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शुक्रवार, 27 जून 2025

पुस्तक चर्चा

 


मूर्तियों के जंगल मेंआग से गुजरते हुए ...

गुर्रमकोंडा नीरजा

पत्रकारिता के क्षेत्र में सुभाष राय एक जाना-पहचाना नाम है। साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन सरोकार’ के संपादन से वे जुड़े रहे। वर्तमान में सुभाष जी ‘जनसंदेश टाइम्स’ के प्रधान संपादक के रूप में लखनऊ में कार्यरत हैं। 1957 में उत्तर प्रदेश के बड़गाँव (मऊ) में जन्मे सुभाष राय की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में हुई। उन्होंने प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान के.एम.आई., आगरा से हिंदी भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि अर्जित की। तदुपरांत संत साहित्य (संत कवि दादू दयाल के साहित्य) पर पीएच.डी. की उपाधि अर्जित की। ‘सलीब पर सच’ (2018) उनकी कविताओं का पहला संग्रह है तथा ‘जाग मछंदर जाग’ और ‘अँधेरे के पार’ आलोचनात्मक निबंध संग्रह। ‘नई धारा रचना सम्मान’, ‘माटी रत्न सम्मान’ एवं ‘देवेंद्र कुमार बंगाली स्मृति कविता सम्मान’ आदि से आप अलंकृत हो चुके हैं। 

कवि के रूप में सुभाष राय उस सच को उजागर करने के लिए छटपटाते हुए प्रतीत होते हैं जो आज के समय में भीड़तंत्र और षड्यंत्र के कारण गायब होता जा रहा है। ‘सलीब पर सच’ कविता संग्रह की भूमिका में उन्होंने इस तथ्य को उजागर किया है कि कविता उनके भीतर प्राण की तरह बसती है। वे कहते हैं कि ‘मेरा परिचय/ उन सबका परिचय है/ जो सोए नहीं हैं जनम के बाद/ लपट है जिनके भीतर/ मेरा परिचय/ उन अनगिनत लोगों/ का परिचय है/ जो मेरी ही तरह/ उबल रहे हैं लगातार।’

आज चारों ओर संवेदनहीनता और संवादशून्यता का जंगल है। इस जंगल में अनायास ही मनुष्य घुसता जा रहा है। इस जंगल में अंदर जाने के लिए तो रास्ता है, लेकिन बाहर आने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं देगा। यह तो जंतर-मंतर है। एक संवेदनशील प्राणी इस संवेदनहीनता और संवादशून्यता को नहीं पचा पाएगा। वह अपने आस-पास घटित घटनाओं को देखकर मौन भी धारण नहीं कर पाएगा। सुभाष राय भी अपने आसपास घटित घटनाओं से इस कदर विचलित हो जाते हैं कि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए कलम उठाते हैं।

सुभाष राय साहित्यकार के साथ-साथ पत्रकार भी हैं। अतः वे अपने आपको परिवेश से काट ही नहीं सकते। इसी का परिणाम है उनकी काव्य कृति ‘मूर्तियों के जंगल में’ (2022, नोएडा: सेतु प्रकाशन, 119 पृष्ठ, मूल्य : रु 199)। यह सुभाष राय की कविताओं का दूसरा संग्रह है। इसमें कुल 69 छोटी-छोटी कविताएँ संकलित हैं। इस संकलन की कविताएँ 2018-2020 के बीच रचित हैं। कहना होगा कि कवि सुभाष ने कोरोना महामारी के संकट काल को अपनी सृजनात्मक क्षमता को विकसित करने के लिए उपयोग किया है। इन कविताओं को पढ़ते समय अनायास ही पाठक अनेक दिशाओं में विचरण करने लगता है। सारी कविताएँ मिलकर एक डिस्कोर्स रचती हैं। सब कविताओं के केंद्र में जीती-जागती ‘आग’ है। सुलगती हुई ‘चिनगारी’ है। मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की ‘बेचैनी’ है। इन कविताओं में ‘आग’ रूपक है जो जीवन की सच्चाई को पाठक के सामने लाने में सक्षम है। कवि-मन पाठक को समाज में व्याप्त तमाम परिस्थितियों से रूबरू कराना चाहता है, नकारात्मक शक्तियों के प्रतिरोध में आवाज उठाना चाहता है। इन कविताओं में नकार और स्वीकार दोनों का संतुलन बखूबी द्रष्टव्य है, लेकिन कहीं भी इनमें न तो नारेबाजी है और न ही बड़बोलापन। 

सुभाष राय इस संवेदनहीन दुनिया में खोना नहीं चाहते। वे अपने आपको बचाए रखने की लगातार कोशिश करते रहना चाहते हैं। इसीलिए वे कहते हैं – ‘आग से ही सीखा है मैंने/ हमेशा सुलगते रहना/ इस तरह ऊष्मा जमा करता रहता हूँ/ मुझे मालूम है एक दिन एक ऐसे/ धमाके की जरूरत होगी/ ताकि बुझे हुए चिराग/ एक साथ भभक कर जल उठें।’ (सुलगते रहना, मूर्तियों के जंगल में, पृ.21)     

ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए ‘आग’ चाहिए ही चाहिए। इसके अभाव में अस्तित्व डगमगा जाएगा। यदि भीतर आग है तो ‘आग में ही बदल जाता है समूचा अस्तित्व/ पिघलकर भी बहता नहीं/ जलकर भी जलता नहीं’ (जलकर भी जलता नहीं, मूर्तियों के जंगल में, पृ.20)। इन पंक्तियों को पढ़ते समय एक दार्शनिक से हमारा साक्षात्कार होता है। हम जानते हैं कि एक तत्व दूसरे तत्व में बदलता है तो उसकी गति, परिमाण आदि में परिवर्तन होता है। द्रव (जल) के कुछ अणु जमकर ठोस बर्फ बनते हैं और जब बर्फ के अणु पिघलते हैं तो जल के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। दोनों की स्थिति (अस्तित्व) में परिवर्तन है – एक तरल है तो दूसरा सघन। दोनों स्थितियों में तो परिवर्तन है, लेकिन द्रव्यमान में नहीं। इन दोनों ही स्थितियों में एक ही तत्व प्रधान है। (नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन। – कामायनी)। कवि सुभाष का मन उस एक ही तत्व के कई-कई रूपों को उजागर करता है।  

आग का उपयोग हम कई तरह से कर सकते हैं। ठंड में हाथ सेंक सकते हैं, रोटी सेंक सकते हैं, खाना बनाने के लिए उपयोग में ला सकते है, अँधेरा दूर कर सकते हैं, जंगल में रास्ता न सूझे तो आग जला सकते हैं। खूँखार जानवरों से बचने के लिए भी आग ही तो चाहिए। इतना ही नहीं उसे विनाश का साधन भी बना सकते हैं, जिंदगी को भस्म करने के लिए आग का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन सुभाष राय के लिए यह समूचा अस्तित्व है (पृ.20), स्वप्न है (पृ.22), प्रेम है (पृ.21), जीवन है (पृ.11), ऊर्जा है (पृ.22), संभावना है (पृ.17)। वे अपने भीतर निरंतर इस आग को जगाए रखना चाहते हैं। ‘आदमी को बाहर की आग तक ले गई होगी/ भीतर की आग’ (ऊष्मा के गर्भ से फूटा, मूर्तियों के जंगल में, पृ.11)। सुभाष जी के यहाँ आग ‘आँसू के ठीक पीछे खड़ी रहती है’ (पृ.15), ‘बहुत स्वादिष्ट होती है’ (पृ.15), ‘करोड़ों वर्ष के सफर की कहानियाँ सुनाती है।’ (पृ.25)

आग तो एक चिंगारी से ही तो सुलगती है। पहले कुछ सुलगता है, छोटा ही कण सही। बाद में वही भभक कर जल उठता है। तेज लपटों में बदल जाता है। समूचा वातावरण जगमगाने लगता है। (पृ.19)। छोटे बच्चे के लिए तो आग खुशी है। जिज्ञासा है। उसे क्या पता कि आग झुलसा देगी। जब तक आग को छूकर नहीं देख लेग, बच्चा नहीं जान पाएगा कि उसे आग को छूना नहीं चाहिए। (पृ.18)। कवि की कविता ‘आग का अर्थ’ पढ़ते समय मुझे बचपन के वे दिन याद आ गए। गर्मियों की छुट्टियों में हम सब दादा-दादी और नाना-नानी से मिलने गाँव का रास्ता पकड़ लेते थे। बचपन में मैंने अकसर माँ, बाबूजी, नाना-नानी, दादा-दादी को फटकार लगाते हुए सुना है। घर में बिजली जाते ही दादी मिट्टी के तेल का चिराग या फिर कभी-कभी पेट्रोमैक्स लैंप जलाती थी। हम सब भाई-बहन चिराग के इर्द-गिर्द बैठकर मस्ती में लौ  से खेलना शुरू कर देते थे। इतने में पीछे से पापा की एक गंभीर आवाज आती थी – ‘हाथ जल जाएगा। सावधान!’ फिर भी हम सुनते कहाँ! न जाने कितनी बार उँगली जली। फिर भी लौ से खेलना नहीं छोड़ा। हाथ की उँगलियों से तरह-तरह की आकृतियाँ बनाते थे। बड़े होते गए। मिट्टी के तेल का चिराग और पेट्रोमैक्स लैंप मोमबत्ती में बदलने लगे। फिर भी वही मस्ती। अब तो वह बात ही नहीं है, क्योंकि उस तरह बिजली जाती नहीं, और जाती भी है तो इनवर्टर और जेनरेटर चलता है। लेकिन आज भी आग का वह स्पर्श उँगलियों में तरोताजा है। इन कविताओं ने उसे पुनः जीवंत कर दिया।

गाँव में घर के आँगन में हमेशा अँगीठी सुलगती रहती थी। दादी-नानी आग को राख में दबाकर रखती थीं। दादा गुड़गुड़ी के लिए आग माँगते। आग बुझ जाती तो बच्चों को दौड़ाया जाता था पड़ोस से माँग लाने के लिए। कोई मना भी तो नहीं करते थे। इसी बात को सुभाष राय ने अपनी कविता ‘राख में चिंगारी’ (पृ.27) में बखूबी व्यक्त किया है। इसे पढ़ते समय मेरी आँखों के समक्ष बचपन की वे सारी स्मृतियाँ अनायास ही किसी फिल्म की रील की तरह तैरने लगीं। लेकिन, हाथ सेंकने के लिए या अपने आपको सर्दी से बचाने के लिए जिस आग का उपयोग किया जाता था, आज उसी आग से घर जलाया जा रहा है, जिंदा व्यक्ति को जलाकर राख किया जा रहा है। जब तीलियाँ नहीं थीं तब राख में आग दबाकर सुरक्षित रखा जाता था उपयोग के लिए। लेकिन आज तीलियाँ आ चुकी हैं। लोगों की जेब में ही तीलियाँ हैं। इनका उपयोग किसी निरीह और बेबस का घर जलाने के लिए किया जा रहा है। बचपन में जिस आग से खेलने का मन करता था, आज उसी आग का नाम सुनते ही रूह काँपने लगती है। 

मानव  जीवन का आग से अजीब रिश्ता है। आदिमानव ने आग का आविष्कार करने के लिए क्या-क्या नहीं किया। पत्थर घिसकर आग सुलगाई, जुगनुओं को पकड़कर बोतल में बंद करके उस रोशनी में शल्यचिकित्सा तक कर डाली। पानी, सूर्य की किरणों और हवा से बिजली बनाई। अपने अंदर की जिजीविषा रूपी आग को जलाए रखने के लिए हर वक़्त कोशिश करता रहा। कवि ‘ऊष्मा के गर्भ से फूटा जीवन’ शीर्षक कविता में कहते हैं कि ‘जब कुछ नहीं रहा होगा/ तब भी रही होगी आग/ बिग-बैंग के ठीक पहले/ कुछ नहीं से बहुत कुछ/ होने की संभावना में/ एक चिंगारी गिरी होगी कहीं/ और समय के रूप में धधकती हुई/ बढ़ चली होगी भविष्य की ओर।’ (ऊष्मा के गर्भ से फूटा जीवन, मूर्तियों के जंगल में, पृ.11)। इन पंक्तियों को लिखते समय अनायास ही अवचेतन मन में दबी हुई विज्ञान की वह चिंगारी सुलगी होगी जो बरसों तक कवि के मन में सुषुप्त अवस्था में विद्यमान थी।   

स्वयं कवि सुभाष राय का आग से गहरा रिश्ता है। उनके चारों ओर यह आग महक फैलाती है। यह आग उन्हें कई कहानियाँ सुनाती है। उनके भीतर ऊष्मा पैदा करती है। रास्ता दिखाती है। जिंदा रखती है। संभावना जगाती है। वे कहते हैं कि मनुष्य के भीतर जब तक यह आग नहीं होगी तब तक वह जीवित नहीं होगा। कवि मन दृढ़ विश्वास से यह घोषणा करता है कि ‘एक दिन मनुष्य सीख लेगा/ आग का प्रत्यारोपण/ और उम्र को चुनौती देगा/ वह आग को जीत लेगा/ तो मृत्यु को भी जीत लेगा।’ (तब मृत्यु को जीत लेगा मनुष्य, मूर्तियों के जंगल में, पृ.12)  

सुभाष राय की पत्रकारीय दृष्टि उनकी कविताओं में भी दिखाई देती है। टीआरपी बटोरने के चक्कर में आज कल मीडियाकर्मी नैतिकता को दरकिनार करके झूठे और सनसनीखेज समाचारों को प्रसारित करने में समय व्यतीत कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में ‘खबरों में’ शीर्षक कविता में कवि कहते हैं कि ‘अखबारों में, चैनलों पर छा गई हैं भटकती हुई आत्माएँ/ स्वर्ग की सीढ़ियाँ खोज ली गई हैं/ पाताललोक का मार्ग खुल गया है/ ***/ खबरों में झूठे हैं, झूठों की फौज है/ सारे लबार हैं, उनके सरदार हैं।’ (खबरों में, मूर्तियों के जंगल में, पृ.60)

सुभाष राय की कविताओं में ग्रामीण और शहरी परिवेश को देखा जा सकता है। कवि यह चिंता व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं कि वे गाँव तो पहुँच गए हैं लेकिन घर नहीं पहुँच सके। ‘मैं गाँव तो आया हूँ/ पर घर नहीं पहुँचा अभी तक/ कह नहीं सकता कि पहुँच पाऊँगा कभी/ ईंटों के बीहड़ में सारी यादें/ जाने कहाँ बिला गई हैं।’ (घर नहीं पहुँचा अभी, मूर्तियों के जंगल में, पृ.39)। गाँव की सुनहरी यादें रह-रहकर कवि के मन तो तड़पाती हैं। माँ और बापू के पाँवों की गंध उस गाँव की जमीन में घुल-सी गई है। कवि यह चिंता व्यक्त करते हैं कि ‘जमीन है कि कुछ बोलती ही नहीं’ (वही)। कवि का मन चिंतित है, क्योंकि ‘यहीं छूट गई थी साथी-सोहबत/ पलग्गी। परनाम, राम-राम, अस्सलाम’ (वही, पृ.38)। आज रिश्तों में वह गरमाहट नहीं, जो पहले हुआ करती थी। स्वार्थपरता के कारण रिश्तों के बीच दीवारें उठ खड़ी हुई हैं (वही, पृ.39)

सुभाष राय की कविताओं में अनेक भारतीय पौराणिक-ऐतिहासिक प्रसंग, मिथक और अंतर-पाठ उपस्थित हैं। कवि इनका प्रयोग करके वर्तमान स्थितियों को उजागर करते हैं। कवि जब कहते हैं ‘जब मैंने पिता के वचन की/ रक्षा के लिए छोड़ी थी अयोध्या/ तब भी तुम्हारे तट के कोमल/ बिछावन पर सोया था’ (फिर छोड़ आया हूँ अयोध्या, मूर्तियों के जंगल में, पृ.95) तो ‘रामायण’ के प्रसंग याद आना स्वाभाविक है। कवि ने रामकथा को इस तरह आत्मसात कर लिया है कि समाज में व्याप्त विसंगतियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहते हैं ‘बेचारा नहीं समझा.../ शिकारी था/ हिरनी की आवाज में/ पुकारता हुआ’ (पुकार, मूर्तियों के जंगल में, पृ.88)। इन पंक्तियों को पढ़ते समय अनायास की ‘रामायण’ का वह प्रसंग स्मरण हो आता है जब राम सीता के लिए सोने के हिरन के पीछे जाते हैं। 

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है सुभाष राय की कविताओं में इतिहास, दर्शन, विज्ञान, राजनीति, संस्कृति, नैतिकता, मनुष्यता आदि अनेक पाठ निहित हैं जो इंसान के आगे-पीछे घूमते हैं। अपनी जड़ों को कायम रखने के लिए तड़पता हुआ मनुष्य और उस मनुष्य के भीतर निहित आग इन कविताओं के केंद्र में हैं। इसी आग के कारण ‘और ऐसे में ही कभी-कभी/ एक स्वतःस्फूर्त स्फुलिंग की तरह/ किसी बुद्ध या किसी न्यूटन के भीतर/ चमक उठता है एक/ अनाविष्कृत युगांतर’ (अस्ति-नास्ति के पार, मूर्तियों के जंगल में, पृ.14)। कहना न होगा कि ‘मूर्तियों के जंगल में’ भटककर हम अपने भीतर-बाहर के व्यक्तित्व से परिचित हो जाएँगे और सुखद अनुभव प्राप्त करेंगे। 

 

गुर्रमकोंडा नीरजा

सह संपादक ‘स्रवंति’

एसोसिएट प्रोफेसर

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास

टी. नगर, चेन्नै – 600017

 

मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

पुस्तक चर्चा



‘धूप और चाँदनी’ : कभी हलधर से पूछो किस तरह सरसों उगी है!

रवि वैद

राम नारायण ‘हलधर‘ (1970) का नाम पहली बार सुनकर सबसे पहले मेरे हृदय में जनता पार्टी के चुनाव चिह्न ‘हलधर किसान’ की याद ताज़ा हो गई। उसी दिन उन्हें हैदराबाद में  ‘सिया सहचरी काव्य सम्मान-2024’ ग्रहीता के रूप   में   देखने और सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। हलधर जी  एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के  कवि  और गज़लकार हैं। अपनी बुलंद आवाज़ और मंच पर बोलने की कला  द्वारा वे अपने श्रोताओं पर एक अमिट छाप छोड़ देते हैं।

जब मुझे उनका ग़ज़ल संग्रह “धूप और चाँदनीपढ़ने के लिए मिला तो मैं उसे पढ़ने के लिए उतावला हो उठा। उनके जीवन और उपलब्धियों के बारे में जानकर मैं बहुत अधिक प्रभावित हुआ। क्योंकि मैं स्वयं ग़ज़ल कहता हूँ तो मेरा हृदय इस ग़ज़ल संग्रह को बारीकी से पढ़ने और ग़ज़ल के शिल्प को परखने का हुआ। मैंने कुछ गजलों की तख़्तीअ कर बहरें निकालीं। मात्रा गिराने की विधा भी देखी। सभी ग़ज़लें, ग़ज़ल लेखन के  शिल्प पर खरी उतरीं। अधिकांश ग़ज़लें ग़ैर-मुसलसल हैं तो कुछ मुसलसल भी हैं। अधिकांश ग़ज़लें छोटी बहरों में लिखी गई हैं, जो अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। लंबे-लंबे मिसरों में अपनी बात कहना आसान होता है,  परंतु छोटे मिसरों में बहुत कुछ कह देना एक मँजे हुए ग़ज़ल-गो का परिचायक है।

राम नारायण ‘हलधर‘ ग्रामीण परिवेश से आते हैं और आज भी अपनी मिट्टी  से जुड़े हुए हैं। इनकी ग़ज़लों  में  ग्रामीण परिवेश व ग्रामीण जीवन की  समस्याओं को साफ़ देखा जा सकता है। इनकी  ग़ज़ल का एक शेर देखिए :

हमारी फस्ल का, इस क़र्ज़ का कुछ कीजिये साहिब ,

हमें हर साल का घाटा किसी दिन मार डालेगा।

 

आज भी बुनियादी सुविधाओं   को तरसता गाँव ‘हलधर’ के लेखन का अभिन्न अंग है।  जैसे

कहीं मंदिर बनाते हैं, कहीं मस्जिद बनाते हैं,

दवाख़ाना अभी भी गाँव में एक खंडहर सा है।

एक और शेर  देखिए –

 

मेरे खेतों में एक ऋण का कुआँ है,

उसे हर साल गहरा देखता हूँ।

एक दो जगह देशज शब्दों का भी प्रयोग किया गया है, जो ग़ज़ल में आत्मीयता भर देते हैं। जैसे

इक लड़की मिलते ही हमसे झगड़े  है,

उससे मिलकर जी नहीं भरता दिन भर में।

एक  शेर ने तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर नज़्म मुझसे पहली सी मुहब्बत…’ के मिसरे  और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवाकी याद ताज़ा करवा दी;  देखिए

ये माना प्यार है बेहद ज़रूरी,

मगर ये भूख इससे भी बड़ी है।

राम नारायण ‘हलधर‘ की अधिकांश गजलों में छह अशआर हैं। यह दर्शाता है कि इन्हें काफ़िया तलाशने में कोई खास मेहनत-मशक्कत नहीं करनी पड़ती। लफ्ज़ इनके ज़हन में इस्तेमाल होने के लिए तैयार रहते हैं। रील बनाने वाली नई पीढ़ी पर तंज़ कसते हुए लिखते हैं :

बहुत आसान है खेतों में यूँ फ़ोटो खिंचाना,

कभी ‘हलधर’ से पूछो किस तरह सरसों उगी है।

और अंत में वह मार्मिक शेर जो मेरे हृदय को वेध  गया। नारी जीवन की त्रासदी की झलक देखिए

गुल--उम्मीद थक कर सो गए सब,

अभी तितली रसोई में खड़ी है।

राम नारायण ‘हलधर‘ का ग़ज़ल संग्रह धूप और चाँदनी केवल ख्याति प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। इसमें किसानों की पीड़ा, आम आदमी की जिजीविषा और भारतीय लोकतंत्र की सियासी विफलता को प्रकाश में लाकर ‘हलधर’ द्वारा हल   तलाशने पर बल दिया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस ग़ज़ल संग्रह में लोक-कल्याण की भावना साफ़ दिखाई देती है। 

राम नारायण ‘हलधर‘ से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी लेखनी से इसी तरह समाज में चल रही बुराइयों को सामने लाकर उनके निवारण का हल खोजने का प्रयास करेंगे। राम नारायण ‘हलधर‘ को   धूप और चाँदनी के लिए हार्दिक बधाई।

◆◆◆

 

समीक्षित पुस्तक: धूप और चाँदनी

विधा: ग़ज़ल

कवि: राम नारायण ‘हलधर’

प्रकाशन वर्ष: 2023

प्रकाशक: इंडिया नेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड

कुल पृष्ठ: 112

मूल्य: ₹ 225/-

समीक्षक:

रवि वैद

402, निर्मल विहार

गुप्ता गार्डन, रमनथापुर

हैदराबाद


 

 

रविवार, 30 मार्च 2025

पुस्तक चर्चा

 


ऋषभदेव शर्मा की रचनाधर्मिता को प्रमाणित करतीं “51 कविताएँ”

डॉ. आल अहमद

            प्रो. ऋषभदेव शर्मा (1957) के प्रतिनिधि कविता संग्रह “इक्यावन कविताएँ” में संकलित कविताएँ विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विषयों पर आधारित हैं। इन कविताओं में कवि ने मानवीय भावनाओं, सामाजिक अन्याय और आध्यात्मिक विचारों को गहराई से व्यक्त किया है। उनकी कविताएँ न केवल समकालीन सामाजिक संदर्भों को उजागर करती हैं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और दार्शनिक चिंतन को भी स्पर्श करती हैं। उनकी लेखन शैली और विषयवस्तु की गहराई उन्हें हिंदी साहित्य के बड़े साहित्यकारों की परंपरा में खड़ा करती है। उनकी कविताओं में निराला की तरह विद्रोह, प्रेमचंद की तरह सामाजिक यथार्थ और महादेवी वर्मा की तरह आध्यात्मिक गहराई देखी जा सकती है। उनकी कविताएँ साहित्य की इस समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाती हुई प्रतीत होती हैं।   

कवि ने अपनी कविताओं में सामाजिक अन्याय और विषमता के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया है। उदाहरण के लिए, कविता "औरतें औरतें नहीं हैं!" में महिलाओं के प्रति समाज में व्याप्त हिंसा और उत्पीड़न को चित्रित किया गया है। यह कविता महिलाओं को केवल शारीरिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित होने वाली वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि संस्कृति और समाज की धुरी के रूप में प्रस्तुत करती है। इस तरह की सामाजिक संवेदनशीलता और यथार्थवादी दृष्टि उन्हें प्रेमचंद की परंपरा से जोड़ती है, जिन्होंने अपने लेखन में सामाजिक अन्याय और शोषण के विभिन्न रूपों को उजागर किया था। ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ भी उसी तरह समाज के गहरे सच को उजागर करती हैं और पाठकों को सोचने के लिए मजबूर करती हैं। उनकी कविताओं में महिलाओं के प्रति समाज के दोहरे मानदंडों और उनके साथ होने वाले अत्याचारों को बहुत ही सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है। यह कविता न केवल महिलाओं के प्रति समाज की क्रूरता को उजागर करती है, बल्कि उनकी शक्ति और संघर्ष को भी दर्शाती है।

मानवीय भावनाओं की गहराई को व्यक्त करने में ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ अद्वितीय हैं। कविता "दुआ" में एक पिता और पुत्र के बीच के संबंधों की मार्मिकता को दर्शाया गया है। यह कविता पिता (परमात्मा) से पुत्र (कवि) की प्रार्थना के रूप में है, जिसमें पुत्र चाहता है कि वह जीवन में लोकहित से प्राप्त होने वाले संतोष और परिपूर्णता को महसूस कर सके। इस तरह की भावनात्मक गहराई और मानवीय संबंधों को चित्रित करने की क्षमता पाठक को महादेवी वर्मा की कविताओं की याद दिलाती है, जिन्होंने अपनी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं को बहुत ही सूक्ष्मता से व्यक्त किया था। ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ भी उसी तरह पाठकों के मन को छूती हैं और उन्हें अपने जीवन के संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। उनकी कविताओं में पारिवारिक प्रेम, मानवीय संबंधों की नाज़ुकता  और जीवन के छोटे-छोटे पलों की महत्ता को बहुत ही सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है।

आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों को व्यक्त करने में भी ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ बहुत प्रभावशाली हैं। कविता "सूरज होने का दर्द" में सूरज को एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अपने अस्तित्व के दर्द को झेलते हुए भी निरंतर प्रकाश बिखेरता है। यह कविता जीवन के संघर्ष और उसके बावजूद निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इस तरह के आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों को व्यक्त करने की क्षमता उन्हें निराला और महादेवी वर्मा जैसे कवियों की परंपरा से जोड़ती है, जिन्होंने अपनी कविताओं में जीवन के गहन सत्यों को उजागर किया था। ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ भी उसी तरह जीवन के संघर्ष और उसके अंदर छिपी शक्ति को दर्शाती हैं। उनकी कविताओं में आध्यात्मिकता और दर्शन का समन्वय देखा जा सकता है, जो पाठकों को जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण देता है।

राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य को व्यक्त करने में तो ख़ैर ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ बहुत प्रभावशाली हैं ही। वह उनका मुख्य काव्यक्षेत्र है। उदाहरणस्वरूप कविता "धर्मयुद्ध जारी है" में कवि ने समाज में धर्म के नाम पर होने वाले झगड़ों और हिंसा को व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। यह कविता धर्म के नाम पर होने वाले झूठ और पाखंड को उजागर करती है और समाज को इससे ऊपर उठने की प्रेरणा देती है। इस तरह के व्यंग्य और सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करने की क्षमता उन्हें नागार्जुन और धूमिल जैसे कवियों की परंपरा से जोड़ती है, जिन्होंने अपनी कविताओं में समाज की विभिन्न विसंगतियों को उजागर किया था। ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ भी उसी तरह समाज के विभिन्न पहलुओं को बहुत ही सूक्ष्मता और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताओं में राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य का प्रयोग बहुत ही सटीक और प्रभावशाली है, जो पाठकों को समाज की विभिन्न विसंगतियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

भाषा और शैली के स्तर पर भी ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ बहुत प्रभावशाली हैं। उनकी भाषा सरल और मारक है, जो सामान्य जन की भाषा से जुड़ी हुई है। इससे उनकी कविताएँ सहज और समझने में आसान बन गई हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में प्रतीकों, रूपकों और मिथकों का भी सुंदर प्रयोग किया है, जो कविताओं को और भी गहरी और अर्थपूर्ण बनाता है। इस तरह की भाषा और शैली उन्हें हिंदी साहित्य के बड़े कवियों की परंपरा से जोड़ती है, जिन्होंने अपनी कविताओं में सरल और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग किया है। उनकी कविताओं में भाषा की सरलता और गहराई का समन्वय देखा जा सकता है, जो उनकी कविताओं को और भी प्रभावशाली बनाता है। विवेच्य कविताओं में और भी अनेक उदाहरण हैं जो कवि की साहित्यिक प्रतिभा और सामाजिक संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। जैसा कि प्रवीण प्रणव ने कहा है –

“इन कविताओं से गुज़रना किसी चुंबकीय रास्ते से गुज़रने जैसा है, जहाँ इन कविताओं के अंश पाठकों की आत्मा से चिपक जाते हैं और फिर देर तक उन्हें गुदगुदाते, कचोटते, कोसते और ढाढ़स  बँधाते रहते हैं।”

इस प्रकार, ऋषभदेव शर्मा की कविताएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं। उनकी कविताएँ हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाती हुई प्रतीत होती हैं और उनकी रचनाधर्मिता को प्रमाणित करते हुए उन्हें बड़े साहित्यकारों की परंपरा में खड़ा करती हैं। ये पाठकों को न केवल सोचने के लिए प्रेरित करती हैं, बल्कि समाज और जीवन को एक नए जनपक्षीय दृष्टिकोण से देखने के लिए आमंत्रित भी करती हैं।

समीक्षित पुस्तक-

इक्यावन कविताएँ (कविता संकलन)/ कवि- प्रो. ऋषभ देव शर्मा/ चयन और प्रस्तावना- प्रो. गोपाल शर्मा/ प्रकाशक- साहित्य रत्नाकर, कानपुर/ संस्करण - प्रथम, 2023/ पृष्ठ- 136/ मूल्य-200 रुपये।

 


समीक्षक

डॉ. आल अहमद

सहायक आचार्य, हिंदी विभाग,

मुमताज़ पीजी कॉलेज

लखनऊ

 

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...