेमचन्द देशानुराग, समाज- सुधार, अछूतोद्धार, शिक्षा, ग़रीबों के लिए मकानों की समस्या, देश के प्रति कर्तव्य, जन- जागृति आदि की ओर संकेत करते हैं। कृषकों की समस्या उपन्यास में है तो, किंतु वह प्रमुख नहीं हो पायी। सम्पूर्ण कथा का कार्य- क्षेत्र प्रधानत: काशी और हरिद्वार के पास का देहाती इलाक़ा है।

          स्वतंत्रता दिवस के सुअवसर पर बाबू गुलाबराय का कथन समीचीन है - "15 अगस्त का शुभ दिन भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे अधिक महत्व है। आज ही हमारी सघन कलुष-कालिमामयी दासता की लौह श्रृंखला टूटी थी। आज ही स्वतंत्रता के नवोज्ज्वल प्रभात के दर्शन हुए थे। आज ही दिल्ली के लाल किले पर पहली बार यूनियन जैक के स्थान पर सत्य और अहिंसा का प्रतीक तिरंगा झंडा स्वतंत्रता की हवा के झोंकों से लहराया था। आज ही हमारे नेताओं के चिरसंचित स्वप्न चरितार्थ हुए थे। आज ही युगों के पश्चात् शंख-ध्वनि के साथ जयघोष और पूर्ण स्ततंत्रता का उद्घोष हुआ था।"

आज के हमारे कवियों का और साहित्यकारों का यह महती दायित्व बनता है कि वह इस देश के बारे में सोचें और उसी परंपरा को जीवित रखें जो मैथिलीशरण गुप्त की परंपरा है, प्रेमचंद की परंपरा है, नीरज की परंपरा है, और यह स्मरण रखें कि यहाँ पर राम का चरित्र लिखने के लिए वाल्मीकि तब मिलता है जब राम इस योग्य होता है कि कोई उसकी बारे में लेखनी चला सके। कहने का अभिप्राय है कि यहाँ पर चाटुकारिता को अपना उद्देश्य नहीं माना जाता और दरबारी कवि होना यहाँ पर अभिशाप है। यहाँ दरबार कवि ढूँढता है, कवि दरबारों को नहीं ढूंढते। यहाँ पर कवि किसी मोह के वशीभूत होकर नहीं लिखते। यहाँ तो राष्ट्र जागरण के लिए लिखा जाता है, राष्ट्रोत्थान के लिए लिखा जाता है, राष्ट्र-उद्धार के लिए लिखा जाता है। क्योंकि सब कवि अपना यह दायित्व समझते हैं कि राष्ट्र जागरण, राष्ट्रोद्धार और राष्ट्रोत्थान ही उनकी लेखनी का एकमात्र व्रत है, एकमात्र विकल्प है।

संदर्भ ग्रंथ सूची :-

1.    कबीर वाणी,आर.एस.रमन, निधि बुक सेंटर, दिल्ली, 2008

2.    कर्मभूमि, प्रेमचंद, वाणी प्रकाशन, दिल्ली,1932

3.    भारत-भारती, मैथलीशरण गुप्त , लोकभारती प्रकाशन दिल्ली, 1969

4.    अंधेर नगरी, भारतेन्दु हरिशचंद्र, ,लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019

5.    कामायनी, जयशंकर प्रसाद, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, 1936

 

 


डॉ.जयंतिलाल.बी.बारीस

असिस्टेंट प्रोफेसर

आर.के.देसाई कॉलेज ऑफ एज्युकेशन

वापी (गुजरात)

 

 

 

 

 

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

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हिंदी सिनेमा और स्त्री विमर्श

डॉ.जयंतिलाल बी.बारीस

स्त्री हमेशा से ही सिनेमा के केंद्र में रही है। यहाँ तक कि हॉलीवुड सिनेमा भी स्त्री के इर्द-गिर्द ही कथाओं को बुनता रहा है। सिनेमा की हर विधा में अर्थात् ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक अथवा आंचलिक सिनेमा में स्त्री की समस्याएँ, स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री की यौनिकता, स्त्री की शृंगारिक अभिव्यक्तियाँ, स्त्री का देह सौष्ठव, स्त्री सौंदर्य की सम्मोहक प्रस्तुति आदि सिनेमा के आकर्षक तत्व रहे हैं। सिनेमा में स्त्री की प्रस्तुति पुरुष की दृष्टि से ही होती रही है - यह एक महत्त्वपूर्ण स्त्रीवादी संकल्पना है। हिन्दी सिनेमा को बॉलीवुड के नाम से जाना जाता है। यह भारत के हिंदी सिनेमा उद्योग को हॉलीवुड की तर्ज़ पर मिली विशेष पहचान है। हॉलीवुड की तरह अब “बॉलीवुड” शब्द हिंदी सिनेमा जगत के लिए रूढ़ हो गया है। सिनेमा में स्त्री का आगमन स्त्री सशक्तिकरण का जीता जागता उदाहरण है। अभिनय, फ़िल्म निर्माण और निर्देशन, तकनीकी सहयोग एवं इससे जुड़े सभी क्षेत्रों में बिना किसी वर्जना और रूढ़ियों के आज स्त्री सक्रिय है। यह स्थिति भारतीय सिनेमा के आरंभ में नहीं थी। उस युग में सिनेमा को औरतों के लिए वर्जित और अनैतिक क्षेत्र समझा जाता था। यहाँ तक कि सिनेमा देखना भी स्त्रियों के लिए निषिद्ध था। नाटकों में भी स्त्री पात्रों का अभिनय पुरुष कलाकार ही करते थे। यही स्थिति सिनेमा के उदयकाल में स्त्री पात्रों के लिए मौजूद थी। जब दादा फाल्के ने सन् 1913 में “राजा हरिश्चंद्र” फ़िल्म बनाई तब रानी तारामती की भूमिका के लिए कोई स्त्री कलाकार अभिनय के लिए तैयार नहीं हुई। यहाँ तक की तवायफ़ों के कोठों से भी उन्हें कोई स्त्री फ़िल्म में अभिनय के लिए नहीं प्राप्त हुई। उसी समय उन्हें एक मराठी नाटक कंपनी का पता चला जो कुछ समय के लिए अपना नाटक प्रदर्शन स्थगित कर रही थी। उन्हें वहाँ से मदद मिली और कमलाबाई गोखले से उनका परिचय हुआ। दादा साहब फाल्के ने अपनी अगली फ़िल्म “मोहनी भस्मासुर” में इन्हीं से अभिनय कराया। इस तरह कमलाबाई और उनकी माँ दुर्गा गोखले को भारतीय सिनेमा की प्रथम स्त्री कलाकार होने का ग़ौरव प्राप्त हुआ। सन् 1931 में आर्देश ईरानी द्वारा निर्मित हिंदी की प्रथम सवाक् फ़िल्म “आलम आरा” में मास्टर विठल के साथ नायिका की भूमिका जुबेदा ने की थी। प्रारम्भिक दौर की फ़िल्मों में विदेशी मूल (एंग्लो-इंडियन)” की स्त्रियाँ ही फ़िल्मों में काम को सहर्ष स्वीकार करती थीं। विदेशी मूल की “रूबी मेयर” हिंदी सिनेमा में “सुलोचना” के नाम से मशहूर हुई। 1925 में निर्मित “वीर बाला” में मोहन भवानी के निर्देशन में सुलोचना ने अभिनय किया। इसी क्रम में एस्तर अब्राहम, प्रमिला के नाम से पारसी घुमंतू थियेटर से होते हुए बंबई की फ़िल्मों में स्टंट कलाकार के रूप में स्थापित हुईं। बंबई की फ़िल्मों पर पारसी रंगमंच का प्रभाव है। इसी दौर में पेटेन्स कूपर ने इसी नाम से नर्तकी के रूप में अपनी पहचान बनाई। इन्होंने यूरेशियन थियेटर, पारसी थियेटर और मदन थियेटर ग्रुप से होते हुए बंबई की फ़िल्मों में क़दम रखा। मदन थियेटर की “पति-भक्ति” (1922) में एक समर्पित पत्नी “लीलावती” की भूमिका में दर्शकों को प्रभावित किया। इतालवी मूल की अभिनेत्री “सिगनोरा मिनेली” इस युग की प्रमुख अभिनेत्री थीं। रेनी स्मिथ जो सीता देवी के नाम से मशहूर हुईं, हिमांशु राय की “प्रेम संन्यास” से प्रसिद्ध हुईं। विदेशी मूल की अन्य अभिनेत्रियों में आरिस गास्पार (सबीता देवी), सुजान सोलोमन (फिरोज़ा बेगम), एफी हिपोलेट (इंदिरा देवी), बोनी बर्ड (ललिता देवी), बेरिल क्लेस्सेन (माधुरी) और विन्नी स्टीवर्ट (मनोरमा) आदि ने बंबई फ़िल्म उद्योग में पहले पहल स्त्री पात्रों की भूमिका को एक सामाजिक पहचान दिलाई। भारतीय मूल की प्रथम अभिनेत्री दुर्गा खोटे बनीं जिन्होंने 1932 में “अयोध्याएचा राजा” में अभिनय किया। दुर्गा खोटे एक कुलीन परिवार की सुशिक्षित लड़की थीं। इस अभिनेत्री ने यह सिद्ध कर दिया कि सिनेमा का क्षेत्र केवल निम्न वर्ग या तुच्छ पृष्ठभूमि की स्त्रियों के लिए ही नहीं बल्कि अभिनय कला के प्रदर्शन में आभिजात्य एवं सुसंपन्न परिवारों की स्त्रियाँ भी सम्मिलित हो सकती हैं।

इस परंपरा की सुदृढ़ नींव डालने वाली युगांतरकारी अभिनेत्री थीं “देविका रानी”। देविका रानी उस समय के मशहूर सर्जन जनरल एम एन चौधरी की सुपुत्री थीं जो न केवल अभिनय के क्षेत्र में बल्कि सिनेमाटोग्राफी और फ़िल्म निर्देशन व निर्माण के क्षेत्रों में भी कुशल थीं। 1930 के दशक से फ़िल्मों में भारतीय स्त्रियाँ धीरे-धीरे अपने अभिनय कौशल से सिनेमा के स्वरूप को बदलने लगीं। वी शांताराम ने 1932 में अपनी फ़िल्म “दुनिया न माने “में शांता आप्टे को परिचित कराया। “शोभना समर्थ” ने 1935 में फ़िल्मों में प्रवेश किया और 1942 में विजय भट्ट द्वारा निर्मित “भरत मिलाप” में सीता की भूमिका को जीवंत कर दिखाया। स्त्रियों का फ़िल्मों में प्रवेश भारतीय संदर्भ में स्त्रियों के मौलिक अधिकारों की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घटना थी। नवजागरण काल से आंदोलन के पुरोधा, स्त्रियों की सामाजिक दुर्दशा के विरोध में सुधारों के लिए मुहिम चला रहे थे। स्त्री शिक्षा, स्त्रियों की आर्थिक स्थिति तथा स्त्रियों के प्रति होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न के विरोध में समाज में एक नई चेतना प्रकट होने लगी थी। भारतीय फ़िल्मों पर इस परिवर्तन का प्रभाव पड़ा। इन सुधारों के परिणाम स्वरूप सिनेमा में स्त्री के प्रति एक नई दृष्टि विकसित हुई। प्रारम्भिक दौर की फ़िल्मों में मुख्य रूप से स्त्री की समस्याओं को अधिक से अधिक चित्रित किया गया। यह भारतीय समाज को पुनर्जागृत करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास रहा है जो कि अत्यधिक सफल हुआ। भारतीय फ़िल्मों में प्रारम्भ से ही क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर नारीवादी विषयों को सर्वाधिक प्रस्तुत किया गया। सिनेमा के हर दौर में स्त्री प्रमुख रूप से कथ्य के केंद्र में रही है।

हिंदी फ़िल्मों में नारी चरित्र-प्रधान फ़िल्मों का एक अलग वर्ग है। हिंदी फ़िल्मों में स्त्री जीवन के सुखमय और दुखमय पक्षों का चित्रण समान रूप से हुआ है। सिनेमा में स्त्री चरित्र के त्याग, अनुराग, मातृत्व, प्रेम, समर्पण जैसे गुणों के महिमामंडित स्वरूप को प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही दूसरी ओर उसे दुश्चरित्र, लोभी, षडयंत्रकारी, उग्र, क्रोधी, प्रतिहिंसात्मक, अनैतिक, देहवादी, पुरुषलोलुप, कामुक, और दुस्साहसी खलनायिका के रूप में भी चित्रित किया गया। दोनों ही चित्रणों में अतिशयोक्ति और काल्पनिक तत्व शामिल हैं। स्त्री का आदर्शवादी “देवी” का स्वरूप भारतीय स्त्री की एक नैतिकतावादी लोकरंजक छवि है जिसकी आकांक्षा समाज करता है, किन्तु वास्तविकता के आईने में इसकी छवि धूमिल हो जाती है। वास्तव में हिंदी (भारतीय) फ़िल्मों के कथानक पुरुषवादी दृष्टिकोण से ही लिखे जाते हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर। यहाँ तक कि निर्माता निर्देशक अगर स्वयं कथा लेखक और अभिनेता या नायक हों तो अक्सर वे कहानी को अपने अनुकूल रचते हैं। कथा - नायिका को अपने हिस्से में रखने के ही सत्प्रयास करते हैं। यदि ग़ौर से देखें तो हिंदी फ़िल्में सारी पुरुष वर्चस्ववादी ग्रंथि से ग्रस्त हैं। “गाईड “में राजू गाईड (देवानंद) रोज़ी (वहीदा रहमान) के पात्र को उपन्यास (आर के नारायण कृत गाईड) के कथानक में फेर बदल करके, सारा दोष रोज़ी पर मढ़कर अपने लिए दर्शकों की सहानुभूति बटोरता है। वास्तव में आर के नारायण के उपन्यास में यह चित्रण भिन्न और विपरीत है। फ़िल्मों में स्त्री की असहाय स्थिति का लाभ पुरुष पात्रों ने उठाया है। फ़िल्मों की अधिकांश कहानियाँ ऐसी ही गढ़ी जाती हैं। ऐसे अनेकों संदर्भ हिंदी फ़िल्मों में दृष्टव्य हैं जो स्त्री की निरीहता और असहायता को दर्शाती हैं जो पुरुष वर्चस्ववादी मनोविज्ञान के शिकार हैं। “दिल दिया दर्द लिया” (1966) अंग्रेजी क्लासिक एमिली ब्राँटे कृत “वुदरिंग हाईट्स” का हिंदी रूपान्तरण है जिसमें उपन्यास की नायिका कैथरीन की भूमिका में वहीदा रहमान (रूपा) अपने बाल प्रेमी पात्र हीथक्लिफ़ की भूमिका में शंकर/राजा साहब (दिलीप कुमार) को मृत समझकर ठाकुर रमेश के दोस्त सतीश (रहमान) के दबाव में विवाह के लिए राज़ी हो जाती है। शंकर का रूपा के प्रेम के प्रति अविश्वास उसमें विध्वंसात्मक क्रोध और आक्रोश को जन्म देता है। शंकर की मानसिकता स्त्री के प्रति पुरुषवादी अहंकारयुक्त श्रेष्ठता को सिद्ध करता है। मूल उपन्यास में कथा कुछ अलग राह पर चलती है। “वुदरिंग हाईट्स” उपन्यास विफल प्रेम की विध्वंसात्मक गाथा है। “धूल का फूल” (1959) स्त्री पर पुरुष द्वारा आरोपित अविवाहित मातृत्व की असामाजिक विषम स्थिति की तीखी आलोचना है। फ़िल्म में दोषी पुरुष अपने आभिजात्य संस्कृति छद्म वेश में स्त्री की अस्मिता को कुचलने में सफल होता है। स्त्री की स्थितियों में सुधार की भावना के पीछे परोपकार की भावना अधिक और सामाजिक परिवर्तन की मानसिकता कम दिखाई देती है। सिनेमा में प्रारम्भ से ही स्त्री की छवि को पुरुष की भोगवादी दृष्टि से ही प्रस्तुत किया जाता रहा है क्योंकि इसके संग सिनेमा की कारोबारी व्यवस्था जुड़ी हुई है। आज के उत्तर-आधुनिक समाज में स्त्री की देह को वस्तु और उपभोग्य सामाग्री के रूप में प्रस्तुत करने की सिनेमाई संस्कृति का विकास हो चुका है। यह देखते ही देखते एक परंपरा बनकर स्थापित हो गई। आज भारतीय सिनेमा की वास्तविकता यही है कि पर्दे पर दिखलाई जाने वाली औरत को शृंगारिकता और सौन्दर्य प्रदर्शन की आड़ में पुरुषों के चाक्षुष भोग का बिम्ब बनाया रहा है। अब यह केवल आरोप न रहकर स्वत: सिद्ध हो गया है। इसे परंपरावादी समीक्षक सिनेमा का पश्चिमीकरण या वैश्वीकरण का प्रभाव बताकर अपना पल्ला झाड़ लेना चाहते हैं। चूँकि समकालीन सिनेमा बाज़ारवाद की उत्पादन प्रणाली का अभिन्न अंग बन चुका है, अतएव वह बाज़ार समाज में मौजूद प्रवृत्तियों को नए-नए प्रकार से सुस्पष्ट तथा निरूपित करता रहेगा। आज उपभोक्तावादी माहौल में जब बाज़ार मुनाफ़ा कमाने की हवस में हर वस्तु को माल (commodity) में बदल सकता है तो केवल नारी देह ही नहीं, बल्कि पुरुष के जिस्म की भी क़ीमत लगा सकता है।

पश्चिमी जगत के नारी आन्दोलनों का प्रारम्भ तब हुआ जब उन्नीसवीं शताब्दी की समाप्ति तथा बीसवीं के आरंभ में सुशिक्षित महिलाओं ने मताधिकार की माँग उठाई। इसे आन्दोलन की पहली लहर के नाम से जाना जाता है। दूसरी लहर का संबंध फ्रांसीसी दार्शनिक तथा साहित्यकार, साइमन द बूवे की नारी विमर्श की कृति “सेकेंड सेक्स ( 1949) से है, जिसमे सीमोन ने दावा किया कि स्त्री जन्म से नहीं होती बल्कि वह बनाई जाती है। कुछ समय तक सीमोन मानती रही कि समाजवाद के प्रसार-प्रचार से नारी अधिकारों की प्राप्त हो जाएगी लिहाज़ा वह स्वयं को समाजवादी लेखक घोषित करती रहीं। बाद में समाजवाद से मोह भंग होने पर वह Movement dela liberation des femmes नामक स्त्री संगठन से जुड़ीं और स्वयं को नारीवादी लेखक कहने लगीं। नारीवाद का यह पहला पड़ाव था। 1963 में अमेरिकी पत्रकार बेटी फ्रायडन की पुस्तक The Feminine mystique का प्रकाशन हुआ। इस पुस्तक में उन स्त्रियों की मानसिक अवस्था का अध्ययन किया गया, जो दूसरे महायुद्ध के उपरांत मातृत्व का दायित्व अकेले वहन करती रहीं। फ्रायडन, नारीवाद की दूसरी लहर का उदघाटन करने वाली महिला बनीं। “The Feminine Mistique में उनका प्रमुख तर्क है कि जिसे स्त्री की रहस्यात्मकता (mystique) कहा जाता है उसे न तो कोई नाम दिया जा सकता है और न ही मामूली पड़ताल से उजागर किया जा सकता है। फ्रायडन के बाद केट मिलेट की पुस्तक Sexual Politics (1969) ने नारीवाद की सोच को समृद्ध बनाया।

ग़ौरतलब है कि उपरोक्त पुस्तकों का प्रकाशन ऐसे समय पर हुआ जब अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन तथा वियतनाम युद्ध-विरोधी संघर्षों की शुरुआत हो चुकी थी। स्त्रियों को विश्वास होने लगा कि अपने अधिकारों के लिए सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक लड़ाई खुद को लड़नी पड़ेगी।

“वैयक्तिक ही राजनैतिक है” जैसी बुलंद घोषणा कर दूसरी लहर के आंदोलनकारियों ने नारी देह के शोषण, मातृत्व, प्रजनन, सौन्दर्य प्रतियोगियों और विज्ञापन उद्योगों को सार्वजनिक बहस का दर्जा प्रदान किया। कालांतर में नारीवाद, साहित्य के साथ-साथ सिनेमा में भी नारी छवियों की प्रस्तुतियों की जाँच करने लगा। 1971 में लंदन में एक ऐसे संगठन की स्थापना हुई (लंदन महिला फ़िल्म संगठन) जिसमें उस समय की प्रमुख महिला आंदोलनकारियों ने भाग लिया। उसके एक वर्ष बाद एडिनबरा में विश्व का पहला नारी फ़िल्म महोत्सव आयोजित किया गया। इस प्रकार फ़िल्म की नारीवादी व्याख्या करने वाले लेखकों को एक मंच उपलब्ध हुआ । इसके बाद ही नारीवादी फ़िल्म लेखन का सिलसिला आरंभ हुआ। इस संबंध में नारीवादी फ़िल्म लेखन की प्रभावशाली हस्ताक्षर “लॉरा मल्वी” के दृष्टिकोण पर विस्तार से विचार करना आवश्यक है। 1975 में ब्रिटेन की “स्क्रीन” पत्रिका में प्रकाशित आलेख में “मल्वी” ने लिखा कि समूचे फ़िल्म उद्योग पर पितृसत्ता का शिकंजा कुछ इस तरह कस चुका है कि पर्दे पर दीखने वाली औरत एक मूक यौनेत्तजक प्रतीक बन कर रह गई है। फ़िल्मों के देखने की परंपरागत पद्धति को नकारते हुए वह तर्क देती है कि फ़िल्म देखते समय कहीं-कहीं पुरुष दृष्टि में वायरिज़्म (voyeurism) अर्थात् यौनिक निहार की प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है। सिनेमाघर का पर्दा विशाल दर्पण है जिसे देखते हुए दर्शक न केवल आत्ममुग्ध हो जाता है बल्कि उसकी दमित इच्छाएँ नायक के क्रिया-कलापों में चरितार्थ होने लगती है। आत्मसातीकरण की इस नई प्रक्रिया को “मल्वी” ने - स्कोपोफीलिया अर्थात “ख़ुद को निहारने का आनंद” कहा है। पर्दे पर अंकित आकृति के साथ आत्मसातीकरण होते ही दर्शक जागृत हो जाता है। मल्वी की शिकायत है कि दर्शक का तात्पर्य केवल पुरुषों से है। अर्थात् निहारने का आनंद केवल पुरुषों को मिला है। महत्त्वपूर्ण यह है कि निहारने वाला पुरुष दर्शक भी हो सकता तथा सिनेमाई आख्यान का नायक। कुल मिलाकर सिनेमा पुरुष पात्रों/दर्शकों को सक्रिय और स्त्री पात्रों/दर्शकों को निष्क्रिय तत्त्वों में बादल देता है।

“मल्वी” की अवधारणाओं ने नारीवादी फ़िल्म लेखन को गहराई से प्रभावित किया। इसी क्रम में अन्य नारीवादी फ़िल्म लेखकों में “जोन्स्टन, मेरी ऐन डोआन, काजा सिल्वर मैन और टेरीसा दे लारिटिस” उल्लेखनीय हैं।

रतीय फ़िल्म समीक्षक “आशा कसबेकर” के अनुसार तमाम विरोधाभासों से निपटने के लिए हिंदी सिनेमा एक आदर्श नैतिक ब्रह्मांड रचता है जिसमें औपचारिक रूप से स्त्री की मर्यादा का उल्लंघन न हो किन्तु अनौपचारिक रूप से पुरुषों को शृंगारिक आनंद प्राप्त हो सके। इसके लिए वह अनेक प्रकार की धूर्ततापूर्ण रणनीतियाँ तैयार करता है, जैसे नृत्य-गीतों के ज़रिये देह का प्रदर्शन। कसबेकर इन रणनीतियों को तीन खंडों में बाँटती हैं -

(1) कौमार्य का महिमा मंडन - हिंदी सिनेमा की स्त्री पवित्र है - जैसे गंगा नदी का जल अथवा सीता।

(2) प्रदर्शन - प्रदर्शन सदैव सार्वजनिक रूप में किया जाता है - चाहे वह थियेटर, बार, डिस्कोथेक, रेस्त्रां या सड़क पर हो। इस प्रदर्शन को आख्यान के भीतर तथा बाहर मौजूद दर्शक समान रूप से देखते हैं।

(3) निहारने की प्रवृत्ति का नकार - सिनेमाई दृश्य रचना को कुछ इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है मानो नृत्य को आख्यान के भीतर बैठा दर्शक निहार रहा हो न कि बाहरी दर्शक। इसका लाभ यह है कि बाहरी दर्शक अपराध-बोध से मुक्त होकर संपूर्ण यौनिक सुख प्राप्त का लेता है। फ़िल्मकार जानता है कि भारतीय सेंसर बोर्ड नग्न दृश्यों को दिखाने की अनुमति नहीं देता। इसलिए वह छद्म रूप में वर्षा गीत के बहाने कामुकता को प्रोत्साहित करता है।

हिंदी सिनेमा में स्त्री छवि का निरूपण कई प्रकार से हुआ है। इसकी सर्वाधिक प्रचलित छवि पौराणिक देवी माँ की है। फ़िल्मकारों ने नायिकाओं की नैतिक सर्वोपरिता स्थापित करने के उद्देश्य से उन्हें राधा, सावित्री, सीता, दुर्गा, काली के तुल्य घोषित किया। देवी माँ आदर्श है - वह पवित्रता की प्रतीक है, उसे अपमान सहना पड़ता है ताकि अराजकता को समाप्त कर नई व्यवस्था की स्थापना की जा सके, उसके पुत्रों को उसकी सुरक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए, न्याय के लिए संघर्ष देवी माँ की मर्यादा को बचाने का संघर्ष है । देवी माँ का स्थायी तथा अत्यंत शक्तिशाली बिम्ब मदर इंडिया (1957) में प्रस्तुत किया गया। देवी माँ के पात्र में नरगिस (राधा) भारत माता का प्रतिरूप है। जब उसकी बिगड़ैल संतान बिरजू (सुनील दत्त) ही उसका अपमान करने लगती है तो भारत माता उसे गोली मार देने में ज़रा भी नहीं संकोच करती। राधा (नरगिस- भारत माता) के लिए बिरजू पुत्र नहीं रह गया है वह केवल एक घृणित डकैत है।

देवी माँ की दूसरी छवि राधा (मीरा) की है। रासलीला की परम्परा में राधा के साथ तीन बिम्ब जुड़े हैं - दिव्यता, शृंगारिकता तथा रत्यात्मकता। हिंदी सिनेमा ने राधा-कृष्ण के मिथक का भरपूर उपयोग किया है चाहे वह “गीत गाता चल” (1975) हो या “बोल राधा बोल” अथवा “मुकद्दर का सिकंदर” अथवा “देवदास”। देवी माँ की तीसरी छवि सीता की है जिसे पति के हाथों अपमानित होना पड़ता है। वह अपनी पवित्रता को स्थापित करने के लिए अग्नि -परीक्षा से गुज़रने के लिए तैयार हो जाती है। ए चंद्रा के निर्देशन में बनी “तेज़ाब” (1988), बासु भट्टाचार्य की “पंचवटी” (1986)तथा श्याम बेनेगल की “निशांत” (1975) सीता के बिम्ब के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

दुष्ट दमन और राक्षस संहारक दुर्गा/काली (शक्ति) की छवि हमें 1970 तथा 1980 के दशकों में बनी तीन फ़िल्मों - “इंसाफ का तराजू (1980), प्रतिघात (1987), ज़ख़्मी औरत (1988)” तथा 90 के दशक में बनी प्रकाश झा की “मृत्युदंड” में स्पष्ट दिखलाई पड़ती है। हॉलीवुड की परिभाषा से इन्हें बदला लेने वाली औरतें कहा जाएगा किन्तु दुर्गा बदला नहीं लेती वह तो असुर और आसुरी प्रवृत्ति का संहार करती है। इसीलिए इन फ़िल्मों की नायिकाएँ दुर्गा की प्रतिरूप हैं न कि किसी हॉलीवुड की तर्ज़ पर गढ़ी प्रतिशोधात्मक नारी।

दरअसल स्वतन्त्रता मिलने के कई दशकों बाद भी हिंदी सिनेमा सामंती या उपनिवेश-कालीन आग्रहों से मुक्त नहीं हो पाया। कुछ अपवादों को छोड़कर पर्दे पर दिखाई जा रही वही स्त्री अच्छी थी जिसने संयुक्त परिवार के दायरे के भीतर रहते हुए पितृसत्ता को ज्यों का त्यों बनाए रखा था। इससे ठीक विपरीत छवि आधुनिक औरत की है। आधुनिक औरत विद्रोही और महत्त्वाकांक्षी है - राजकपूर की “अंदाज़” (1948)। पितृसत्ता को उससे सबसे अधिक ख़तरा था, इसीलिए उसका व्यंग्य चित्र प्रस्तुत करना ज़रूरी हो गया था। उसे पाश्चात्य लिबास पहने, सिगरेट पीते, क्लब जाते डांस करते, ऊँची आवाज़ में बोलते, मर्दों से ज़बान लड़ाते तथा षडयंत्र रचते दिखाया गया। पितृसत्ता स्त्रियों की आज़ादी के ख़िलाफ़ है। इसीलिए वह आज़ाद दीखने वाली हर औरत को दंड का पात्र मानता है। बलात्कार आज़ाद औरत को दिया गया दंड है। बलात्कार का प्रथम चरण स्त्री निर्वस्त्रीकरण है। ज़ाहिर है सेंसर बोर्ड ऐसे दृश्यों के क्लोज़प की अनुमति नहीं देता । इसलिए शॉट की यौनेत्तजकता को क़ायम रखने के लिए कैमरा भीड़ पर केन्द्रित कर दिया जाता है जो निर्वस्त्र की जा रही औरत को बेशर्मी से निहार रही है। निर्देशक जानता है कि सिनेमाघर में मौजूद सैकड़ों जोड़ी आँखें भी निहारने की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा हैं। बाद में भुक्तभोगी स्त्री अकेले ही बलात्कारी पुरुष का विनाश करने में कामयाब हो जाती है। दुर्गा के प्रतिरूप को इस काम के लिए न संस्था चाहिए और न ही कोई आंदोलन। इस प्रकार देवी माँ का बिम्ब बरक़रार रखते हुए फ़िल्मकार यौनिकता को छद्म रूप से से प्रवेश दिलाने में सफल हो जाता है।

यौनिक निहार की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करने के लिए हिंदी सिनेमा ने एक और महत्त्वपूर्ण प्रयोग किया। फ़िल्मों में खल-चरित्र वाली स्त्री पात्र -वैम्प की प्रस्तुति। वैम्प में वह सभी विशेषताएँ होती हैं जो देवी माँ में नहीं पाई जाती जैसे कौमार्य, पवित्रता, लावण्य आभा आदि। वैम्प अनियंत्रित वासना का प्रतीक है। उसे नाईट क्लबों, मदिरालयों या नाच घरों में देखा जा सकता है। वह पाश्चात्य स्त्रियों की भाँति चरित्रहीन थी क्योंकि पराये मर्दों के साथ नाचने में उसे परहेज़ न था। स्वातंत्र्योत्तर काल के शुरुआती दौर में वैम्प को प्राय: एक विदेशी भारतीय महिला के रूप में चिह्नित किया जाता था। चूँकि वह नाचघर की संस्कृति की प्रतिनिधि थी अतएव कैबरे के दृश्यों में उसकी मुख्य भूमिका होती थी। इस प्रकार 50-60 तक के दशकों में हिंदी सिनेमा ने वैम्प (खलनायिका) तथा कैबरे नृत्य के ज़रिये यौनिक निहार को बराबर प्रोत्साहन दिया। “श्री 420 (1954), नौ दो ग्यारह (1957) तथा आर-पार (1953)” वैम्प और उसके कुटिल व्यवहार के प्रमुख उदाहरण हैं। 1970 तक पहुँचते-पहुँचते वैम्प का चरित्र अर्थहीन हो गया। अब नायिका स्वयं ही प्रदर्शन की वस्तु बन गई । किन्तु नायिका के देह प्रदर्शन के लिए एक सार्वजनिक जगह की तलाश थी जहाँ मौजूद दर्शकों की आड़ में सिनेमाघर के दर्शकों को निहारने का अवसर प्रदान किया जा सके। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए कॉलेज के वार्षिकोत्सव, नृत्य प्रतियोगिताओं, संस्थापना दिवस इत्यादि को दृश्य आख्यान में शामिल किया गया। “दिल तो पागल है” (1998) की समूची कहानी का तान-बाना नृत्य प्रतियोगिता के इर्द-गिर्द बुना गया है। इस प्रकार के नृत्यों का परिवर्तित रूप उन फ़िल्मों में देखने को मिलता है जहाँ नायिका को अपहृत कर लिया जाता है और वह नायक को बचाने तथा विलन को रिझाने के लिए नाचने को तैयार हो जाती है। नायिका के शील की क़ुर्बानी (नृत्य) को सार्वजनिक स्थल में देखा जाता था । जेवेल थीफ़ (1967), सीता और गीता (1972) तथा शोले (1971) और “क़ुर्बानी” नृत्य की ख़ास मिसालें हैं।

हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐतिहासिक (हिस्टोरिकल) और मुसलिम सामाजिक (सोशल) कही जाने वाली फ़िल्मों का विशेष दर्जा है। इस समूह (Genre) में पाई जाने वाली फ़िल्मों का विशेष महत्त्व है क्योंकि हिंदी फ़िल्मकार को नवाबी तहज़ीब की आड़ में कोठे में रहने वाली तवायफ़ के चरित्र निरूपण का अच्छा अवसर मिलता है। कोठा ऐसी भौगोलिक जगह है जो गुज़रे वक़्त का प्रतीक होने के साथ-साथ आधुनिकता के प्रभावों से विमुक्त है। कोठे के अंत:स्थल मुसलिम तहज़ीबों से रचे-बसे होते हैं वहाँ मुशायरे, ठुमरी और ग़ज़ल गायकी पूरी तरह मौजूद है। कोठे की छवि जो तवायफ़ है वह साधारण वेश्या नहीं होती। उसके क़द्रदान शहर के तमाम रईस और उमरा होते हैं। तवायफ़ एक तरह से इतिहास की त्रासदी है। कालांतर में समाज में उसका सम्मान घट गया। किन्तु वह अपनी शर्तों पर जीना जानती है। सत्ता के अत्याचारी स्वरूप का पर्दाफ़ाश करने में वह ज़रा भी नहीं हिचकती । मुसलिम सोशल फ़िल्मों में तवायफ़ के सकारात्मक चरित्र को पूरी तरह से उभारा जाता है। किन्तु अधिकतर फ़िल्मकारों की ख़ास दिलचस्पी कोठे पर होने वाले मुजरों में दिखाई देती है। इस प्रकार तवायफ़ और मुजरा एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं। कोठा, तवायफ़ और मुजरा ऐसे अलंकारपूर्ण प्रतीक हैं जिन्हें पाकीज़ा (1971), उमराव जान (1981), सरदारी बेगम (1996) को मुस्लिम सोशल के नाम पर भरपूर इस्तेमाल किया गया है। कोठे और तवायफ़ों की कहानियों पर बने ऐसे मुसलिम सोशल अधिक लोकप्रिय हैं, क्योंकि कोठे में नृत्य (मुजरा) करने वाली तवायफ़ पुरुषों के यौनिक निहार की ज़रूरतों को पूरा करती है। यह आवश्यक नहीं कि मुसलिम सोशल में कैमरा तवायफ़ की देह पर ही केन्द्रित रहे। वस्तुत: पाकीज़ा की नायिका साहिब जान (मीना कुमारी) के लाल रंग में नहाये पैर यौनिक निहार का बिन्दु बन जाते हैं।

1993 के दशक से हिंदी सिनेमा में स्त्री पात्रों एवं नर्तकियों के देह प्रदर्शन के लिए आइटम गीत परंपरा का आरंभ हुआ। इस परंपरा ने फ़िल्मों की व्यापारिक क्षमता में कल्पनातीत वृद्धि कर दी। यह दृष्टव्य है कि जैसे जैसे फ़िल्मों से कथावस्तु अदृश्य होती गई, सार्थकता का ह्रास होता गया, स्त्री देह की फूहड़ और अश्लील प्रस्तुति को बाज़ार की स्वीकृति प्राप्त होती गई। इस दौर में प्रयोग के रूप में शामिल किए गए आइटम गीत (item songs) को इसी ऊहापोह की परिणति माना जा सकता है। आइटम गीत की विशेषताएँ हैं - प्रमुख चरित्र का सिनेमाई आख्यान का हिस्सा न होना, प्रदर्शन का ऊर्जामय होना, द्विअर्थी शब्दों, व्यंजनापूर्ण भाव-भंगिमाओं का प्रयोग तथा कैमरे को विभिन्न कोणों से संचालित कर क्लोज़अप द्वारा दर्शकों की वासना जागृत करना। कुछ फ़िल्म विशेषज्ञों का मानना है कि आइटम गीत की शुरुआत “खलनायक” (1997) की बहुचर्चित प्रस्तुति “चोली के पीछे क्या है” से हुई थी। इस गीत को लेकर राष्ट्रीय मीडिया में ज़बर्दस्त प्रक्रियाएँ हुईं । दिल्ली के वकील और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य “आर पी चुग” ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की जिसमें गीत पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया गया था। अपनी याचिका में चुग ने गीत को “अश्लील तथा स्त्रियों के लिए अपमानजनक” घोषित किया था। इसी प्रकार फ़रीदाबाद के विनीत कुमार ने स्थानीय उपभोक्ता फ़ोरम में दायर की गई एक याचिका में गीत पर पाबंदी लगाने की माँग उठाई। कुमार की दलील थी कि गीत “भारतीय संस्कृति, अंतरात्मा तथा नैतिकता~” के विरुद्ध था। मीडिया द्वारा विवाद को अधिक प्रश्रय दिये जाने का नतीजा यह हुआ कि फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों से बढ़कर कारोबार किया।”खलनायक” की सफलता के बाद आइटम गीत मानो हिंदी सिनेमा के नए रूपक बन गए। “छम्मा छम्मा (चाइना गेट, 1998), महबूब मेरे (फिजा, 2000), माही वे (कल हो न हो) धूम मचा ले (धूम 2004), कजरारे (बंटी और बबली 2005), बीड़ी जलइके (ओंकारा), रेस, खाकी, अग्निपथ आदि दर्जनों फ़िल्में आई जिनमें आइटम गीतों का प्रयोग दर्शकों को लुभाने के लिए किया गया और यह परंपरा अब अपरिहार्य हो गई है। सिनेमा के आरम्भिक दौर से ही स्त्री को पर्दे पर किस प्रकार दिखलाया जाए? यह प्रश्न फ़िल्मकारों को उद्वेलित करता रहा है। विगत शताब्दियों में हिंदी फ़िल्मकारों ने इसके लिए तरह तरह के बिम्बों का प्रयोग किया है। फिर भी वह दो दबावों के कारण स्वयं को विवश और असहाय पाता है। पहला दबाव वित्तीय है तो दूसरा अनुभूति से जुड़ा। इन दबावों से प्रभावित निर्माता और निर्देशक का प्रथम लक्ष्य होता है स्त्री देह का यथासंभव प्रदर्शन ताकि पुरुष दर्शकों को कामासक्त आनंद की अनुभूति हो सके। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के साथ यह दबाव बढ़ता ही जाएगा लेकिन फ़िल्मकारों को अपने प्रतिबद्ध दर्शकों की नैतिक चिंताओं का ख़्याल भी रखना पड़ेगा। अतएव वह स्त्री की मर्यादा और मान सम्मान को पूरी तरह से नज़रंदाज़ नहीं कर सकता।

संदर्भ सूची

1. शहर और सिनेमा: वाया दिल्ली; मिहिर पंड्या; वाणी प्रकाशन; प्रथम संस्करण 2011 आवारा हूँ– ब्लॉग

2. सिनेमा और संस्कृति; डॉ. राही मासूम रजा; संपादन एवं संकलन प्रो. कुंवरपाल सिंह; वाणी प्रकाशन; आवृति 2011

3. भारतीय सिने सिद्धान्त; डॉ. अनुपम ओझा; पहली आवृति; 2009 राधा कृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड नई दिल्ली

4. अपनी माटी पत्रिका, अक्टूबर-दिसम्बर 2014; अंक 16

5. सिनेमा, साहित्य और हिंदी; दैनिक जागरण; 22 जुलाई 2016

6. साहित्य और सिनेमा: भूमिकाओं का उलटफेर; दैनिक भास्कर 17 मई 2016

7. साहित्य और सिनेमा; दैनिक जागरण पत्रिका; डॉ पुनीत बिसारिया 16 जून 2015

8. परख, (2011), भूमंडलीकरण के दौर में. समयांतर. फरवरी, पृ.70

9. परख, जवरीमल्ल, जनसंचार माध्यमों का सामाजिक चरित्र 2006 , अनामिका

पब्लिशर्स.2006. पृ. 172

 

 


डॉ.जयंतिलाल बी.बारीस

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर

आर.के.देसाई कॉलेज ऑफ एज्युकेशन

वापी (गुजरात)

 

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

आलेख

 


राजस्थानी लोक नृत्यों में जालोर का ढोल नृत्य’

डॉ. जयंतिलाल बी. बारीस

प्रत्येक राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति एवं सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण एक अलग पहचान रखता है। भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिम भाग में अवस्थित राजस्थान राज्य भौगोलिक दृष्टि से पूर्व में गंगा-यमुना नदियों के मैदान, दक्षिण में मालवा के पठार तथा उत्तर एवं उत्तर पूर्व में सतलज-व्यास नदियों के मैदानों से घिरा हुआ है। इस राज्य की कहानी गौरवपूर्ण परंपरा की कहानी है। एक ओर पृथ्वीराज चौहान, राणा साँगा, प्रताप, वीर दुर्गादास, अमरसिंह राठौड़ आदि द्वारा राज्य का नाम विशेष रूप में गौरवान्वित किये जाने का बोध होता है तो दूसरी ओर संस्कृति में समाहित भिन्न-भिन्न रंगों, रूपों एवं कलाओं के दिग्दर्शन होते हैं। राजस्थान की सांस्कृतिक विशेषता को रेखांकित करते हुए डॉ. जयसिंह नीरज लिखते हैं-‘‘देश के परिदृश्य में राजस्थानी का सांस्कृतिक वैभव बेजोड़ है। त्यागमयी ललनाओं, साहसी वीरों और गरिमामयी संस्कृति के इस प्रदेश का भौगोलिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक वैविध्य अनोखा है। यहाँ एक ओर दूर-दूर तक फैली अरावली की शृंखलाएँ हैं, तो दूसरी ओर विराट मरुस्थल। एक ओर पूर्वांचल और दक्षिणांचल हरीतिमा के वैभव से युक्त हैं, तो दूसरी ओर बियावान मरु के टीलों का अखण्ड साम्राज्य। उत्तर में गंगानगर से लेकर दक्षिण में डूँगरपुर, बाँसवाड़ा तक और पूर्व में अलवर, भरतपुर से लेकर पश्चिम में जैसेलमेर तक फैला यह प्रदेश आकार में ही बड़ा नहीं है, वरन् प्राकृतिक सम्पदा, कलात्मक वैभव, रहन-सहन, वेश-भूषा, बोली-भाषा, धर्म और दर्शन आदि में भी इतना समृद्ध और सम्पन्न है कि इसकी तह तक संस्कृति-कर्मी अभी भी बहुत कम पहुँच पाये हैं।‘‘(राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा-सं. डॉ. जयसिंह नीरज व डॉ. बी.एल.शर्मा, (भूमिका से)पृ.-5,)

राजस्थानी लोक संस्कृति में समाहित लोक नृत्यों में लोक जीवन की सरसता, सरलता, सहजता के साथ ही साथ लोक गीत, लोक वाद्य, लोक शृंगार एवं कलाओं का समावेश रहता है। लोक जीवन के हृदय में व्याप्त भावों के स्वरूप को प्रकट करते हैं लोक नृत्य। राजस्थान में प्रचलित लोक नृत्य की विशेषता को रेखांकित करते हुए हरदान हर्ष लिखते हैं-‘‘राजस्थान के लोक-नृत्य राजस्थानी संस्कृति के अनुपम शृंगार हैं। यहाँ की प्रकृति ने राजस्थानी व्यक्ति को एक ओर शारीरिक रूप से कठोर और परिश्रमी बनाया है तो दूसरी ओर मन से उसे कोमल और संवेदनशील। आनन्द के समय में उत्सवादि अवसरों पर वह प्रसन्नता से झूमने लगता है। वह अपनी अंग-भंगिमाओं का अनायास, अनियोजित प्रदर्शन करता है। इस तरह लोग तब सामूहिक रूप से झूमने लगते हैं, वे किसी नियम से बंधे नहीं होते। बढ़ते हुए उत्साह के साथ, किसी लोक-गीत की लय के साथ, किसी लोक-वाद्य की ताल के साथ उनके अंगों की थिरकन प्रकट होती है, जिसे देशी-नृत्य या लोक-नृत्य कहा जाता है।‘‘(राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति-हरदान हर्ष, पृ.-208) राजस्थान के लोक-नृत्य में भवाई नृत्य, घूमर-नृत्य, डंड़िया-नृत्य, तेरहताली नृत्य, डांडया नृत्य, कालबेलिया-नृत्य, ढोल नृत्य, थाली-नृत्य, गणगौर नृत्य आदि प्रमुख हैं, जिनमें स्थानीय रंग की छटा भी दृष्टव्य है।

‘जालोर‘ राजस्थान राज्य के तैंतीस जिलों में से एक जिला है जो कि राज्य के पश्चिम में मरुस्थल क्षेत्र से संबंधित है। इस जिले का ‘ढोल नृत्य‘ राज्य के लोक नृत्यों में अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए प्रसिद्ध है। ‘जालोर का ढोल नृत्य मरुस्थल क्षेत्रों के अलावा अन्य क्षेत्रों में विशेष रूप से विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर किया जाता है। जालोर का ‘ढोल नृत्य पुरुष-प्रधान नृत्य है। राज्य में जीवन यापन करने वाली सरगरा, ढोली, भील आदि जातियों द्वारा यह नृत्य अधिक किया जाता है। जालोर और ढोल नृत्य से संबंधित एक किंवदती है जिसे व्यक्त करते हुए डॉ. कालूराम परिहार लिखते हैं-‘‘जब जालोर बसा था उन्हीं दिनों सिवाणा गाँव के खींवसिंह राठौड का सरगरा जाति की युवती से प्रेम हो गया और वह सिवाणा छोड़कर जालोर आ गया। यहाँ आकर खींवसिंह ढोल बजाने लग गया और जालोर का ढोल नृत्य प्रसिद्ध हो गया।(राजस्थान के लोकनृत्य और लोकनाट्य-डॉ.कालूराम परिहार, पृ.-26)

जालोर के ‘ढोल नृत्य से संबंधित ‘ढोल एक अवनद्ध लोक वाद्य है। अवनद्ध अर्थात चमड़े आदि से ढका हुआ। अवनद्ध से संबंधित लोक वाद्यों में चंग, डफ, ढोलक, ढोल, नगाड़ा, नौबत आदि हैं। ‘ढोल वाद्य को चढ़ाने और उतारने के लिए डोरी में लोहे या पीतल के छल्ले लगे रहते हैं। ढोल का नर भाग डंडे से तथा मादा भाग हाथ से बजाया जाता है। लोक नृत्यों की माधुर्य वृद्धि के साथ ही वातावरण निर्माण एवं भावाभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाने में इन वाद्यों की भूमिका किसी भी स्तर से कम नहीं। राज्य में ‘ढोल‘ वाद्य को बजाने संबंधी विशेषता व मांगलिक कार्यों में इसके महत्त्व को अभिव्यक्त करते हुए हरदान हर्ष लिखते हैं-‘‘यह एक मांगलिक वाद्य है। विवाह के प्रारम्भ में ढ़ोल के ऊपर भी स्वास्तिक का चिन्ह बनाते हैं। इसका पूजन होता है और इसके रोली चढ़ाते हैं।....राजस्थान में यह बारह प्रकार से बजाया जाता है - एहड़े का ढ़ोल, गेर का ढ़ोल, नाचने का ढ़ोल, झोटी ताल (देवरे के देवी-देवताओं के सामने बजाई जाती है), बारू ढ़ोल (लूट के समय बजाया जाता है), घोड़ चढ़ी का ढ़ोल (दूल्हा घोड़े पर चढ़कर जाता है उस समय), बरात चढ़ी का ढ़ोल, आरती का ढ़ोल, वार त्योहार का ढ़ोल, सगरी को न्योतो (जीमणे का निमंत्रण) आदि। इसको बजाने के लिए दो आदमियों की आवश्यकता पड़ती है। राजस्थान के कई लोक-नृत्यों में यह बजाया जाता है, जैसे-जालोर का ढोल नृत्य, भीलों का गेर नृत्य और शेखावाटी का कच्छी घोड़ी नृत्य।‘‘(राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति-हरदान हर्ष, पृ.-218) इन शैलियों में बजने वाले ढोल की ध्वनियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं जैसे कि ‘ढाक्-ढिना, ढाक्-ढिना, ढाक्-ढिना.......’, धिना-धिना, धिक-धिका......‘, ‘धाक धिना, तिरकट-तिना........’, आदि।

‘ढोलनृत्य’ में ढोल का आकार सामान्य ढोल से काफी बड़ा होता है। ढोल नृत्य का मुख्य कलाकार अपने शरीर पर तीन ढोल बाँधकर उन्हें बजाता है। शरीर में बँधे तीन ढोलों में से प्रथम ढोल वह अपने सिर पर रखता है, द्वितीय ढोल सामने की तरफ रखता है और तृतीय ढोल पीछे की तरफ रखता है। इन तीनों ढोलों को इस तरह से शरीर में बाँधा जाता है कि नृत्य नर्तक अपनी कलाएँ या नृत्य को प्रस्तुत करते हुए किसी तरह की परेशानी अनुभव न करे और ढोल भी अपने स्थान से खुले नहीं। मुख्य कलाकार के साथ अन्य सहयोगी कलाकार भी होते हैं जो कि नृत्य के साथ साथ वादन में भी उपयुक्त भूमिका निभाते हैं।

‘ढोल नृत्य’ में मुख्य कलाकार ढोल को पहले ‘थाकना शैली’ में बजाना शुरु करता है। थाकना शैली से तात्पर्य है एक तरह से वादन से पहले की भूमिका के लिए बजाये जाने वाली लय व ताल। ज्यों ही थाकना समाप्त हो जाता है तब अन्य नर्तक कोई मुँह में तलवार लेकर, कोई हाथों में डण्डे लेकर, काई भुजाओं में रूमाल लटकाकर लयबद्ध अंग संचालन करके नृत्य करने लगते हैं। नृत्य के दौरान अनेक जोशीली भाव-भंगिमाओं को ढोल नृत्य के कलाकार प्रदर्शित करते हैं। थाकना शैली के अलावा भी अन्य अलग-अलग शैलियों में ढोल का वादन होता है। ढोल वादन के साथ नृत्य दृश्य एक तरफ जोश से भरपूर होता है तो दूसरी तरफ गति से। ढोल नृत्य में नाचते हुए, वादन करते हुए कलाकार जोश में आकर एक दूसरे के ढोल पर भी डंका मारते हैं। ढोल नृत्य से संबंधित नर्तक उछलते-कूदते हुए आपस में तारतम्य बनाए रखते हैं। इस नृत्य में नर्तक ताल और लय की एक शृंखला बनाते हैं। ‘ढोल नृत्य’ में एक तरफ राजस्थानी लोक संस्कृति के दिग्दर्शन होते हैं तो दूसरी तरफ लोक कला की मार्मिकता एवं रसात्मकता की अनुभूति होती है।

सहायक ग्रन्थ सूची

१. राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा-सं. डॉ. जयसिंह नीरज व डॉ. बी.एल.शर्मा, राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी प्लाट नं १ ,झालाना सांस्थानिक क्षेत्र, जयपुर-राज. तेरहवाँ संस्करण २००५

२.राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति-हरदान हर्ष, आशीर्वाद पबिल्केशन्स, बी -10 टोक रोड, जयपुर-३०२०१५, नवीन संस्करण -2004

३.राजस्थान के लोकनृत्य और लोकनाट्य-डॉ.कालूराम परिहार, रायल पब्लिकेशन १८ शक्ति कॉलोनी,गली नं २,रातानाडा-जोधपुर (राजस्थान) प्रथम संस्करण २००९

 



जयंतिलाल बी. बारीस

असिस्टेंट प्रोफेसर

आर.के. देसाई कॉलेज ऑफ एजुकेशन

वापी

 

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...