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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

स्मृति शेष

विनोद कुमार शुक्ल

राजा दुबे

वंचितों के पक्ष में खड़े होने वालों में

अग्रगण्य थे, विनोद कुमार शुक्ल

एक दो नहीं हिन्दी काव्य जगत में वंचितों के पक्ष में खड़े रहने वाले बीसियों कवि थे, हैं और आगे भी रहेंगे मगर इन कवियों में से ऐसे कवि गिने-चुने ही हैं जो जिन्हें वंचितों के पक्ष में खड़े होने की काव्य अभिव्यक्ति के माध्यम से घोषणा करनी होती है।

वंचितों के लिये अपने मनोभाव को कविता के माध्यम से बिना लाग-लपेट, बिना व्यक्तव्य वाली भाषा शैली और बिना पक्षधारिता के ढिंढोरा पीटे,सहज-सरल तरीके से व्यक्त करने वाले गिने चुने कविता करने वाले कवियों की संख्या बेहद कम है और ऐसे ही बिल्ले कवियों में अग्रगण्य माने जाने विले कवि थे - विनोद कुमार शुक्ल। उनके अवसान से सहज और जनोन्मुखी साहित्य का एक सितारा अस्त हो गया मगर हमारे आपके मन मस्तिष्क में उसकाआलोकित अवदान हमेशा अंकित रहेगा ।

विनोद कुमार शुक्ल , हिन्दी भाषा के एक ऐसे साहित्यकार थे, जिन्हें हिन्दी साहित्य में उनके अनूठे और सादगी भरे लेखन के लिए जाना जाता है। श्री शुक्ल का जन्म 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव ज़िले में हुआ था । वे उन लेखकों में शामिल थे जिन्होंने कविता और कथा दोनों विधाओं में अपनी अलग, विशिष्ट और गहरी पहचान बनाई। । उनकी रचनाओं की भाषा सरल होते हुए भी अत्यन्त गूढ़ और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर मानी जाती है. रोज़मर्रा की ज़िन्दगी, साधारण लोगों के अनुभव और उनके भीतर के संसार को उन्होंने अद्भुत बारीकी से अपनी रचनाओं में जगह दी । उनके प्रमुख उपन्यासों में नौकर की कमीज, दीवार में एक खिड़की रहती थी और खिलेगा तो देखेंगे शामिल हैं। वहीं कविता संग्रहों में लगभग जयहिंद, सब कुछ होना बचा रहेगा और अतिरिक्त नहीं विशेष रूप से चर्चित रहे । नौकर की कमीज पर आधारित फिल्म भी बनाई गई थी, जिसे साहित्य और सिनेमा दोनों क्षेत्रों में सराहना मिली। शुक्ल के दूसरे उपन्यास दीवार में एक खिड़की रहती थी को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। वर्ष 2023 का अन्तर्राष्ट्रीय पैन-नाबोकोव पुरस्कार से सम्मानित होने वाले भी वे पहले भारतीय साहित्यकार थे ।

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने और मध्यप्रदेश के सुप्रसिद्ध लेखक चन्द्रशेखर साकल्ये ने भी अपने श्रद्धांजलि व्यक्तव्य में उनकी एक ही प्रसिद्ध कविता – “हताशा से एक व्यक्ति ..” के माध्यम से उनके लेखन की अगाध ऊर्जस्विता को पारिभाषित करने की कोशिश की। वो कविता है

हताशा से एक व्ऊ बैठ गया था /व्यक्ति को मैं नहीं जानता था / हताशा को जानता था / इसलिये मैं उस व्यक्ति के पास गया /मैंने हाथ बढ़ाया / मेरा हाथ पकड़कर वो खड़ा हुआ /मुझे वह नहीं जानता था / मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था /हम दोनों साथ चले / दोनो एक दूसरे को नहीं जानते थे / साथ चलने को जानते थे। प्रेम जनमेजय ने अपने संदेश में कहा कि वे वंचित और हताश व्यक्ति के साथ के कवि थे । मैं उनके जाने से हताश नहीं दुखी हूँ । उनकी रचनाशीलता हर हताश को साथ होने की ऊर्जा देती रहेगी ।मैं जानता नहीं कि अभी और कितना लिख पाते ,पर उनके होने पर यह विश्वास मिलता था कि वंचित को थामने वाले हाथ जीवित हैं । साकल्ये का मानना था व्यक्तिवाचक संज्ञा को क्रियावाचक संज्ञा में बदलकर वे जीवन दर्शन का जो नया भाष्य करते थे, वो विलक्षण था।

अभी कुछ दिन पहले ही जब इस विनोद कुमार शुक्ल को उनके घर में भारत में साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान ज्ञानपीठ दिया जा रहा था, उन्होंने अपनी एक कविता पढ़ी थी- “जागता हूँ तो सबकी नींद से/ सोता हूँ तो सबकी नींद में/ मैं अकेला नहीं/ मुझमें लोगों की भीड़ इकट्ठी है/ मुझे ढूँढो मत/ मैं सब लोग हो चुका हूँ/ मैं सबके मिल जाने के बाद/ आख़िर में मिलूँगा/ या नहीं मिल पाया तो/ मेरे बदले किसी से मिल लेना। उनके इस काव्य व्यक्तव्य पर बीबीसी के आलोक पुतुल ने कितनी सटीक बात कही है कि विनोद कुमार कहते ज़रुर हैं कि मेरे बदले किसी ओर से मिल लेना लेकिन सच तो यही है कि किसी दूसरे से मिलना, दूसरे से मिलने की तरह होगा, विनोद कुमार शुक्ल से मिलने की तरह नहीं ।

श्री शुक्ल के गृहप्रदेश छत्तीसगढ़ के समाचार पत्र समूह - “आज की जलधारा” ने श्री शुक्ल की स्मृति में एक लाख रुपये के सम्मान की घोषणा की हैं। समाचार पत्र के प्रमुख श्री सुभाष मिश्रा ने उनके का अवसान को हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति निरुपित की है ।

राजा दुबे

13 - रुबी भगवान इस्टेट,

मानसरोवर हास्पीटल के पीछे

कोलार , भोपाल (मध्यप्रदेश)

पिन 462042

***

सोमवार, 31 मार्च 2025

पुरस्कृत प्रतिभा

 

पुरस्कृत प्रतिभा :

विनोद कुमार शुक्ल को

ज्ञानपीठ पुरस्कार

राजा दुबे

सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को वर्ष 2024 के लिये ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिये चुना गया है । यह सम्मान पाने वाले छत्तीसगढ़ के वे पहले लेखक हैं। अट्ठासी साल के श्री शुक्ल  अपनी सरल भाषा और संवेदनशील लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने - "नौकर की कमीज " और " दीवार में एक खिड़की रहती थी" जैसी प्रसिद्ध औपन्यासिक कृतियाँ लिखीं। चयन समिति ने उनकी अनूठी लेखन शैली और हिंदी साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया।

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किये जाने की घोषणा पर श्री शुक्ल ने कहा कि यह भारत का, साहित्य का एक बहुत बड़ा पुरस्कार है ।  इतना बड़ा पुरस्कार मिलना यह मेरे लिए खुशी की बात है ।भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य रचने वाले रचनाकारों को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया जाता है । इस पुरस्कार के तहत ग्यारह लाख रुपये की सम्मान निधि , वाग्देवी की काँस्य प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है ।

लेखक, कवि और उपन्यासकार शुक्ल  की पहली कविता वर्ष 1971 में " लगभग जयहिंद " शीर्षक से प्रकाशित हुई थी । उनके प्रमुख उपन्यासों में ," नौकर की कमीज ", " दीवार में एक खिड़की रहती थी " और " खिलेगा तो देखेंगे " शामिल हैं।शुक्ल के उपन्यास

"नौकर की कमीज " पर प्रसिद्ध फिल्मकार मणि कौल ने वर्ष 1999  में इसी नाम से एक फिल्म बनायी थी। इस फिल्म के बारे में सुप्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार का मानना है कि आपके उपन्यास " नौकर की कमीज़ "  इसलिये महान रचना नहीं है क्योंकि उस पर फ़िल्म बनी है बल्कि इसलिये महान रचना है क्योंकि आज़‌ नौकरियों में  इन्सान की गरिमा घिसती हुई एकदम् मिटने की कगार  पर है और आपने इस रचना के माध्यम  से उस गरिमा को पुनर्प्रतिष्ठित करने का बड़ा काम किया  है ।

उनके रचनाकर्म का जहाँ तक सवाल है - उनके उपन्यास -" नौकर की कमीज ,"  " खिलेगा तो देखेंगे " और " दीवार में एक खिड़की रहती थी ", हिन्दी के सबसे बेहतरीन उपन्यासों में माने जाते हैं । उनकी कहानियों के संग्रह " पेड़ पर कमरा " और " महाविद्यालय " की भी बहुत चर्चा रही ।उनकी कविताओं की किताबों में - " वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर ", " आकाश धरती को खटखटाता है " और " कविता से लम्बी कविता " जैसी कृतियाँ तो बेहद लोकप्रिय हुई हैं । आपने बच्चों के लिए भी किताबें लिखी हैं - " जिनमें हरे पत्ते के रंग की पतरंगी " और  " कहीं खो गया नाम का लड़का " जैसी किताबें शामिल हैं, जिन्हें बच्चों ने बहुत पसन्द किया है । उनकी किताबों का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है और उनका साहित्य दुनिया भर में पढ़ा जाता है ।



कविकर्म के औचित्य पर उनकी यह पंक्तियाँ भी महत्वपू्र्ण मानी जा रही हैं –

" मुझे बचाना है

एक-एक कर

अपनी प्यारी दुनिया को

बुरे लोगों की नज़र है

इसे खत्म कर देने पर "

वे आज भी लेखन में सक्रिय हैं ,उम्र के इस मुकाम पर आपका यह कहना कि - " मुझे लिखना बहुत था , बहुत कम लिख पाया । मैंने देखा बहुत, सुना भी बहुत , महसूस भी किया बहुत , लेकिन लिखने में थोड़ा ही लिखा ,कितना कुछ लिखना बाकी है ...इस बचे हुए को लिख लेता अपने बचे होने तक "

यह वाक्यांश उनकी सृजनात्मकता की इच्छा को दर्शाता है ।वे आज भी लेखन में सक्रिय हैं, खासतौर पर बच्चों के लिए लिखना उन्हें पसंद है। उनका मानना है कि "लिखना एक छोटी चीज़ नहीं है, इसे निरन्तर करते रहना चाहिए और पाठकों की प्रतिक्रिया पर भी ध्यान देना चाहिए।" विनोद कुमार शुक्ल की

यह निरन्तरता बनी रहे  इसी शुकामना के साथ, सादर अभिवादन ।

उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और अंतरराष्ट्रीय साहित्य में उनके योगदान पर वर्ष 2023 के " पेन-नोबोकोव अवॉर्ड फॉर अचीवमेंट इन इंटरनेशनल लिटरेचर " से भी सम्मानित किया गया था । उनका लेखन सरल भाषा, गहरी संवेदनशीलता और अद्वितीय शैली के लिये जाना जाता है। वह  हिन्दी साहित्य में अपने प्रयोगधर्मी लेखन के लिये प्रसिद्ध हैं। 

 

राजा दुबे

एफ - 310 राजहर्ष कालोनी ,

अकबरपुर

कोलार रोड

भोपाल 462042

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...