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सोमवार, 30 सितंबर 2024

लघुकथा


विरासत

गोपाल जी त्रिपाठी

गत वर्ष सर्दियों में गांव का एक गरीब गुजर गया, और अपनी गरीबी की सौगात बड़े बेटे के नाम कर गया । सुना! उसकी तेरही पर मिठाई और खीर बन रही थी,घी में छन-छन जलेबी और पूड़ियाँ छन रही थीं । लोग सहभोज खा रहे थे, और उसके बेटे का यश गा रहे थे । एक पड़ोसी अकेले कुछ बड़बड़ा रहा था, पूछने पर बताया, वह आदमी भूख से मरा था ! आज सुना उसका बेटा सर्द राह सदा के लिए गुज़र गया, और अपने पिता की विरासत बड़े बेटे के नाम कर गया!!


गोपाल जी त्रिपाठी

हिंदी प्रवक्ता कवि और साहित्यकार,

सेंट जेवियर्स स्कूल

सलेमपुर ग्राम पोस्ट-नूनखार,

देवरिया उ०प्र०

गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

कविता

संत सिरोमणि रविदास

गोपाल जी त्रिपाठी

 

जिसकी पद-रज अमर बिन्दु मीरा हिए,

जिसके जीवन से प्रेरित कबीरा हुए।

संत ऋतुओं में वह जैसे मधुमास है ! 

कौन है वह!

महासंत रविदास है

पा के पारस भी मन जिसका विचलित नहीं ,

कर्म की साधनारत इतर चित्त नहीं ।

दीन-हीनों को अर्पित हरेक साँस है ! कौन है वह

कर्म मृत -चर्म का मर्म सद्धर्म का,

पा के कंगन प्रफुल्लित जो सत्कर्म का !

जिसके कठउत में गंगा का संवास है ! कौन है वह

छू के मिट्टी वह सतलुज बहाया करे,

पा के कठउत में गंगा नहाया करे ।

संत-समुदाय में जो परम व्यास है ।

कौन है वह !

महासंत रविदास है !!


गोपाल जी त्रिपाठी

हिंदी प्रवक्ता कवि और

साहित्यकार,सेंट जेवियर्स

स्कूल सलेमपुर ग्राम पोस्ट-

नूनखार, देवरिया उ०प्र०

रविवार, 12 नवंबर 2023

कविता

 



ज्ञानदीप

गोपाल जी त्रिपाठी

 

आओ दीप जलाएँ हम,

मन का तिमिर मिटाएँ हम

आओ दीप जलाएँ हम------

एक दीप हो राष्ट्रप्रेम का

एक मेरे प्रभु राम का ;

एक देशहित बलिदानों का,

एक सैनिक के नाम का ।।

 

एक सनातन संस्कृति के हित,

गौ-गंगा, हर-धाम का ;

सेवा, समरसता का दीपक,

संस्कृति का सत्काम का ।।

 

एक स्वदेशी को प्रेरित हो,

हर हाथों के काम का ;

एक शांति-सद्भाव जगाए,

विश्व-गुरु पदनाम का ।।

 

आओ मिलकर दीपदान कर,

कण-कण ज्योति जलाएँ हम;

कवि गोपाल ज्ञान-गरिमा का,

उजियारा फैलाएँ हम। ।

मिलकर तिमिर मिटाएँ हम।

उजियारा फैलाएँ हम। । उजियारा------


 

गोपाल जी त्रिपाठी

सोमवार, 31 जुलाई 2023

कविता




हिंदी का हिमालय (मुंशी प्रेमचंद)

गोपाल जी त्रिपाठी

यह दुनिया है ‘कर्मभूमि’ तुम ‘रंगभूमि’ ही समझ रहे ,

 ‘सवासेर गेंहूँ’ हराम था, किस ‘सद्गति’ में उलझ रहे!

 यह जीवन एक ‘प्रेमाश्रम’ है  ‘सेवा सदन’ न बन जाये,

‘प्रेम की वेदी’ पर कुर्बानी सिर पर पहन ‘कफन’ आये ।

 कितने भी ‘गोदान’ करो तुम, ‘कायाकल्प’ नहीं होगा;

 धनिया रो-रो मर जायेगी, साधन स्वल्प नहीं होगा ।

‘पूस की रात’ में होरी-झबरा ठिठुर -ठिठुर मर जायेंगे,

 गऊदान होगा जरूर पर कम्बल एक न पायेंगे ।

 ‘ठाकुर के कुएँ’ पर घुरहू का मुहाल पानी भरना,

 किये अगर विद्रोह नियत है ठाकुर के हाथों मरना ।

 ‘होनहार विरवान नहीं तो पात हुए कैसे चिकने’,

सामंतों के हाथ में अब तो ‘मिल मजदूर’ लगे बिकने !

‘परमेश्वर है पंच’ अगर तो ‘गबन’ नहीं हो पायेगा,

 छः पैसे लेकर हामिद भी ‘ईदगाह’ को जायेगा ।

 कामरान कादिर कल्लू कासिम मेले में जायेंगे,

 खेल-खिलौने और मिठाई लेकर मौज मनाएँगे ।

 दादी की आँखों का तारा चिमटा लेकर आयेगा,

 जलते हाथों प्यार मिलेगा खूब दुआएँ पायेगा ।

 ‘धनपत राय’ नवाब हो गया ‘चंद प्रेम’ की गाथा है,

 उर्दू का सिरमौर वही हिंदी का सागर माथा है ।

 जैसे पति परमेश्वर के बिन ‘मंगलसूत्र’अधूरा है,

 वैसे ही साहित्य गगन भी ‘मुंशी’ बिना न पूरा है ।।

              


गोपाल जी त्रिपाठी

हिंदी प्रवक्ता कवि और

साहित्यकार,सेंट जेवियर्स

स्कूल सलेमपुर ग्राम पोस्ट-

नूनखार,देवरिया उ०प्र०

बुधवार, 28 जून 2023

कविता

 


नवाबों का नगर

(२३/१२/१९९३)

गोपाल जी त्रिपाठी

 

आदमी के आबरू की

अर्थी उठती देखकर,

ठाठ मारे नग्नता चौरास्ते

पर हँस रही है ;

 अब नहीं रहता कोई

  परदा गिराकर शहर में,

क्योंकि अब कश्मीर के बूटे

 कहीं मिलते नहीं --क्योंकि -----

 अब न चोली-ओढनी का मेल

 दिखता घाघरा -अब न चोली----

 क्यों कि सरे-पंचनद अमन के

 फूल अब खिलते नहीं ---

चोरों-उचक्कों से नवाबों का

  नगर सब अट गया है - चोरों-उचक्कों---

 दर्जी भी कुर्ते को जालीदार

  अब सिलते नहीं --दर्जी भी -----

  खुशी हरदम खेलती थी जहाँ

  हर शामों-सहर --खुशी हरदम----

  नफरतों की गली में प्यार

  के दीवाने भी --नफरतों की गली में --

बहुत दिन बीते कहीं

 बेखौफ अब मिलते नहीं --बहुत दिन बीते कहीं बेखौफ अब मिलते नहीं --बहुत दिन बीते-------!!


 

गोपाल जी त्रिपाठी

ग्राम पोस्ट-नूनखार,देवरिया

हिंदी प्रवक्ता,

सेंटजेवियर्स स्कूल

सलेमपुर

मंगलवार, 30 मई 2023

कविता

 



जीवन मार्ग

गोपाल जी त्रिपाठी

कर्म से योग हो,योग का कर्म हो ;

देश का हो भला,यह तेरा धर्म हो ।

कर्म से योग हो-------

सत्य का -प्रेम का,नीति का-नेम का ;

तुम करो साधना,योग का क्षेम का ।

श्रेष्ठ जीवन है पाया तू वरदान में-

तू मनुज है -तेरा ध्येय सत्कर्म हो ।।

कर्म से योग हो------

नारियों को तू ममता की मूरत समझ;

बच्चों-बूढ़ों की भी तू जरूरत समझ ।

भोग के लोभ मे तू न डूबे कभी ;

पुण्य के पंथ का ही तेरा कर्म हो ।।

कर्म से योग हो------

प्राणियों पर दया खुद पे संकट तो क्या;

हो सतत शांति सर्वत्र हो निर्भया ।

ज्ञान का दान कर हो मनुजता प्रखर;

सादगी से जियो और सद्धर्म हो ।।

कर्म से योग हो------

भूमि- अंबर-अनिल-अग्नि और नीर से;

ये बनी कंचना पाये तकदीर से ।

विश्व के परिवरण का तू रखवार बन;

ये तेरा हेतु हो, ये तेरा मर्म हो ।।

कर्म से योग हो -----------


 

गोपाल जी त्रिपाठी

ग्राम पोस्ट-नूनखार,देवरिया

हिंदी प्रवक्ता,सेंट

जेवियर्स स्कूल सलेमपुर

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...