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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

स्मृति शेष

विनोद कुमार शुक्ल

राजा दुबे

वंचितों के पक्ष में खड़े होने वालों में

अग्रगण्य थे, विनोद कुमार शुक्ल

एक दो नहीं हिन्दी काव्य जगत में वंचितों के पक्ष में खड़े रहने वाले बीसियों कवि थे, हैं और आगे भी रहेंगे मगर इन कवियों में से ऐसे कवि गिने-चुने ही हैं जो जिन्हें वंचितों के पक्ष में खड़े होने की काव्य अभिव्यक्ति के माध्यम से घोषणा करनी होती है।

वंचितों के लिये अपने मनोभाव को कविता के माध्यम से बिना लाग-लपेट, बिना व्यक्तव्य वाली भाषा शैली और बिना पक्षधारिता के ढिंढोरा पीटे,सहज-सरल तरीके से व्यक्त करने वाले गिने चुने कविता करने वाले कवियों की संख्या बेहद कम है और ऐसे ही बिल्ले कवियों में अग्रगण्य माने जाने विले कवि थे - विनोद कुमार शुक्ल। उनके अवसान से सहज और जनोन्मुखी साहित्य का एक सितारा अस्त हो गया मगर हमारे आपके मन मस्तिष्क में उसकाआलोकित अवदान हमेशा अंकित रहेगा ।

विनोद कुमार शुक्ल , हिन्दी भाषा के एक ऐसे साहित्यकार थे, जिन्हें हिन्दी साहित्य में उनके अनूठे और सादगी भरे लेखन के लिए जाना जाता है। श्री शुक्ल का जन्म 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव ज़िले में हुआ था । वे उन लेखकों में शामिल थे जिन्होंने कविता और कथा दोनों विधाओं में अपनी अलग, विशिष्ट और गहरी पहचान बनाई। । उनकी रचनाओं की भाषा सरल होते हुए भी अत्यन्त गूढ़ और मानवीय संवेदनाओं से भरपूर मानी जाती है. रोज़मर्रा की ज़िन्दगी, साधारण लोगों के अनुभव और उनके भीतर के संसार को उन्होंने अद्भुत बारीकी से अपनी रचनाओं में जगह दी । उनके प्रमुख उपन्यासों में नौकर की कमीज, दीवार में एक खिड़की रहती थी और खिलेगा तो देखेंगे शामिल हैं। वहीं कविता संग्रहों में लगभग जयहिंद, सब कुछ होना बचा रहेगा और अतिरिक्त नहीं विशेष रूप से चर्चित रहे । नौकर की कमीज पर आधारित फिल्म भी बनाई गई थी, जिसे साहित्य और सिनेमा दोनों क्षेत्रों में सराहना मिली। शुक्ल के दूसरे उपन्यास दीवार में एक खिड़की रहती थी को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। वर्ष 2023 का अन्तर्राष्ट्रीय पैन-नाबोकोव पुरस्कार से सम्मानित होने वाले भी वे पहले भारतीय साहित्यकार थे ।

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने और मध्यप्रदेश के सुप्रसिद्ध लेखक चन्द्रशेखर साकल्ये ने भी अपने श्रद्धांजलि व्यक्तव्य में उनकी एक ही प्रसिद्ध कविता – “हताशा से एक व्यक्ति ..” के माध्यम से उनके लेखन की अगाध ऊर्जस्विता को पारिभाषित करने की कोशिश की। वो कविता है

हताशा से एक व्ऊ बैठ गया था /व्यक्ति को मैं नहीं जानता था / हताशा को जानता था / इसलिये मैं उस व्यक्ति के पास गया /मैंने हाथ बढ़ाया / मेरा हाथ पकड़कर वो खड़ा हुआ /मुझे वह नहीं जानता था / मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था /हम दोनों साथ चले / दोनो एक दूसरे को नहीं जानते थे / साथ चलने को जानते थे। प्रेम जनमेजय ने अपने संदेश में कहा कि वे वंचित और हताश व्यक्ति के साथ के कवि थे । मैं उनके जाने से हताश नहीं दुखी हूँ । उनकी रचनाशीलता हर हताश को साथ होने की ऊर्जा देती रहेगी ।मैं जानता नहीं कि अभी और कितना लिख पाते ,पर उनके होने पर यह विश्वास मिलता था कि वंचित को थामने वाले हाथ जीवित हैं । साकल्ये का मानना था व्यक्तिवाचक संज्ञा को क्रियावाचक संज्ञा में बदलकर वे जीवन दर्शन का जो नया भाष्य करते थे, वो विलक्षण था।

अभी कुछ दिन पहले ही जब इस विनोद कुमार शुक्ल को उनके घर में भारत में साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान ज्ञानपीठ दिया जा रहा था, उन्होंने अपनी एक कविता पढ़ी थी- “जागता हूँ तो सबकी नींद से/ सोता हूँ तो सबकी नींद में/ मैं अकेला नहीं/ मुझमें लोगों की भीड़ इकट्ठी है/ मुझे ढूँढो मत/ मैं सब लोग हो चुका हूँ/ मैं सबके मिल जाने के बाद/ आख़िर में मिलूँगा/ या नहीं मिल पाया तो/ मेरे बदले किसी से मिल लेना। उनके इस काव्य व्यक्तव्य पर बीबीसी के आलोक पुतुल ने कितनी सटीक बात कही है कि विनोद कुमार कहते ज़रुर हैं कि मेरे बदले किसी ओर से मिल लेना लेकिन सच तो यही है कि किसी दूसरे से मिलना, दूसरे से मिलने की तरह होगा, विनोद कुमार शुक्ल से मिलने की तरह नहीं ।

श्री शुक्ल के गृहप्रदेश छत्तीसगढ़ के समाचार पत्र समूह - “आज की जलधारा” ने श्री शुक्ल की स्मृति में एक लाख रुपये के सम्मान की घोषणा की हैं। समाचार पत्र के प्रमुख श्री सुभाष मिश्रा ने उनके का अवसान को हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति निरुपित की है ।

राजा दुबे

13 - रुबी भगवान इस्टेट,

मानसरोवर हास्पीटल के पीछे

कोलार , भोपाल (मध्यप्रदेश)

पिन 462042

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स्मृति शेष

 

धर्मेन्द्र

राजा दुबे

उनका साथ छूटा मगर

संस्मरण में वे मौजूद हैं

मेरे एक अभिन्न मित्र थे सुनील मिश्र, आला दरजे के फिल्म समीक्षक । इस विधा के लिये उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था । मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग में उप संचालक पद पर कार्यरत  सुनील, धर्मेन्द्र के जबर्दस्त फैन थे । वे हर साल  धर्मेन्द्र के जन्मदिन , 08 दिसम्बर को मुम्बई उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ देने जाते थे । अपने साथ भोपाल से कुछ नमकीन और ग़ज़क लेकर जाते थे । उन्होंने कई बार मुझसे भी आग्रह किया कि मैं उनके साथ मुम्बई चलूँ मगर मैं ऐसा कोई  योग नहीं बना पाया ।

सुनील और मैं, हम दोनों धर्मेन्द्र को लेकर खूब चर्चा करते और लगभग हर चर्चा का समापन इस

एक संयुक्त घोषणा के साथ होता था कि धर्मेन्द्र को वो यश वो सम्मान बॉलीवुड में नहीं मिला जिसके वो हकदार थे । धर्मेन्द्र की फिल्म – ‘सत्यकाम’ का जब-जब टीवी पर प्रसारण होता हम हफ्ते दस दिन तक हम उसी की बात करते । धर्मेन्द्र के अभिनय,उनके अभिनय में हास्य के एक अन्तर्प्रवाह और अभिनय करते समय चेहरे पर मनोभाव को जीवंत कर देने वाले मूर्धन्य कलाकार के बेजोड़ होने परहम दोनों हमेशा एकमत रहते और हम दोनों धर्मेन्द्र के ख्यालों में डूबे रहते ।

धर्मेन्द्र के उस विलक्षण प्रशंसक , सुनील मिश्र का कोरोना की तीसरी लहर में निधन हो गया । फिल्म के लिये लेखन की विधा के लिये तो यह अपूरणीय क्षति थी ही ,मेरे लिये भी यह एक व्यक्तिगत क्षति थी । सुनील से मैं अक्सर कहा करता था कि वो धर्मेन्द्र के अवदान पर एक किताब लिखे ,मगर हमेशा सुनील यही कहता कि मैं इस बारे में जब भी पापाजी, ( सुनील उन्हें इसी नाम से पुकारता था) से बात करता वो इस विषय को टाल जाते । वर्ष में जब धर्मेन्द्र को मध्यप्रदेश सरकार के राष्ट्रीय किशोर कुमार सम्मान से सम्मानित किया गया तब धर्मेन्द्र अस्वस्थता के चलते भोपाल नहीं आ पाये थे । संस्कृति विभाग के एक अधिकारी उन्हें यह सम्मान सौंपने मुम्बई गये थे । तब धर्मेन्द्र ने सुनील  को नम आँखों और भर्राई आवाज़ में याद किया था । 

सुनील के स्तर के समकक्ष तो नहीं मगर उससे कुछ कमतर मैं भी फिल्म पर लिख लेता था ।  धर्मेन्द्र पर फिल्माये गये फिल्म- ‘आये दिन बहार के’ के एक गीत – ‘मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे , मुझे ग़म देने वाले तू खुशी को तरसे’  पर हम दोनों काफी विमर्श करते । मैं और सुनील भी उसे हिन्दी फिल्मों में किसी नायक द्वारा अपनी नायिका को बेवफाई के लिये कोसे जाने वाला अप्रतिम गीत मानते थे ।

रफी साब ने इस गीत को जो स्वर दिये थे वो स्वर नायक की नायिका के प्रति वितृष्णा भाव को इस कदर अभिव्यक्त करता था कि लगता था कि वितृष्णा की "सुनामी " आ गई हो । रफी साब के इस गीत पर धर्मेन्द्र ने जो मनोभाव अपने चेहरे से व्यक्त किये हैं वो विलक्षण थे ।

आनन्द बक्षी की इस रचना में नायिका के लिये जब उन्होंने यह लिखा कि -  "तू फूल बने पतझड़ का, तुझ पे बहार न आए कभी, मेरी ही तरह तू तड़पे, तुझको क़रार न आए कभी, जिये तू इस तरह की ज़िंदगी को तरसे.." तो लगा कि यह किसी को बद्दुआ का चरम नहीं  तो और क्या है ? इस गीत की एक-एक पंक्ति पर धर्मेन्द्र के चेहरे की भाव प्रवणता नायक के मन में उमड़ती घृणा को इस सघनता के साथ प्रस्तुत करती है कि देखने सुनने वाले चकित रह जाते हैं ।

इसी भावभूमि का एक गीत - "जब प्यार किसी से होता है " फिल्म में देवानंद पर भी फिल्माया गया था । " तेरी जुल्फों से जुदाई तो नहीं माँगी थी, कैद माँगी थी रिहाई तो नहीं माँगी थी " । इस गीत को भी रफी साब ने गाया था मगर इसमें नायिका की बेवफ़ाई को लेकर कोसने वाले भाव में वितृष्णा की  सघनता नहीं थी , बेबाकी थी । इसीसे हसरत जयपुरी ने वैसी ही शब्द रचना की थी और शंकर जयकिशन का उसीसे तारतम्य बैठाया संगीत था । धर्मेन्द्र पर फिल्माया गया गीत उस फिल्म में उनके चरित्र कोलेकर सर्वथा उपयुक्त था । इस गीत पर इतना श्रेष्ठ अभिनय सिर्फ धर्मेन्द्र ही कर सकते थे । सुनील ने इस गीत को लेकर धर्मेन्द्र से मेरी ओर से यह पूछा भी था कि आपके निजी जीवन में कभी आप किसी के प्रति इतना घृणाभाव रख ही नहीं सकते फिर इस गीत में ? तब उन्होंने कहा था कि वहाँ तो फिल्म का एक चरित्र था , में कहाँ था ? आज जब धर्मेन्द्र महाप्रयाण को प्राप्त हो गये हैं उनकी स्मृति हम सबको साल रही है ।

सादर नमन धर्मेन्द्रजी ।

राजा दुबे

13 - रुबी भगवान इस्टेट,

मानसरोवर हास्पीटल के पीछे

कोलार , भोपाल (मध्यप्रदेश)

पिन 462042

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सोमवार, 31 मार्च 2025

पुरस्कृत प्रतिभा

 

पुरस्कृत प्रतिभा :

विनोद कुमार शुक्ल को

ज्ञानपीठ पुरस्कार

राजा दुबे

सुप्रसिद्ध साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को वर्ष 2024 के लिये ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिये चुना गया है । यह सम्मान पाने वाले छत्तीसगढ़ के वे पहले लेखक हैं। अट्ठासी साल के श्री शुक्ल  अपनी सरल भाषा और संवेदनशील लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने - "नौकर की कमीज " और " दीवार में एक खिड़की रहती थी" जैसी प्रसिद्ध औपन्यासिक कृतियाँ लिखीं। चयन समिति ने उनकी अनूठी लेखन शैली और हिंदी साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया।

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किये जाने की घोषणा पर श्री शुक्ल ने कहा कि यह भारत का, साहित्य का एक बहुत बड़ा पुरस्कार है ।  इतना बड़ा पुरस्कार मिलना यह मेरे लिए खुशी की बात है ।भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य रचने वाले रचनाकारों को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया जाता है । इस पुरस्कार के तहत ग्यारह लाख रुपये की सम्मान निधि , वाग्देवी की काँस्य प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है ।

लेखक, कवि और उपन्यासकार शुक्ल  की पहली कविता वर्ष 1971 में " लगभग जयहिंद " शीर्षक से प्रकाशित हुई थी । उनके प्रमुख उपन्यासों में ," नौकर की कमीज ", " दीवार में एक खिड़की रहती थी " और " खिलेगा तो देखेंगे " शामिल हैं।शुक्ल के उपन्यास

"नौकर की कमीज " पर प्रसिद्ध फिल्मकार मणि कौल ने वर्ष 1999  में इसी नाम से एक फिल्म बनायी थी। इस फिल्म के बारे में सुप्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार का मानना है कि आपके उपन्यास " नौकर की कमीज़ "  इसलिये महान रचना नहीं है क्योंकि उस पर फ़िल्म बनी है बल्कि इसलिये महान रचना है क्योंकि आज़‌ नौकरियों में  इन्सान की गरिमा घिसती हुई एकदम् मिटने की कगार  पर है और आपने इस रचना के माध्यम  से उस गरिमा को पुनर्प्रतिष्ठित करने का बड़ा काम किया  है ।

उनके रचनाकर्म का जहाँ तक सवाल है - उनके उपन्यास -" नौकर की कमीज ,"  " खिलेगा तो देखेंगे " और " दीवार में एक खिड़की रहती थी ", हिन्दी के सबसे बेहतरीन उपन्यासों में माने जाते हैं । उनकी कहानियों के संग्रह " पेड़ पर कमरा " और " महाविद्यालय " की भी बहुत चर्चा रही ।उनकी कविताओं की किताबों में - " वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर ", " आकाश धरती को खटखटाता है " और " कविता से लम्बी कविता " जैसी कृतियाँ तो बेहद लोकप्रिय हुई हैं । आपने बच्चों के लिए भी किताबें लिखी हैं - " जिनमें हरे पत्ते के रंग की पतरंगी " और  " कहीं खो गया नाम का लड़का " जैसी किताबें शामिल हैं, जिन्हें बच्चों ने बहुत पसन्द किया है । उनकी किताबों का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है और उनका साहित्य दुनिया भर में पढ़ा जाता है ।



कविकर्म के औचित्य पर उनकी यह पंक्तियाँ भी महत्वपू्र्ण मानी जा रही हैं –

" मुझे बचाना है

एक-एक कर

अपनी प्यारी दुनिया को

बुरे लोगों की नज़र है

इसे खत्म कर देने पर "

वे आज भी लेखन में सक्रिय हैं ,उम्र के इस मुकाम पर आपका यह कहना कि - " मुझे लिखना बहुत था , बहुत कम लिख पाया । मैंने देखा बहुत, सुना भी बहुत , महसूस भी किया बहुत , लेकिन लिखने में थोड़ा ही लिखा ,कितना कुछ लिखना बाकी है ...इस बचे हुए को लिख लेता अपने बचे होने तक "

यह वाक्यांश उनकी सृजनात्मकता की इच्छा को दर्शाता है ।वे आज भी लेखन में सक्रिय हैं, खासतौर पर बच्चों के लिए लिखना उन्हें पसंद है। उनका मानना है कि "लिखना एक छोटी चीज़ नहीं है, इसे निरन्तर करते रहना चाहिए और पाठकों की प्रतिक्रिया पर भी ध्यान देना चाहिए।" विनोद कुमार शुक्ल की

यह निरन्तरता बनी रहे  इसी शुकामना के साथ, सादर अभिवादन ।

उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और अंतरराष्ट्रीय साहित्य में उनके योगदान पर वर्ष 2023 के " पेन-नोबोकोव अवॉर्ड फॉर अचीवमेंट इन इंटरनेशनल लिटरेचर " से भी सम्मानित किया गया था । उनका लेखन सरल भाषा, गहरी संवेदनशीलता और अद्वितीय शैली के लिये जाना जाता है। वह  हिन्दी साहित्य में अपने प्रयोगधर्मी लेखन के लिये प्रसिद्ध हैं। 

 

राजा दुबे

एफ - 310 राजहर्ष कालोनी ,

अकबरपुर

कोलार रोड

भोपाल 462042

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

स्मृति शेष

कार्टून बनाना सबसे

कठिन विधा है

राजा दुबे

कार्टून बनाना सबसे कठिन विधा है और बकौल वरिष्ठ कार्टूनिस्ट और एक प्रखर व्यंग्यकार राजेन्द्र घोड़पकर के कार्टून बनाना यदि रुपंकर विधा है तो इसे गढ़ने के पहले क्या बनाना है इसका मंथन साहित्य की विषय वस्तु है । गोया सोचने और उसे काग़ज़ पर उकेरने की द्विपक्षीय मेधा हो तभी कोई कार्टूनिस्ट बन सकता है । इस सबके चलते ही कार्टून बनाना एक कठिन विधा है और इसकी मारक शक्ति तो इतनी जबर्दस्त होती है कि विदेश में तो कुछ विवादास्पद कार्टूनों को लेकर प्रतिक्रियावादी ताकतों ने कार्टून बनाने वालों की हत्या के फतवे तक ज़ारी किये गये थे । इतने जोखिम के बाद भी कुछ कार्टूनिस्ट मिशन कार्टून मेकिंग से जुड़े रहे और उन्होंने व्यापक ख्याति भी पाई , उन्हीं में से एक थे -" काक " । काक बनाम हरिश्चंद्र शुक्ल, देश के उन दुर्लभ कार्टूनिस्टों में से हैं जो मूलतः हिन्दीभाषी प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रों जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका इत्यादि  जुड़े रहे और अपने तीखे कटाक्ष से कार्टून जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रहे ।

राजेन्द्र घोड़पकर

व्यंग्य की अपनी अनोखी शैली के चलते काक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय और जटिल राजनीतिक विषयों को भी बहुत ही सरलता से आम आदमी से जोड़कर अपने व्यंग्यचित्रों में प्रस्तुत करते थे। एक हिन्दी कहावत के अनुसार काक अर्थात् कौवा वह पक्षी होता है जो किसी के झूठ पर अपनी कर्कश ध्वनि से आवाज़ उठाता है । वे मानते थे कार्टून लक्ष्यभेदी विधा है और इससे हम उन तमाम विसंगतियों को सहज ही व्यक्त कर सकते हैं जिसे लेखक कई शब्दों में व्यक्त करते हैं । दैनिक हिन्दुस्तान की सम्पादक , मृणाल पांडे ने उनके बारे में कहा था कि -" चार्ली ब्राउन की ही तरह काक की अपील में भी मानव मूर्खता पर हँस सकने और शर्म महसूस करवाने की अभूतपूर्व क्षमता है " । लोकसभा अध्यक्ष रहे बलराम जाखड़ ने एक बार हरिद्वार में वर्ष 1986 में कहा था कि - " मैं महज पाँच सौ सदस्यों के साथ लोकसभा का स्पीकर (अध्यक्ष) हूँ जबकि काक लाखों  सदस्यों की लोक सभा के स्पीकर हैं" ।


उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के पूरा गाँव में 16, मार्च 1940 को जन्मे  काक ने अपने कैरियर में लगभग दो दर्जन से ज्यादा समाचारपत्र और पत्रिकाओं के फ्रीलांस कार्टूनिस्ट के रूप में कार्य किया । काक के कार्टूनिस्ट जीवन की शुरुआत 1967 में  दैनिक जागरण में छपे पहले कार्टून से हुई। दिनमान, शंकर्स वीकली, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स और जनसत्ता जैसे प्रमुख समाचारपत्रों के लिए कार्टून बना चुके काक वर्तमान में प्रभासाक्षी डॉट कॉम के लिए कार्टून बना रहे थे ।

काक कार्टूनिस्ट्स क्लब ऑफ इण्डिया के प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष भी रह चुके हैं। ज़मीनी स्तर पर लोगों की समस्याओं के बारे में उनकी शानदार समझ की वजह से काक को जनता के कार्टूनिस्ट (कार्टूनिस्ट  ऑफ  मॉसेस ) के रूप में भी जाना जाता है। आर.के.लक्ष्मण के आम आदमी के विपरीत, काक का आम आदमी एक मूक दर्शक नहीं है बल्कि एक मुखर टीकाकार है जो बोलने का कोई भी मौका चूकता नहीं है ।

काक को अपने कार्टून्स के लिये अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले । वर्ष 2003 में हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा काका हाथरसी सम्मान , वर्ष 2009 में  एर्नाकुलम (कोच्चि) में कार्टून शिविर के दौरान केरल ललित कला अकादमी द्वारा और इसी साल केरल कार्टून अकादमी द्वारा और इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ कार्टूनिस्ट्स, बैगलुरु द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया । वर्ष 2011 में कार्टून वॉच के तत्वावधान में कार्टून महोत्सव, नई दिल्ली में डॉ॰ ए पी जे अब्दुल कलाम द्वारा उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया । वर्ष 2017 में प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया द्वारा पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिये आपको राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया ।

काक की वर्ष 1988 में रुपा एण्ड कम्पनी द्वारा प्रकाशित, विनोद भारद्वाज द्वारा चयनित कार्टून्स की पुस्तक -"नज़रिया " और  वर्ष 1999 में भारतीय रक्षा बलों को समर्पित कार्टून्स का  संग्रह- " कारगिल कार्टून्स " उनके दो उल्लेखनीय कार्टून संग्रह है । काक और शेखर गुरेरा द्वारा भारतीय रेल के 150 गौरवशाली साल पूरे होने के अवसर पर बनाये गये कार्टून्स के एक संकलन - " लॉफ जजों यू ट्रेवल्स " भी बेहद चर्चित रहा ।

राजा दुबे

एफ - 310 राजहर्ष कालोनी ,

अकबरपुर

कोलार रोड

भोपाल 462042

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

स्मृति शेष

 

अनंत गौरवगाथा की विरासत

सौंप गये श्याम बेनेगल

राजा दुबे

फिल्मकार श्याम बेनेगल के बारे में फिल्म इतिहास के अथ्येता यासिर उस्मान की यह टिप्पणी उनके समग्र अवदान को अभिव्यक्त करने की दिशा में एक शाश्वत वक्तव्य मानी जायेगी कि - “श्याम बेनेगल, वो फिल्मकार थे जिन्होंने सार्थक सिनेमा की शाम नहीं ढलने दी।” श्याम बेनेगल के बारे में यदि हम यह कहें कि वे सार्थक सिनेमा के पर्याय थे तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । सत्तर के दशक में जब गीत-संगीत का मुग्धकारी दौर मद्धम पड़ रहा था और सुपर स्टार राजेश खन्ना के रोमांस का जादू भी फीका पड़ रहा था तब अमिताभ बच्चन का यंग एंग्रीमेन के रूप में प्राकट्य हुआ ।

कहने को चुनौती देने वाला एंग्री यंग मैन आ चुका था मगर उसका ग़ुस्सा भी यथार्थ से ज़रा दूर, फ़िल्मी ही था। सही मायने में व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा क्या होता है , यह श्याम बेनेगल ने बताया।

यह बात आज विस्मयकारी लग सकती है कि विज्ञापन की दुनिया से आये एक फ़िल्मकार ने सिनेमा को केवल विशुद्ध मनोरंजन का साधन मानने से साफ़ इनकार कर दिया। यह फ़िल्मकार थे श्याम बेनेगल, जिन्होंने फ़िल्मों को समाज को आईना दिखाने और बदलाव लाने के एक माध्यम के रूप में देखा । यही नज़र थी जिसके साथ श्याम बेनेगल ने वर्ष 1974 में अपनी पहली फ़िल्म ‘अंकुर’ के साथ मुख्यधारा की मसाला फ़िल्मों के समानांतर एक अमिट लक़ीर खींच दी ।

बेनेगल ‘अंकुर’ की पटकथा को तेरह वर्षों से बनाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कोई उसमें दिलचस्पी नहीं दिखाता था । इसी अंकुर ने हिंदी फिल्मों में एक नई उम्मीद, एक क्रांतिकारी न्यू वेव का आगाज़ किया, जिसे भारतीय फ़िल्म इतिहास में समानांतर सिनेमा कहा गया, इसके अग्रदूत श्याम बेनेगल ही थे। ‘अंकुर’ में श्याम बेनेगल ने सही मायनों में व्यवस्था के खिलाफ़ गुस्से को एक व्यावहारिक अन्दाज में प्रस्तुत किया।

वर्ष 1975 में श्याम बेनेगल ने एक बाल फिल्म ‘चरणदास चोर’ बनाई थी लेकिन उनका मूल लक्ष्य अगले वर्ष अर्थात् वर्ष 1976 में पूरा हुआ, जब उन्होंने सत्यजीत राय की तरह अपनी सिनेत्रयी का निर्माण किया । ‘अंकुर’ और ‘निशांत’ के बाद ‘मंथन’ इसकी तीसरी कड़ी थी। उनकी इस फिल्म का प्रसारण चीन के राष्ट्रीय टेलीविजन नेटवर्क पर भी किया गया।

तेलंगाना (आंध्रप्रदेश) के कृषक विद्रोह की पृष्ठभूमि में निर्मित ‘अंकुर’ फिल्म ने सिनेमा को राजनीतिक, सामाजिक धरातल पर अभिनव अर्थ प्रदान किए। फिल्म के अंतिम दृश्य में एक बच्चा सूर्या की हवेली पर पत्थर फेंकता है। क्रांति का यह नवांकुर शोषण की उपज है। ‘अंकुर’ ने बर्लिन, स्टार्टफोर्ड, लंदन फिल्मोत्सवों में शामिल होकर 43 राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान जीते।

उनकी फिल्म ‘निशांत’ वर्ष 1945 में घटित एक सच्ची घटना पर आधारित थी। यह उन दिनों की कहानी है, जब जमींदार प्रथा अपने चरम पर थी। गाँव का एक जमींदार परिवार अपनी समृद्धि के बूते पर ग्रामीणों का दमन करता है। ‘निशांत’ कान और लंदन फिल्म समारोह में प्रदर्शित होने के बाद मेलबोर्न फेस्टिवल में गोल्डन फ्लेम पुरस्कार से सम्मानित की गई। विश्व फिल्म पत्रिका ने इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म, पटकथा और श्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार दिया। फिल्म में गिरीश कर्नाड, अमरीश पुरी, अनंत नाग और शबाना आजमी की प्रमुख भूमिकाएँ थीं।

श्याम बेनेगल की कोई भी फिल्म , केवल फिल्म नहीं होती थी, हर फिल्म सोद्देश्य होती थी । गुजरात के विश्वप्रसिद्ध दुग्ध सहकारिता आन्दोलन पर केन्द्रित उनकी फिल्म ‘मंथन’ विकासशील देशों के जमीनी परिवर्तन का महत्वपूर्ण दस्तावेज कही गई । इसलिए इसे तृतीय सिनेमा की प्रतिनिधि कृति भी निरूपित किया गया। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म के राष्ट्रीय अवॉर्ड के अलावा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह से आमंत्रण भी प्राप्त हुआ।

नारीवादी आन्दोलन की प्रतिनिधि कृति के रूप में श्याम बेनेगल ने निर्देशकीय कैरियर के आरम्भ में ‘भूमिका’ बनाई थी। मराठी रंगमंच की ख्यात अभिनेत्री हंसा वाडकर के जीवन पर आधारित थी। स्मिता पाटिल, अमरीश पुरी, नसीर, अनंत नाग, कुलभूषण खरबंदा अभिनीत इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म और स्मिता पाटिल को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय अवार्ड मिला था। इस फिल्म को अल्जीरिया में आयोजित फेस्टिवल ऑफ इमेज ऑफ वूमन हेतु आमंत्रित किया गया था। इस विवादास्पद फिल्म को भारत में नारीवादी आंदोलन की प्रतिनिधि कृति के बतौर देखा गया।

विश्वचर्चित फीचर फिल्मों के अलावा श्याम बेनेगल  ने क्लोज टू नेचर, फ्लोटिंग जाएंट, क्वायट रिवॉल्यूशन जैसे वृत्तचित्रों का निर्माण भी किया। राय और नेहरू पर उनके वृत्तचित्र अत्यधिक सराहे गए। छोटे पर्दे पर श्याम द्वारा निर्मित यात्रा, कथासागर और  भारत एक खोज़ जैसे धारावाहिक प्रसारित हो चुके हैं। भारत एक खोज के बारे में  तो यह कहा जाता है कि यदि आप भारत के इतिहास और‌ उसकी संस्कृति को जानना चाहते हैं तो इस धारावाहिक को आद्योपांत देखना चाहिये।

 


राजा दुबे

एफ - 310 राजहर्ष कालोनी ,

अकबरपुर

कोलार रोड

भोपाल 462042

सोमवार, 15 अगस्त 2022

विशेष

 



स्मृति शेष भूपिन्दर

राजा दुबे

पार्श्वगायन हो या फिल्मों में संगीत देना या फिर केवल गिटार से कुछ फिल्मी गानों में विलक्षण प्रभाव उत्पन्न करना, हर फन में माहिर पार्श्वगायक भूपिन्दर अपनी श्रेष्ठ कलात्मक प्रतिभा के कारण बेहद लोकप्रिय पार्श्वगायक और संगीतकार के रूप में पहचाने गये।  दिलकश गीतों का गायन तो इस शख्सियत की पहचान रही। भूपिन्दर के गाये गीतों में फिल्म ‘बाज़ार’ का एक गीत - "करोगे याद तो हर बात याद आयेगी .." गाते समय भूपिन्दर  सा'ब को अपने पिता और सुप्रसिद्ध संगीतकार नत्थेसिंह की याद जरूर आई होगी जो अपने बेटे को एक परफेक्ट कम्पोज़र बनाना चाहते थे और इसीलिए वे उन्हें संगीत सिखाते समय छोटी-छोटी चूक पर बहुत मारते थे और इसी मार के चलते भूपिन्दर संगीत से परहेज़ करने लगे लेकिन प्रारब्ध से कोई कैसे भाग सकता है, भूपिंदर भी नहीं भाग पाए और वे  अपनी आवाज के बल पर बॉलीवुड में छा गये । ‘बाज़ार’ फिल्म के इस लोकप्रिय गीत के लेखक सागर सरहदी कहते हैं कि इस गीत का समग्र प्रभाव भूपिंदर के डूब कर तल्लीनता के साथ गाने से उभरकर आया। इतने सालों बाद आज़ भी यादों के गलियारों में टहलने वालों के लिए यह गीत एकदम मुफीद माना जाता है ।

भूपिन्दर द्वारा गाये गानों की संख्या भले ही सीमित है मगर उन गीतों की लोकप्रियता अत्यधिक रही है और उनके गाये गीतों पर यह जुमला एकदम फिट बैठता है कि उनके गाये गीत एक से बढ़कर एक हैं । फिल्म बाज़ार का सागर सरहदी का लिखा गीत - " करोगे याद तो हर बात ..." या फिर किनारा फिल्म का गुलज़ार का लिखा गीत - " नाम गुम जाएगा.." या फिर उन्हीं का लिखा फिल्म परिचय का गीत ," बीती ना बिताई रैना .." आज भी श्रोताओं के मनपसन्द गीतों की फेहरिस्त में शीर्ष पर हैं । भूपिंदर के पार्श्वगायन के लिए इससे बड़ा काम्प्लीमेन्ट और क्या होगा कि आज के दौर के सबसे बेहतरीन गीतकार गुलज़ार ने अनोखे गायक भूपिंदर के बारे में एक बात कही थी कि " मेरा बस चले तो मैं भूपिंदर की आवाज़ का ताबीज़ बनाकर पहन लूँ " । भूपिन्दर के अवसान के साथ वह दिलकश आवाज़ भी खामोश हो गई है मगर खामोश होने से पहले इस आवाज़ ने दिल को छूने वाले इतने सारे नग़मे, नज़्म और ग़़ज़ल के रूप में दिए हैं, जिन्हें याद कर ज़माना भूपिंदर पर फ़ख़्र करेगा । ‘दिल ढूँढता है फिर वही फुरसत के रात-दिन’ या ‘एक अकेला इस शहर में’ या ‘फिर कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता’ जैसे कितने ही कालजयी गीत गाने वाले भूपिंदर की जोड़ी गुलज़ार के साथ खूब जमी । गुलज़ार सरीखे गीतकार भूपिंदर की आवाज़ के साथ उनकी बनाई धुनों के भी कायल थे ।

भूपिंदर का जन्म पंजाब प्रांत के पटियाला में 06, फरवरी 1940 में हुआ था। उनके पिता नत्थेसिंहजी भी बहुत बड़े संगीतकार थे, इसलिए वे  संगीत के बीच में ही पले-बढ़े। हालाँकि उनके पिता बहुत सख्त थे और संगीत के शिक्षण के प्रति कड़े अनुशासन से उन्हें बचपन में संगीत से वितृष्णा हो गई थी। लेकिन धीरे-धीरे वो संगीत को पसन्द करने लगे । किशोरावस्था में ही उन्होंने ग़ज़ल गाना शुरू कर दिया था। उन्हें आकाशवाणी के एक कार्यक्रम में गजल गाने का मौका मिला और इसके बाद उन्हें दिल्ली के दूरदर्शन केंद्र में भी गजल गाने का मौका मिला। वर्ष 1980 के दशक में भूपिंदर सिंह ने बांग्लादेश की गायिका मिताली सिंह से शादी कर ली। साथ में दोनों ने कई कार्यक्रम किए, जिनसे उनकी शोहरत को चार चाँद लग गए। भूपिन्दर जगजीत सिंह, गुलाम अली और  हरिहरन आदि को अपना आदर्श मानते थे लेकिन दुष्यन्तकुमार के भी बडे़ मुरीद थे। वो कहते थे कि संगीत को किसी सरहद में नहीं बाँधा जा सकता। गीत अच्छे हों, संगीत में मिठास हो तो हर कान को भाता है।

भूपिंदर को दिल्ली शहर बहुत रास आया । दिल्ली में रहकर उन्होंने गिटार और वायलिन बजाना सीखा। वर्ष 1968 में संगीतकार मदन मोहन ने आल इंडिया रेडियो पर उनका कार्यक्रम सुनकर उन्हें  दिल्ली से मुम्बई बुला लिया। सबसे पहले उन्हें फिल्म ‘हकीकत’ में मौका मिला जहाँ, उन्होंने इस फिल्म की एक ग़ज़ल - " होके मजबूर मुझे उसने बुलाया होगा " मोहम्मद रफी सा'ब के साथ गाई । यह ग़ज़ल तो हिट हो गई, लेकिन उन्हें इससे कोई खास पहचान नहीं मिली। इसके बाद भूपिन्दर सिंह ने स्पेनिश गिटार और ड्रम पर कुछ गजलें पेश की। वर्ष 1968 में अपनी लिखी और गाई हुई गजलों की एलपी (लांग प्लेइंग) रिकार्ड रिलीज की जो ज्यादा ध्यान नही खिंच पाई । लेकिन इस नए प्रयोग को जब उन्होंने दूसरी एलपी  रिकार्ड में  पेश किया तो सबका ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ । इसके बाद "वो जो शहर था" नाम से वर्ष 1978 में जारी तीसरी एलपी रिकार्ड से उन्हें खासी शोहरत मिली। गीतकार गुलजार ने इसके गाने वर्ष 1980 में लिखे थे।

रिक्तता को भरने की अनुभूति जगाती थी भूपिन्दर की आवाज़

फिल्मों और फिल्म संगीत पर आधिकारिक तौर पर लेखन करने वाले सुप्रसिद्ध समीक्षक यतीन्द्र मिश्र ने अपनी फेसबुक वाल पर भूपिन्दर सिंह के बारे में लिखा कि एक आवाज़, जो माइक्रोफोन से निकलकर अपने भारी एहसास में रिक्तता को भरती सी लगती थी। कहीं पहुँचने की बेचैनी से अलग, बाकायदा अपनी अलग सी राह बनाती हुई, जिसे निर्वात में गुम होते हुए भी ऑर्केस्ट्रेशन के ढेरों सुरों के बीच दरार छोड़ देती थी।  सत्तर-अस्सी के दशक में ऐसे कई गीतों के गायक जिन्होंने जब भी गाया, सुनने वाले को महसूस हुआ -जैसे कुछ गले में अटका रह गया है। एक कभी न कही गई दुःख की इबारत, जिसके सहारे जज़्बात की शाख पर गीतकारों ने कुछ फूल खिला दिए थे। याद कीजिए- 'आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं / जिंदगी इतनी मुख्तसर भी नहीं…' (थोड़ी सी बेवफाई), 'करोगे याद तो हर बात याद आएगी…' (बाज़ार), 'एक अकेला इस शहर में…’ (घरौंदा), 'फिर तेरी याद नए दीप जलाने आई…’ (आई तेरी याद), 'ज़िंदगी, जिंदगी मेरे घर आना…’ (दूरियाँ) , सब एक से बढ़कर एक।

भूपिंदर किसी भी गीत को गाने के पहले गले की कितनी तैयारी करते थे यह  हर उस गाने में भी अलग से सुनी जा सकती थी जहाँ उनके करने के लिए बहुत ज़्यादा नहीं था, उनकी छोटी सी मौजूदगी भी कहीं दर्ज़ रह जाती थी। एस. डी. बर्मन के संगीत में लता मंगेशकर के ‘ज्वैलथीफ’ फिल्म के गीत - ‘होठों पे ऐसी बात मैं दबा के चली आई’ या मदन मोहन के लिए 'हकीकत'  में मो. रफ़ी, मन्ना डे और तलत महमूद जैसे दिग्गजों के संग 'होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा...' गाना अविस्मरणीय हो गया ।भूपिन्दर सिंह ऐसे बहुत थोड़े, मगर अमर गीतों में खुद की आवाज़ को हौले से दर्ज़ होने देते थे। उनकी यही पहल उनको बड़ा गायक बनाती थी ।उनके उन्मुक्त गानों पर झूमने के भी कई बहाने होते थे । मिताली के संग के कुछ गीतों में आप उन दोनों को सुनिए- 'राहों पे नज़र रखना/ होठों पे दुआ रखना/ आ जाए कोई शायद / दरवाज़ा खुला रखना…' मगर अब वो दरवाज़ा खुला ही रहने वाला है। भूपी भला अब कहाँ लौटने वाले हैं? हम बस उनकी यादों में उन गानों की प्लेलिस्ट में डूबते-उतराते रहेंगे । वे अब नहीं हैं मगर उनकी सोज़ भरी गायकी आज़ भी हमारे बीच  है।

भूपिंदर का गिटार वादन  का जलवा भी खूब रंग लाया

भूपिन्दर शौकिया गिटारवादक नहीं थे । गिटार वादन का उन्होंने बाकायदा शिक्षण प्राप्त किया था और वे गिटार  से किसी भी फिल्मी गीत में विलक्षण प्रभाव उत्पन्न करने की कला में पारंगत थे । चेतन आनन्द की फिल्म ‘हँसते जख्म’  में एक गाना है-  ‘तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है ...’ इस गाने में गिटार भूपिंन्दर सिंह ने ही बजाया था.।यहीं से उनके गिटार का जलवा लोगों ने देखा फिर उन्होंने जो कुछ किया वह इतिहास है। ‘यादों की बारात " फिल्म के प्रसिद्ध गाने -  ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को ..’ में गिटार भूपिंदर सिंह ने बजाया था। इतना ही नहीं फिल्म हरे रामा, हरे कृष्णा के गीत - ‘दम मारो दम ..’ , शोले फिल्म के गीत - ‘मेहबूबा मेहबूबा ..’  और अमर प्रेम फिल्म के गीत ‘चिन्गारी कोई भड़के ..’  में भी भुपिन्दर ने गिटार वादन किया था ।



राजा दुबे 

एफ - 310 राजहर्ष कालोनी ,

अकबरपुर

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भोपाल 462042

 

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...