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शनिवार, 30 दिसंबर 2023

काव्यास्वादन

 

‘मन पसंद मौसम’ से ‘रिहाई’

डॉ. पूर्वा शर्मा  

कविता....सिर्फ़ कविता....बस! कविता ही कविता...कविता ही करना और कविता को ही जीना....अर्थात् जीवन ही कवितामय.....तो फिर शेष क्या रहा?.... अगली यात्रा की योजना.....जिसमें विदाई के वक्त भी साथ में सिर्फ़ कविता की दो-एक किताब....अर्थात् कविता-अनुराग के साथ ही अंतिम यात्रा.... ।

उपर्युक्त पंक्तियों को सार्थक करने वाले काव्य सेवी एवं काव्य समर्पित कवियों की सूची में एक नाम शामिल है – ‘डॉ. सुधा गुप्ता’ । सुधा जी के लिए जीवन का एक ही अर्थ है - कविता । बारह-तरेह वर्ष की उम्र से ही काव्य सृजन में जुटी सुधा जी का पहला संग्रह 1954 में प्रकाशित हुआ और अब तक उनकी कुल पचास पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है । गत सत्तर वर्षों की काव्य साधना के साथ-साथ उनका काव्य-प्रेम और प्रगाढ़ हो चला तथा कवयित्री आज भी सिर्फ कविता में ही रची बसी रहना चाहती है । उनका कवित्व साहित्य की अन्य विधाओं में भी साफ़-साफ़ दिखाई देता है । सुधा जी के काव्य फलक पर एक नज़र डालने पर 15 हाइकु संग्रह एवं 6 अन्य जापानी काव्य संग्रह (ताँका,चोका आदि), 16 कविता संग्रह, 4 बाल-गीत संग्रह तथा 2 पूजा गीत संग्रह – यानी कुल 43 पद्य-पुष्प मिलते हैं ।

सहृदय कवयित्री सुधा जी का हाइकुकार रूप पाठकों के समक्ष ज्यादा उजागर हुआ है, लेकिन एक सिद्धहस्त हाइकुकार के अनेकों हाइकु से गुजरने के पश्चात् उनकी संवेदनशील कविताओं में गोते लगाना एक अलग ही अनुभव रहा । प्रकृति प्रेमी सुधा जी की कोमल कान्त पदावली वाले अनेकों हाइकु की तुलना में यह रचनाएँ नितांत भिन्न नज़र आई । व्यक्ति और समाज की पीड़ा को अभिव्यक्त करती इन कविताओं में प्रेम, विरह, स्मृतियाँ, अकेलापन, आशावादी स्वर, आक्रोश, सामाजिक सरोकार, दंगे, मानवीय संवेदना, दहेज प्रथा, बाल श्रमिक, विधवा, दलित, घरेलू नारी एवं वृद्ध जीवन.......... और न जाने ऐसे तो जीवन के और कितने ही रूप-रंग नज़र आते हैं। सच कहें तो हाइकु से इतर यह काव्य संसार एक अलग ही दुनिया; सच की दुनिया दिखाता है । इन काव्य संग्रहों से गुज़रना एक अनूठी एवं अविस्मरणीय यात्रा है ।

डॉ. सुधा गुप्ता के कविता संग्रहों – चाँद की कंदील (1983), एक काफ़िला नन्हीं नौकाओं का (1983) तथा बूढ़ी सदी और डैने का टूटा आदमी (1984) – में अनेक छोटी-बड़ी कविताएँ संगृहीत है । संवेदनाओं के विभिन्न धागों से बुने इन काव्य संग्रहों में से कुछ रंग-बिरंगी कतरने यहाँ प्रस्तुत है ।

सुधा जी की बहुत पहले लिखी कविताएँ उनके जीवन संग्राम में कहीं ‘अनमनी’ सी, छिपी पड़ी रही और फिर उनके प्रथम काव्य संग्रह ‘चाँद की कंदील’ में प्रकाशित हुई । इन कविताओं में ज़िन्दगी को यातना का शिविर, चुइंग गम जैसी अलग-अलग उपमाएँ देकर, उसमें जीवन की  विविध संवेदनाओं - पीड़ा, बेबसी, ख़लिश, चुभन, उदासी, विरह आदि को बड़े ही सहज रूप में व्यक्त किया है । कवयित्री के मन की हथेली वॉन गॉग की तरह जलती मोमबत्ती पर टिकी है और उनका मन  कह उठता है –

मैं / चारों ओर घिरते अँधरे को देखती हूँ / और चाहती हूँ / कोई /

किसी ओर से / एक बार / सिर्फ़  इक बार/ मुझे / आवाज़ लगा ले! 

(चाँद की कंदील, पृ. 64)

‘एक काफ़िला :नन्हीं नौकाओं का’ संग्रह से गहन अर्थ लिए कुछ छोटी कविताएँ देखिए –

१)कहाँ-कहाँ हो आया मन / दो पल में / क्या-क्या पा, / खो आया मन / दो पल में ।

२)हौले से / तुमने तपता मेरा हाथ छुआ /और / पूछा– / ‘अब कैसी हो ?/ ....झपकी आई थी ।

३)फूल / मुझे बहलाने आये / मेरे पास बैठकर / हिचकी भर-भर / रोने लगे ।

४)मेरे हिरना-मन / कैसे / और / कब / तुम बन गये कोल्हू के बैल ?/ आँखें मूँद / चलते जाते हो-चलते जाते हो, / नीरस / इस दुष्चक्र से / ऊबते नहीं ?

आप देख सकते हैं कि उपर्युक्त सभी नन्हीं रचनाएँ इतने कम शब्दों में कितना कुछ बयाँ करती है । एक अन्य कविता ‘दुविधा’ में शब्द और रिश्ते का संबंध देखिए -

मेरे-तुम्हारे बीच / कुछ मुर्दा शब्द पड़े हुए हैं....

मेरे होठों से / तुम्हारे कानों तक की यात्रा / इनके नसीब में नहीं थी....

इन्हें दरिया में बहाना है / या / धरती में सुलाना है ? 

(बूढ़ी सदी और डैने टूटा आदमी, पृ. 17-18)

एक लंबी कविता ‘गुज़र जाते हैं मन पसंद मौसम’ में एक अलग ही विषय – बच्चे के स्कूल से कॉलेज प्रवेश करने तक की यानी बड़े हो जाने की कथा है । माँ के अंतर्मन की व्यथा को कवयित्री ने लगभग डेढ़ सौ पंक्तियों में बखूबी पेश किया है । हृदय को आनंद देने वाले मनभावन क्षण हमारे मन पसंद सुहावने मौसम की तरह बड़ी शीघ्रता-तत्परता से गुज़र जाते हैं ।

प्रस्तुत कविता में शीर्षक के नीचे की पंक्ति में लिखा है –  ‘दुनिया की हर एक माँ के लिये एक कविता’ ।  दरअसल यह कविता प्रत्येक माँ का अनुभव है । दुनिया की हरेक माँ इससे प्रभावित है, कोई कम तो कोई ज्यादा ।

“जिनमें तुम्हारी जान बसती थी / अब कुम्हला गये हैं / गुजर गया है बहार का काफ़िला.... / 

जिनके आने वाले बसंत के एक-एक दिन की गिनती करती तुम्हारी अंगुलियाँ / ख़ुशी से लरजती थीं” 

(‘बूढ़ी सदी और डैने टूटा आदमी’, पृ. 83)

बच्चों में तो सदा माँ की जान ही बसती है, यह पंक्तियाँ बहुत कुछ कह गई । नारी का सार तत्व माँ है, इससे ज्यादा सुख का अनुभव किसी भी नारी को अपने अन्य किसी भी रूप से प्राप्त नहीं हो सकता ।

“तुम्हारे अकेलेपन का संदेश लाये हैं’/ तुम्हें एकदम फ़िज़ूल –बेकार की चीज़.....” 

(‘बूढ़ी सदी और डैने टूटा आदमी’, पृ. 84)

माँ को इस बात का अंदेशा हो चुका है कि अब उसे अकेले ही गुज़र-बसर करना है । माँ को फ़िज़ूल –बेकार की चीज़ कहकर बच्चे यह साबित करना चाहते हैं कि अब उन्हें किसी भी कार्य में माँ की आवश्यकता नहीं है । माँ तो फ़्लैश बैक में अपने बच्चे के जन्म से लेकर अभी तक का सफ़र देखते हुए सोच रही है कि उसने तो बच्चे के जीवन में बहुत ही अहम भूमिका निभाई है,    लेकिन यह बच्चे –

“स्कूल की दीवार फाँद कर / विश्वविद्यालय-परिसर में गुम हो जाते हैं” 

(‘बूढ़ी सदी और डैने टूटा आदमी’, पृ. 85)

दरअसल यह बच्चे स्कूल की ही नहीं, माँ के आँचल और उसके प्यार की दीवार फाँदकर उसके सुरक्षा कवच से भी दूर हो जाना चाहते हैं । अब उसे माँ साथ नहीं बल्कि अपने हम उम्र वालों के साथ ही समय व्यतीत करना पसंद है । कविता में इस भाव का एक का चित्र कुछ इस प्रकार से हुआ है –

“और आगे पीछे तुम्हारे गुड्डे-गुड़ियों का / नन्हा काफ़िला चलता था / तुम्हारा आँचल थामे......

कितना तरस जाती थीं तुम / पल दो पल अकेले रह पाने के लिये” 

(‘बूढ़ी सदी और डैने टूटा आदमी’, पृ. 86)

और आज अकेलेपन में माँ पत्रिका, समाचार-पत्रों आदि में जबरदस्ती आँखें गढ़ाए अपना वक्त गुज़ार रही है । बच्चे का इंतज़ार व्यर्थ है, अब उसे माँ की बात या तकलीफ़ सुनने में कोई रुचि नहीं । उसकी आँखों में यह बात पढ़कर माँ चुपचाप अपने आँसुओं को भी उससे छिपा लेती हो । अपना मन बहलाने के लिए कभी ईश्वर के भजन या इधर-उधर की, ज़माने की बातें करती है लेकिन 

“उस समय भी मन तुम्हारा कहीं चुपचाप / बुदबुदाता है / गुज़र जाते हैं मन पसंद मौसम....

(‘बूढ़ी सदी और डैने टूटा आदमी’, पृ. 88) 

माँ का बुदबुदाना इस बात का संकेत है कि उसे अब भी वही मौसम पसंद है जो बीत चुका है । आख़िरकार कब तक अपनी पसंद के मौसम जीवन में बने रहेंगे ? अतः यही कहना मुनासिब होगा कि - ‘गुज़र जाते हैं मन पसंद मौसम’ ।

एक स्त्री का जीवन सदा ही चुनौतीपूर्ण रहा है । एक स्त्री को अपने जीवन की मुक्ति किस तरह से और कैसे चाहिए उसका चित्रण ‘रिहाई’ कविता में दिखाई दिया है । इस कविता में स्त्री संवेदना का स्वर देखिए –

“मुझे तो / मेरी दादी-माँ ने / पहली घुट्टी की जगह भी / नसीहत पिलाई थी !....

तुमने नसीहतों का मृदु विष दे-दे कर / कमज़ोर / डरपोक, निस्तेज, निःसत्व / स्त्रिनुमा मशीन में बदल दिया.... 

(‘एक काफ़िला :नन्हीं नौकाओं का’, पृ.110-111)

स्त्री अपने जीवन से रिहाई चाहती है । विदाई का वक्त आ जाने पर वह अपनी सफ़र की साड़ी में अमलतास के कुछ रंग डालना चाहती है और इमली की छाँह में कुछ पल सुस्ताना चाहती है । साथ में कविता की एक या दो किताब भी ले जाना चाहती है । इस तरह से वह खुद तय करना चाहती है कि वह कहाँ जाना चाहती है और अपने साथ क्या ले जाना चाहती है । वह कहती है कि उसके पास कनफ़ैस करने के लिए कुछ नहीं है –

“मैंने / ज़िन्दगी का स्वाद चखा ही नहीं / तो स्वीकार क्या करूँ...... 

(‘एक काफ़िला :नन्हीं नौकाओं का’, पृ.114)

कवयित्री के शब्द चयन (ट्रैंक्वालाइज़र)पर गौर कीजिए –

“नैतिकता के ट्रैंक्वालाइज़र दे-देकर / एक समूची, खूबसूरत संभावनाओं से भरी / ज़िन्दगी / तुम डकार गये”

(‘एक काफ़िला :नन्हीं नौकाओं का’, पृ. 114)

कौन उसकी इस विदाई में शामिल होगा इस बात से स्त्री को कोई फर्क नहीं पड़ता । उसे चुपचाप नाव पर बैठकर पहली बार ‘उसकी मर्ज़ी’ से चप्पू चलाना है, उसे तट पर छूटतों का मोह भी नहीं है । आगे की संवेदना देखिए –

“तुम्हारी आँखों में आँसू ? ओह ! शायद, शिकार हाथ से निकलने की पीड़ा है..... अब, अंतिम वक्त तो बख्श दो”

 (‘एक काफ़िला :नन्हीं नौकाओं का’, पृ. 115)

यहाँ कविता की गहन संवेदना और प्रतीकात्मक शैली को आप देख सकते हैं । यहाँ पर वर्णित दोनों कविताओं - ‘गुज़र जाते हैं मन पसंद मौसम’ और ‘रिहाई’ में शब्दों की बुनावट एवं गूढ़ अर्थ, संवेदना की गहनता और प्रतीकात्मक शैली से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि सुधा जी की कविताएँ साधारण मनुष्य की संवेदना कहती असाधारण कविता है । सुधा जी की अन्य कुछ कविताओं में जीवन-दर्शन, चिन्तन और बाह्य जीवन के साथ जीवन की अंतर्यात्रा की यात्रा का संकेत दिखाई देता है । 

सुधा जी ने अपनी आत्मकथा में कहा है – “एक विचार मन को बार-बार कचोटता था कि मेरी कविता को सहृदय पाठक बहुत कम मिले”(एक पाती : सूरज के नाम, डॉ. सुधा गुप्ता, पृ. 551) सुधा जी की इस बात को लेकर मन में कुछ विचार उठते हैं । पहला – क्या सच में संवेदनशील पाठक इतने दुर्लभ है ? दूसरा – क्या कविता समझने वाले पाठक कम है, या फिर – संवेदना-चिंतन-दर्शन से ओत-प्रोत रचनाओं के गहन अर्थ तक पहुँच पाना कहाँ तक संभव है । कई बार कुछ रचनाओं की सरल शब्दावली में भी अर्थ की अत्यधिक गहनता अथवा प्रतीकात्मक भाषा के कारण यह रचनाएँ साधारण पाठक के समझ से परे होती हैं । यही कारण है कि पाठक उसकी गहराई तक नहीं पहुँच पाता, उसके मर्म को पकड़ नहीं पाता । सुधा जी के काव्य के विषय में यह तीसरा विचार एकदम सही लगता है ।  

डॉ. सुधा गुप्ता जी का काव्य संसार बहुत ही व्यापक है । यहाँ कुछ कविताओं के माध्यम से आप समझ चुके होंगे कि सुधा जी की कविताएँ शिल्पगत विशेषताओं जैसे भाषा, शैली , बिम्ब, प्रतीकों आदि की उत्कृष्टता को छूते हुए विचार और  मनुष्य की संवेदना, दर्द एवं सामाजिक दर्द को अपना बनाती हुई कुछ ऐसे स्तर पर पहुँचती हैं जहाँ पर पहुँच पाना हर किसी के बस की बात नहीं ।

 

डॉ. पूर्वा शर्मा

वड़ोदरा

 

 

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2023

काव्यास्वादन

 


पत्थर

-           डॉ. सुधा गुप्ता 

समकालीन परिवेश, मानवीय संवेदना, प्रतीकात्मकता, सामाजिक विषमता-विवशता, मनोजगत के विविध भाव, स्त्री चेतना, प्रेम, प्रकृति आदि अनेक स्थूल-सूक्ष्म विषयों का स्पर्श करते हुए डॉ.सुधा गुप्ता की लेखनी हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं व काव्य की विभिन्न शैलियों में पिछले लगभग पाँच दशकों से निरंतर चलती रही है । विशेषतः हाइकु सृजन में उनका योगदान कुछ खास ही रहा है । सन् १९८८ में  ‘आदमकद वसन्त’ नामक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ । यह संग्रह शब्दों के बहाव में मानव हृदय को पिघलाने और पाठकों को विशेष रूप से अपनी ओर खींचने वाली कई भावपूर्ण एवं मार्मिक रचनाओं से शोभित है । इसी संग्रह में एक कविता है - ‘पत्थर’ ।


हमारे विचार से इस ‘पत्थर’ नामक कविता को हम एकाधिक दृष्टियों से भी देख सकते हैं। सबसे पहले तो हम कह सकते हैं कि कवयित्री के वैयक्तिक जीवनानुभव की जमीन से उगी यह एक सामाजिक सरोकार की कविता है। दूसरी तरफ यह कहना भी गैरवाजिब नहीं होगा कि इसमें एक स्त्री की केवल व्यक्तिगत सोच तथा इसी सोच के पीछे अपना एक निजी अनुभव को बताने वाली यह कविता है, जिसे सामान्यीकृत मानना ज्यादा ठीक नहीं है ।

आकार में बहुत ही छोटे कद की इस कविता का  प्रारंभ होता है - 

बचपन में

दादी माँ की देखा देखी

पत्थर की प्रतिमा

पूजती थी

यहाँ एक स्वाभाविक बात कही गई है - एक सहज प्रक्रिया को बताया गया है । बचपन का मतलब – एक अवस्था तो है ही पर इसके साथ-साथ बचपन यानी बोध की कमी । समझ की कमी ।  ज्ञान की कमी। इसीलिए तो जब कविता में दृश्य बदलता है - और कवयित्री कहती है कि बचपन बीत गया और बड़ी हो गई तब उस पत्थर की प्रतिमा की पूजा निरर्थक लगी - पर आदतन उस कार्य से जुड़ी रहीं । मतलब पूजा- मूर्तिपूजा में कोई आस्था नहीं- विशेष लगाव-भावना नहीं, यह पूजा महज़ आदतन ही हो रही है ।

अब यह जो है वह कवयित्री की निजी मान्यता है, इस व्यक्तिगत सोच को सामान्यीकृत करना ठीक नहीं है ।

पत्थर की प्रतिमा की पूजा को निरर्थक बताने वाली कवयित्री यहाँ तक ही नहीं बल्कि आगे कहती है कि तन्हा जीवन सफ़र को पार करने के बाद जब एक साथ मिलता है और अब उसकी पूजा शुरू होती है और यह पूजा भी मानो पत्थर पूजा के आदत के कारण ही।

हमने पहले भी कहा है कि यह विचार कवयित्री का वैयक्तिक है।       

संदर्भ :-

    आदमकंद वसन्त(कविताएँ), सुधा गुप्ता, विमल प्रकाशन, गाज़ियाबाद, प्रथम संस्करण फ़रवरी १९८८, पृष्ठ-०३

  

विमल चौधरी

शोधछात्र हिंदी विभाग,

सरदार पटेल विश्वविद्यालय

वल्लभविद्यानगर

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

काव्यास्वादन

 

स्त्रियाँ (अनामिका)

डॉ. पूर्वा शर्मा

एक नारीवादी साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली प्रसिद्ध कवयित्री ‘अनामिका’ ने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्त्री-जीवन के विविध रूपों, उसकी विडंबनाओं-विसंगतियों व त्रासदी को सफलता से रेखांकित किया है। उनकी प्रस्तुत कविता ‘स्त्रियाँ’ में स्त्री अस्मिता, स्त्री शोषण, स्त्री के अधिकार आदि का वर्णन बड़ी ही मार्मिकता के साथ हुआ है। वर्षों से समाज में स्त्री की स्थिति दोयम दर्जे की रही है और स्त्री स्वयं अपनी इस दयनीय स्थिति से भली-भाँति परिचित है। लेकिन इसका वह विरोध भी नहीं कर पाती है। स्त्री जीवन की इसी सच्चाई को कवयित्री ने इस कविता में निर्भीकता से बताया है। कविता के आरंभ की पंक्तियाँ ही स्त्री-शोषण को बखूबी स्पष्ट करती हैं। कवयित्री की संवेदना एवं शब्द चयन गज़ब का है – 

पढ़ा गया हमको

जैसे पढ़ा जाता है काग़ज़

बच्चों की फटी कॉपियों का

चनाजोर गर्म के लिफ़ाफ़े बनाने के पहले!

यहाँ कवयित्री ने स्त्री को कागज़ की उपमा दी है और कागज़ भी कौनसा! ‘फटी कॉपियों का’ जिससे ‘चनाजोर गर्म के लिफ़ाफ़े’ बनाए जाते हैं। एक अनूठी उपमा देते हुए कितनी सहजता से, कितने सरल शब्दों में एक स्त्री के मन की बात कह दी है।  आगे की पंक्तियों में दूसरी उपमा ‘घड़ी’ भी बड़ी ही सहज एवं अनूठी है। सुबह-सुबह अलार्म बजने पर होने वाली अनुभूति को कितनी सुंदरता से स्त्री के वजूद के साथ जोड़ दिया है –

देखा गया हमको

जैसे कि कुफ़्त हो उनींदे

देखी जाती है कलाई घड़ी

अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद!

इन दोनों उपमाओं के बाद भी कवयित्री उपेक्षित स्त्री जीवन की संवेदना को व्यक्त करने के लिए दो और अन्य उपमाओं का उपयोग करके कहती हैं कि उसकी स्थिति, उसका वजूद तो जैसे इस पुरुष सत्तात्मक समाज में नगण्य ही रहा है। स्त्री के होने का भाव, उसके अस्तित्व का भाव, न होने की तरह ही है। अपने लाभ के लिए पुरुष समाज उसका बस भोग-उपयोग ही कर रहा है। उसके प्रति सभी का रवैया दूर के रिश्तेदारों के दुःख की भाँति है –

सुना गया हमको

यों ही उड़ते मन से

जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने

सस्ते कैसेटों पर

ठसाठस्स भरी हुई बस में!

भोगा गया हमको

बहुत दूर के रिश्तेदारों के

दुःख की तरह!


अपने अस्तित्व का बोध कराने के लिए स्त्री को अपनी आवाज़ बुलंद करनी ही होगी। इसलिए अनामिका एक विदुषी की भाँति बड़ी ही विनम्रता के साथ कहती है –

एक दिन हमने कहा

हम भी इंसान हैं –

हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर

जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद

नौकरी का पहला विज्ञापन!

कविता की आगे की पंक्तियों में भी कवयित्री का आक्रोश और आग्रह दोनों ही नज़र आता है। एक ओर जहाँ कविता के आरंभ में कवयित्री ने स्त्री की स्थिति-परिस्थिति को रेखांकित किया है वहीं दूसरी ओर आगे की पंक्तियों में उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि स्त्री को देखने के लिए आपके पास किस तरह की दृष्टि होनी चाहिए –

देखो तो ऐसे

जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है

बहुत दूर जलती हुई आग!

सुनो हमें अनहद की तरह

और समझो जैसे समझी जाती है

नई-नई सीखी हुई भाषा!

अपने विवेक से समस्या के साथ उसका निदान प्रस्तुत करने में कवयित्री सफल हुई है। लेकिन जैसे ही स्त्री अपने अस्तित्व बोध की बात करती है तो अगले ही क्षण उसकी इस माँग को खारिज़ करने का शोर सुनाई देने लगता है –   

इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई

एक अदृश्य टहनी से

टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें

चीख़ती हुई चीं-चीं

दुश्चरित्र महिलाएँ, दुश्चरित्र

महिलाएँ –

समाज स्त्री को एक नये नजरिये से देखने को तैयार नहीं है। जैसे ही स्त्री अपने लिए आवाज़ उठाती है उस पर इल्ज़ामों के तीर चलना शुरू हो जाते हैं। पुरुषवादी समाज में स्त्री का चुप रहना ही श्रेष्ठ माना गया है और यही मान लिया जाता है कि आवाज़ उठाने वाली स्त्री तो दुश्चरित्र ही है।  

किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूलीं-फैलीं

अगरधत्त जंगली लताएँ!

खाती-पीती, सुख से ऊबी

और बेकार बेचैन, आवारा महिलाओं का ही

शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ...।

फिर ये उन्होंने थोड़े ही लिखी हैं

(कनखियाँ, इशारे, फिर कनखी)

बाक़ी कहानी बस कनखी है।

पहले से ही साहित्य की कहानी-कविताओं आदि में पुरुष लेखकों ने स्त्रियों का चित्र कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया है कि उसे एक विशेष ढंग से देखे-सुने जाने के लिए हम अभ्यस्त हो गए है। यही कारण है कि स्त्री को इस पुराने ढंग अथवा परंपरा से कुछ अलग अंदाज़ में देखना पसंद ही नहीं करते। यदि वह स्वयं को इस लीक से हटकर अलग तरीके से प्रस्तुत करती है तो उसे   चरित्रहीन और आवारा ही समझा जाता है। आगे की पंक्तियों में कवयित्री गुहार लगाकर पूरे पुरुष समाज से कह रही है कि अब तो नारी की इस त्रासदी से छुटकारा दे दो। अपने पर हर ज़ुल्म जैसे भ्रूण हत्या, यौन शोषण, दासत्व, अग्नि परीक्षा से मुक्ति चाहती है। निम्न पंक्तियों में ‘बख़्शो’ का स्वर देखिए –

हे परमपिताओ,

परमपुरुषों—

बख़्शो, बख़्शो, अब हमें बख़्शो!

संवेदना एवं कथ्य की दृष्टि से तो यह कविता बेजोड़ है ही, इसके अतिरिक्त सुंदर उपमानों के साथ अनूठे एवं सटीक विशेषणों जैसे – दूर के रिश्तेदारों के दुःख की तरह!, बहुत दूर जलती हुई आग, नई-नई सीखी हुई भाषा!, रंगीन अफ़वाहें, अगरधत्त जंगली लताएँ  आदि का प्रयोग कविता में चार चाँद तो लगाता है और उसके अर्थ में भी वृद्धि करता है।

समाज स्त्री को किस नज़रिए से देखता है और स्त्री स्वयं के प्रति कैसा व्यवहार अथवा दृष्टि की अपेक्षा करती है जो इस कविता के माध्यम से स्पष्ट होता है। स्त्री विमर्श का उद्देश्य – स्त्री की ‘स्व’ की पहचान का बोध जो प्रस्तुत कविता में परिलक्षित होता है। 

 


डॉ. पूर्वा शर्मा

वड़ोदरा

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

काव्यास्वादन

 


ट्राम में एक याद : चेतना पारीक के बहाने

विकास कुमार मिश्रा

प्राचीन काल से लेकर अर्वाचीन काल तक प्रेम काव्य का केंद्रीय कथ्य रहा है। आदिकवि के मुख से नि:सृत संस्कृत का प्रथम श्लोक भी क्रौंच पक्षी की प्रेमक्रीड़ा में विघ्न डाल, जोड़े में से एक की हत्या कर देने वाले निषाद के लिए श्राप रूप में प्रस्फुटित हुआ था। हिंदी के कवि सुमित्रानंदन पंत का “वियोगी पहला कवि” वस्तुत: प्रेम-वियोगी ही है। प्रेम के दोनों पक्षों – संयोग एवं वियोग को केंद्र में रखकर प्रचुर मात्रा में काव्य सृजन हुआ। वस्तुत: वियोग प्रेम में अवकाश नहीं पैदा करता, अपितु वह प्रेम में प्रकाश की उत्पत्ति करता है। वियोग में प्रेमी का भौतिक शरीर भले ही अलग हो, परन्तु मन से वह और भी एकाकार हो जाता है। गोया – तुलसीदास कृत रामचरितमानस के राम हनुमान के द्वारा सीता से कहते हैं –

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।।

हिंदी साहित्य में भी आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक असंख्य प्रेम केन्द्रित काव्यों का सृजन हुआ। प्रेम पर काव्य सृजन की इतनी प्रचुरता का कारण इसके प्रति ‘नेति-नेति’ की धारणा है। हरेक कवि ने इसका अलग-अलग दर्शन किया और अभिव्यक्ति भी सबकी अलग-अलग रही। प्रेम संबंधी कविताओं को दो भागों में बाँटकर देखा जाता है। पहली, वे कविताएँ जिनमें प्रेम के उदात्त रूप का दर्शन होता है। दूसरी, वो कविताएँ जिनमें प्रेम फूहड़ता के कक्ष में प्रवेश करता दिखाई देता है। हिंदी साहित्य में प्रेम के उदात्त रूप को केन्द्रित कर बहुत कम कविताएँ लिखी गई हैं। अकविता आंदोलन ने तो फूहड़ता की भी परिसीमा को ध्वस्त कर दिया था।

हिंदी में उदात्त प्रेम पर लिखी गई कुछ ही स्मरणीय कविताएँ हैं, जिनमें ज्ञानेंद्रपति की कविता ट्राम में एक याद एक प्रमुख कविता है। यह कविता बहुचर्चित है एवं कई भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया है। इसकी प्रथम पंक्ति -  चेतना पारीक, कैसी हो? इतनी चर्चित हुई कि पाठक के मन में चेतना पारीक कविता के शीर्षक के रूप में पैठ गया। कविता के प्रारम्भिक अंश में कवि ‘चेतना पारीक’ से गत जीवन के अनुभवों के आधार पर कई प्रश्न पूछता है। ये ऐसे प्रश्न हैं, जो चेतना पारीक के बहाने एक आधुनिक प्रगतिशील स्त्री का चित्र मन में पैदा कर देते हैं। एक ऐसी स्त्री का चित्र, जो आधुनिक परिवेश में जी रही है, जो नाटक में भाग लेती है, लाइब्रेरी जाती है, कविता लिखती है, गीत गाती है, चित्र बनाती है, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है, उसे ढेर सारे मित्र बनाने पसंद हैं तथा वह प्रेम भी करती है। इन सबके साथ ही उसमें आदर्श एवं उदात्त चरित्र वाली स्त्री की प्रतिमूर्ति दिखाई देती है। कवितांश पाठक को अपने साथ ही मानसिक यात्रा पर ले चलता है, कविता पढ़ते-पढ़ते पाठक चेतना पारीक से प्रश्न पूछना प्रारम्भ कर देता है और स्मरण में खो जाता है।

चेतना पारीक, कैसी हो?

पहले जैसी हो?

कुछ-कुछ खुश

कुछ-कुछ उदास

कभी देखती तारे

कभी देखती घास

चेतना पारीक, कैसी दिखती हो?

अब भी कविता लिखती हो?

 

तुम्हें मेरी याद न होगी

लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो

चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो

तुम्हारी क़द-काठी की एक

नन्ही-सी, नेक

सामने आ खड़ी है

तुम्हारी याद उमड़ी है

 

चेतना पारीक, कैसी हो?

पहले जैसी हो?

आँखों में उतरती है किताब की आग?

नाटक में अब भी लेती हो भाग?

छूटे नहीं है लाइब्रेरी के चक्कर?

मुझ-से घुमन्तू कवि से होती है कभी टक्कर?

अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?

अब भी तुम्हारे हैं बहुत बहुत मित्र?

अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?

अब भी जिससे करती हो प्रेम, उसे दाढ़ी रखाती हो?

चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं गेंद-सी उल्लास से भरी हो?

उतनी ही हरी हो?

कवितांश में चेतना पारीक की छवि के साथ ही कवि के प्रेमिल मन का भी दर्शन होता है। कवि का प्रेमी मन आज भी चेतना पारीक की याद में गुम है, वह भूल नहीं पाया। कवि अपने बहाने एक उदात्त प्रेमी का भी अंकन करता है।

कविता के उत्तरार्द्ध में कवि चेतना पारीक के बहाने महानगरीय त्रासदी का वर्णन करता है। विकसित महानगरों में जीवन अतिगत्यात्मक अवस्था में है। सबको दौड़कर पहले पहुँचने की जल्दी है, सबको जिंदगी एक दौड़ लगती है। महानगरों की गलियों में शोर-शराबा और ट्रैफिक जाम एक आम बात बन चुकी है। इस भाग-दौड़ की महानगरीय जिंदगी में कवि को कलकत्ता की विकलता स्पष्ट सुनाई देती है। मनुष्य महानगरीय जिंदगी जीने की प्रक्रिया में प्रकृति से दूर होता जा रहा है। उसके महावन में एक भी गौरैया नहीं है। …और गौरैये के बिना महावन कैसा? चेतना पारीक के बहाने कवि महानगर के महाट्टहास का अंकन करता है। इस महाट्टहास ने न जाने कितने पशु-पक्षियों का बसेरा लील लिया। यह महाट्टहास डरावना है, उसके समक्ष मधुर हँसी ने दम तोड़ दिया है। पूँजीवादी इस समाज में मशीनी धक-धक के सामने किसी एक जीवित धड़कन का कोई महत्व नहीं रह गया है। कवि पूर्व के कलकत्ता का स्मरण कर व्यथित है कि विकसित होते महानगर बहुत कुछ खत्म करते जा रहे हैं।

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है

भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है

ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है

विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है

 

इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है

एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है

महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम कम है

विराट धक्-धक् में एक धड़कन कम है कोरस में एक कंठ कम है

तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ाली है

वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है

 

फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ देखता हूँ

आदमियों को किताबों को निरखता लेखता हूँ

रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग-बिरंगे लोग

रोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोग

देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है

देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है

 

चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?

बोलो, बोलो, पहले जैसी हो !

उत्तरार्द्ध में कविता पाठक के मन को त्रास से भर देती है, वह चेतना पारीक के बहाने विकास के नाम पर हो रही विभीषिका के प्रति पाठक को चेताती है। कविता बिल्कुल नये ढंग से प्रेम और महानगरीय समस्या को एक साथ अंकित करती है। कवि का अनुभव इतना व्यापक है कि वह समस्त पाठक को अपना स्वयं का अनुभव प्रतीत होता है।

 


विकास कुमार मिश्रा

शोध छात्र, हिंदी विभाग

सरदार पटेल विश्वविद्यालय

वल्लभ विद्यानगर (गुजरात)

 

 

                                    

                                                

 

 

                                                   

 



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