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शनिवार, 31 जनवरी 2026

दिन कुछ ख़ास है!

 


कविता

विधाता छंदाधारित मुक्तक

मैं तिरंगा हूँ...

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

 

कभी  आकाश  को छूते,

                           हुए मैं मुस्कुराता हूँ।

शहीदों से कभी लिपटा,

                        हुआ आँसू बहाता हूँ।।

तिरंगा  नाम  है  मेरा,

                      वसन  माँ भारती का हूँ।

वतन जयघोष जब करता,

                  खुशी से खिलखिलाता हूँ।।

***

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर


कविता

 

डॉ. अनिल कुमार बाजपेई काव्यांश

(रूपमाला छंद के तीन रूप)

1.

कर्म

कौन  है  ऐसा  यहाँ  पर, हो  दुखों  से दूर।

जो कभी  हारा नहीं  होहै कहीं क्या शूर।।

पेड़  भी  देते  वही  फलबो रहे जो आज।

भोगना पड़ता सभी कोजो किये हैं काज।।

माता सीता

और  कोई  भी  सहारा, है  नहीं  हे राम।

बैठकर मैं ले रही हूँ, आपका  बस नाम।।

हो  रहा है  आज  स्वामी, घोर  पश्चाताप।

क्या पता था है दशानन,के ह्रदय में पाप।।

जय हनुमान

साथ लाया हूँ निशानीराम का मैं दास।

राम के दुःखी ह्रदय मेंआपका ही वास।।

नाश होगा दुष्ट का माँ, दिन नहीं वो दूर।

आप आएँगी अयोध्यादम्भ होगा चूर।।

***

पूर्णिका

(2122  2112  212)

2.

यथार्थ

 

बिल्डिंगों  पर  बिल्डिंगे हैं तन रही।

सेठ  की तो नित दिवाली मन रही।।

 

रो   रहा  है  अन्नदाता  चीखकर।

रोटियों से पेट की क्यों ठन रही।।

 

सत्य की होती सदा ही जीत है।

चोर  पहरेदार में क्यूँ  छन रही।।

 

पड़ गए गांधी अकेले आज तो।

बंदरों में ही नहीं अब बन रही।।

 

अब अहिंसा बस किताबों में दिखे ।

हाथ में दिखती सभी के 'गन' रही ।।

 

हैं करोड़ों  देवता  जिस  देश  में।

पाप से फिर क्यूँ धरा ये सन रही।।

 

भारती  की  कोख  में  दोनों पले।

भाइयों में नित्य क्यूँ अनबन रही।।

 

रोज  ही  भरते  खजाने  सेठ के।

जेब क्यूँ मजदूर की ठनठन रही।।

 

लाख सेवा का अनिल वो दम भरें ।

प्राथमिकता  तो सदा ही धन रही ।।

***

डॉ. अनिल कुमार बाजपेई काव्यांश

जबलपुर


बुधवार, 31 दिसंबर 2025

काव्य

ताटंक छंद

1

शब्दों की महिमा

डॉ. अनिल कुमार बाजपेई काव्यांश

शब्दों को निष्प्राण न जानों, उनमें जीवन होता है।

उनमें भी मुस्कानें होतीं, उनका  मन भी रोता है।।

कभी बने वो विरह-वेदना, पलकों से बह जाते हैं।

बोल नहीं पाते जो बातें, शब्द उन्हें कह जाते हैं।।

 

शब्दों  का संसार निराला,सब आपस में भाई हैं।

उनमें ना हिन्दू मुस्लिम  है, ना कोई ईसाई हैं।।

शब्द  बनाएँ  वेद-ऋचायें, उनने  गीता गाई   है।

बनी ग्रंथ साहिब शब्दों से, बाइबिल भी समाई है।।

 

शब्द बनाते राम कृष्ण भी,वही मोहम्मद के प्यारे।

ईसा भी शब्दों से बनता,नानक नाम लगे न्यारे।।

शब्दों से दरगाहें  बनतीं, शब्दों  से  काबा काशी।

शब्दों से माता रानी हैं, शब्दों से शिव अविनाशी।।

****

पूर्णिका-2122 2122 212

2

रो पड़ा ख़ुद भी खुदा...

 

रो पड़ा ख़ुद भी खुदा ये देखकर ।

बेखबर था आदमी का ये शहर ।।

आज भी तो घोर काली रात है ।

कौन कहता हो गई है अब सहर ।।

क्या खुदा भी अब सितमगर बना गया ।

सो गया मुँह चादरों से ढाँककर ।।

व्यर्थ है बातें करोड़ों लाख की ।

एक कपड़ा भी नहीं जब देह पर ।।

हैं अगर पिछले जनम के कर्म ये ।

सो रहे पापी सभी क्यों सेज पर ।।

वोटरों में बँट गए कम्बल सभी ।

छोड़ क्यों इनको दिया दुर्भाग्य पर ।।

मिल न पाये उम्र भर कपड़े जिन्हें ।

शान से फिर आखिरी होगा सफर ।।

रोज ही गुजरे यहाँ से काफिला ।

क्यों नहीं उनकी पड़ी इनपर नजर ।।

मौत को भी अब शरम आने लगी ।

हाल ऐसा जिंदगी का देखकर ।।

फर्क कुछ पड़ता नहीं उनको अनिल ।

पाँच सालों तक नहीं उनको फिकर ।।

 


डॉ. अनिल कुमार बाजपेई काव्यांश

जबलपुर

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मंगलवार, 30 सितंबर 2025

कविता

गीतिका छंद

माँ

(पित्रपक्ष विशेष)

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

 

माँ तुम्हारे श्रीचरण जब,

इस धरा पर रुक गए ।

आदमी क्या देवता के,

शीश सम्मुख झुक गए ।।

वर्ष भर की क्यों प्रतीक्षा,

नित्य ही आया करो ।

नींद  अब  वैसी कहाँ माँ,

लोरियाँ गाया करो ।।

 

जो गईं माँ तुम यहाँ से,

चैन सुख सब छूटते ।

सेतु  जो  तुमने  बनाये,

क्षीण होकर  टूटते ।।

रौनकें घर में कभी थीं,

आज फीकी पड़ गईं ।

नेह की कलियाँ ह्रदय में,

सूख के ही झड़ गईं ।।

 

बैठना  वो  संग पिता के,

माँ तुम्हारा द्वार पर ।

मुस्कुराहट का खजाना,

फिर लुटाना द्वार पर ।।

सौम्य  शीतलता  लिए तुम,

देवियों का रूप थीं ।

कष्ट दुःख के ताप में माँ,

शीत ऋतु की धूप थीं ।।


 

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर

रविवार, 31 अगस्त 2025

कविता (सुखदा छंद)

श्रीकृष्ण जन्म 


डॉ. अनिल कुमार बाजपेयीकाव्यांश

बन्दीगृह के ताले,   कैसे टूट गए ।

भाग्य कंस  के देखो, कैसे रूठ गए ।।

सातों संतानों  को, उसने मार दिया ।

प्रभुजी ने ही उसका, फिर उद्धार किया ।।

 

मुखड़ा प्रभु का कितना, भोलाभाला है ।

हर्षित  संग  देवकी, हर  ब्रजवाला  है ।।

मोर  पंख  माथे  का, सबको  है  सोहे । 

मधुरिम  मुख मुस्काये, जग को है मोहे ।।

***

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर


शनिवार, 30 अगस्त 2025

कविता (अरुण छंद)

 



शिव-शिवा नर्तन

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयीकाव्यांश

आइये, गाइये, नाथ  की आरती।

धाम में, वाम  में, झूमती पार्वती।।

नाचते, नाचते,  हो  गई है प्रभा।

रूप को, देखके, खो गई है विभा।।

 

हाथ ले, हाथ में, नाचते शिव शिवा।

और तो, है नहीं, मात्र उनके सिवा।।

देखकर, देवगण, हर्ष  से झूमते।

माँ उमा, के चरण, भक्तजन चूमते।।

 

बज  रहीं, पायलें, छमछमाती हुई।

नाचती, चूड़ियाँ, खनखनाती हुईं।।

केश यूँ, पार्वती, के बिखर जा रहे।

बस लगे, मेघ भी, नाचते आ रहे।।

 

देखिए, तो जरा, नाथ  के नृत्य  को।

सृष्टि के, रचयिता, के यथा सत्य को।।

जोर  से, मंत्र के, नाद  डमरू करें।

सब दिशा, ओम का, जाप कैसे भरें।।


डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर


बुधवार, 30 जुलाई 2025

काव्य रूपांतर

 

ईदगाह

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

साहिल  शेखू  राजा आओ ।

जल्दी अपने कदम बढ़ाओ । ।

ईदगाह   का    सुंदर   मेला ।

लगा   खिलौने  का है ठेला । ।

बिकती रबड़ी  और जलेबी ।

खाये  फातिमा  आपा  बेबी । ।

शेखू  असलम  चाट खा रहे ।

आपस में मिलबाँट  खा रहे । ।

मेरा  मन  भी   है ललचाता ।

करना क्या  समझ न आता । ।

रखे  पास  में  तीन   हैं पैसे ।

कर दूँ  खर्च उन्हें फिर कैसे । ।

चलो नहीं अब कुछ खाऊँगा ।

समय  हो रहा  घर जाऊँगा । ।

राह   देखती   घर  में  दादी ।

बेचारी    है    सीधी   सादी । ।

बना   रही  होगी   वो   रोटी ।

छोटी   कच्ची   मोटी  मोटी । ।

रोटी   सेक   नहीं     पाती है ।

बिन चिमटी के जल जाती है । ।

हाथ  में   कैसे पड़ गए छाले ।

सूखे-   सूखे   काले-   काले । ।

क्यों  न चिमटा आज  खरीदूँ ।

दादी  को    ही   ईदी   दे  दूँ । ।

लौटके  हामिद जो घर आया ।

दादी  को  चिमटा  पकड़ाया । ।

रखना   इसको  साथ  तुम्हारे ।

नहीं  जलें फिर  हाथ तुम्हारे । ।

लगी   फूट  कर   दादी   रोने ।

हाय   हामिद  लाल   सलोने । ।

जोर   से  उसको गले लगाया ।

अल्ला का  फिर शुक्र मनाया । ।

***

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...