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शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

कविता

 


हिन्दी

प्रणति ठाकुर

 

संस्कृत की समृद्ध गोद में भाषा बनकर आई हिन्दी,

अपनी सहज प्रकृति के कारण जनमानस को भायी हिन्दी ।

 

दामोदर पण्डित ने इसको स्वयं सँवारा ,

उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणको रचकर इसे निखारा ।

 

बावन वर्ण हैं इसके इसमें शोभा पाते,

भाषा को प्रति पग सम्भालते नहीं अघाते ।

 

है अपने हर एक वर्ण का रखती सदा ये मान,

हर ध्वनि का, लघु-दीर्घ, परखती है अनुपम अनुदान ।

 

कई बोलियों ने इसको कुछ शब्द दिये हैं ,

प्रादेशिक सौन्दर्य इसे उपलब्ध किये  हैं ।

 

विश्व-पटल पर हिन्दी थोड़ी मुखर हुई है,

खुद का किया संभाल निरंतर सुघर हुई है ।

 

भाषाओं में जगह है इसकी बड़ी ही ऊँची,

जग के मन भाती है ये नवरंगी कूची ।

 

समय-धार के साथ ये हिन्दी सदा बहेगी,

खुद को कर समृद्ध समय के साथ चलेगी ।

 

हृदय-तल का है हमारे गान, सिन्धु समान हिन्दी,

भारती के ओज का वरदान, है अभिमान हिन्दी ।।

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प्रणति ठाकुर

फ़्लैट - 3 F,G, टॉवर - 1

डायमंड रेजीडेंसी

बाकुलतला

38, हो ची मिन्ह सारनी

बेहाला,चौरास्ता

कोलकाता- 61

जनवरी 2026, अंक 67

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