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रविवार, 14 अप्रैल 2024

कहानी


प्यास

डॉ. मंजु शर्मा

घड़ी उठाते, पर्स और गाड़ी की चाबी संभालते हुए उसके पैर हाथ और होंठ एक साथ दौड़ रहे थे। धरर्र  की आवाज़ के साथ वह छू मंतर। अब शाम का पता नहीं और न ही आधी रात का । इसी रफ्तार से चलती है।  न .. न चलती नहीं दौड़ती है।   

पिता ने  गर्वीली आवाज में कहा कि श्रीमती जी आपको तो खुशी होनी चाहिए कि  हमारी बेटी तेज तर्रार रिपोर्टर के नाम से जानी-पहचानी और पसंद की जाती है। माँ मुस्कुरा दी। दोनों हमेशा के जुमले पर आ गए  ‘मेरी बेटी मेरा अभिमान है’।

अचानक ब्रेक के साथ जोर का धक्का लगा और गाड़ी रेवड़ (भेड़ों का झुंड) के जाने का इंतजार करने लगी।  हार्न  बजाया। हार्न  का  इन पर  कोई असर नहीं । ये तो अपनी चाल से चलेंगी । बिल्कुल कतार में क्या अनुशासन है रंजना मुस्कुरा दी।  वैसे शहर में भी तो ट्रैफिक में यही होता है हार्न, हार्न बस बजाते रहो । आवश्यक अनावश्यक। रेवड़ रेवड़ी और रेवाड़ी .. वह सोचने लगी एक मात्रा कितना गहरा अर्थ देती है । रास्ता फारिग हुआ तो गाड़ी हवा से बात करने लगी । यहाँ भीड़भड़क्का तो था नहीं कि गाड़ी धीरे से चलाए ।  अगर टीले में फँस गई तो यह सोचकर वह सतर्क हो गई । और गेयर बदल दिया ।

जेठ की चिलचिलाती धूप बदन में शूल की तरह चुभती है ।  रंजना ने पानी पीना चाहा । अरे जल्दी में पानी लाना तो भूल ही गई । वैसे कोन बड़ी बात पानी तो खरीद सकते हैं न ! कंधे उचकाए और  आगे बढ़ गई  । लेकिन रंजना का  यह विश्वास जल्दी ही धरास्याही  हो गया । कहीं पानी नहीं बस मृगमरीचिका । शायद वह रास्ता भटक गई थी । जीपीएस हमेशा खरा उरते यह भी जरूरी नहीं न । उसका गला सूखने लगा । वह पानी की तलाश में उतरी कि लू के गरम थपेड़ों ने उसे झुलसा दिया। छाया देने वाला चश्मा उतारा  उफ़! यहाँ तो आग बरस रही है । यह धूप तो आँखों को रेगिस्तान में बदलने को आतुर है। प्यास  के मारे छटपटाहट जैसे पानी बिन मीन । थोड़ा आगे गई कि एक जाँटी  (राजस्थान में पाया जाने वाला वृक्ष ) के नीचे भुने हुए तीतरों की तरह पड़े दो लोग । रंजना की आवाज से उनमें   कुछ हलचल हुई । उनके पास फावड़ा, परात और पानी का एक मटका था । उसकी नजरें पानी के मटके पर पड़ी कि जी में जी आया । मुझे पानी पीना है । दो बेजान आँखे पल्लू से झाँकी और   इस अप्रत्यासी प्रश्न से चौंक गई । अब उसने अपनी लूगड़ी (ओढनी) नीची की और बुदबुदाई । के बोल रहया हैं ये बाईसा ? रामप्रताप  ने राम-राम कर अभिवादन में हाथ जोड़े । मुझे पानी चाहिए । उसने सीधे प्यास का हवाला दिया । दोनों एक दूसरे को सूखी आँखों से देखने लगे फिर घड़े की ओर टकटकी । क्या हुआ ? देखिए! यहाँ पानी की बोतल नहीं मिल रही है और मेरा गला सूखे जा रहा है, थोड़ा सा पानी पिला दीजिए । बचपन में नल खुला छोड़ने पर दादाजी की घुड़की कानों से टकराई .. तुम लोग पढ़ लिखकर भी अनपढ़ हो । ‘पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून’ कहते हुए नल को बंद कर देते थे । सच में आज पानी के एक गिलास के लिए वह गिड़गिड़ा रही थी । बाईजी पाणी तो है, पण थे पीओगा ? मानो मैंने उनकी दुखती रग को छील दिया हो ? पीने के लिए ही तो माँग रही हूँ न ? वह उबल पड़ी । वे दोनों नि:शब्द । रंजना जैसे ही  चलने के लिए मुड़ी कि गंगा  की उदासी में लिपटी असहाय आवाज ने उसे रोका ‘पाणी पिवाणों तो धरम को काम है।  यह कहते हुए उसके  घायल दिल  की राह से जबरदस्ती निकलती हुई पानी की गर्म बूंदे तपती धरती पर चू पड़ी। रंजना  अनजान सी इस पहेली में उलझ गई। रामप्रताप  ने कहा, वो मैडमजी हम जात बाहर हैं न ! इसलिए सोचा कि हमारा छुआ पानी  आप कैसे ....? रंजना के माथे पर प्यास और परेशानी के पड़े बल अब सीधे होने लगे । उसने हाथ बढ़ा दिया और गटगट करती एक साँस में पानी पी गई। मानो जीवन मिल गया हो । सच यह तृप्ति तो टनों सोना पाकर भी न मिले । अब थोड़ी सी छाँव का सहारा लेकर वह उनके पास बैठ गई । यह जात बाहर क्या मतलब, समाज से बहिष्कृत ? प्रताप ने हाँ में गर्दन झुका ली। गंगा ने अपनी लुगड़ी सरका कर गोद में सोए बच्चे को दूध पिलाने लगी ।

आपका नाम क्या है ? रामप्रताप और यह गंगा है।

कहाँ रहते हैं ? यहीं गरोदा गाँव की ढाणी में। क्या करते हो ? गंगा ने कहा अब तो ठाला हाँ । मतलब ? मतबल पहले गाँव में, मनरेगा में या और किसी तरह का काम मिल जाता था अब नहीं मिलता । काम के वास्ते दूर दूर जानो पड़े है। ‘निवाला छीन लिया हमारा’।  किसने ? रंजना ने पूछा ।  कुछ देर चुप्पी छाई रही । ‘खाप पंचायत ने’ बड़ा ही शुष्क जवाब। यह सब क्यों कैसे क्या मैं जान सकती हूँ पूछते हुए अंजना ने पालथी लगा ली। अब न उसे लू झुलस रही थी और न चिलचिलाती धूप चुभ रही थी । गंगा पैर के अंगूठे से मिट्टी कुरेदने लगी । वो मुझे परेम (प्रेम) हो गया था । उसकी आवाज पापभाव और लोकलाज की तलैया में डुबकी लगाने लगी । जेठ दुपहरी में उसके नैना सावन भादो बन बरसने लगे । अंगूठे से मिट्टी कुरेदे जा रही थी मानो गंगा उसमें समा जाना चाहती हो । फिर एकाएक अंजना के मौन को गंगा की तल्खी आवाज ने तोड़ा । अब मन पर किसी का जोर तो नहीं न ! म्हाने गलती की सजा मिल गई । जुर्माना दिया। पाछे क्यूँ भूखे-प्यासे घर से दूर बिरान होना पड़ रहा है?  और सुबक पड़ी ।  रामप्रताप ने बताया कि खाप पंचायत ने दोनों को निर्वस्त्र कर सफेद झीना कपड़ा पहनाया और पूरे समाज के सामने दूध और पानी से नहलाया । अर्थात शुद्धीकरण । व्हाट नोनसेन्स ? अंजना अपने आप से खीज उठी । कल ही तो उसने चंदा मामा दूर के नहीं अब टूर के सुना था । चाँद पर पहुँचने और  रहने की बातों से उड़ी-उड़ी जा रही थी । अचानक धरती पर गिर पड़ी जिससे उसकी सोच के पंख लहूलुहान हो उठे ।

रामप्रताप ने आगे कहा गंगा उस सदमे से बाहर नहीं आई है । इसे दौरे पड़ने लगे हैं । इलाज के पैसे नहीं है । गाँव का कोई दुकानदार हमें सामान नहीं देता है। जरूरत की चीजें  मिलों दूर जाकर लानी  पड़ती  है । कुओं और हैंडपंप से पानी नहीं भरने दिया जाता है  और न ही गांवों के टेंपो से आना-जाना ।  सब पर रोक है । तीन साल से किसी शादी-ब्याह में नहीं गए । पंचायत ने फरमान जारी किया है कि किसी ने हमारी मदद की तो उन्हें भी बिरादरी से निकाल दिया जाएगा ।

तो क्या किसी ने रिपोर्ट नहीं लिखवाई ? लिखवाई थी न ! पर मजाल है कि किसी का बाल बाँका हुआ हो ! बस यह नारकीय जीवन भुगत रहे हैं मैडम जी ।

कहते कहते सिसक उठा । रंजना आज महिला दिवस पर विशेष – ‘स्त्री अधिकार और उसका सम्मान’ पर किसी संस्था में बोलने वाली थी। लेकिन कागजों पर लिखना और टीवी शो पर बोलना कितना आसान है न ! यह सोचते हुए नमस्ते के लिए हाथ जोड़कर उठने लगी । ध्यान आया कि माँ ने पार्ले जी रखा था । बच्चे के लिए पर्स से बिस्कुट निकालते हुए वे  रिसर्च पेपर्स भी निकल पड़े और लू के झोंके में उड़ गए । मुँह चिढ़ाते हुए बलुई मिट्टी में समाधिस्थ  हो गए।

 

डॉ. मंजु शर्मा

विभागाध्यक्ष (हिंदी)

चिरेक इंटरनेशनल स्कूल, हैदराबाद

सोमवार, 31 जुलाई 2023

आलेख

 


प्रेमचंद का शिक्षा विमर्श

डॉ. मंजु शर्मा

समाज को व्यवस्थित,  सुचारु रूप से चलाने तथा उसके विकास के लिए शिक्षा सशक्त साधन है। शिक्षा छुआछूत से दूर, जात-पाँत का खंडन करती है । इसके अभाव में मानवीय मूल्यों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अर्थात् समाज एवं देश की रीढ़ होती है, शिक्षा ।

प्रेमचंद जी ने शिक्षा व्यवस्था को बहुत करीब से जाना था, और उसके नकारात्मक  रूप पर टिप्पणियाँ की। वे शिक्षक, हेडमास्टर तथा डिप्टी थे। उन्होंने केवल कक्षा-कक्ष की परिधि में दी जाने वाली शिक्षा को, शिक्षा का संकीर्ण रूप माना। उनका मानना था कि शिक्षा वही है जो ‘समझ’ को विकसित करे। प्रेमचंद की कहानियों में वर्ग संघर्ष पर कुठाराघात किया गया है।

वे एक आदर्श अध्यापक थे ।

उनकी कहानी ‘बड़े भाई साहब’ 1934 में लिखी गई थी । इसमें पश्चिमी शिक्षा नीति पर व्यंग्य किया गया है। विद्यार्थियों पर पढ़ाई के अनावश्यक बोझ पर भी चोट की है। प्रेमचंद बोझ बनती शिक्षा के विरुद्ध थे। उनकी दृष्टि में शिक्षा जीवन को सँवारने, सामाजिक कुरितियों को दूर करने वाली होनी चाहिए। यहाँ शिक्षा पद्धति के दोषों का पर्दाफाश किया गया है जो बच्चों को किताबी कीड़ा बना देती है। किताबी ज्ञान जहाँ कूप मंडूक बनाता है वहाँ अनुभवी और व्यवहारिक ज्ञान जीवन की हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम बनाता है। लेखक कहते हैं जीवन की समझ ‘अनुभवी ज्ञान’ से आती है।

आज ‘नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ में शिक्षा व्यवस्था में जिन सुधारों पर बल दिया गया है, प्रेमचंद  साहित्य में इनकी\पहले ही दलील दी जा चुकी है। रटन पद्धति, मानवीय कुशलता, जीव-जंतु प्रेम, नैतिक शिक्षा आदि को महत्व दिया गया है। शिक्षा में खेल को स्थान देने से ही बालक का सर्वांगीण विकास होता है। यह भी बड़े भाई साहब कहानी में रेखांकित किया गया है। उन्होंने कहा था “बागवानी, खेलकूद, क्ले-मॉडलिंग, कसरत, वाद-विवाद जैसे विषयों की  भी परीक्षा की वेदी पर बलि चढ़ा दी गई है।” आज वर्तमान शिक्षा प्रणाली में जिस सुधार की बातें हो रही है, इसकी पहल प्रेमचंद जी ने सौ साल पहले ही कर  दी थी । शिक्षा मानव जीवन की महत्वपूर्ण इकाई है। शिक्षण में छात्रों पर पड़ने वाले अनावश्यक बोझ, रट्टन पद्धति उन्हें कतई पसंद नहीं थी ।

“बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी ही गुज़रे हैं। कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवाँ लिखा और सब नंबर ग़ायब! सफाचट। सिफ़र भी न मिलेगा, सिफ़र भी! हो किस ख़याल में! दरजनों तो जेम्स हुए हैं, दरजनों विलियम, कोड़ियों चार्ल्स! दिमाग़ चक्कर खाने लगता है। आँधी रोग हो जाता है। इन अभागों को नाम भी न जुड़ते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, सोयम, चहारुम, पंजुम लगाते चले गए। मुझसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता। और जामेट्री तो बस ख़ुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नंबर कट गए। कोई इन निर्दयी मुम्तहिनों से नहीं पूछता कि आख़िर अ ब ज और अ ज ब में क्या फ़र्क़ है और व्यर्थ की बात के लिए क्यों छात्रों का ख़ून करते हो। दाल-भात-रोटी खार्इ या भात-दाल-रोटी खाई, इसमें क्या रखा है; मगर इन परीक्षकों को क्या परवाह! वह तो वही देखते हैं, जो पुस्तक में लिखा है। चाहते हैं कि लड़के अक्षर-अक्षर रट डालें। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोड़ा है और आख़िर इन बे-सिर-पैर की बातों के पढ़ने से क्या फ़ायदा।”

छात्रों की स्थिति को लेकर प्रेमचंद जी ने शिक्षा प्रणाली तथा अध्यापकों को जिम्मेदार ठहराया । ‘परीक्षा’ कहानी शिक्षा केवल  डिग्रियों की संख्या बढ़ाने में विश्वास रखने  वालों की पोल खोलती है। इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद जी कहना चाहते हैं कि मनुष्य की असली पहचान व्यक्ति में निहित परोपकारी भाव, उदार एवं उच्च चरित्र से होती है। तभी समाज में पृथक पहचान बन सकती है।  किताबों तथा कक्षा-कक्ष की चारदीवारी से बाहर जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम और संवेदनाएँ उत्पन्न करे, वह शिक्षा होती है।

एक तरफ ‘दो बैलों की कथा’ कहानी  मुक्ति के लिए संघर्ष आवश्यक है लेकिन संघर्ष में विचलित हुए बिना नैतिक धर्म पर अडिग रहना सिखाती है । जैव-विविधता को साकार करने के लिए ऐसी रचनाएँ प्राण फूँकती है । दूसरी तरफ स्वाधीनता में बाधक बनने वाली स्थितियों एवं व्यक्तियों के प्रति आक्रोश व्यक्त करती है। इसमें पशुओं के प्रति आत्मीयता और मित्रता का चित्रण है।

प्रेमचंद साहित्यकार और पत्रकार होने से पहले एक सजग अध्यापक थे। यही कारण है कि संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था की रग-रग से वाकिफ़ थे। शिक्षा का अभाव समाज से दूर ले जाता है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को उसके परिवेश से जोड़े । समाज की व्यवस्था में सुधार लाने के लिए अध्यापक, हमेशा तत्पर रहता है। मानवतावादी दृष्टिकोण  के कारण प्रेमचंद साहित्य में समाज का हर वर्ग संवेदनाओं के साथ खड़ा है।

आधुनिक युग में मनुष्य विकास तो कर रहा है किंतु अपनत्व पीछे छूट रहा है। ‘मंत्र’ कहानी शिक्षित और साक्षर के भेद को स्पष्ट करती है। ‘बोध’ कहानी में प्रेमचंद  की आर्थिक जर्जरता , जो सामान्य रूप से  एक अध्यापक की होती है दर्शाया है,  किंतु जीत मूल्यों की होती है यह भी रेखांकित किया है ।

उपन्यास सम्राट  प्रेमचंद बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।  कलम के सिपाही  ‘प्रेमचंद’ ने  ‘कलम’ की ताकत से समाज को नई दिशा दी। समाज में व्याप्त  कुप्रथाओं, रूढ़ियों, दलित, जातिगत भेद आदि समस्याओं पर कुठाराघात किया। देश परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा था उसी समय प्रेमचंद ने न केवल ब्रिटिश सत्ता का विरोध  किया बल्कि  समाज को खोखला करती  परंपराओं को भी   खत्म करने का  बीड़ा उठाया। प्रेमचंद का अध्यापकीय  मन  रूढ़ियों का खंडन करने के पक्ष में होने के बावजूद आदर्श की चौकठ  नहीं लाँघता।  ब्रिटिश सत्ता के दमन और अत्याचार से त्रस्त समाज में प्रेमचंद ने लोगों को यथार्थ बोध करवाया किंतु आदर्श को नहीं छोड़ा यह भारतीय संस्कार हैं।

राष्ट्र भक्ति की मशाल लिए युवाओं का मार्गदर्शन किया। उनके कथानक की जमीन पर चाहे  मालती मेहता (गोदान) हो, कर्मभूमि के अमरकांत- सुखदा हो,सभी राष्ट्रीय जागरण लाने की कोशिश करते हैं।

किसानों और स्त्रियों के प्रति हुए अन्याय को उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने अभिव्यक्ति दी। सामाजिक समस्याओं और रुढियों के विरुद्ध आवाज़  उठाकर समाज का मार्गदर्शन किया।

वे  देशभक्त थे, स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित होकर इन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड़ दी थी | कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में आम आदमी की व्यथा को अभिव्यक्त किया। यही कारण है कि  प्रेमचंद के विचारों की प्रासंगिकता 21 वीं सदी के आधुनिक समाज में भी बरकरार है ।

उनकी  कृतियाँ  भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ  हैं । उन्हें अपने जीवनकाल में ही  ‘उपन्यास सम्राट’ की पदवी मिल गई थी। सत्याग्रह आंदोलन जमींदारों, साहूकारों एवं पदाधिकारियों की समस्याओं के बारे में प्रेमचंद ने कई कहानियों में लिखा था। प्रेमचंद नाम से उनकी पहली कहानी ‘ बड़े घर की  बेटी’ ज़माना पत्रिका में छपी थी।  इस कहानी  में ‘आनंदी’ पात्र घर को बिखरने से बचाती है । यह वर्तमान पीढ़ी के लिए बड़ी सीख है। उन्होंने पारंपरिक मूल्य जो समाज की सेहत के लिए लाभकारी हों उसका बहिष्कार नहीं होने दिया।

प्रेमचंद  वर्तमान से कभी दूर नहीं गए। वे आजीवन ईमानदारी के साथ वर्तमान काल की अपनी वर्तमान अवस्था का विश्लेषण करते रहे। उन्होंने देखा कि बंधन समाज के भीतर है बाहर नहीं| प्रेमचंद का मानना था कि एक बार अगर किसान तथा गरीब यह अनुभव कर सकें कि संसार की कोई भी शक्ति उनको दबा नहीं सकती, तो वे निश्चय ही अजय हो जाएँगे ।

‘गोदान’ के अपने मौजी पात्र (मेहता ) से कहलवाते हैं, "मैं भूत की चिंता नहीं करता, भविष्य की परवाह नहीं करता; भविष्य की चिंता हमें कायर  बना देती है।  भूत का भार हमारी कमर तोड़ देता है ।  हम व्यर्थ का भार अपने ऊपर लादकर रूढ़ियों और विश्वासों तथा  इतिहासों के मलबे के नीचे दबे पड़े हैं। उठने का नाम ही नहीं लेते।" यह तार्किक सोच थी प्रेमचंद की।  इसी दृष्टिकोण से प्रेमचंद ने समाज को नई दिशा दी। प्रेमचंद सेवासदन से ही शिक्षा पर बल देते हैं ।

 

प्रेमचंद स्वदेशी आंदोलन से बहुत प्रभावित थे। इसका प्रभाव उनकी रचनाओं पर पड़ा। इन्होंने समाज को नया दृष्टिकोण दिया। 'सुभागी' कहानी में बेटी द्वारा पिता का अंतिम संस्कार करवा कर सदियों से चली आ रही परंपरा को तोड़ा और यह स्पष्ट किया कि ‘लड़की’ लड़कों से कम नहीं है। इस प्रकार प्रेमचंद जी ने समाज में रहकर समाज की बुराइयों पर कुठाराघात किया। गबन, सेवासदन, निर्मला आदि उपन्यासों में स्त्रियों की समस्याओं को न केवल उठाया बल्कि उनके जीवन को एक नई दिशा भी प्रदान की।

भारतीय समाज की आत्मा में बसे  इस मनीषी को भूलते जाना  साहित्य और समाज दोनों के लिए क्षति है ।

 

 


डॉ. मंजु शर्मा

अध्यक्ष , हिंदी विभाग

चिरेक इंटरनेशनल स्कूल

हैदराबाद

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बुधवार, 26 जुलाई 2023

कहानी

 


1

टिफ़िन बॉक्स

डॉ.  मंजु शर्मा

रीना ने रसोईघर से आवाज़ लगाई चिंटू ओ.... चिंटू !  उफ़! क्या घोड़े बेचकर सोता है, यह बच्चा। स्कूल का समय हो गया है, अभी तक जागा ही नहीं। माँ हाथ में करछी लिए ही पहुँच गई चिंटू को स्वप्न लोक से लाने के लिए । देखा कि  चिंटू बड़बड़ा रहा था .. मुझे नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए । माँ के ममतामय सागर में हैरानी का ज्वार उठने लगा झट से उसे चिपका लिया । क्या हुआ बेटू ? क्या बुरा सपना देखा ! उठो ! मुर्गा बोला... हुआ सवेरा.... जगो उठो.... कहते हुए रीना उसे गुदगुदाने लगी । चिंटू ने कमल की पंखुड़ियों सी आँखें खोली और उसके गुलाबी होंठों पर मुस्कुराहट तैर गई । चिंटू ने कहा माँ प्रणाम ! माँ ने खुश होकर उसे गले से लगा लिया । अब जल्दी से नहा धोकर स्कूल के लिए तैयार हो जाओ कहते हुए रीना चौके की ओर चली गई । कुछ ही देर में चिंटू बाबू एकदम तैयार होकर आ गए । अच्छा क्या नहीं चाहिए तुम्हें, क्या कह रहे थे ? रीना  कुछ मुस्कुराहट और कुछ हैरानी से उसके भोले चेहरे हो निहारने लगी । माँ आपको  पता है ? मैडम जी कह रही थीं आज से कोई बच्चा प्लास्टिक का टिफ़िन नहीं लाएगा । ओहो! तो कक्षा की बातें तुम्हारे  दिमाग में चकरी बन घूम रही थी, कहते हुए हँसने लगी । चिंटू स्कूल के लिए एकदम तैयार होकर नाश्ता करने बैठ गया । रीना सुंदर सा टिफ़िन बॉक्स और पानी की बोतल ले आई । माँ यह नहीं चाहिए कहते हुए चिंटू ने मुँह बिचकाया और नन्हीं हथेलियों से सरका दिया टिफ़िन बॉक्स को । क्यों क्या हुआ ? चिंटू के इस तरह चिढ़ने पर रीना की भौं टेढ़ी हो गई।  प्लास्टिक हमारे खून में जाता है ,फिर अंदर जम जाता है और हम बीमार हो जाते हैं । मुझे यह नहीं चाहिए, एक ही साँस में चिंटू ने  फरमान सुना दिया।  सुनो  बेटा!  यह प्लास्टिक अच्छी कंपनी का है , इससे कुछ  नहीं होता। रीना ने तर्क दिया। माँ हमारी टीचर जी कहती हैं प्लास्टिक की वस्तुओं में रखी चीजों में  धीरे-धीरे प्लास्टिक के कण जमने लगते  हैं । उसने  बीच में ही टोका,लेकिन तुम खाना किसमें  ले जाओगे भला ? अरे ! माँ और कुछ दे दीजिए न ! चिंटू के कमल-दल से होंठ सिकुड़ गए, माथे पर  ढेरों शिकन उभर आई । माला फेरती दादी बहुत देर से पोते और बहू की बातचीत सुन रही थी , उन्होंने आवाज़ लगाई अरे ! बहू सुंदर आकर्षक,सस्ती हल्की चीजों का जादू अब चिंटू पर नहीं चढ़ने वाला । वह समझदार हो गया है। उसे तांबे के बर्तन में खाना-पानी दे दो ।  गरविली मुस्कुराहट झुर्रियों  से झलकने लगी।  ओहो! माँ जी आप भी न बाबाआदम के जमाने की बात करती हैं  एक तो यह टस से मस नहीं हो रहा ऊपर से आप ! माँजी ने मुँह बिचकाकर पल्लू आगे सरकाया और उनकी उंगलियों में मनके तेजी से घूमने लगे ।

रीना ने समझाना चाहा कि खाना नहीं खाओगे तो स्वस्थ कैसे रहोगे ? बड़े होकर पैसे कैसे कमाओगे ? चिंटू ने अपनी मनकों जैसी आँखें नचाई।  वही तो कह रहा हूँ न मम्मा!  स्वस्थ रहने के लिए प्लास्टिक अच्छा नहीं है ।

रीना को सुबह-सुबह झंझट नहीं चाहिए था अत: उसने आदेश दिया , तुम्हें इसी में खाना ले जाना होगा समझे । आए बड़े सुधारवादी ।

चिंटू जा चुका था । पर शाम को घर लौटा तो उसके होंठों पर सफेद पपड़ी जमी थी, मुँह अलसाया हुआ जैसे कमलदल मुरझा गया हो । क्या हुआ बेटे ? तुम ठीक हो न ! कहते हुए रीना ने उसे गोद में ले लिया और बस्ते से टिफ़िन बॉक्स निकाला । उसमें खाना वैसे ही पड़ा था । रीना  की आँखें भर आई।  उसे अपनी गलती का अहसास हुआ । जल्दी से रसोई की टाँड़ पर पीतल और तांबे के बर्तन जो बोरे  में आउटडेटेड समझकर रख दिए गए थे,उतरने लगे । चिंटू के लिए सुंदर-सा टिफ़िन धातु का न कि प्लास्टिक का । चिंटू खुश और माँ भी खुश । दादी सोफ़े पर बैठी रामायण देख रही थी , बुदबुदाई – भलो करे टीचर जी थारो।

***

2

बधाई हो


ट्रिन ट्रिन ट्रिन ..

फ़ोन नहीं उठा रही है।  क्या हुआ हुआ होगा ? कम से कम बताना तो  चाहिए।  नहीं किसी काम में उलझी होगी।  ठीक है न, फिर  करूँगी और सोनू काम में उलझ  गई। शीतल ने बस्ता  सोफ़े पर रखा और गले में झूल गई। उसके आते ही माँ का मन महकने लगा। माँ ,माँ !आज क्या बनाया है ? पेट में चूहे कूद रहे हैं।  अच्छा जी पहले हाथ-मुँह धो लो, कपड़े बदलो, मैंने गरमागरम आलू पूरी बनाई है और तुम्हारी पसंद का हलवा भी। उसने हाँ माँ कहते हुए बस्ता उठाया और फ्रेश होने चली गई। सोनू ने लोई बनाकर रखी थी।  इसे तो अपने पापा की तरह गरम फूली पूरी ही भाती है। सोचते हुए उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई। सोचने लगी शीतल की उपस्थिति घर में जान  डाल  देती है। एक जान और हजार काम, धमाचौकड़ी बच्चों-सी। सच में भगवान ने बचपन को कितना बिंदास बनाया है। थाली परोस कर ले आई। ले जल्दी पेट पूजा कर।  पेटू कहकर हँसने लगी। सुराही से पानी उँड़ेलती हुए ध्यान हाथ पर बंधी घड़ी पर गया। अरे घंटे हो गए हैं कला  का फोन नहीं आया। मिस्ड कॉल तो देखा ही होगा ....। व्हाट्सअप चैक किया, मैसेज भी नहीं देखा सोनू के माथे पर बल पड़ गया। जरूर तबियत खराब हो गई होगी। आजकल अपने आप में न जाने कहाँ खोई रहती है। बस मुँह पर ताला जड़ लिया है। एक बार फिर से कोशिश करती हूँ। हैलो ! एक उबाऊ-सी आवास कानों से टकराई हैलो।  क्या हुआ सुबह से चिंता हो रही थी।  फ़ोन मैसेज कुछ नहीं।  तबियत तो ठीक है न!  सोनू  ने एक साथ ढेरों प्रश्नों की बौछार लगा दी। हाँ ठीक हूँ। बस यूँ ही सो गयी थी।  सीधा सपाट जवाब। अच्छा बच्चे कैसे है ?  सब ठीक ही तो है अपनी दुनिया में। फिर वही रुखा सा जवाब।  सोनू को लगा कुछ ठीक नहीं है। कुछ इधर- उधर की बातें जबरन की और दूसरे दिन मिलने का आश्वासन दे फ़ोन रख दिया। शीतल खाना खाकर थैंक यू का किस चिपका गई गाल पर। सोनू ने  इशारा किया थोड़ा आराम कर लो लेकिन उसने तो मानो पंडित नेहरू की बात गाँठ बाँध रखी  है ‘आराम हराम है’  लगी किताब पढ़ने।  इस लड़की का क्या करूँ ? थोड़ी देर में देखती हूँ अदरक वाली  चाय ले आई   बिटिया रानी। सोनू ने सोचा नाहक  ही बेटे  का ढोल बजाते रहते हैं लोग। और  स्मृति की परतें चाय की घूँट के साथ  एक एक करके उधड़ने  लगी। शीतल का जन्म।  मैं कितनी खुश थी हर पल, हर जगह वह फूल-सा चेहरा ही नज़र आता था बस।  लेकिन कानों  पर कुछ और दस्तक देता रहता था।  लड़की हुई हैं। किसी ने कहा बाल तो देखो कितने घने हैं।  दरिद्रता लाई है, तो किसी ने ने कहा और क्या ? जन्म लेते ही पैसो की ढेरी करवा दी क्योंकि उसका जनम ऑपरेशन से हुआ था।  सो पहले डॉक्टरों को चढ़ावा चढ़ा था।  यह सब तीर की तरह चुभ रहा था। लेकिन प्रतिरोध करने की न हिम्मत थी,न हालात थे।  आखिर उधार लेकर ही तो ऑपरेशन करवाया था। उसकी छोटी सी हथेली ने मेरा गाल छुआ और  रोने लगी थी , मानो शिकायत कर रही हो कि  देखो ना माँ ! मैंने क्या किया है ? प्यार की जगह तिरस्कार के तीरों से मेरा स्वागत हो रहा है।  मनकों जैसी आँखों में आँसू भर आए। फिर दिन बीतते गए। आज घर है, गाड़ी है, सब कुछ तो है।  यह तो लक्ष्मी स्वरूपा है।  इनसे बढ़कर संस्कारी सुशील गुणवती मेरी बिटिया रानी है। और क्या चाहिए ?

साईं इतना दीजिए  जा में कुटुंब  समाए ...  कबीर  जी को नमन किया।  बिखरे बालों को समेटते हुए ढीला-सा जुड़ा बनाया।

कला को मैं ऐसे घुटते नहीं देख सकती। जरूर कोई दीमक उसे चाट रही है, खोखला कर रही है। सोचते हुए तुरंत मैसेज किया।

सोनू - कल मेरे घर आ रही है तू बस।

कला  – कल तो नहीं, फिर कभी।

सोनू – कल ही। मुश्किल  से कोरोना के बाद मिलने का मौका मिला है। तुम हो कि लॉकडाउन के मजे ले रही हो।

कला – नहीं ,ऐसी बात नहीं है।

सोनू – ओ मैडम! ये सब बात छोड़ो। जरा बको भी। वैसे भी तुम्हारी बकबक सुनने का बहुत मन कर रहा है।

कला – ओके। आती हूँ।

सोनी – लंच के पहले ही आ जाना। साथ में खाना खाएँगे।

कला – मुस्कुराहट के साथ अँगूठा दिखा दिया बस।

सोनू का मन  बेचैनी और खुशी के द्वन्द्व में उलझा हुआ था।

दो साल बाद अपनी पक्कम-पक्का सहेली से मिलने की खुशी तो दूसरी ओर उसकी उदासी। बढ़िया लंच की तैयारी की सोनू ने। वह ढेरों बातें करना चाहती थी, इसलिए सारा काम कला के  आने से पहले ही निबट जाए यही योजना थी। कान चमगादड़ बनी घंटी पर चिपके थे। बेल बजी, लपककर दरवाजा खोला  – दूधवाला था। तीन बजे कला ने कदम रखा। यह क्या उसके चेहरे पर अमावस पसरी पड़ी थी। बाल दुख पेशानी के गवाह बने रबड़बैड में कैद।  हाथ में एक बैग। फलों से भरा। यह उसका संस्कार था, जब भी कहीं जाओ खाली हाथ न जाओ। यह क्या हाल बना रखा है ? यह तो पूरा कंकाल, ताज्जुब है चल कर आया है। आँखें धँसी हुई,गालों की हड्डियाँ उभर कर दिले हालात का हिसाब दे रही थी। सोनू हतप्रद। अरे अंदर भी आने देगी ? फीकी मुस्कान के साथ कला ने कहा। ओह! सोनू झेंप गई , जुबान तालु से चिपक गई ,हाँ आ, आओ न ! बैठो और रुलाई फूट पड़ी। गले मिलकर दोनों का मन  हल्का हुआ। पहले शहतूत का शरबत,फिर अपनी  अदरक वाली चाय। कला ने सिर हिला  कर हामी भरी। सोनू के पैरों तले की जमीन खिसक गई क्या कला बोलना भूल गई है ?

ओए मैडम जी!  ये अजनबियों का सा व्यवहार न करो। पहले के रोल में चटर पटर करो भई ! सोनू ने वातावरण को सहज करने की कोशिश करनी चाही। कला ने कहा  ऐसा कुछ नहीं है मैं आराम से हूँ। देख कला जो भी तकलीफ  हो मुझसे कहो। इतना भी पराया न कर यार ! और उसका हाथ अपने हाथ में ले आश्वासन दिया , दिल खुलवाना चाहा। आखिर उस हँसते हुए चेहरे पर अवसाद के बादल इतने गहरे क्यों हो गए हैं? माना कि कोरोना ने उदासी और एकेलेपन की सौगात दी है। लेकिन मैसेज तो हमेशा अच्छे ही आते थे , गुडमॉर्निंग के, आशा भरे मैसेज, चुटकुले तो क्या यह सब नकली था केवल आभासी ? जो हकीकत की जमीन पर अपनी छाप छोड़ने से पहले ही डिलीट हो जाता है।

सोनू ने फिर बात छेड़ी और बता घर में सब कैसे हैं?

व्हाट्सअप  होता तो अँगूठे की इमोजी टिक  देती। आँखें कभी झूठ  नहीं बोलती। उसके जवाब में छटपटाहट थी। दुख आँखों की पुतलियों पर हिलोरे लेकर पछाड़ खाने लगा। आँखों के ढक्कन पानी के  उबाल में ऊपर उठने लगे। देख कला सच सच बता।  तबीयत ठीक नहीं है ,हम अच्छे  डॉक्टर के पास चलेंगे। नहीं मैं ठीक हूँ बस यूं ही। कोई तकलीफ नहीं है। सोनू  ने झल्लाकर कहा  अंधा भी बात देगा कि तू ठीक है या बीमार। कला ने प्रतिकार किया हाँ मेरा मन  बीमार है,घायल है। और उसकी कोई दावा नहीं है। क्या बक रही हो कला? पति, बच्चे घर सभी के रहते ऐसी बातें ?

हाँ सब है न लेकिन घर नहीं मकान है। जिसमें चार अनजान लोग रहते हैं। कला ऐसे क्यों कहती हो तुम्हारे परिवार की तो मिसाल देते थे लोग। हाँ देते थे पर अब नहीं।

इसी बीच शीतल आ गई नमस्ते आंटी। कैसी हैं आप ? यथार्थ और कल्पना कैसे हैं ? कला का  मुरझाया  चेहरा शीतल को देखकर खिलने लगा जैसे प्यासी बेल पर थोड़ा-सा पानी जीवन बन जाता है। सब ठीक है। आंटी आपने चाय पी ? मैं अपने हाथों से स्पेशल चाय मलाई मार के बनाकर लाती हूँ। आपकी थकान रफ़फू चक्कर। चाय वाला... चाय... कहते हुए रसोई घर की ओर मुड़ी और जोर से बोली आंटी चाय बनाने में प्रधानमंत्री जी कि सी फिलिंग आती है, सभी उसकी बात पर हँस पड़े। कला भी मुस्कुराई। हाँ कर्म  अच्छे हों तो सब अच्छा। तुम्हारी माँ ने पुण्य किए  थे जो तुम जैसी चहकती चिड़िया मिली। हाँ लेकिन अपुन उड़ने वाली नहीं हैं।

खाना चाय सब हुआ। सोनू कला के कष्ट की तह तक नहीं जा सकी। देर हो रही है ,अब मैं चलती हूँ। सोनू ने भी रोकने की कोशिश नहीं की। अच्छा ! तुम भी आओ न घर। आज मुझे अच्छा लगा। सोनू ने हाँ भरी और अपने ड्राइवर को हिदायत दी कि हिफाजत से पहुँचा कर आना। उसके जाने के बाद सोनू फिर कला की फिक्र में डूबने लगी।

आज शनिवार है शीतल तुम्हारी छुट्टी है न। मैं कला आंटी के घर हो आती हूँ। अच्छा मम्मू। यह लड़की भी न  पता नहीं क्या क्या लाड़ करती है। उलटा  है बेटी माँ के लाड़ करे।

ट्रीन ट्रीन ..  आओ आओ सोनू।  धूप से झुलसी दूब जैसे चेहरे पर मानो ओस की बूँदें छलक आई हों। आलीशान घर। आधुनिकतम भौतिकता पसरी पड़ी थी , महँगा साज-सामान। कुछ ही देर में सोनू को अटपटा लगने लगा। जैसे वह घर नहीं संग्रहालय हो। जहाँ कीमती चीजों की प्रदर्शनी हो। इस बीच कला चाय ले आई। बिकानेरी भुजिया तुझे पसंद है न... कहते हुए उसने प्लेट आगे बढ़ाई।  बच्चे दिखाई नहीं दे रहे आज तो छुट्टी है न ! अपने अपने कमरों में है न। बुलाती हूँ। कला ने दरवाजे पर दस्तक दी। डोंट डिस्टर्ब मॉम। प्लीज गो। अब कल्पना को आवाज लगाई। उफ़! माँ कभी तो अपनी प्राइवेसी में रहने दिया करो। मुझे भूख नहीं है। वैसे मैंने ऑर्डर कर लिया है खाना। कला का हाथ दरवाजे पर चिपका ही रहा। उसने भ्रकस प्रयास किया। बच्चे रातभर पढ़ते हैन न थक जाते हैन। सो रहे हैं। सोनू ने नब्ज पकड़ ली बीमारी की डायगनोस हो चुकी थी बीमारी .. सिसकियों,रोष चुप्पी के तिराहे से निकल कर सब इकट्ठा होने लगे। आत्मीयता,आदर प्रेम सब सिवाल की तहर फिसलने लगे। कुछ भी तो हाथ नहीं आ रहा था। रोबोट-सा जीवन मुझे नहीं चाहिए कहकर कला चुप हो गई। सोनू ने सोचा संयुक्त परिवार का वो आँगन जहाँ बच्चों की चिल्ल-पौ, चाची, ताई और माँ के झगड़े, दादी का प्यार और फटकार रेवड़ियाँ बाँटती बुआ। चाचा जी की बावन कड़ियों की कहानियाँ। रात को डर लगे तब भूत पिशाच निकट नहीं आवे – के साथ नींद की गोदी में सो जाना। अहा ! कला, सच कहा गया है दौलत भूख-प्यास नहीं जगा सकती , नींद नहीं खरीदी जा सकती है। देख कला –कुछ तो तकनीकी का दुरुपयोग है कुछ आज की पीढ़ी। थोड़ी देर में यथार्थ बाहर आया। भीमकाय, आँखों के नीचे काले घेरे सिर पर चिड़िया का घोंसला ,हाथ में मोबाइल गले पर काली परतें। हाय आंटी। नमस्ते खुश रहो! माँ पे करदो हजार रुपए। पिज़्ज़ा बर्गर और कोक के लिए। कहना बना हुआ है बेटा ओ ई वानट्स दिसँ सो ई ऑर्डर। कला को जैसे इस तरह के व्यवहार की आदि हो गई थी। क्या सोच रही है कला। बच्चे बुरे नहीं आदतें बुरी हो गई हैं। हाँ जानती हूँ कला ने ठंडी साँस ली। जबसे पढ़ाई, खरीददारी सब कुछ ऑनलाइन हुआ है तबसे ये सब लाइन पर रहे ही नहीं। हाँ वक्त का तकाजा था इसलिए बच्चों को मोबाइल के हवाले करना पड़ा। लेकिन बहुत जरूरी है हमारी भी मौनीटरिंग। सोनू मुझे रातदिन इनकी सेहत की चिंता रहती है। ये असामाजिक हुए जा रहे हैं। भावनाओं को तो कुचल दिया है वेबसीरिज ने। ये गेम्स आक्रामक बना रहे हैं बच्चों को। माँ की बातें आउट डेटेड और  बोरिंग लगने लगी है। तुम्हें पता है किसी के सामने बोलना तक नहीं आता निशाचर हो गए हैं। सोनू ने भी सिर हिला दिया। आज की पीढ़ी के पैर लड़खड़ा रहे हैं। किंतु कला संतुलन और सामंजस्य बैठाए तो तकनीकी अभिशाप नहीं बनेगी। सोनू तू ही बता पति छ: छ: महीने काम से बाहर रहते हैं, बच्चे वैसे बात नहीं करते हैं, मैं चाहती हूँ कि इनके लिए खूब खाना बनाऊँ, इन्हें खिलाऊँ ,ये मुझसे लड़ें, शिकायत करें, प्यार करें। यहाँ तो कोई कुछ बोलता ही नहीं। खाने की टेबल पर भी मोबाइल हावी रहता है। फिर कुछ देर चुप्पी ने देर डाल दिया। सारे जातं कर लिए पर गैजेस्टस की लत नहीं छुड़ा सकी। हूँ कहते हुए सोनू समझने का प्रयास करने लगी। एक काम कर गाँव से माँ बाबूजी को बुला ले। दादा-दादी के प्यार की छाँव तले तुम्हारा परिवार फिर से खुशहाल हो जाएगा। मैं उनका जीवन भी एकाकीपन की वेदी पर बलि नहीं होने दे सकती। बुजुर्गों को तो अपनत्व, आपस में बात करने वाले ही तो चाहिए , वे रूखी- सूखी खाकर अपनी चौपाल में खुश रहते हैं। इस सोने की लंका में दम घुट गया उनका।

इस बीमारी का का कुछ इलाज तो करना पड़ेगा। माहौल बदल दो। माहौल बदल दूँ क्या कह रही हो ?

कुछ गरीब अनाथ बच्चों को पढ़ा लिखा। नए कौशल सिखा। तुम तो एक्सपर्ट हो कला। अपनी कला को पहचानो। एन जी ओ से जुड़कर जरूरत मंदों के लिए हाथ बढ़ाओ। पैसों की कमी तो है नहीं तुम्हें।

कला को तो रास्ता दिख गया। उसका  चेहरा आत्मविश्वास की आभा से दमकने लगा। मैं कुछ अलग कर सकती हूँ।

कुछ दिनों बाद बच्चे स्कूल स्कूल चले जाते हैं ....।  

कला अपना समय अनाथ बच्चों को देने लगी गौरी, बबलू और बिट्टू कि प्रतिभा देखकर वह दंग रह गई। एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए उन्हें तैयार करवाया। ‘इंटरनेट और हम’ बच्चों ने प्रथम पुरस्कार जीता। उनकी फ़ोटो अखबार में छपी। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा।

इस बीच कला ने महसूस किया कि उसके बच्चे  कल्पना और यथार्थ भी अब घर और परिवार के निकट आने लगे हैं।

आज यथार्थ पाँच बजे उठ गया। माँ मोहिनी को संगीत सिखा रही थी। वह भी चुपचाप आँखे बंद करके बैठ गया। कला की साधन सफल होने लगी। कल्पना भी चाय की प्याली ले आई। लो माँ। यह कहते कल्पना का गला रुँध आया और कला ने उसे गले से लगा लिया। कला की आँखों से गरमाई दो बूँद कल्पना के गालों पर लुढ़क आई। इस बीच यथार्थ भी माँ से चिपट गया। जैसे तीनों अलग भटके राही मिल गए हों।

रविवार को तीनों सोनू के घर गए। सबने साथ में लंच किया। हँसी ठहाकों से घर गूँज उठा। इसी बीच कला ने मैसेज देखा कि सूरज बाबू अमेरिका छोड़ कर अपने घर आ रहे हैं। कला के गालों पर लालिमा दौड़ गई। सोनो की आँखें ताड़ गई उसने कहा – बधाई हो !

 


डॉ. मंजु शर्मा

अध्यक्ष , हिंदी विभाग

चिरेक इंटरनेशनल स्कूल

हैदराबाद

 

 

 


जनवरी 2026, अंक 67

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