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शनिवार, 30 दिसंबर 2023

कृति से गुजरते हुए…

 

खुशबू का सफ़र ( हाइकु संग्रह)

साईनबानुं मोरावाला

हिन्दी हाइकु जगत के जो प्रमुख हस्ताक्षर हैं, मुख्य सर्जक हैं जिनके नाम से तथा जिनके लेखन-सर्जन से सही मायने में हिन्दी हाइकु को एक पहचान मिली या एक नई दिशा मिली है, ऐसे सर्जकों में डॉ. सुधा गुप्ता का नाम अग्रिम पंक्ति में आता है । हाइकु काव्य के क्षेत्र में सुधा जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनके कई हाइकु-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। जैसे –‘खुशबू का सफ़र (१९८६), ‘लड़की का सपना (१९८९), ‘तरु देवता पाखी पुरोहित(१९९७), ‘कुकी जो पिकी (२०००), ‘बाबुना जो आएगी(२००४), ‘आ बेठी गीत परी (२००४), ‘अकेला था समय (२००४), ‘चुलबुली रात ने (२००६), ‘कोरी माटी के दीये (२००९), ‘ खोई हरी टेकरी (२०१३) तथा सुख राई-सा दुःख के परबत।

उनके हाइकु में संवेदना के कई आयाम मिलते हैं । उन्होंने प्रेम, प्रकृति, जीवन-दर्शन, पर्यावरण, सामाजिक सरोकार, राजनीति, व्यंग्य, प्रेम-विरह, सुख-दु:, नारी-चित्रण, वृद्धों की समस्या, गरीबी, ऋतु-वर्णन जैसे अनेक विषयों से जुड़े हाइकु लिखे हैं।

‘खुशबू का सफ़र’ (१९८६) डॉ. सुधा गुप्ता का पहला हाइकु संग्रह है तथा हिन्दी साहित्य जगत का दूसरा एकल हाइकु संग्रह। प्रस्तुत संग्रह में कुल १०८ हाइकु संकलित हैं । इसमें ज्यादातर हाइकु प्रकृति, ऋतु-वर्णन, बारहमासा, जीवन दर्शन, धर्म आदि को लेकर रचे गए हैं ।

इस संग्रह में कवयित्री ने बारह महीनों एवं छह ऋतुओं के वर्णन के अंतर्गत प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है। इसमें रचे गये सभी हाइकु अनूठे उपमानों के साथ सजे हैं । प्रकृति के विविध रूपों को पढ़ते-देखते हुए हम इस तथ्य से अवगत होते हैं कि बहुत बारीकी से कवयित्री इस तरह की स्थिति का अवलोकन करती हैं। विविध ऋतुओं का बदलना, कौन सी ऋतु में कौन से फूल खिलते, फूलों के रंग-रूप सबका अवलोकन करके उसे अलग-अलग उपमाएँ देकर हाइकु में बाँध देना वो भी बड़ी सहजता और सरलता के साथ । यहाँ पर हम ऋतु वर्णन को लेकर रचे गए हाइकु के कुछ उदाहरण देख सकते हैं -

फूलों की टोपी/ हरियाली का कुर्ता/ वसंत दूल्हा ।

सोनल फूल/ अमलतास खिला/ झरना नही ।

बादर कारे/ जल भरें गुब्बारे/ फूटे,बरसे ।

बर्फ का ताज/ पहने निंदियारी/ वनस्पतियाँ  

पीपल खड़ा/ साय-साय दौडती/ पागल हवा ।

उपर्युक्त हाइकु में सुधाजी ने खूबसूरत वसंत को उतने ही सुंदर शब्दों में वर्णन किया है । हरियाले कुर्ते पर रंग-बेरंगी फूलों की टोपी पहने बसंत को दूल्हे के रूप में प्रस्तुत किया है। सुधा जी की रचनाओं में विषयों की विविधता रही है । ऋतु तथा महीनों का बदलना, विभिन्न पेड़-पौधों, पक्षियों के विविध रूप-गुण पर भरपूर मात्रा में हाइकु सृजन किया है । पहाड़, नदी, सागर, दिन-रात, चाँद-सूरज, सवेरा-संध्या, बारिश आदि को लेकर बहुत ही सुंदर हाइकु रचे हैं ।

डॉ. सुधा गुप्ता ने ऋतुओं को लेकर तो अपनी लेखनी चलाई है लेकिन साथ ही साथ बारहमासा को भी अपने हाइकु काव्य में पिरोया है। चैत, वैशाख, जेष्ठ, आषाढ़, सावन, भादों, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ, फाल्गुन इन सभी महीनों की विशेषताओं पर भी हाइकु सृजन किया है । उनके काव्य में ऋतु-वर्णन से जुड़ा कोई भी विषय अछूता नहीं रहा है । सारे विषयों को इन छोटी-छोटी तीन पंक्तियों में समेट लिया है

मटर छीमी:/ नाचती गाती खुश/ चैत आया ।

तंदूर तपा/ धरती रोटी सिके/ दहक लाल ।

आषाढ़ लगा/  मन संतूर बजा/ संकल्प डिगा ।

सावन-रात/ झिल्ली बोलती फिर/ खूलते ज़ख्म

भादों की संध्या/ खिला नील आकाश/ अभागी संध्या ।

कवयित्री प्रकृति के हर रूप से बेहद प्रेम करती है। थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कहना हर किसी के लिए आसान नहीं होता है। वैसे तो हम सभी जानते हैं कि भारत विविध ऋतुओं का देश है, जिसमें वसंत का महत्व अधिक है। वसंत की सुषमा से प्रकृति खिल उठती है। चैत मास को लेकर सुधा जी ने कितने सुंदर हाइकु रचे हैं। वसंत खत्म होते-होते वैशाख में हवाएँ बहना बंद हो जाती है। उसके बाद जेठ माह में तो गर्मी का प्रकोप बढ़ जाता है। जेठ की तपन को भी कवयित्री ने यहाँ पर उकेरा है। आषाढ़ माह में जब वर्षा का आगमन होता है तब गर्मी से राहत होती है, पेड़-पौधें झूमने लगते हैं। सावन भादों में बारिश होती रहती है। सावन में वर्षा को देखकर चारों तरफ वातावरण प्रफुल्लित हो जाता है। डॉ. सुधा गुप्ता ने बड़े ही कलात्मक ढंग से बारहमासा को हाइकु में पिरोया है ।

चाबुक लिये/ हवा धूमती रही/ सट सटाक ।

साँवली भोर/ हिम परिधान में/ झरोखे खड़ी ।

ऋतु-वर्णन तथा बारहमासा साहित्य की परम्परा रही है । एक ऋतु के बाद दूसरी ऋतु का आना और मौसम का बदलना यह तो एक प्राकृतिक घटना है । यहाँ पर हर मौसम में होने वाली अनुभूतियों को बड़ी ही सहजता के साथ हाइकु में उतारा है ।

डॉ. सुधा गुप्ता के ऋतु-वर्णन के साथ-साथ भी अन्य विषयों से जुड़े हाइकु लिखे हैं

खो गई आस्था/ भटकता इन्सान/ दु:खी हैरान ।

हिज्र की तोड़/ दीवारें वे फौलादी/ कोई आ मिला ।

साँज का तारा/ नीले मजार पर/ अकेला फूल ।

रजनी गंधा/ हँसती सारी रात/ सुबह सोती ।

अंत में, हम यह कह सकते हैं कि डॉ. सुधा गुप्ता के हाइकु का विषय चाहे कोई भी हो परंतु उसे बहुत ही कलात्मक ढंग से वह अनमोल बना देती है। सुधा जी द्वारा प्रयोग किए गए अनूठे विविध उपमान रचनाओं को ताजगी प्रदान करते हैं। इनकी रचनाओं में विषय की विविधता के साथ भाव एवं शिल्प संयोजन इतना बेजोड़ है कि सभी हाइकु बहुत ही उत्कृष्ट बन पडे है । साथ ही साथ बिम्बों, प्रतीकों, अलंकारों आदि के सुंदर प्रयोग  एक नया चमत्कार उत्पन्न करते हैं  । हम कह सकते हैं कि इनके हाइकु संसार ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है ।

संदर्भ –

खुशबू का सफ़र ( हाइकु संग्रह), सुधा गुप्ता, प्रथम संस्करण:१९८६, प्रकाशन: इन्डो विजन (प्रा) लि., II -220 नहेरु नगर, गाजियाबाद 201001

 



साईनबानुं मोरावाला

पीएच.डी. शोध-छात्रा,

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग,..विश्वविद्यालय,

वल्लभ विद्यानगर गुजरात

 

 

 

 

 

कृति से गुजरते हुए....

 


छः दशकों के काव्य की अंतर्यात्रा है : बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध और हिन्दी कविता

कुलदीप ‘आशकिरण’

        हाल ही में (18 नवंबर, 2023 को) इस जीवन और जगत की अंतर्यात्रा को पूर्ण कर गोलोकवासी हुई हिन्दी साहित्य की मूर्धन्य रचनाकार डॉ. सुधा गुप्ता ने आजीवन साहित्यिक सेवा में रत रहीं और उन्होंने अपनी रचनाओं से हिन्दी साहित्य संसार को समृद्ध किया। कविता, हाइकु, आलोचना और आत्मकथा जैसी विधाओं में दर्जनों किताबें उनके नाम से प्रकाशित हैं। इन्हीं कृतियों में से 'बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध और हिन्दी कविता शीर्षक से एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति है, जिसके अब तक दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं, पहला संस्करण 2004 में और दूसरा 2020 में। डॉ. सुधा गुप्ता की यह आलोचनात्मक कृति छः दशकों की काव्ययात्रा को अपने आप में संजोए हुए है। पुस्तक के पुरोवाक् में ही लेखिका देश की आजादी और नेताओं की स्वार्थ लोलुपता पर कटाक्ष करते हुए लिखती हैं खून की नदी में बहती कटी फटी लाश सी आजादी मिल गई भारत वासियों को..... राष्ट्र की देह के कटे हुए हिस्से मुँह चिढ़ा रहे थे। इतना ही नहीं वह जातीयता, धर्म, क्षेत्रीयता और भाषाई विवाद जैसे मुद्दों को, जिस पर उस दौर के रचनाकारों ने अपनी कलम चलाई; को भी अपनी इस कृति में आलोचनात्मक दृष्टि से पिरोती हैं। देश में फैली अशिक्षा, बढ़ती बेरोजगारी और अराजकता जैसी राष्ट्रीय समस्याओं को भी समाज सापेक्ष प्रस्तुत करने का इन्होंने यहाँ सार्थक प्रयास किया है। इसमें न केवल छः दशकों के काव्य की अंतर्यात्रा है बल्कि इनका स्वयं का जिया हुआ यथार्थ है, जिसे आत्मसात कर इन्होंने अपनी इस कृति में पिरोया है।

        तीन अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक में डॉ. सुधा गुप्ता ने लगभग 900 से अधिक काव्य संग्रहों का वाचन कर पुस्तक में संदर्भित किया है। साथ ही इस दौर की कविताओं और उनके रचनाकारों का भी आलोचनात्मक मूल्यांकन बड़ी सहजता से किया है। कृति का पहला अध्याय 'विषय प्रवेश' है जिसका शीर्षक 'स्वातन्त्रयोत्तर हिंदी कविता : सामान्य परिचय' जरूर दिया गया है, किंतु स्वतंत्रता के बाद हिंदी कविता के 50 वर्षों की कविता को अपने आलोचनात्मक दृष्टि से विश्लेषित करते हुए विभिन्न कालखण्डों में समाज और राजनीति के साथ बदलते कविता के स्वर को उनकी प्रवृत्तियों के साथ उकेरती हैं। कविता के संदर्भ में इनका मत है कि जिस प्रकार जल धारा की यात्रा होती है ठीक उसी प्रकार कविता की यात्रा भी है।  इन्होंने न केवल कविता को परिभाषित किया बल्कि इस कालखण्ड की काव्य अंतर्यात्रा और उनके रचनाकारों एवं संपादित प्रकाशकों  से भी हमें रूबरू कराती है। विदित है कि इस कालखण्ड में (1951-2000) विभिन्न काव्य आंदोलन हुए जिसे साहित्येतिहासकारों ने 'युग और वाद' में विभक्त किया है। किन्तु डॉ. सुधा गुप्ता अपनी इस कृति में इन कालखण्डों के काव्य आंदोलन को नए शीर्षकों से अभिहित करती हैं। जहॉं वह छायावाद से लेकर प्रगतिवाद तक के काव्य आंदोलन को 'नई कविता के कदमों की आहट' के रूप में देखतीं हैं वही सातवें दशक की कविता को कविता के पाँव में चुभा काँटा और आठवें नवे दशक की कविता को 'कविता की वापसी' के रूप में। छायावाद, प्रगतिवाद और नई कविता के प्रवर्तकों और उनके प्रेरणा स्रोतों पर भी अपनी पैनी दृष्टि डालते हुए लेखिका ने विभिन्न दर्शनों से प्रभावित रचनाकारों का भी सहज मूल्यांकन अपनी इस कृति में किया है।

        कृति के दूसरे अध्याय (प्रयोगवादी धारा) की शुरुआत डॉ. धर्मवीर सिंह की परिभाषा से करते हुए स्वयं प्रयोगवाद को मोहभंग के रूप में उद्भाषित कर इसे सामाजिकता के अभाव की कविता कहकर गहनता से देखती हैं। साथ ही प्रयोग की विरासत के रूप में इन्होंने निराला की कविता और उनकी सामाजिक चेतना को ही उदाहरण के साथ प्रस्तुत करते हुए प्रयोग की विरासत सिद्ध करती हैं। इस अध्याय में लेखिका ने प्रयोगवाद, नकेनवाद, नई कविता तथा नवगीत आदि की विस्तृत चर्चा करते हुए इस दौर के काव्यान्दोलन और अन्य विधाओं (जैसे गजल, दोहे, शायरी, हाइकु, प्रलम्ब आदि) का भी गहनतम अध्ययन कर विद विश्लेषण प्रस्तुत करतीं हैं। गजल, दोहे और शायरी के अतिरिक्त जिन विधाओं का लेखिका ने सूक्ष्मता से विश्लेषण किया है वह है 'हाइकु' और 'प्रलम्ब कविता' हाइकु के अंतर्गत 'हाइकु का मूल, हाइकु का स्वरूप एवं विकास, हाइकु का काव्यशिल्प तथा हिंदी में हाइकु कविता' शीर्षक से सूक्ष्म विश्लेषण किया। इसे अधिक जानने और समझने के लिए पाठक को मूल कृति से रूबरू होना पड़ेगा।

        हाइकु की भाँति 'प्रलम्ब कविता' के इतिहास और स्वरूप पर भी इसी अध्याय में प्रकाश डालती हैं  और 'पंत' की 'परिवर्तन' कविता को प्रथम 'प्रलम्ब कविता' मानते हुए बताती हैं कि 'प्रलम्ब कविता का इतिहास भी कम से कम 80 वर्ष पुराना है। इसके अंतर्गत आने वाली कविताओं की एक लंबी सूची रचनाकारों और इनके प्रकाशन वर्ष के साथ पुस्तक में शामिल है जो पाठक वर्ग के लिए नवीन और उपयोगी है

        कृति का अंतिम और तीसरा अध्याय 'हिंदी कविता (1950–2000 ई. )शीर्षक है। इस अध्याय के अंतर्गत लेखिका ने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के पाँच दशकों की हिंदी कविता के वैचारिक धरातल और इसके शिल्पगत सौंदर्य को सोदाहरण प्रस्तुत किया है। इस अध्याय का आरंभ वैचारिक धरातल उपशीर्षक से करते हुए 'मुक्तिबोध' के वाक्य 'हम व्यक्तिवाद के दण्डकारण्य से बाहर निकल पड़े हैं....... हम स्वागत भाषण और एकालाप से हटकर वार्तालाप की ओर जाएँ, निःसंगता से हटकर संघर्ष में योग दें।' से करते हुए हिंदी कविता पर अस्तित्ववाद, यथार्थवाद, प्रतिकवाद और धनवाद के प्रभाव को भी बारीकी से पकड़ते हुए मूल्यांकित करती हैं। इस अध्याय में इन्होंने हिंदी कविता का शब्द-सम्पदा, नवीन विश्लेषण, प्रतीक योजना और नाद-सौंदर्य की दृष्टि से भी विशेष मूल्यांकन किया है।

          पुस्तक पढ़ने में लगभग एक सप्ताह के श्रमसाध्य के बाद निष्कर्षतः मैं कह सकता हूँ कि पाँच दशकों से भी अधिक कालखण्ड की हिंदी कविता का समग्रता और सहजता से मूल्यांकन, विश्लेषण और विवेचन करना बहुत ही श्रमसाध्य और कठिन कार्य है जिसे डॉ. सुधा गुप्ता ने किया है। पाठकों के समक्ष प्रस्तुत पुस्तक अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण शोध ग्रंथ है और शोधार्थियों के लिए के लिए महत्वपूर्ण सहायक शोध सामग्री। इस पुस्तक को पढ़ने की प्रेरणा मुझे मेरे गुरु प्रोफेसर हसमुख परमार से मिली जिन्होंने मुझे न केवल पुस्तक ही उपलब्ध कराई अपितु सुधा जी के संपूर्ण कृतित्व और व्यक्तित्व से भी रूबरू कराया। अयन प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित यह पुस्तक 'बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध और हिंदी कविता' हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।

 

कुलदीप ‘आशकिरण’

शोधछात्र हिंदी विभाग,

सरदार पटेल विश्वविद्यालय

वल्लभविद्यानगर

 

 

 

कृति से गुजरते हुए....


हाइगा आनन्दिका

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

जीवनानुभूतियों की सुंदर, सरस ,लयात्मक अभिव्यक्ति सर्वदा आनंद की स्रोतस्विनी रही है। इस दृष्टि से डॉ. सुधा गुप्ता का रचना-संसार बहुत समृद्ध तथा हिंदी साहित्य की अनुपम निधि है। कहना न होगा कि विविध विधाओं में सुधा जी की पुस्तकों ने हिंदी साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया। जिन्हें सुधी पाठकों एवं आलोचकों ने समीचीन अभियुक्तियों से अलंकृत किया। हाइकु, ताँका, चोका, सेदोका, हाइबन प्राय: सभी ने साहित्य जगत को अपनी ओर आकर्षित किया तथा पर्याप्त चर्चा का विषय बने। परंतु आज इनसे इतर एक अन्य विधा हाइगापर रचित डॉक्टर सुधा जी की पुस्तक हाइगा आनन्दिका  से सुधी पाठक वर्ग का परिचय करवाना मेरा मंतव्य है।

वस्तुत: जब हाइकु को उसमें व्यंजित भाव से सम्बद्ध चित्र पर अंकित किया जाता है तब वह रचना हाइगाकहलाती है। डॉ. सुधा गुप्ता जी ने पुस्तक की भूमिका में "हाइगा से मेरा परिचय : अनुराग और अंतरंगता" शीर्षक के अंतर्गत हाइगा की रचना प्रक्रिया ,उद्भव और विकास पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार जापान में काली स्याही की चित्रांकन कला को सुमिएकहते हैं। सुमिअर्थात काली तथा मतलब चित्र। डॉ. सुधा जी के शब्दों में इन चित्रों के साथ हाइकु का संयोग सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में निखरा जो हाइगाकहलाया। हाइकु में कुका अर्थ है कविता और हाइगा में गाका अर्थ है चित्र। इस प्रकार हाइकु कविता को चित्र के साथ व्यंजित करना हाइगाहुआ। पुस्तक में चित्र, सुलेख में अंकित हाइकु को हाइगा के रूप में परिभाषित करते हुए सुधा जी का पहला ही हाइगा है - संगम त्रयी .. पृ.13

इसी संदर्भ में सुधा जी ने बाशो एवम्  उनके शिष्य के उद्धरण से यह भी स्पष्ट किया कि जिस प्रकार बाशो अपने सीधे- सरल रेखांकन पर तत्सम्बद्ध हाइकु अपने ही सुलेख में अंकित कर हाइगा बना लेते थे , वैसे ही उनके हाइकु पर बाशो के शिष्य भी काली स्याही और तूलिका से चित्र बना देते थे । इस प्रकार हाइकुकार की अपनी हस्तलिपि में अन्य कलाकार के द्वारा बनाए चित्र पर हाइकु लेखन भी मिलकर हाइगाके रूप में स्वीकृत हुआ। प्रिंटेड चित्र पर अंकित हाइकु को हाइगाके रूप नें सुधा जी की स्वीकृति नहीं मिली। यद्यपि वर्तमान समय में यह प्रचुर मात्रा में दिखायी देते हैं।

डॉ. सुधा गुप्ता जी ने पुस्तक की भूमिका में ही अपनी इस इच्छा का भी उल्लेख किया कि वह हाइगाका ऐसा संग्रह प्रकाशित करें जिसमें मुख्य रूप से बालकों की रुचि के कुछ हाइकु एवं तत्संबंधी चित्र हों। यह संग्रह बालकों में वितरित किया जाए और उन्हें हाइगा के रूप से परिचित कराया जाए । यही कारण है कि हाइगा आनन्दिकाके हाइगा सुधा जी ने मुख्यतः बच्चों की रुचि के अनुरूप सृजित किए। प्रकृति के मोहक स्वरूप पर , जो कि बच्चों को आकर्षित करें,ऐसे हाइकु चुने । उन पर श्रीमती निरुपमा , डायरेक्टर ,निरुपमा प्रकाशन , मेरठ ने बहुत ही सुरुचि पूर्वक चित्र बनाए । पुन: सुधा जी ने उन चित्रों पर अपने सुलेख में हाइकु लिखकर हाइगा बनाए।

यही कारण है कि पुस्तक में पशु-पक्षी, फूल-पत्तियों से सजे रोचक , मोहक हाइगा सर्वाधिक दृष्टिगोचर होते हैं । भालू है , गिलहरी है,गौरैया, मैना , तोता , बढ़ई ,तितली, बतख, कबूतर ,किंगफिशर,मोर , बाबुना से सजा संसार बहुत प्यारा है । जिनमें बच्चों का ही नहीं बड़ों का भी मन अटक-अटक रह जाता है । चटखारे लेकर बेर खाते भालू को देखिए- पृ.56

मेघों से आच्छादित आकाश तले नाचते मोर गीत गाती बाबुना सभी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं - पृ.57

प्रात:काल में जब भी किसी प्राथमिक विद्यालय के निकट से गुजरो तो नन्हें बच्चों की सहज उछल-कूद और शोर उन्हें देखने के लिए विवश कर देते हैं । अद्भुत व्यंजना है ! दृश्य उकेरने में सिद्ध सुधा जी की लेखनी भोर की कक्षा का कैसा सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करती है देखिए – पृ.30

क्यारियों में सिर उठाए खड़े पौधों पर खिले फूल उन्हें प्रकृति माँ से सुबह की चाय माँगते बच्चों जैसे प्रतीत होते हैं- पृ.85

इसी प्रकार वृद्धावस्था और बाल्यावस्था को एक साथ उपस्थित करता हाइगा भी अद्भुत है – पृ.76

कान्हा में अनुरक्त मन , मयूर पंख , तुलसी-माल, बांसुरी की धुन मन में सुनते-गुनते, आराधना करते  हाइगा भी पुस्तक में सजे हैं ।पृ.14

संतोष ही परम धर्म है और अनमोल धन भी का उद्घोष करता सुधा जी का सुप्रसिद्ध हाइकु चिड़िया रानीभी पुस्तक की आभा को द्विगुणित करता विराजमान है, अपना सन्देश संवाहित करने में समर्थ है – पृ.31

किं अधिकं , प्रकृति में रमी प्रकृति वाली सुधा जी की लेखनी कहीं भी भ्रमण करे अंततोगत्वा प्रकृति पर लौट आती है। हाइगा आनन्दिकामें भी प्रकृति के इतने सुन्दर दृश्य साकार किए हैं कि कुछ कहते न बने। घर के आँगन में महकते तुलसी-चौरे से , ट्यूलिप , धरा का शृंगार करता वसंत , फूलों की पाग बाँधे वरजैसा पर्वत-शिखर।  आड़ू -अनार से लदे वृक्ष और इन्द्रधनुषी पंखों वाली तितलियाँ बड़ी सुन्दरता से पुस्तक में विद्यमान हैं। नटखट गंगा फेन उड़ाती रस की झारी-सी प्रतीत होती है तो कहीं एकाकिनी तापसी जैसी - पृ. 35

कस्तूरी मृग, हिरणी, घटाएँ ,चाँद से सजा आकाश क्या कहिए छोटी सी पुस्तक में सुधा जी का रचना-संसार इतना विस्तृत है कि उसे शब्दों मे कह पाना सहज नहीं । उसे तो पुस्तक पढ़कर ही जाना जा सकता है ।

अस्तु, श्रीमती निरुपमा जी का सरल, सधा, मोहक रेखांकन और उस पर डॉ. सुधा जी के सुन्दर हस्तलेख में भावप्रवण हाइकु का संयोग अनुपमेय है।

 

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

वापी, गुजरात

कृति से गुजरते हुए....

एक पाती : सूरज के नाम

 डॉ. पूर्वा शर्मा

अनगिनत रेशमी-सूती, कोमल-खुरदुरे, खुशरंग-बदरंग, सुन्दर-असुन्दर टुकड़ों को जोड़-तोड़ कर तैयार की गई यह कथरी!” (एक पाती : सूरज के नाम, डॉ. सुधा गुप्ता, पृ. 5)

हिन्दी आत्मकथा की परंपरा को विकसित करने में पुरुष लेखकों के साथ-साथ महिला लेखिकाओं का योगदान भी काफ़ी महत्त्वपूर्ण रहा है । विशेषतः इक्कीसवीं सदी में स्त्री आत्मकथाओं की संख्या में बहुत बढ़ोतरी देखी जा सकती है।

इक्कीसवीं सदी की हिन्दी महिला आत्मकथाकारों की पंक्ति में एक बहुत महत्त्वपूर्ण नाम शामिल है – डॉ. सुधा गुप्ता, इनकी आत्मकथा है – ‘एक पाती : सूरज के नाम’ । वैसे मूलतः कवयित्री के रूप में प्रसिद्ध सुधा जी ने अपनी कविताओं, जापानी काव्य शैली - हाइकु, ताँका, चोका, सेदोका आदि के सृजन से काव्य लेखन में तो अपना जादू बिखेरा ही है, साथ ही साहित्य की अन्य विधाओं एवं समीक्षा के क्षेत्र में भी इनके लेखन कौशल को हम देख सकते हैं । अपनी इस दीर्धाकार आत्मकथा में सुधा जी ने अपनी आप बीती को बहुत ही विस्तार के साथ अपने एक अलग अंदाज़ में प्रस्तुत किया है ।

प्रस्तुत आत्मकथा ‘एक पाती : सूरज के नाम’ में निरूपित कथ्य कुल पाँच प्रकरणों में विभक्त  है । 579 पृष्ठीय इस आत्मकथा में ‘मैं निरगुनिया’ शीर्षक से भूमिका तथा प्रथम स्तवक : आँका-बाँका : रंगहीन खाका, द्वितीय स्तवक : एक था अंधा कुआँ, तृतीय स्तवक : कोइला भई न राख, चतुर्थ स्तवक : जलते रेगिस्तान का सफ़र : नंगे पाँव, पंचम स्तवक : खण्ड 1 – बीहड़ बियाबान में टिमकते जुगनू, खण्ड 2 – पतझर की पीर, खण्ड 3 – एक पाती : सूरज के नाम एवं अंत में कवि–हाइकुकार–परिचय प्रस्तुत किया गया है । इन शीर्षकों के अंतर्गत और भी  कई उप शीर्षक दिये गये हैं । 

प्रस्तुत आत्मकथा में सहज-स्वाभाविक विषय-वस्तु का लेखिका ने सहजता और स्वभाविकता के साथ थोड़े कलात्मक अंदाज़ में वर्णन किया है । लेखिका के जीवन की एक तरह से यह एक महागाथा ही है । इस महागाथा में लेखिका ने अपने जन्म, बचपन, युवावस्था से लेकर अपने  वृद्धत्व तक के सफ़र को चित्रित किया है । अपने जन्म के प्रसंग को लेकर लेखिका ने बताया कि किस तरह से नवागत (लेखिका) ने गंगाजल सुड़क लिया था – उस दिन से धरती पर गिरते ही जो पानी माँगा, तो ज़िन्दगी भर बस पानी ही माँगती रही ......”(पृ. 14)

पढ़ते-लिखते कविता करते आर्य समाजी पिता के घर में कैसे बाईस वर्ष निकल गए पता नहीं चला और ‘स्वयंसेवक दल’ में काम करने वाली आज़ाद पंछी आत्मा वाली, झोली भरकर पुरस्कार बटोरने वाली बिटिया का संबंध हापुड़ के एक घोर परंपरावादी व्यवसायिक परिवार से हो गया । लेखिका के मन में उभरा चित्र देखिए – “एक पिंजरा, पिंजरे की तीलियों से स्वयं को टकराता-घायल करता आज़ादी का दीवाना पंछी, कभी तो तीलियाँ टूट जायेंगी....कभी तो आज़ादी मिल ही जाएगी ।”(पृ. 22)

लेखिका को विवाह के आरंभ में ही ज्ञात हो गया था कि उनके पतिदेव उन्हें पसंद नहीं करते । “हमारा दाम्पत्य जीवन बेहद जद्दोजहद, तनाव, मन-मुटाव से भरा, असहज रूप में ही बीता – एकमात्र कारण था हमारे अपने –अपने सिद्धांतों का दो विपरीत ध्रुवों में स्थित होना । समन्वय और सामंजस्य की कोई गुंजाइश ही नहीं थी ।”(पृ. 43)

आर्थिक हालात अच्छे न होने के कारण लेखिका ने अलग-अलग स्थानों पर नौकरी की और पति के नौकरी छोड़ने के पश्चात् पूरे घर की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर उठाई । पति की ज़िद के कारण बीच में नौकरी छोड़नी भी पड़ी और नतीज़ा...... – “मैंने अपने ‘पुल जला दिये’... विकल्प गँवा दिये...बेकारी और दरिद्रता को गले लगा लिया... आगे खड़े थे पहाड़ से दुर्गम, लम्बे और वीरान दिन, अभाव और दारिद्रय से भरे उदास दिन, दूसरों की दया पर जीने के दिन, आत्म-सम्मान को स्वयं अपने पैरों तले रौंद कर, क्षत-विक्षत कर, कुचल फेंकने के दिन।”(पृ. 213-214) लेखिका ने इस बात का भी कई बार उल्लेख किया है कि उन दिनों लक्ष्मी जी उनसे रूठी रही ।

जीवन की कुछ अविस्मरणीय घटनाओं जैसे कॉलेज के कुछ प्रसंग, बाबा नागार्जुन एवं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के कुछ किस्से तथा माँ-पिताजी के अंतिम दिनों के कुछ पलों को प्रस्तुत किया गया । अपने सृजन एवं इसके प्रकाशन को लेकर भी कुछ घटनाओं का उल्लेख आत्मकथा में    है । अपनी नापसंदगी को भी लेखिका ने जाहिर किया है -  “....चिड़ियाघर को देखकर मैं इतनी दुःखी हो गई कि निश्चय कर बैठी – भविष्य में कभी कोई चिड़ियाघर नहीं देखूँगी ।”(पृ. 50) इस तरह से कुछ रचनाओं के सृजन के पीछे की घटनाएँ या संवेदनाएँ भी दी गई   है ।

लेखिका ने अपने अनुभव एवं स्वाध्याय से कुछ निष्कर्ष भी प्रस्तुत किए – “जब जीवन की राह पर लौटने का समय आ चुका हो तो जल्दी से जल्दी ‘गंतव्य’ आ पहुँचने की ख़ुशी में अपना माल-असबाब सहेज-समेट कर, ‘चौकन्ने’ होकर बैठ जाना ही ‘समझदार, ‘होशियार’ मुसाफ़िर की पहचान है ।”

स्त्री आत्मकथाओं में स्त्री अस्मिता की प्रस्तुति को बखूबी देखा जा सकता है । एक स्त्री अपनी पहचान या किसी भी क्षेत्र में अपने आप को स्थापित करने वाले विविध कारण एवं आधार भी इन आत्मकथाओं में स्पष्टतः नज़र आते हैं । सुधा जी ने आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने परिवार के पालन पोषण का कार्य किस तरह किया ?, अपनी पीठ पर अत्यधिक जिम्मेदारियों का बोझ उठाते हुए अपना जीवन को कैसे बिताया इसकी प्रस्तुति आत्मकथा में प्रस्तुत है । अकेले कैसे बंद रास्तों वह बाहर आई है और अस्तित्व को बचाया, जीवन की सफलता-असफलता को दर्शाते हुए एक स्त्री के अस्तित्व एवं महत्त्व को व्यक्त करना आत्मकथा का मुख्य उद्देश्य ही कहा जा सकता है । “अनेकों बार ज़िन्दगी ऐसे मुकाम पर आ खड़ी हुई; जहाँ सर्वनाश के सिवा सारे रास्ते बन्द होते थे, फिर भी न डरी, न रोई, घबराई । बन्द रास्तों से अकेले, एकदम अकेले नये रास्ते निकाले । सर्वनाश को परे धकेल दिया । जिजीविषा ही एकमात्र सहचरी रही । जीवन का स्वाद नहीं खोया, कविता से प्यार करना नहीं छोड़ा ।” (पृ. 24)

पुरुष प्रधान समाज में हम देखते हैं कि स्त्री का शोषण तो एक आम बात बन गई है । यहाँ अपने परिवार में ही नहीं बल्कि परिवार के बाहर के व्यक्ति का व्यवहार भी स्त्री के साथ किस तरह का होता है इसे यह उदाहरण बराबर बताता है – “जाओ-जाओ मास्टरनी जी, वहाँ दिल्ली गेट के कॉलेज में पढ़ाओं हो तुम, जानूँ हूँ मैं । बड़ी मास्टरनी हो, अपनी लड़कियों को डराना । मुझे कानून मत पढ़ाओं ।”(पृ.44)

अब जब सदियों से हमारे समाज में स्त्रियों पर पुरुषों का विशेष अधिकार रहा है तो पति द्वारा पत्नी को दी जाने वाली शारीरिक-मानसिक यातना, उत्पीड़न आदि को तो बहुत सहज रूप से समाज के हर वर्ग में देखा जा सकता है । “.....बड़ी ज़ोर का भरपूर तमाचा मेरे मुँह पर पड़ा...कि मेरी इतनी हिम्मत कैसे हुई कि उनकी हुक्म-उदूली कर सकूँ!” (पृ. 43)

अपने बाह्य जगत यानी सामाजिक जीवन से संबद्ध अनेकों प्रसंगों एवं वर्णन के साथ ही अपने   अंतर्जगत को भी सुधा जी ने अपनी इस गाथा में बखूबी व्यक्त किया है । अपनी निजता, आकांक्षाएँ, सपने, दर्द, हृदयगत प्रसन्नता, अपने कार्य से होने वाले आत्म संतोष , मानसिक स्थिति-दशा आदि की भी अभिव्यक्ति हुई है । एक स्त्री को अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं, सपने आदि को चूर होता देखना और अपनी हृदयगत भावना को किसी से कह भी न पाने की पीड़ा भी आत्मकथा में दिखाई देती है –  “एक मासूम जिन्दगी का गला घोट कर हत्या कर दी गई। ताबूत में दफ़ना दिया गया। विश्व भर के खुफ़िया / जासूसी विभाग / खोजी पत्रकारिता कभी उस हत्या का सुराग नहीं पा सके ।” (पृ.147)

कोई भी आत्मकथा एक वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व करती है । प्रस्तुत आत्मकथा व्यक्ति विशेष की कहानी है लेकिन यह पूरे स्त्री वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है । लेखक अपनी कथा को स्व से सार्वजनिक बनाता है । आत्मकथा में लेखक के निजी जीवन के साथ-साथ एक व्यापकता भी होती है । अपने समय, समाज, स्थिति, परिवेश आदि का बखूबी चित्रण दिखाई देता है । किसी व्यक्ति विशेष के बहाने वर्ग, समाज एवं परिवेश आदि को चित्रित करना एक सफल सार्थक आत्मकथा के गुण हैं, जो सुधा जी की आत्मकथा में मौजूद हैं ।

मेरठ में जातीय दंगे, समाज में अशांति, विश्व युद्ध आदि प्रसंगों का चित्रण भी आत्मकथा में हुआ है। लेखिका ने अपने बदलते समाज के कुछ कड़वे अनुभव प्रस्तुत किए हैं । दहेज उत्पीड़न /वधू-उत्पीड़न के खिलाफ़ हुए कुछ आन्दोलनों से बदलते हुए समाज की कुछ बदलती तस्वीर सामने आई जिसमें लाचार बहुएँ कम दिखाई दी एवं मजबूर सास-ससुर अधिक । इस प्रकार हमारे समाज की स्थिति एवं परिवेश को आत्मकथा में देखा जा सकता है । 

जंग तो जारी रहेगी’ – शीर्षक के अंतर्गत लेखिका ने स्त्री अस्मिता के साथ नारी उत्पीड़न, बाल-मज़दूरी, कन्या भ्रूण हत्या, नदियों के प्रदूषण के प्रति जागरूकता, आतंकवाद के खिलाफ़ जंग, विशिष्ट वर्ग के सिर पर ‘मैला’ ढोने की विवशता, वृद्ध विमर्श, आधुनिकता /फैशन के नाम पर लड़कियों का भटकना विवाह के नाम पर अपव्यय एवं भोजन की बर्बादी आदि के साथ अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति प्रेम को प्रस्तुत किया है ।

सुधा जी मूलतः कवयित्री है, अतः इनकी आत्मकथा में यानी गद्य में किए गए वर्णन में कविता का स्वभाव ज्यादा मात्रा में दिखाई देता है । अपनी अलंकृत भाषा-शैली के साथ-साथ आत्मकथा में काव्य पंक्तियाँ का होना आत्मकथा को सहज बनाता है । यहाँ तक कि आत्मकथा के शीर्षक में भी कवितापन दिखाई देता है । स्त्री आत्मकथाओं में लेखिकाओं ने अपनी तीखी भाषा को लड़ाई का औज़ार बनाया है, किन्तु सुधा जी ने अपनी चुप्पी, चीख, रोना-हँसना आदि मनोभावों को काव्य के रूप में प्रस्तुत कर अपनी व्यथा बयाँ की है, यथा – 

साँझ घिरी/ झरते पत्तों की वे आवाज़ मौत /

टिटहरी की कर्कश चीख़ / झींगुर की सिसकी / जंगल रो रहा है .......”(पृ.499)

इसके अलावा भी आत्मकथा में अज्ञेय, धूमिल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, टैगौर आदि की कुछ पद्य एवं गद्य पंक्तियाँ, रहीम-कबीर आदि की कुछ पद्य पंक्तियाँ, कुछ शेर-मिसरा के साथ अरविन्द साहित्य एवं अंग्रेजी की कुछ प्रचलित पंक्तियाँ भी देखी जा सकती है ।

होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिये

इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिये ।” (पृ. 216)

आत्मकथा में जगह-जगह पर अलग-अलग विषयों को लेकर लेखिका ने अपने बहुत ही  महत्त्वपूर्ण विचार प्रकट किये हैं । अनेकों जगह पर इनके जीवन-दर्शन के दर्शन भी होते हैं । इसलिए यह कहना बिलकुल उचित होगा कि आत्मकथा में सुधा जी का एक चिन्तक एवं दार्शनिक रूप भी दिखाई देता है । इसके बहुत से उदाहरण आत्मकथा में मिल जाएँगे परन्तु यहाँ समय व आलेख की पृष्ठ-सीमा को देखते हुए इन उदाहरणों को नहीं दे रहे ।

आत्मकथा के पाठक दो तरह के होते हैं – पहला वह है जो आत्मकथाकार के वास्तविक जीवन से परिचित है, परन्तु दूसरा पाठक वर्ग ऐसा है जो आत्मकथाकार की रचना के माध्यम से ही इनके जीवन से परिचित होता है । यह दूसरा वर्ग पहले पाठक वर्ग से कहीं बड़ा होता है । इस तरह के पाठकों के सामने आत्मकथाकार स्वयं को शब्दों के रूप में ही प्रस्तुत करता है । इसलिए जरूरी है कि लेखक ईमानदारी एवं तटस्थता के साथ अपने बारे में, अपने समय, समाज वर्ग के बारे में अपनी वास्तविक जीवन कहानी को निरूपित करें, गढ़े नहीं । लेखिका अपनी आत्मकथा के बारे स्वयं कहती है – न कोई रहस्य, न कोई रोमांच, न कोई नसीहत, न तर्क-वितर्क, न आदेश-उपदेश, न अध्यात्म या विज्ञान की कोई खोज, न कोई ‘चरम’ न कोई ‘चमत्कार’ । राजनीति के दांव-पेच और ‘रोमांस’ जैसी छपने-बिकने लायक चीज़े तो दूर-दूर तक नहीं ......बिलकुल ही नहीं....”(पृ. 9)

प्रमाणिकता, ईमानदारी, साहस जैसे गुण यदि लेखक में नहीं है तो एक सार्थक, सटीक एवं उत्कृष्ट आत्मवृत्त संभव नही है । सत्य कहने के लिए साहस चाहिए, अपनी दुर्बलताएँ-दोष, अपने कुछ डर आदि बताने के लिए भी हिम्मत की आवश्यकता पड़ती है । सुधा जी ने अपने आत्मकथा लेखन में इसका बराबर ध्यान रखा है । आत्मकथा लेखन बड़े साहस का कार्य है । वैसे भी अतीत में झेली गई यातनाओं/पीड़ाओं का सिलसिला संत्रास बनकर पीछा नहीं छोड़ता और जब वक्त उन ज़ख़्मों पर मरहम लगाने लगता है तब उसी दर्द को पुनः शब्दरूप में काग़ज़ पर उतारना....... फिर से उसी दुःखी गली से गुज़रने जैसा है ।

अपनी जीवन-कथा के इस कालांश की दुःखदायी घुटन भरी त्रासदी को काग़ज़ पर उतारते हुए सौ-सौ बार मरी हूँ,...........अतीत की उन गुफ़ाओं में पहुँचते ही मेरा दम घुटना शुरू हो जाता...साँस रुकने लगती... फिर लिखने की ताकत कहाँ बचती ?” (पृ. 395)

इतना ही नहीं लेखिका ने कुछ स्थानों पर संकेतों अथवा काव्य पंक्तियों के सहारे अपनी बात कही है, लेकिन अपशिष्ट भाषा का प्रयोग नहीं किया । ‘मेरा काला अतीत’ उप शीर्षक से लेखिका ने अपने वैवाहिक जीवन की बुनियाद टेढ़ी पड़ने या जान बूझकर किसी ओर के द्वारा इसे डालने के बारे में ज्यादा खुलकर नहीं बताया है । लेखिका की भाषा बहुत संतुलित एवं संयमित रही – “यदि यहाँ मेरा संबंध स्थिर हो जाता तो भविष्य में मेरे साथ उनका आना-जाना तथा प्रेम-संबंध बना रह सकता था ।” (पृ. 142)

आत्मकथा कोई विवरण अथवा रिपोर्ट नहीं, यह तो एक कला रूप है । पाठक वर्ग में इसकी लोकप्रियता के लिए आवश्यक है कि इस साहित्यिक विधा में कलात्मक-पुट अवश्य हो । सृजनात्मकता एवं कलात्मकता के बिना तो आत्मकथा मात्र दैनंदिनी ही लगेगी । प्रायः यह देखा गया है कि लोकप्रिय आत्मकथा में यह गुण ज्यादा प्रमाण में प्राप्त होता है । सुधा जी की आत्मकथा में भी यह गुण विद्यमान है । यदि प्रस्तुत विशालाकार आत्मकथा की संरचना को देखा जाए तो मौटे तौर पर पाँच स्तवक में विभिन्न शीर्षकों से विभाजित इस आत्मकथा के उप-शीर्षक भी  बहुत आकर्षक हैं । प्रायः स्त्री आत्मकथाओं में पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती देते हुए लेखिकाओं ने आग उगलने वाली भाषा का प्रयोग किया है, लेकिन सुधा जी की भाषा बहुत सधी एवं शालीनता लिए हुए नज़र आती है ।

सब स्त्रियाँ अमृता प्रतीम जैसी ‘बोल्ड’, हिम्मतबाज़ और ‘डेयरिंग’ नहीं हो सकती कि प्रारब्ध को चकमा देकर उसके बाज़ार से मनपसंद चीज़ पर झपट्टा मारकर उठा लें....

बहुत कम प्रतिशत उन स्त्रियों का है जो मन्नू भण्डारी की तरह अपने नरक से बाहर आने की कोशिश कर, चुपचाप अपनी ज़िन्दगी को जीती चली जाती हैं.....अपनी शालीनता और शाइस्तगी को बरकरार रखते हुए .....

ज्यादातर तो औरतों का हाल यह है कि शक्ति, सामर्थ्य, बुद्धि, आर्थिक आत्मनिर्भरता के बावजूद वे एक बार अगर अंधे कुएँ में गिर पड़ीं तो बस गिर पड़ीं .....ज़िन्दगी के आखिरी लम्हे तक उस अकेले भयावह अंधेरे  में पड़े रहना ही उनकी नियति है.....

क्यों ? क्यों ??

इस ‘क्यों’ के हर जीवन में अलग-अलग हज़ार कारण हो सकते हैं, होते हैं ।” (पृ. 85)

यहाँ तीसरी श्रेणी में (ज्यदातर तो औरतों ...) शायद लेखिका स्वयं की बात कर रही है ।

सुधा जी ने आत्मकथा में कहीं पर वर्णनात्मक शैली, तो कहीं विश्लेषणात्मक शैली के साथ विवरणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है । कहीं उत्तम पुरुष एवं कहीं अन्य पुरुष का प्रयोग, कहीं पर गहन अर्थ लिए सरल शब्द, तो कहीं पर सांकेतिकता, व्यंजना एवं वक्रोक्ति के प्रयोग से आत्मकथा के शिल्प सौन्दर्य में वृद्धि हुई है ।

देशज आंचलिक शब्दों, मुहावरे, लोकोक्ति एवं प्रचलित लोकगीतों के प्रयोग से आत्मकथा में एक सहज भाषा प्रवाह बना रहा है । कुछ मुहावरे, लोकोक्ति आदि देखिए -  चोर चोरी से जाये हेरा फेरी से न जाये, मेरे मन कुछ और है विधना के मन और, हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और, बिंध गया सो मोती रह गया सो पत्थर, शक्ति से परे कर्त्तव्य नहीं, आलादीन का चिराग़, साढ़े-साती, पकी फसलों पर ओलों की वर्षा, जब खुले तुरुप के पत्ते, मारे भ इऔर रोवन भी ना देय, बीती ताहि बिसारी दे आगे की सुधि ले, हारे को हरिनाम, जब उड़ गए हाथों के तोते आदि ।

कुछ उप-शीर्षकों में कलात्मकता एवं अर्थ की गहनता को देखिए – ‘आम के पेड़ के नीचे बैठना और पाना अद्वितीय आनंद’ – चींटियों के काटने को अद्वितीय आनंद कहना। सब्ज़ी में अतिरिक्त जीरा – सब्ज़ी में मच्छरपतंगों का गिरना । आरंभ हुआ सपनों का चकनाचूर होना : मौत बिंदिया की  पति की मृत्यु के बाद उसकी बिंदी, चूड़ी, शृंगार आदि सब कुछ नष्ट हो जाता और उसका कांतिहीन शृंगारहीन चेहरा उसके दुःख का बोध कराता है । फिर हुआ बम-विस्फ़ोट, चोर चोरी से जाये हेरा फेरी से न जाये, बीहड़ बियाबान में टिमकते जुगनू, पतझर की पीर.... इस तरह के अनेक उदाहरण आत्मकथा में देखे जा सकते हैं ।  और तो और सत्तर वर्षों के सृजन में पचास पुस्तकों के प्रकाशन के पश्चात् लेखिका ने स्वयं को ‘निरगुनिया’ कहा है  –

मैं निरगुनिया, जिसे किसी भी तरह के कार्य में कुशल होने का ‘गुन’ नहीं आया, न ज़िन्दगी जीने का और न उसे कुशलता से कागज़ पर चित्रित करने का, न लोक सधा, न परलोक!” (पृ. 11)

सुधा जी की आत्मकथा का शीर्षक – ‘एक पाती : सूरज के नाम’ में पूरी तरह कवित्व दिखाई देता है । कलात्मकता अथवा कवितापन होने के कारण इस शीर्षक का अर्थ बोध सीधे-सीधे नहीं होता वरन इसके अर्थ को खोजना पड़ता है । लेखिका ने इसी आत्मकथा में ‘एक पाती : सूरज के नाम’ उप-शीर्षक से अपनी एक कविता को अंतिम स्तवक के अंतिम खण्ड में प्रस्तुत किया है –

सूरज खिलखिलाया / आखिर तुम किससे डरती हो?/ अंधेरे से ?/ पगली

हर किसी का सूरज / उसकी अपनी मुट्ठी में बंद होता है /

जिससे वह जब चाहे / उजाला कर ले

मैं / अपने सूरज को ढूँढने / अगली यात्रा पर / निकल पड़ी ।” (पृ.547)

लेखिका अपने बाहरी - सामाजिक जीवन यात्रा के साथ-साथ अपने जीवन की अंतर्यात्रा को भी संकेतित करती हुई प्रतीत होती है । अपने सूरज को ढूँढने की बात .......वह सूरज जो स्वयं की मुट्ठी में बंद होता है – यहाँ अपनी चेतना, आत्मज्ञान, अपने स्व को पहचानना, अपने विवेक को जानना, आत्मनिरीक्षण करना, जिसके प्रकाश और प्रभाव से अज्ञान रूप अंधकार को दूर करना, अपनी दुर्बलताओं-कमजोरियों-दोषों को जानना और उसे दूर करने का प्रयास करना – इस तरह की बात स्पष्ट होती है जो लेखिका चिंतन एवं दर्शन से संबद्ध है और इस तरह की स्थिति इनकी प्रस्तुत आत्मकथा में भी ढूँढी जा सकती है । आत्मकथा का समापन करते हुए क्षत-विक्षत कर्ण (जो युद्ध भूमि में अंतिम साँसें ले रहे हैं, छल-बल से कर्ण को पराजित करने वाले कृष्ण स्वयं कर्ण से उसकी अंतिम इच्छा पूछते हैं और कर्ण कुमारी भूमि पर स्वयं के अंतिम संस्कार करने की इच्छा प्रकट करते हैं) का सन्दर्भ देते हुए लेखिका कहती है –

कृष्ण के प्रति कैसी बेजोड़ निष्ठा है! कैसा समर्पण! कैसी अनन्यता!

दुःख सबके अपने-अपने अलग हैं.... सहने की सीमा भी सबकी अपनी अपनी! उससे मुक्ति की चाहना भी एकदम अपनी! 

बस यही अंतिम इच्छा मेरी भी है और एकमात्र प्रार्थना कि ऐसी अनन्य निष्ठा मेरी भी बनी रहे ।” (पृ.567)

***

आत्मकथा : एक पाती : सूरज के नाम, लेखिका : डॉ. सुधा गुप्ता, मूल्य : 800 /-, पृष्ठ : 579, संस्करण : 2012, प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली-110030 

डॉ. पूर्वा शर्मा

वड़ोदरा

 

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...