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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

विशेष

ब्रज भूमि: भक्ति योग, ज्ञान योग और कर्म योग की त्रिवेणी

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

जब भी वृंदावन में पहुँचेंगे और नगर में भ्रमण करेंगे तो यही लगता है कि यहाँ तो वासुदेव कृष्ण साक्षात् विराजमान हैं ही उनके कालजयी उपदेश के मुख्य सूत्र _भक्ति, ज्ञान और कर्म योग की त्रिवेणी कहीं साक्षात् है तो यहीं है। हर ओर राधे राधे,जय श्री कृष्णा, राधे राधे जय श्री कृष्णा। यह महामंत्र गलियों में गूँज रहा है।

प्रत्येक व्यक्ति तो भक्ति भावना से ही यहाँ पाँव रखता है लेकिन जिन्होंने अपने जीवन को यहीं के लिए समर्पित कर दिया है वह तो अनवरत भक्ति में लीन है। इस महाभक्ति से ज्ञान की जो धारा प्रवाहित होती है उसके प्रभाव से निश्चित रूप से सभी को ज्ञान की प्राप्ति होती है।

दुकानदार,परिवहन चालक, तीर्थ यात्री, सभी लोग अहर्निश भक्ति के सागर में डूबे दिखाई देते हैं। जीवन निर्वाह के लिए छोटे बड़े जितने भी हैसियत के लोग हैं अपने कर्म के साथ ही साथ भक्ति में डूबे हुए हैं केवल धनार्जन ही मूल उद्देश्य नहीं है जैसा मैंने महसूस किया।यह उस अलौकिक परम ब्रह्म की ही शक्ति और कृपा है कि यह त्रिवेणी निरंतर प्रवाहमान है।भारत ही नहीं इस कृष्ण के भक्ति का ही प्रभाव है कि देश की सीमाओं को लांघकर विदेशी भक्त भी भक्ति के ब्रज रास में डूबे दिखाई पड़ते हैं।

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

ब्रज भूमि,श्री धाम वृंदावन

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विशेष

 

यमुना में भाई बहन का स्नान और दीप दान (मथुरा जी)

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

पुराणों में यह कथा आती है कि एक बार यमुना जी ने अपने भाई यम देव से आने का निमंत्रण दिया। यमदेव जिस दिन यमुना जी के पास पहुंचे उस दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि थी। यमुना जी ने भाई यमदेव की बहुत आव भगत किया और आत्मिक आतिथ्य किया जिससे खुश होकर यमदेव ने कहा कि बहन आशीर्वाद माँ गो।बहन की इच्छा जानकर यमदेव ने वर दिया कि इस द्वितीया तिथि को यमुना में जो भाई बहन स्नान करेंगे उन्हें यमदूतों का भय नहीं रहेगा और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। तभी से भाई बहन एक साथ मथुरा जी के यमुना में स्नान कर दीप दान कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और बहनें भाई को तिलक कर आशीर्वाद देती हैं।

   लोक संस्कृति में इस पावन पर्व पर यमुना तट पर जो आस्था की भीड़ दीखती है वह सदा मनोहारी और सुखकारी है। मथुरा की पावन धरा पर पहुँचने पर लगता है कि सब कुछ भूलकर यहीं का याद है। झुण्ड में नंगे पांव चलते लोग यह साक्षात् साबित करने के लिए काफी है कि आज भी भक्ति और आस्था भारतीय संस्कृति की परिपाक हैं। भीड़ लेकिन कोई समस्या नहीं। कोई हो हल्ला नहीं। सरकारी मुलाजिम भी सहयोग की भावना से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।

    घाट के सरल और सहज पुजारी भी सहयोग और आस्था से सबकी पूजा कराते हैं यह यमुना जी की बड़ी कृपा है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि के निकट डीग चौक पर से पैदल जाना होता है जहाँ से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर विश्राम घाट है वहीं यम देव एवं यमुना जी का मंदिर भी स्थित है जहाँ लोग पूजा अर्चना करते हैं।

    आधुनिकता के इस चकाचौंध के दौर में भी हमारी संस्कृति की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है यह इतनी गहरी हैं कि इसकी जड़ों से प्रस्फुटित कोंपलें सदियों से निर्मलता से आगे बढ़ रही हैं।

    हमारे पूर्वजों ने जो रास्ता दिखाया वह आपसी सद्भाव, आपसी प्रेम, अपने तीर्थस्थलों पर जाकर लोक कल्याण के साथ ही साथ अपने गांव, समाज और कुल की भलाई की मन्नत माँ गने की रही है वह इस घाट पर जाकर अनेक जनपदों, राज्यों से आये तीर्थ यात्रियों को देखकर ही पता चलता है।

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

ब्रज भूमि,श्री धाम वृंदावन

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विशेष

रमण रेती, रेती में लोटता है आस्था का सैलाब

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

मथुरा की पावन भूमि का कण-कण पावन है पवित्र है। कण-कण में भक्ति, ज्ञान और कर्म की अविरल धारा अनवरत चौबीस घंटे प्रवाहित होती रहती है। कौन-सा कोना ब्रज भूमि का अछूता है जहाँ भगवान की उपस्थिति दर्ज न हो। जहाँ लीलाधारी श्री कृष्ण का बाल्यकाल भी इसी रेती में क्रीड़ा करता हुआ व्यतीत हुआ। उस परम नारायण की क्रीड़ा स्थली के कण-कण भक्ति ,प्रेम और आस्था का रस सराबोर है जहाँ पहुँचने पर ऐसा प्रतीत होता है कि इस नश्वर संसार में उस परम अलौकिक सत्ता की रचनाधर्मिता और अलंकारों से झंकृत माटी की महक और उसमें से निकलती ध्वनि तरंगें स्वयमेव किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर रही हैं।

लगभग साढ़े पाँच हजार साल पहले द्वापर युग में एक मनुष्य की आकृति में अवतरित हुए स्वयं नारायण ने अनेक बाल लीलाएँ करते हुए सभी को सुख प्रदान किया। जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में नियत कर्मों को संपादित करने की जो व्यवस्था सनातन संस्कृति में निर्धारित है वासुदेव कृष्ण ने भी उन नियमों का पालन किया। और हो भी क्यों न? जिन नियमों को सनातन संस्कृति ने युगों युगों से अपनाया तो भला लोक हित एवं सर्व कल्याण की भावनाओं से युक्त जीवन व्यवस्था से धर्म के रक्षक उसकी उपेक्षा क्यों करें ? हाँ इतना जरूर है उनके कर्मों को देखकर स्वयं मैया यशोदा भ्रमित ह़ोती हैं, कभी साक्षात् ईश्वर समझ बैठती हैं, कभी मात्र मनुष्य या अपना सुत, सिर्फ और सिर्फ कान्हा। यही स्वरूप और मातृत्व के बीच का जो रहस्य है, इस कठिन अन्वेषण और जीजिविषा का गहन तोष है। क्या अजीब है कि निश्चित रूप से जब मैया अवतार समझती हैं तो अवाक रह जाती है लेकिन अपनी माँ  को सत्य की भित्ति पर लौकिक आवरण का मुखौटा समुपस्थित करना भी जरूरी था जिसे उस परम पुरुष की वास्तविक सत्ता और सांसारिक आवरण के लिए आवश्यक था।

     जिन गलियों में बाल लीलाएँ हुईं, बाग, वन, तड़ाग, सभी में खेलना कूदना और बाल अवस्था में भी अपने अस्तित्व को छिपाए हुए अपने अवतार के उद्देश्यों को पूरा करने का अवसर जिन्होंने नहीं छोड़ा अर्थात उद्देश्य ही धर्म और मानवता को नष्ट करने वाले असुरों का सफाया। बखूबी और एक उत्कृष्ट योद्धा के समान उन्होंने पूर्ण किया। जो केवल वही जानते थे। ऐसा वर्णन है कि श्रीकृष्ण अपने बाल्यकाल में महावन जिसे आज रमण रेती भी कहा जाता है, उस माटी में खूब खेले। गोप गोपिकाओं को असीम सुख को प्रदान किया।  ब्रज साहित्य के प्रिय कवि रसखान जी ने इसी वन में पुरूषोत्तम श्री कृष्ण की उपासना की थी और उन्हें भगवत् स्वरूप का दर्शन हुआ था उनकी समाधि भी बनी हुई है जहाँ बड़ी श्रद्धा से लोग माथा टिकाते है। वहीं एक और संत गिरी ने भी बारह वर्ष तक कठिन तपस्या किया उन्हें भी श्री कृष्ण जी का दर्शन हुआ वहीं प्रभु श्रीकृष्ण का मंदिर बनवाया गया जो बहुत जीर्ण-शीर्ण होने के बाद कालांतर में नव निर्माण किया गया है जो घने वन में ही है।

मंदिर में राधा कृष्ण जी की साक्षात् मनमोहक मूर्ति स्थापित है जहाँ हजारों लोग हर रोज दर्शन करते हैं। वहीं बगल में जमीन पर रेत में स्त्री पुरुष बाल वृद्ध हर कोई लोटता है। अपने शरीर को एक ऐसी सत्ता के पद रज में समर्पित करता है और दुनिया में क्या है यह भूलकर मिट्टी में अपनी काया को लपेटता है।लोटता है आस्था का सैलाब। प्रेम के उमड़े सैलाब में वहाँ हर कोई राधा मय, कृष्ण मय हो जाता है। सांसारिक हैसियत दरकिनार हो जाते हैं, सारी हस्ती, झूठ की चमक दमक सब तुच्छ हो जाते हैं, कहाँ? जहाँ यह विश्वास की यमुना प्रवाहित हैं, जहाँ नारायण की लीला हुई थी, जहाँ बाल कृष्ण ने अपने बाल्यकाल में ही धर्म की स्थापना और प्रेम की धारा का पाठ शुरू किया था।पशु पक्षी, वनस्पति, पेड़,पहाड़, नदी नाले सभी में प्राण फूंक दिया था उस बाल कृष्ण ने जो हजारों साल बाद आज भी उसी तरह से लोग उस शक्ति का अहसास करते हैं भले ही साक्षात उनकी उपस्थिति न हो लेकिन कण कण में भगवान, राधे कृष्णा की सत्ता को विराजमान समझना भारतीय संस्कृति की गहरी मिठास और सच्चाई हूं। आखिर श्री कृष्ण ने जो समाज को दिया आज वही प्रेम, भक्ति, ज्ञान और कर्म की अविरल धारा अनवरत प्रवाहित हो रही है। यहाँ ब्रज भूमि पर हर कोई अपने सांसारिक जीवन के कर्मों को करतो हुआ भी अर्थात कर्म योग, ज्ञान और भक्ति का योग समस्त नियमों से सराबोर है। हर हाल मे राधा रानी और श्रीकृष्ण ही जीवन के सहारा हैं, आदि से जीवन पर्यन्त सिर्फ और सिर्फ वही हैं,वही हैं। यहाँ आस्था और प्रेम का सैलाब श्रीकृष्ण के पद रज के कण-कण में लोटता है।सब कुछ भूलकर। श्रीकृष्ण के चरणों में।

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

ब्रज भूमि,श्री धाम वृंदावन

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मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

कविता


ऐ कवि लिख देना

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

ऐ कवि लिख देना

अपनी सुंदर लेखनी से

कोरे कागज के पन्नों पर

जिस धरती की गोंद में

पले बढ़े खेले कूदे

जिन हरे वृक्षों की छाया में

सूरज की तप्त किरणों से

जब व्यथित हुए

सहारा दिया मधुर छाँव मिली

उनकी मधुर स्मृतियों को लिख देना।

जिस वायु की शीतलता से

काया की उष्णता को

शीतलता मिली

लिख देना उनके आत्मीय अहसासों को।

लिख देना निःस्वार्थ,अहर्निश

निष्कपट प्रकृति के इन भावों को

जहाँ झरने, नदियों, के शीतल

अमृतमय जल, जीवन को

दीर्घ बनाते हैं

तुम्हारे शस्य हरित हो लहराते हैं

खेतों में,लिख देना उनके

परोपकारी भावों को।

लिख देना चिड़ियों की कोलाहल

किसान की थकावट

हल चलाते, खेतों में अथक

परिश्रम से आक्लांत धरती के

भगवान को उनके मधुर गीत

पल भर संगीत के अमिय से

उनकी भुजाओं में नयी

उर्जा का संचार करते हैं।

लिख देना

प्रकृति सदा गीत, संगीत के बहाने

जीवन को नया धार देती है

लिख देना।।

***


डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

हाटा कुशीनगर


रविवार, 31 अगस्त 2025

कविता

 

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

1.

भादो की अँधियारी रातें

भादो की अँधियारी रातें, इन्हें काटना मुश्किल है,

फटे हुए हैं तन के अचकन, इन्हें साटना मुश्किल है।।

 

बिखर गए हैं तिनके, झोपड़ कभी बनाया था,

अरमानों की डोरी से गाँठें कभी बनाया था।

बारिश की टप-टप बूँदें हैं , इन्हें रोकना मुश्किल है

फटे हुए हैं तन के अचकन, इन्हें साटना मुश्किल है।।

 

जीवन में शतरंजी चालें, किसने यहाँ बिछाई है,

हर चौखट पर पर्द लगे हैं, किसने इसे सजायी है।

कोर कोर हैं फटे हुए, उसे निपटना मुश्किल है,

फटे हुए हैं तन के अचकन, इन्हें साटना मुश्किल है।।

 

अपने और पराए का अब कैसे पहचान करें,

धोखा और समर्पण का,अब कैसे हम भान करें।

बनते मिटते अहसासों का,भाव पलटना मुश्किल है,

फटे हुए हैं तन के अचकन, इन्हें साटना मुश्किल है।।

 ***

2.

मैं पथिक हूँ

 

जिंदगी भी हारती फिर दौडती है ,

मौन-सी पगडंडियों पर चल रहा हूँ ।

कंटकों से बिध रहे हैं पाँव मेरे ,

नित नए उपमान में मैं ढल  रहा हूँ ।।

 

थिर न हो यह लक्ष्य लम्बी है डगर ,

सृजन के बिंबित क्षणों में पल रहा हूँ ।

कौन है जो रोकता बढ़ते कदम को ,

हौसलों के साथ मैं प्रतिपल रहा हूँ।।

 

तेज हो ज्वाला लपट से बढ़ रही जब,

मैं दिशाओं में सदा अविचल रहा हूँ।

साथ ले अगणित क्षणों को प्रीति के,

नेह के बंधन में मैं हर पल रहा हूँ।।

 

वन गिरि हों या कि हो सागर भी गहरे

बीच गह्वर में सदा मैं फल रहा हूँ ,

ना किसी की राह में रोड़ा बनूँ मैं

रीत सपनों का सदा मैं कल रहा हूँ।।

 ***



डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’

हाटा कुशीनगर, उत्तर प्रदेश


शनिवार, 30 अगस्त 2025

आलेख

 


श्रीकृष्ण की लौकिक लीला और पारलौकिक स्वरूप

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

द्वापर युग में वासुदेव एवं माँ देवकी के गर्भ से प्रकट हुए लौकिक श्री कृष्ण का पूरा जीवन ही लीलाओं से भरा हुआ है । बात आती है कि श्रीकृष्ण ने जन्म लिया या प्रकट हुए।यह पौराणिक ग्रंथों में मौजूद है कि वे मृत्यु लोक पर एक माता के माध्यम से अवतीर्ण हुए थे। जब माँ देवकी को अवतार से पूर्व ही अनुमान हो गया था कि तारनहार आने वाले हैं। तारनहार यानी स्वयं नारायण।

लेकिन यह उस नारायण की लीला ही थी कि अवतार के बाद सब कुछ भूल गया।यही उनकी पहली लीला थी जिसे लौकिक माता पिता के समक्ष उन्होंने प्रदर्शित किया। क्योंकि अवतार के बाद देवकी और वासुदेव ने जिस स्वरूप को देखा तो अपने को धन्य मानते हुए स्तुति करने लगे। चार भुजाएँ शंख, चक्र और कमल से सुशोभित थीं। और साक्षात् परमेश्वर का दर्शन हो रहा था। नाना तरह से स्तुति करते हैं।

विदितोऽसि भवान् साक्षात् पुरुष: प्रकृते:पर:।

केवलानुभवानन्द स्वरुप:सर्व बुद्धि दृक।।

स एव स्व प्रकृत्येदं सृष्द्वाग्रे त्रिगुणात्मकम्।

तदनु तवं हृयप्रविष्ट: प्रविष्ट इव भाव्यसे।।

यथा इमे अविकृता भावा:तथा ते विकृतै:सह।

सन्निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव।

प्रागेव विद्यमानत्वात् तेषां इह संभव:।।

               (श्रीमद्भागवत दशम स्कंध अध्याय 3, ।।14,15,16,)     


    यहाँ यह भी उद्धृत करना आवश्यक है कि कृष्णावतार के पूर्व ही दिशाएँ गुंजायमान हो उठीं, देव भी स्तुति करने लगे।

बाद में प्रभु की लीला ही थी कि उनके वास्तविक स्वरूप का भान नहीं रहा। इस दिव्य अवतार का वर्णन श्रीमद्भागवत् पुराण के दशम स्कंध के तीसरे अध्याय में उल्लिखित है जिसमें अवतार के बाद की अलौकिक छटा और माँ देवकी और वासुदेव जी के द्वारा भगवान श्री कृष्ण की स्तुति का मनोरम वर्णन किया गया है। वहीं वे बताते हैं कि उन्हें नन्द बाबा के घर पहुँचा दें। बाल कृष्ण मथुरा से गोकुल अंधेरी रात और भारी बरसात के मौसम में वासुदेव जी के सिर पर हैं। उफनती यमुना नदी में वासुदेव जी उतरते हैं यह श्री कृष्ण की लीला ही थी कि यमुना जी भी सादर मार्ग प्रशस्त करती हैं।उनकी लीला ही थी कि न तो मथुरा कारागार के रक्षक जान सके और न ही गोकुल में नंद बाबा के घर किसी को पता चला। यह महा रहस्य किसी को पता नहीं चला। इधर कंस भी धोखा खा गया। दूसरी तरफ गोकुल में बधाई बजने लगी। उत्सव मनाया जाने लगा। तमाम बाल लीलाओं को श्री कृष्ण ने गोकुल में किया। तमाम असुरों को बाल्य काल में ही सुरधाम पहुँचाया। यह भी पूर्व निर्धारित था कि द्वापर में उन्हीं के हाथों उद्धार होगा। पूतना उद्धार, बकासुर उद्धार, आदि तमाम इसके उदाहरण हैं।

ऐसा कहा जाता है कि तमाम लीलाओं को करने के क्रम में बाबा नंद एवं मैया यशोदा को भी कभी कभी यह महसूस हो गया कि वे साक्षात नारायण हैं लेकिन लीलाधारी श्री कृष्ण की माया में घिरे हुए थे उन्हें कुछ स्मरण नहीं रहता था।

जिस प्रकार मनुष्य के जीवन के प्रत्येक अवस्था में कर्म निश्चित होते हैं वैसे ही नारायण अवतार श्री कृष्ण के जीवन में भी घटित हुआ। इसके पीछे यह बहुत ही बड़ा रहस्य है।एक ऐसा भी समय था जब गो पालन, ग्वाल बालों के संग खेल कूद, गोपियों के संग रास, मक्खन चोरी जैसी बाल लीलाओं में एक अलौकिक आनन्द का सुख उन्होंने भोगा। लेकिन समय बलवान होता है। समय आ गया था कुछ और करने का।जो बाल कृष्ण अवतार के बाद मथुरा छोड़ गोकुल पहुँचे थे अब समय आ गया था धरती के बोझ और जन आक्रांता कंस के उद्धार का। मथुरा पहुँचे और वहाँ भी तमाम लोगों पर कृपा करी।कंस का अंत हुआ और अंततः उसे भान हो ही गया कि वे साक्षात नारायण के अवतार हैं। जीवन के संघर्षों में श्री कृष्ण को तमाम रूप धरने पड़े। यदुकुल की रक्षा के लिए तमाम आततायियों का भी संहार किया। बहुत ही गहरा रहस्य यही है कि जो श्री कृष्ण प्रेम की बांसुरी बजाया करते थे वे एक समय आने पर शस्त्र उठाते हैं।

प्रेममय संसार की स्थापना करने के बाद एक नया अध्याय शुरू किया और अपने पुरुषार्थ और शक्ति के प्रयोग से ही तमाम असुरों का संहार किया। इसमें उनकी असलियत और माया का भान कुछ लोगों को ही हो सका। कुरूक्षेत्र में अर्जुन को ज्ञान देते हुए चतुर्भुज रूप का दर्शन देते हैं। हालाँकि भीष्म पितामह और बिदुर जी को सब कुछ पता था। द्वारकाधीश के रूप में भी उन्होंने भू लोक में तमाम लीलाओं का संपादन किया। राज व्यवस्था,समाज व्यवस्था, कूटनीति,कर्म योग, ज्ञान योग, और प्रेम के जिन मूल्यों के आदर्श योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्थापित किया वह द्वापर युग का एक अहम अध्याय था।वह अध्याय जो युगों युगों तक चराचर जगत में अपनी छटा बिखेरता रहेगा।

राधा जी और श्री कृष्ण की प्रेम गाथा अगर छोड़ दी जाए तो श्री कृष्ण के अवतार की कथा अधूरी रह जाएगी। हाँ यह वही राधा जी हैं जो सर्वदा गो लोक में विराजती हैं। पृथ्वी के भार हरण के निमित्त जब अवतार का समय आया तो उन्हें भी भू लोक में आना पड़ा।जो श्री कृष्ण और राधा जी सदैव गो लोक में वास करते हैं ।श्री राधा जी द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के अवतार की कथा और लौकिक जीवन की गूढ़ रहस्य हैं।देवी भागवत् में राधा जी को सर्वोच्च देवी, कृष्ण की प्रियतमा,अनंत गुणों से परे बताया गया है।जो कृष्ण के शरीर का आधा भाग हैं।वे शाश्वत हैं और सभी लोकों की माता हैं।वे कृष्ण के शरीर का बायां भाग हैं।आयु,बल और सौंदर्य में उनके समान हैं। लक्ष्मी और लक्ष्मी पति भी उनकी पूजा करते हैं।

पद्म पुराण में राधा के महत्व को स्थापित किया गया है। राधा कृष्ण की भक्ति के मार्ग को दर्शाया गया है। जहाँ प्रेम का अद्भुत वर्णन किया गया है -

गतोराधापति स्थानं यत्सिद्धैरप्य गोचरम्।

ततश्च तदुपादिष्टो गोलोकादु परिस्थितिम्।।

नित्यं वृंदावनं नाम नित्य रास रसोत्सवम्।

अदृश्य परमं गुह्यं पूर्ण प्रेम रसात्मकम्।।

अर्थात् प्रियतम के उस स्थान पर पहुँचना जो सिद्धों के लिए भी अगोचर है,जिसकी स्थिति गोलोक से भी ऊपर है,जिसका नाम नित्य वृन्दावन है, जहाँ नित्य रास आदि रसोत्सव होते रहते हैं,जो स्थान पूर्ण प्रेमरसात्मक, अत्यंत गुह्य तथा अदृश्य है।

श्री वृन्दावन धाम को कभी गोविंद त्याग नहीं करते।अन्यत्र जगह जैसे मथुरा और द्वारका में जो उनका शरीर दृष्टिकर होता है वह कृत्रिम है --

वृंदावन परित्यागो गोविंदस्य न विद्यते।

अन्यत्र यद्वपुस्ततु कृत्रिमं तन्न संशय:।।

(अध्याय 77,छंद 71।।पाताल खण्ड,पद्म पुराण।।

            उनकी माया को बिरले ज्ञानी और महा मुनि गण ही समझ सकते हैं। सचमुच श्री कृष्ण के रहस्य को समझ सकना यदि संभव भी हो सके तो केवल उनकी कृपा से ही संभव है।

 

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

हाटा कुशीनगर, उत्तर प्रदेश

बुधवार, 30 जुलाई 2025

कविता

 

1.

लहरों के पग रीते हैं ??

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

आज कहूँ मैं कैसे किससे

नदियों के तट रीते हैं?

रेत हठीली थमती जाए

लहरों के पग  रीते हैं??

 

बाग बाग मंथर गति बहती

बहती सभी दिशाओं में

घाट घाट पर पूजित होती

सुंदर सृजित कथाओं में

नील गगन के छाए रहते

लहरों के पग  रीते हैं??

 

कंकर कंकर रेत कणों को

अभिसिंचित करती रहती

मर्म वेदना को धोती सी

निर्मल अविरल बहती रहती

नीर रेत घुल घुल कर मिलते

लहरों के पग  रीते हैं ??

 

हिम गिरि से निकली धारा

कल कल छल छल जाती है

वन उपवन को जीवन देती

अमिय बिछाती जाती है

निज आश्रय में साधन देते

लहरों के पग रीते हैं ??

 

खग कुल कलरव करते जल में

धवल हार सी बहती जाए

नदिया जीवन,जीवन धारा

जीवन में सुख भरती जाए

वसुधा का शृंगार हैं करते

लहरों के पग रीते हैं ??

 

रेत हठीली थमती जाए

नदियों के तट रीते हैं??


2

देखता हूँ कौन है वो?

 

देखता हूँ कौन है वो ??

देखता हूँ कौन है वो

शून्य की गहराईयों में

झाँकता है मौन है वो

देखता हूँ कौन है वो??

 

चीरते घनघोर तम की

खाइयों में डूबता है

ले तरंगित ज्योति लव

देखता हूँ कौन है वो??

 

है शिखरिणी मौन देखे

श्वेत नीले बादलों को

ले सजाए पंख स्वर्णिम

देखता हूँ कौन है वो??

 

कालिमा की भेंट चढ़ती

जो निशानी दिख रही है

मर्म के व्याकुल दृगों में

देखता हूँ कौन है वो??

 

कंटकों के रास्ते में

शूल की तीखी चुभन

चीखती सी घाटियों में

देखता हूँ कौन है वो??

 

हैं गगन में दिख रहीं जो

उड़ रही हैं बगुल पंक्ति

श्वेत धारी नील नभ में

देखता हूँ कौन है वो??

***


डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...