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बुधवार, 28 जून 2023

दोहे

गर्मी 

सीमा ‘सुशी’

1

दिन भर तीखी धूप को सह जाने के बाद।

खिलकर कहता मोगरा, ये मेरा प्रतिवाद।।

2

गर्मी राहत गुलमोहर, चम्पा है मदहोश।।

बहकाता है मोगरा, और जूही खामोश।।

3

गर्मी आँख तरेरकर, खूब दिखाती डाह।

और खिले मधुमालती, करे नहीं परवाह।।

4

इसी धूप ने पूस में, बाँटा बहुत शबाब।

यही सोचकर ज्येष्ठ में, खिलते रहे गुलाब।।

5

गर्मी सोती थी कभी, अमराई की छाँव।

बेकल सी अब खोजती, हरियाली की ठाँव।।

6

खिड़की से अठखेलियाँ, पर्दों से तकरार।

ए सी ने सब छीन ली, झोंकों की रफ्तार।।

7

मौसम की प्रतिकूलता, करती रही प्रयास।

गुलमोहर हँसता रहा, हुआ तनिक न उदास।।

8

साँझ ढले सजता गगन, ले तारों को संग।

इधर महक जाती धरा, खिला मोगरे अंग।।

9

बैरन गर्मी दे रही, चहल-पहल को मात।

सन्नाटे करने लगे, दोपहरी से बात।।

10

शरमीली छिपकर खिली, जतन न आए काम।

हवा मुखबिरी कर गई, हुई मोगरा शाम।।

 


सीमा पांडे मिश्रा सुशी

113/62 एकता परिसर शिवाजी नगर

भोपाल (मध्य प्रदेश) - 462016


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