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मंगलवार, 26 मार्च 2024

व्यंग्य


इति श्री रिसर्चाय

हरिशंकर परसाई

बाबू गोपालचंद्र बड़े नेता थे, क्योंकि उन्होंने लोगों को समझाया था और लोग समझ भी गए थे कि अगर वे स्वतंत्रता-संग्राम में दो बार जेल - ए क्लासमें - न जाते, तो भारत आजाद होता ही नहीं। तारीख 3 दिसंबर 1950 की रात को बाबू गोपालचंद्र अपने भवन के तीसरे मंजिल के सातवें कमरे में तीन फीट ऊँचे पलँग के एक फीट मोटे गद्दे पर करवटें बदल रहे थे। नहीं, किसी के कोमल कटाक्ष से विद्ध नहीं थे वे। वे योजना से पीड़ित थे। उन्होंने हाल ही में करीब चार लाख रुपया चंदा करके स्वतंत्रता-संग्राम के शहीदों की स्मृति में एक भव्य बलि स्मारकका निर्माण करवाया था। वे उसके प्रवेश द्वार पर देश-प्रेम और बलिदान की कोई कविता अंकित करना चाहते थे। उलझन यही थी कि वे पंक्तियाँ किस कवि की हों। स्वतंत्रता-संग्राम में स्वयं जेल-यात्रा करनेवाले अनेक कवि थे, जिनकी ओजमय कविताएँ थीं और वे नई लिखकर दे भी सकते थे। पर वे बाबू गोपालचंद्र को पसंद नहीं थीं। उनमें शक्ति नहीं है, आत्मा का बल नहीं है उनका मत था।

परेशान होकर उन्होंने रखा ग्रंथ निकाला अकबर बीरबल विनोदऔर पढ़ने लगे एक किस्सा : ‘...तब अकबर ने जग्गू ढीमर से कहा, ‘देख रे, शहर में जो सब से सुंदर लड़का हो उसे कल दरबार में लाकर हाजिर करना, नहीं तो तेरा सिर काट लिया जाएगा।बादशाह का हुक्म सुनकर जग्गू ढीमर चिंतित हुआ। आखिर शहर का सबसे सुंदर लड़का कैसे खोजे। वह घर की परछी में खाट पर बड़ा उदास पड़ा था कि इतने में उसकी स्त्री आई। उसने पूछा, ‘आज बड़े उदास दीखते हो। कोई बात हो गई है क्या?’ जग्गू ने उसे अपनी उलझन बताई। स्त्री ने कहा, ‘बस, इतनी-सी बात। अरे अपने कल्लू को ले जाओ। ऐसा सुंदर लड़का शहर-भर में न मिलेगा।जग्गू को बात पटी। खुश होकर बोला, ‘बताओ भला! मेरी अक्ल में इतनी-सी बात नहीं आई। अपने कल्लू की बराबरी कौन कर सकता है।बस, दूसरे दिन कल्लू को दरबार में हाजिर कर दिया गया। कल्लू खूब काला था। चेहरे पर चेचक के गहरे दाग थे। बड़ा-सा पेट, भिचरी-सी आँखें और चपटी नाक।

किस्सा पढ़कर बाबू गोपाल ठीक जग्गू ढीमर की तरह प्रसन्न हुए। वे एकदम उठे और पुत्र को पुकारा, ‘गोबरधन! सो गया क्या? जरा यहाँ तो आ।गोबरधन दोस्तों के साथ शराब पीकर अभी लौटा था। लड़खड़ाता हुआ आया। गोपालचंद्र ने पूछा, ‘क्यों रे, तू कविता लिखता है न?’ गोबरधन अकबका गया। डरा कि अब डाँट पड़ेगी। बोला, ‘नहीं बाबूजी, मैंने वह बुरी लत छोड़ दी है।गोपालचंद्र ने समझाया, ‘बेटा, डरो मत। सच बताओ। कविता लिखना तो अच्छी बात है।गोबरधन की जान तो आधे रास्ते तक निकल गई थी, फिर लौट आई। कहने लगा, ‘बाबूजी, पहले दस-पाँच लिखी थीं, पर लोगों ने मेरी प्रतिभा की उपेक्षा की। एक बार कवि-सम्मेलन में सुनाने लगा तो लोगों ने हूटकर दिया। तब से मैंने नहीं लिखी।गोपालचंद्र ने समझाया, ‘बेटा, दुनिया हर जीनियसके साथ ऐसा ही सलूक करती है। तेरी गूढ़ कविता को समझ नहीं पाते होंगे, इसलिए हँसते होंगे। तू मुझे कल चार पंक्तियाँ देशभक्ति और बलिदान के संबंध में लिखकर दे देना।गोबरधन नीचे देखते हुए बोला, ‘बाबूजी, मैंने इन हल्के विषयों पर कभी नहीं लिखा। मैं तो प्रेम की कविता लिखता हूँ। जहूरन बाई के बारे में लिखी है, वह दे दूँ?’

गोपालचंद्र गरम होते-होते बच गए। बड़े संयम से मीठे स्वर में बोले, ‘आज कल बलिदान त्याग और देश-प्रेम का फैशन है। इन्हीं पर लिखना चाहिए! गरीबों की दुर्दशा पर भी लिखने का फैशन चल पड़ा है। तू चाहे तो हर विषय पर लिख सकता है। तू कल शाम तक बलिदान और देश-प्रेम के भावोंवाली चार पंक्तियाँ मुझे जोड़कर दे दे। मैं उन्हें राष्ट्र के काम में लानेवाला हूँ।’ ‘कहीं छपेंगी?’ गोबरधन ने उत्सुकता से पूछा। छपेंगी नहीं खुदेंगी, बलि-स्मारक के प्रवेश द्वार पर।गोपालचंद्र ने कहा। गोबरधन दास को प्रेरणा मिल गई। उसने दूसरे दिन शाम तक चार पंक्तियाँ जोड़ दीं। गोपालचंद्र ने उन्हें पढ़ा तो हर्ष से उछल पड़े, ‘वाह बेटा, तूने तो एक महाकाव्य का सार तत्व भर दिया है इन चार पक्तियों में। वाह... गागर में सागर!वे चार पंक्तियाँ तारीख 6 सितंबर को बलि-स्मारकके प्रवेश-द्वार पर खुद गईं। नीचे कवि का नाम अंकित किया गया - गोबरधन दास।

विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के शोध कक्ष में डॉ. वीनसनंदन अपने प्रिय छात्र रॉबर्ट मोहन के साथ चर्चा कर रहे थे। इस काल के अंतरराष्ट्रीय नाम होने लगे। रॉबर्ट मोहन डॉ. वीनसनंदन के निर्देश में बीसवीं शताब्दी की कविता पर शोध कर रहा था। मोहन बड़ी उत्तेजना में कह रहा था, ‘सर, पुरातत्व विभाग में ऐसा क्लूमिला है कि उस युग के सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय कवि का मुझे पता लग गया है। हम लोग बड़े अंधकार में चल रहे थे। परंपरा ने हमें सब गलत जानकारी दी है। निराला, पंत, प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर आदि कवियों के नाम हम तक आ गए हैं परंतु उस कृतघ्न युग ने अपने सब से महान राष्ट्रीय कवि को विस्मृत कर दिया। मैं विगत युग को प्रकाशित करनेवाला हूँ।

तुम दंभी हो।डॉक्टर ने कहा। तो आप मूर्ख हैं।शिष्य ने उत्तर दिया। गुरु-शिष्य संबंध उस समय इस सीमा तक पहुँच गए थे। गुरु ने बात हँसकर सह ली। फिर बोले, ‘रॉबर्ट, मुझे तू पूरी बात तो बता।राबर्ट ने कहा, ‘सर, हाल ही में सन 1950 में निर्मित एक भव्य बलि-स्मारक जमीन के अंदर से खोदा गया है। शिलालेख से मालूम होता है कि वह भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में प्राणोत्सर्ग करनेवाले देश-भक्तों की स्मृति में निर्मित किया गया था। उसके प्रवेश-द्वार पर एक कवि की चार पंक्तियाँ अंकित मिली हैं। वह स्मारक देश में सबसे विशाल था। ऐसा मालूम होता है कि समूचे राष्ट्र ने इनके द्वारा शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी। उस पर जिस कवि की कविता अंकित की गई है, वह सबसे महान कवि रहा होगा। क्या नाम है उस कवि का?’ डॉक्टर साहब ने पूछा। गोबरधनदास’, मोहन बोला। उसने कागज पर उतारी हुई वे पंक्तियाँ डॉक्टर साहब के सामने रख दीं।

डॉक्टर साहब ने प्रसन्न मुद्रा में कहा, ‘वाह, तुमने बड़ा काम किया है।रॉर्बट बोला, ‘पर अब आगे आपकी मदद चाहिए। इस कवि की केवल चार पंक्तियाँ ही मिली हैं, शेष साहित्य के बारे में क्या लिखा जाए?’ डॉक्टर साहब ने कहा, ‘यह तो बहुत ही सहज है। लिखो, कि उन का शेष साहित्य काल के प्रवाह में बह गया। उस युग में कवियों में गुट-बंदियाँ थीं। गोबरधनदास अत्यंत सरल प्रकृति के, गरीब आदमी थे। वे एकांत साधना किया करते थे। वे किसी गुट में सम्मिलिति नहीं थे। इस लिए उस युग के साहित्यकारों ने उनके साथ बड़ा अन्याय किया। उनकी अवहेलना की गई, उन्हें कोई प्रकाशक नहीं मिला। उनकी कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं। पर अन्य कवियों ने प्रकाशकों से वे पुस्तकें खरीदकर जला दीं।

रॉबर्ट के मुख पर उल्लास छा गया । बोला, “और यह भी लिख दूँ न कि इन्होंने सौ से ऊपर ग्रन्थ लिखे थे ।"

हाँ, हाँ, बल्कि दो सौ । और यह भी लिखो कि उस समय देश-प्रेम से उन्मत्त जन-समूह गोबरधनदास की ओजपूर्ण कविताएँ गाता हुआ बलि-पथ पर बढ़ता था ।" गुरु ने शोध आगे बढ़ाई ।

रॉबर्ट ने शंका की, "लेकिन सर, वैसे देखा जाये तो ये पंक्तियाँ बहुत रद्दी हैं । निष्कर्ष ग़लत न हो जाये ?"

डॉक्टर साहब ने डाँटा, “ रॉबर्ट, तुम्हें शोध का सबसे पहला नियम नहीं आता । अरे, जो प्राचीन है वह सब से उत्तम है । बुरा केवल वर्तमान है । और शोध का प्रयोजन ही यह है कि जिस में जो चीज़ न हो, उसे खोजा जाये। इन पंक्तियों में काव्य-गुण नहीं है जो तुम्हें अपनी ओर से आरोपित करना होगा । महाकवि था । कोई हँसी-खेल नहीं है । "

विद्यार्थी सहम गया ।

डॉक्टर वीनस ने कहा, " मगर रॉबर्ट, उस महापुरुष का उल्लेख होना चाहिए, जिसने महाकवि की प्रतिभा को परखा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए कम-से-कम चार पंक्तियाँ तो सुरक्षित रखीं । कौन था उसका प्रमुख निर्माता ?"

रॉबर्ट ने काग़ज़ देख कर बताया, “एक नेता था, बाबू गोपाल चन्द ।”

महान् था वह ।” डॉक्टर ने आँखें बन्द करके कहा, "उस गुटबन्दी के युग में उपेक्षित प्रतिभा को इस तरह पहचानना और उसे मान्यता देना, किसी विराट् आत्मा का ही कार्य हो सकता है । मुझे लगता है, महात्मा गोपाल चन्द ने ही उस ग़रीब महाकवि को आश्रय दिया होगा और ऐसा करने से वह उस काल के कवियों के कोप का भाजन बना होगा । अन्य कवियों ने ईर्ष्या-वश उसकी निन्दा की होगी । पत्रों में उसके खिलाफ़ लिखा होगा । उस सत्याग्रह के युग में कवियों ने उसके द्वार पर अनशन कर दिया हो, तो कोई आश्चर्य नहीं । मेरे पास प्रमाण है, निराला ने कुकुरमुत्तानामक कविता इसी बात से कुछ कर लिखी होगी । दिनकर जी के कस्मै देवाय हविषा विधेममें भी यही प्रश्न है । शोध अनुमान पर चलती है ।"

और रॉबर्ट मोहन की क्रान्तिकारी खोज प्रकाशित हुई जिसके द्वारा विश्व ने 20वीं शताब्दीं के सबसे महान् राष्ट्रीय कवि को जाना, गोबरधनदास को ।

 

हरिशंकर परसाई

 

 

 

 

 

रविवार, 12 नवंबर 2023

व्यंग्य

 



लक्ष्मीजी से मुलाक़ात

डॉ. गोपाल बाबू शर्मा

दीपावली की रात को जब सोने का वक़्त हुआ, तब भी श्रीमती ने घर का दरवाजा खुला छोड़ दिया। हमने उत्सुकता वश पूछा, “क्यों, क्या बात है ?”

आज की रात लक्ष्मीजी आती हैं।” श्रीमती ने उत्तर दिया।

लक्ष्मीशब्द सुन कर हमारी आँखों के आगे लक्ष्मी के अनेक रूप उभर कर आने लगे ।

एक लक्ष्मी वह है, जो बस स्टैण्ड पर फटे कपड़ों में मुसाफ़िरों से भीख माँगती फिरती है।

उसका नाम भी लक्ष्मी है, जो ठेकेदार की बँधुआ मजदूरी में है और ईंटें ढोने का काम करती है।

वह भी तो लक्ष्मी ही है, जो महाशय मलूकचंद के यहाँ बर्तन माँजती है और महाशय जी की कृपा से इन दिनों उसके पाँव भारी हैं।

पड़ोसी की लड़की का नाम भी लक्ष्मी ही है। उसके उद्दण्ड और आवारा भाई पर घर में सब लाड़-प्यार उड़ेलते हैं, पर लक्ष्मी को हर समय लताड़-दुत्कार ही मिलती है, क्योंकि वह बेटा नहीं, बेटी है।

कहने को सब उसे भी लक्ष्मी ही कहते हैं, जो रोज़ रात को अपने शराबी पति से पिटती है और अपने आँचल से बेबसी के आँसू पोंछ कर रह जाती है ।

श्रीमती जी का इन लक्ष्मियों से क्या लेना-देना था। उनका मतलब तो उन लक्ष्मीजी से था, जो भगवान् विष्णु की चंचला धर्मपत्नी और धन की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं।

हमें डर था कि रात को दरवाज़ा खुला देख कर कहीं घर में चोर न घुस आए और आसानी से कबाड़ा कर नौ दो ग्यारह हो जाएँ, लेकिन गृह- लक्ष्मी की बात मानते तो शनीचर कहलाते, सो चुप रहे। थोड़ी देर जागते रहे फिर पता नहीं कब पलकें झपने लगीं और नींद आ गई ।

आदमी के अवचेतन में जो बात रहती है, वही उसे सपने में दिखाई देती है। हम लक्ष्मीजी का ध्यान करते-करते सोये थे, सो सपने में देखा कि सचमुच लक्ष्मी जी सामने खड़ी हैं।

हमने उनके स्वागत में मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर का सहारा यों लिया- आप पधारीं हमारे घर पर खुदा की क़ुदरत है, कभी हम आपको, कभी अपने घर को देखते हैं।

लक्ष्मीजी मुसकराईं। बोलीं, “यह औपचारिकता और मक्खनबाजी छोड़ो। पहले मेरे कुछ सवालों का जवाब दो ।”

हम खुशी के मारे फूल कर कुप्पा हो गए, “पूछिए, जो पूछना चाहें। बंदा हाजिर है।”

लक्ष्मी जी का पहला सवाल था, “तुम अभी कुँवारे हो या विवाहित ? “

प्रश्न सुन कर हमें बड़ा अटपटा लगा। क्या लक्ष्मी जी को यह भी नहीं पता कि हम बैचलर की डिग्री कभी की खो बैठे हैं और हमारी श्रीमती जी बैचलर से मास्टर की डिग्री हासिल कर चुकी हैं, पर हमने बिना कुछ कहे, उत्तर दिया, “पूरी तरह विवाहित हैं ।

बाइ द वे, दहेज के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है ?”

दहेज को हम लड़की वालों के लिए एक अभिशाप मानते हैं और लड़के वालों के लिए लूट का माल । हम दहेज के हमेशा विरोधी रहे। अपनी शादी में तो क्या, हमने अपने दोनों बेटों के विवाह में भी दहेज की माँग नहीं की।” (तभी भीतर से धीरे से आवाज़ आई, ‘जब माँगा ही नहीं, तो कोई देता भी क्यों!’) “लाटरी के टिकट खरीदते हो?”

नहीं, भूल कर भी नहीं । लाटरी भी तो एक जुआ है और जुआ खेलना महापाप है ।”

रिश्वत लेते हो?”

नहीं, बिलकुल नहीं।”

बड़े बेवक़ूफ़ हो । रिश्वत तो अब बहुत कॉमन चीज़ है।”

बात यह है मैडम कि हम प्राध्यापक हैं। एक तो मास्टरी के पेशे में रिश्वत है कहाँ? दूसरे हम लेने की नीयत भी करें, तो हमें देता कौन है? लोग परीक्षा के दिनों में नंबर बढ़वाने अवश्य आते हैं, किंतु उनके साथ हमारा कोई घनिष्ठ परिचित अथवा रिश्तेदार भी टिकट-सा चिपका रहता है। वे अपना काम करवाते हैं और गाँठ की चाय भी पी जाते हैं।”

कोचिंग क्लास तो चलाते ही होंगे?”

नहीं, वह भी नहीं। कोचिंग करने का परम सौभाग्य तो कॉमर्स तथा साइंस के टीचरों को मिला है। हम ठहरे राष्ट्र-भाषा हिन्दी के अध्यापक । हिन्दी जैसे विषय में ट्यूशन कौन पढ़ता है। जो भी आता है, घंटे दो घंटे मुफ़्त में पढ़ जाता है और परीक्षा के समय आवश्यक प्रश्नोंपर निशान लगवा ले जाता है। नक़ल करने के लिए बाज़ार में गैस पेपर मिल ही जाते हैं।”

साहित्य में कुछ दख़ल रखते हो? आई मीन, कुछ लिखते-लिखाते भी हो?”

हाँ शुरू-शुरू में कविता लिखते थे, पर नई कविता के ज़माने में छंदोबद्ध कविता मुश्किल से छपती थी। पारिश्रमिक के पैसे भी प्रायः नहीं मिलते थे।”

कवि-सम्मेलनों में तो जाते होगे?”

संयोजकों से हमारी कोई रैट-पैट नहीं। हम खुद संयोजक बन कर कवि-सम्मेलनों के आयोजन का धंधा नहीं करते। जब हम किसी कवि को नहीं बुला पाते तो दूसरा हमें क्यों बुलाने लगा ? यह तो अदले-बदले का बायना है, दो और लो वैसे भी कवि-सम्मेलन अब पहले जैसे कहाँ रहे? आजकल उनमें कविता कम, भँड़ैती ज़्यादा होती है । वह हमारे वश की बात नहीं। इसलिए.....”

कवि-सम्मेलनों में जाने का मन नहीं करता, यही न?” लक्ष्मीजी खिलखिल पड़ीं, “तो कविता के अलावा कुछ और लिखते । कुछ लिखा ?”

हाँ, व्यंग्य के आठ संग्रह छप चुके हैं, जिनकी पाठकों और समीक्षकों ने सराहना भी की है।”

तब तो अच्छी-खासी रॉयल्टी झाड़ते होंगे?”

रॉयल्टी? अजी, भगवान् विष्णु का नाम लीजिए। लेखक को रॉयल्टी तो तब मिले; जब प्रकाशक में लॉयल्टी हो । पहला संग्रह छापते वक़्त प्रकाशक ने लाग की आधी रक़म धरवा ली। बाद में उसके बदले में थोड़ी-सी पुस्तकें चेंप दीं। दूसरी पुस्तक के प्रकाशक ने कुछ लिया नहीं, तो कुछ दिया भी नहीं । सारी पुस्तकें खुद ही बेच खाईं। शेष संग्रह अपनी जेब से छपवाए हैं। उनकी आधी से अधिक प्रतियाँ उपहार तथा समीक्षार्थ चली गईं और बाक़ी प्रतियाँ पीहर की तीहरसी दीमकों का ग्रास बन रही हैं।”

किसी पुस्तक पर कोई पुरस्कार प्राप्त हुआ?”

नहीं, दो बार अख़बार में विज्ञप्ति पढ़ कर एक जगह पुस्तकें भेजी थीं, परंतु पुरस्कार-समिति में कोई जान-पहचान का व्यक्ति नहीं था। पुरस्कार तो अब तिकड़म और साँठ-गाँठ से झटके जाते हैं। हम किसी खेमे में भी नहीं हैं। तीसरी बार पुस्तकें भेजने की हिम्मत नहीं हुई।”

तुम्हारा कोई लड़का डॉक्टर या इंजीनियर है?”

नहीं, दोनों में से कोई भी नहीं ।”

अध्यापन के साथ-साथ कोई साइड बिजनैस भी करते हो? जैसे प्रापर्टी डीलिंग, कॉलोनाइजेशन आदि का काम ?”

नहीं, क्योंकि ये धंधे झूठ, बेईमानी और झगड़ेख़ोरी के बिना नहीं कर सकते।”

पुलिस के दलाल हो?”

वह भी नहीं। इसका तो मन में कभी ख़याल ही नहीं आया ।”

तस्करी का धंधा भी नहीं करते?”

हमने सोचा, लक्ष्मीजी मसखरी कर रही हैं। मुसकान बिखेरते हुए हमने कहा, “नहीं जी, नहीं। न तो हमें स्मैक वग़ैरह लेने की आदत है और न विदेशी वस्तुओं के प्रति हमारे मन में कोई मोह। हम स्वदेशीके हिमायती हैं। सोने-चाँदी के बिस्कुटों की भी कोई तमन्ना नहीं। फिर तस्करी किसलिए ? यों भी तस्करी में रिस्क बहुत है और इसे हम देश-द्रोह से कम नहीं मानते ।”

क्या राजनीति में आने और नेता बन जाने का कोई इरादा है, कई राजनेता और मंत्री पहले फ-टीचर ही थे।”

“नहीं, राजनीति में घुसपैठ करने का हमारा कोई इरादा नहीं। हालाँकि हमें भाषण देना खूब आता है। छात्र संघ में मंत्री रह कर हम स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री, बाबू जय प्रकाश नारायण, पृथ्वीराज कपूर, प्रेमनाथ डोंगरा जैसे नेताओं और महापुरुषों के सामने एक्सटेम्पोर बोल चुके हैं। हमने तब यूनियन की नाक ऊँची की और अपनी धाक जमाई, लेकिन आज भूखी, ग़रीब और दुखी जनता को राशन की ज़रूरत है, भाषण की नहीं। नेताओं की तरह झूठे आश्वासन देने में भी हम एकदम अनफिट अब राजनीति वास्तव में गंदा खेल हो गई है। हम जैसा अनाड़ी आदमी उसे नहीं खेल सकता, खेलने की कोशिश भी करेगा तो धड़ाम से चारों खाने चित्त गिरेगा।”

हम धड़ाधड़ बोले चले जा रहे थे कि अचानक लक्ष्मीजी का मूड ऑफ हो गया । झुँझलाते हुए बोलीं, “तुम्हारे पास है क्या? कभी तुम्हारे यहाँ चोरी हुई नहीं।  सी. बी. आई. या आयकर वालों का छापा पड़ा नहीं । न ऐसा कुछ करते-धरते हो और न करना ही चाहते हो, जिसके कारण आसानी से अच्छी कमाई-धमाई हो सके।  घिसे-पिटे, कोरे आदर्शों की टूटी-सी बकुचिया लिए बैठे हो और इच्छा करते हो कि तुम्हारे घर छम-छम करती लक्ष्मी चली आए। मेरे लिए तुम मेकअपका सामान तक नहीं जुटा सकते। मैं तो क्या, कोई भी निगोड़ी तुम्हारे यहाँ पैर नहीं रखेगी। मेरी सीधी-सादी बहिन सरस्वती भले ही रह ले। जाओ, मुँह धोकर आओ। तुम लक्ष्मीवान् क्या, लक्ष्मी वाहन भी बनने के क़ाबिल नहीं।”

हमने बुझे मन से सफाई देनी चाही, लेकिन लक्ष्मीजी इसके लिए कतई तैयार न थीं। बोलीं, ‘गोस्वामी जी की चौपाई सुनी ही होगी कि सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।’ तुम सचमुच कर्महीन हो, इसीलिए दीन-हीन हो। तुम मेरी कृपा के पात्र कदापि नहीं हो सकते। तुम्हारे यहाँ आने से तो हज़ार बार बेहतर है कि किसी उठाईगीरे के घर रहूँ।  समझ लेना मिस्टर कि नौकर के लिए इण्टरव्यू में गए थे और रिजैक्ट कर दिए गए।”

आँख खुली तो लक्ष्मीजी नदारद थीं। हाँ, श्रीमती जी जरूर सूप बजा-बजा कर रट लगा रही थीं, “भाग दलिद्दर, लक्ष्मी आई। भाग दलिद्दर....” ।”


 

डॉ. गोपाल बाबू शर्मा

आगरा

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...