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मंगलवार, 30 सितंबर 2025

कविता

 



चाय की चुस्की में जीवन का सार

अश्विन शर्मा ‘अन्ना’

 

बैठे हो तुम और मैं,

हाथों में चाय का प्याला,

भोर की मंद किरणों संग

मन में उमंगों का उजाला।

 

भाप उठे कप से जैसे,

सपने फिर से सज जाएँ,

थोड़ी-सी मुस्कान तुम्हारी,

दिन का हर रंग खिल जाए।

 

चाय की मिठास में घुल जाए,

कुछ अनकही बातों का रस,

हर घूँट में महसूस हो,

सुकून का अनमोल स्पर्श।

 

थकावट, उदासी, सब छूट जाएँ,

इन पलों का हो ऐसा जादू,

तुम्हारा साथ, चाय का स्वाद—

जीवन का बन जाए आधार।

 

बैठे रहें यूँ घंटों तक,

बस इस पल का लुत्फ उठाएँ,

चाय की चुस्की और संग तुम्हारा,

जिंदगी के गीत गुनगुनाएँ।

 


अश्विन शर्मा ‘अन्ना’

बेंगलुरू





शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

आलेख

 


हिंदी: हमारी आत्मा का आईना, संवाद का सेतु और भारत की धड़कन

अश्विन शर्मा

“मैंने उसकी हिंदी कर दी।

उसको अच्छे से हिंदी में समझा दिया।

ये हिंदी है, बिल्कुल हिंदी।

तूने हिंदी में समझाया, तो जैसे दिल से दिल जुड़ गया।

भाई, आज हिंदी में गपशप करते हैं।

हिंदी में बात करना केवल बोलना नहीं, यह तो एक एहसास है।”

शब्दों से आगे, जड़ों से जुड़े

हिंदी केवल एक भाषा नहीं, यह जीवन जीने का तरीका है। यह एक ऐसी धारा है, जो न केवल हमारे शब्दों को, बल्कि हमारे दिलों को भी एक साथ जोड़ती है। हिंदी हमारी पहचान है, यह हमारी संस्कृति, हमारी विविधता और हमारी एकता का प्रतीक है। जब हम हिंदी में बात करते हैं, तो यह सिर्फ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होता, यह तो एक ऐसी अनुभूति होती है, जिसमें हमारे विचार, हमारी भावनाएँ, और हमारे रिश्ते ढलते हैं। यह भाषा नहीं, यह एक तरीका है, एक जीवन जीने का। हिंदी में संवाद करना दिल से जुड़ने जैसा है। हिंदी उस पुल का नाम है जो विचारों और संवेदनाओं को जोड़ता है। 

हमारी संस्कृति और आत्मा की गहरी परछाई

हिंदी एक आईने की तरह है, जिसमें हम अपनी पूरी संस्कृति, अपने अतीत और भविष्य को देख सकते हैं। यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और हमें हमारे वर्तमान को समझने का एक नया दृष्टिकोण देती है। हिंदी में बसी है हमारी संस्कृति, हमारी पहचान, और हमारे विचारों की वह गहराई जो शब्दों से भी परे जाती है। यह हमें न केवल शब्दों में, बल्कि आत्मा से भी एकजुट करती है। यह एक ऐसी शक्ति है जो हमारे समाज और संस्कृति के मोल को हर कोने तक पहुँचाती है। हिंदी केवल भाषा नहीं है, यह हमारी आत्मा की गहरी परछाई है।

हिंदी: सीमाओं से परे

हिंदी केवल भारत की सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया के कोने-कोने में फैली हुई है। जब हम हिंदी की गूंज सुनते हैं, तो वह सिर्फ शब्दों की गूंज नहीं होती, बल्कि यह जीवन के उन रंगों का हिस्सा बन जाती है, जो हर एक संस्कृति, हर एक समाज में मिलते हैं।  

जहाँ-जहाँ हिंदी है, वहाँ-वहाँ जीवन के रंग हैं: 

1. भारत: यह भारत की आत्मा है, जो हर राज्य, हर गली, और हर दिल में बसी है। 

2. नेपाल: हिमालय की ऊँचाइयों से लेकर तराई की खुली वादियों तक, हिंदी की गूंज यहाँ के दिलों में बसी है। 

3. मॉरीशस और फिजी: ये द्वीप जहाँ भारतीय मूल के लोग हिंदी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं। 

4. गयाना और त्रिनिदाद: यहाँ हिंदी भाषा को श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, और यहाँ यह उत्सवों की रौनक बढ़ाती है। 

5. संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया: जहाँ प्रवासी भारतीय अपनी जड़ों को याद करते हुए, हिंदी में संवाद करते हैं। 

हिंदी की यह यात्रा केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, यह समय की सीमाओं से भी परे जाती है। 

भारत का सांस्कृतिक और भौगोलिक विस्तार: हिंदी की छाया

भारत का सांस्कृतिक और भौगोलिक विस्तार केवल कश्मीर से कन्याकुमारी तक सीमित नहीं है। हिंदी की छाया पूरे देश में फैली हुई है, जो हर कोने को जोड़ती है। उत्तर में बर्फ से ढँके इंदिरा कोल पास, लद्दाख से लेकर दक्षिण में इंदिरा पॉइंट, ग्रेट निकोबार तक; पूर्व में सूरज की पहली किरण का स्वागत करने वाले किबिथू, अरुणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिम में रेत के स्वर्णिम विस्तार घूरा मोटा, गुजरात तक; उत्तर-पूर्व के विजयनगर, अरुणाचल प्रदेश से दक्षिण-पश्चिम के लहरों से घिरे मिनिकॉय द्वीप, लक्षद्वीप तक; और उत्तर-पश्चिम में सियालकोट सीमा के पास, गुजरात तक – हिंदी इन सभी को जोड़ने वाली एक अनमोल सांस्कृतिक कड़ी है। 

यह भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि यह एकता का प्रतीक है। भारत के विविध हिस्सों में हर 20-30 किलोमीटर पर बोली की ध्वनि बदल जाती है, लेकिन हिंदी एक साझा धागा है जो हर स्थान को एक साथ जोड़ता है। यह वह डोरी है जो विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, और बोलियों को एक सूत्र में पिरोती है। 

हिंदी: सरलता की गहराई

हिंदी में शब्द बहुत सरल होते हैं, लेकिन उनके अर्थ बहुत गहरे होते हैं। यह एक ऐसी भाषा है, जो जटिल विचारों को भी सादगी से प्रस्तुत कर देती है। जब हम हिंदी में बात करते हैं, तो यह संवाद का एक साधारण और दिल से जुड़ा हुआ तरीका बन जाता है। हिंदी वह भाषा है, जो रिश्तों को सुदृढ़ बनाती है और विचारों को स्पष्ट करती है। यह एक ऐसी कड़ी है जो समाज के विभिन्न हिस्सों को जोड़ती है, और यह सभी वर्गों, उम्रों और परिवेशों के लिए सहज होती है। 

सरलता में छिपी गहराई और समझ की ताकत को हिंदी बखूबी व्यक्त करती है। 

हिंदी: गर्व और गौरव का प्रतीक

हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, यह हमारी संस्कृति, हमारे विचारों और हमारी पहचान का प्रतीक है। यह हमारे भीतर का गर्व है, जो हमें हमारे अतीत से जोड़ते हुए हमारे भविष्य के मार्ग को स्पष्ट करता है। हिंदी ही वह कड़ी है, जो भारत के विभिन्न हिस्सों को जोड़कर एक मजबूत और अद्वितीय समाज का निर्माण करती है। यह हमारी धरोहर है, और इसका सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है। 

 एक संदेश: हिंदी के लिए गर्व और समर्पण

आइए, हम हिंदी को केवल शब्दों तक सीमित न रखें। इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ, इसे अपनी पहचान का हिस्सा मानें। हिंदी से ही हमारी संस्कृति है, हिंदी से ही हमारे रिश्ते मजबूत होते हैं। हिंदी हमारी आवाज़ है, हमारी भावना है, और हमारी एकता का प्रतीक है। 

हिंदी में बसता है गर्व, समर्पण और हमारी पहचान।

हिंदी है, तो हम हैं।

हिंदी से ही सब मुमकिन है।

हिंदी: संवाद का सेतु, अपनत्व का प्रतीक और भारत की आत्मा।

***

अश्विन शर्मा

बेंगलुरू


मंगलवार, 31 दिसंबर 2024

कविता

 


चाय और जीवन का नारीत्व

अश्विन शर्मा

चाय...

जैसे एक नारी का रूप,

जो धरती की कोख में पलती है,

धूप सहती है, बारिश झेलती है,

हर दर्द को अपने भीतर समेटकर,

संसार को अपनी सुगंध से महकाती है।

 

सुबह की पहली किरण संग,

वो हल्के स्वाद सी,

जैसे रिश्तों में पहली झलक –

कोमल, सौम्य, और दिल को छू लेने वाली।

 

दोपहर की तेज़ धूप में,

वो गाढ़े रंग सी बन जाती है,

जैसे नारी अपने हर रिश्ते को

मजबूती से संभाल लेती है।

 

शाम की ठहरती हवा में,

वो अपनी गर्माहट से थकान मिटाती है,

जैसे किसी माँ का आँचल

हर दर्द को सुकून में बदल देता है।

 

चाय का हर कण,

उसके धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक है –

कभी मीठी, तो कभी हल्की कड़वाहट लिए,

पर हर बार अपनापन देती है।

 

उबलते पानी में,

जब वो अपना रंग छोड़ती है,

तो सिखाती है,

कि बलिदान में ही उसका सौंदर्य है।

 

हर सुबह, हर शाम,

उसकी उपस्थिति,

जैसे जीवन में एक नारी का होना –

साँसों की तरह अनिवार्य,

और अस्तित्व की तरह गहन।

 

चाय…

सिर्फ एक पेय नहीं,

जीवन का सार है,

उसकी सुगंध, उसका स्वाद,

हर पल में उसकी नारी शक्ति का एहसास है।

 

तो अगली बार जब चाय का प्याला उठाओ,

उसके हर घूँट में

एक नारी की कहानी सुनो।

 


अश्विन शर्मा

बेंगलुरु

शनिवार, 30 नवंबर 2024

विशेष


यात्रा की राह पर विचार यात्रा

अश्विन शर्मा

ना सबूत है ना दलील है, मेरे साथ रब्बे जलील है

"ना प्रमाण है, ना तर्क है, मेरे साथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर है।"

रेल की खिड़की से बाहर झाँकते हुए यह पंक्ति बार-बार मेरे हृदय में प्रतिध्वनित हो रही है। मैं इस समय पुणे से बेंगलुरु की यात्रा कर रहा हूँ। चारों ओर फैली हरियाली और कहीं हल्की, कहीं मूसलधार वर्षा के दृश्य मेरे अंतर्मन को स्पर्श कर रहे हैं। यात्रा के दौरान मन में विचारों की अंतहीन शृंखला चलने लगती है, किन्तु आज कुछ विशेष अनुभूति हो रही है।

मैं देख रहा हूँ कि एक खेत पानी में डूबा हुआ है, जबकि उसके समीप का खेत हरे-भरे पौधों से लहलहा रहा है। दोनों खेतों के बीच केवल थोड़ी सी दूरी का अंतर है, फिर भी उनकी स्थिति बिल्कुल भिन्न है। ऐसा क्यों होता है? एक ही क्षेत्र में, एक ही मौसम में, एक ही वर्षा के बावजूद एक किसान की मेहनत विफल हो जाती है और दूसरे की फसल खिल उठती है?

शायद यह उस परमेश्वर की महिमा है जिसे हम देख नहीं सकते, परंतु अनुभव कर सकते हैं। यह सोचते हुए मेरी आस्था और अधिक सुदृढ़ हो जाती है। यह विश्वास कि इस संसार में जो कुछ भी होता है, उसी की इच्छानुसार होता है। हम चाहे कितनी भी योजना बना लें, कितनी भी परिश्रम कर लें, अंतिम निर्णय तो ईश्वर के हाथों में ही होता है।

प्रकृति का यह खेल किसी गहरी आध्यात्मिक शिक्षा की ओर संकेत करता है। एक ओर जहाँ एक किसान की फसल नष्ट हो जाती है, वहीं दूसरी ओर कोई दूसरा किसान अपनी लहलहाती फसल को देखकर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। क्या यह अन्याय है? अथवा यह जीवन का स्वाभाविक चक्र है, जो हमें सिखाता है कि कृतज्ञता सदैव हमारे अंतर्मन में होनी चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों?

इस यात्रा के दौरान यह अनुभूति हुई कि ईश्वर के प्रति आभार केवल सुखद क्षणों के लिए नहीं, अपितु उन कठिन परिस्थितियों के लिए भी होना चाहिए, जो हमें आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करती हैं। जब-जब हम हरे-भरे खेतों को देखते हैं, हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह किसी की परिश्रम और किसी की कठिनाइयों का परिणाम हो सकता है। परंतु प्रत्येक परिस्थिति हमें एक नई दृष्टि और अनुभव प्रदान करती है, जो अंततः हमें आत्मिक रूप से समृद्ध बनाती है।

जैसे ही रेल तेज़ी से इन हरी-भरी धरती को पार करती जा रही है, मैं समझने लगता हूँ कि हर वृक्ष, हर पौधा, और हर खेत अपनी-अपनी कथा कह रहे हैं। यह दृश्य मुझे सिखाता है कि जीवन में जब भी चुनौतियाँ आएं, हमें निराश नहीं होना चाहिए। ईश्वर की कृपा सर्वत्र व्याप्त है, केवल उसे अनुभव करने का दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है।

वर्षा कहीं हो रही है, कहीं नहीं। परंतु यह प्रकृति का ही खेल है कि हरियाली फिर भी सर्वत्र विस्तारित है। यह यात्रा मेरे लिए मात्र एक यात्रा नहीं रही, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव बन गई है, जहाँ परमेश्वर के प्रति मेरी आस्था और भी अधिक गहन हो गई है।

अंततः, परमेश्वर हर स्थान पर है, उसकी कृपा हर क्षण हमारे साथ है।

  


अश्विन शर्मा

बेंगलुरु

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...