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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

सामयिक टिप्पणी

महिलाएँ : भारत में विशालतम अल्पसंख्यक!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

महिलाएँ भारत में विशालतम अल्पसंख्यक हैं। - सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की यह टिप्पणी भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। उन्होंने यह टिप्पणी संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने में हो रही देरी पर केंद्र सरकार से जवाब माँगते हुए की। ग़ौरतलब है कि भारत की 48 प्रतिशत अर्थात लगभग आधी आबादी महिलाओं की है। फिर भी, राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन में उनकी आवाज दबी हुई क्यों है?

इसी विडंबना का आईना है - विशालतम अल्पसंख्यक। संख्या में बहुमत, लेकिन अधिकारों, अवसरों और सम्मान में अल्पसंख्यक! यह असंगति है; अंतर्विरोध है! अल्पसंख्यक समुदायों को संविधान विशेष सुरक्षा देता है, लेकिन महिलाओं के लिए ऐसी कोई स्पष्ट  व्यवस्था नहीं। लिंग-आधारित भेदभाव इतना गहरा है कि आधी आबादी होकर भी महिलाएँ  अल्पसंख्यकबनकर रह गई हैं। उदाहरणस्वरूप, लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 14 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक औसत इससे कहीं अधिक - 27 प्रतिशत - है। क्या यह हमारे लोकतंत्र की नींव के ही कमजोर होने का प्रतीक नहीं? यदि आधी आबादी की आवाज संसद तक न पहुँचे, तो नीतियाँ कैसे समावेशी होंगी? आशंका स्वाभाविक है कि 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक को कहीं जानबूझकर तो निलंबित नहीं रखा गया है!

कहना न होगा कि महिलाओं की स्थिति को विकसित भारतके हमारे स्वप्न की होना चाहिए। सयानों की मानें तो भारत में हर घंटे कम से कम दो महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। शिक्षा में लड़कियों का नामांकन बढ़ा है, लेकिन ड्रॉपआउट दर ऊँची है। रोजगार में भी महिलाओं की भागीदारी अपेक्षा से कम है। राजनीति में तो हालात और भी दयनीय हैं। पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण के बावजूद, उच्च स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित है। ऐसे में न्यायमूर्ति नागरत्ना का  लिंग असमानता को अल्पसंख्यक समस्याके रूप में चिह्नित करना बेहद मानीखेज़ है। महिलाओं के इस हाशियाकरण के बीज समाज की पितृसत्तात्मक संरचना में हैं, जिसने महिलाओं को बहुमत से वंचित कर दिया है। याद करें, विश्वमारी कोरोना ने किस तरह इस असमानता की कुरूपता दर्शाई थी। घरेलू हिंसा के मामले दोगुने हो गए थे! मतलब कि समानता का अधिकार आधी आबादी के लिए अधूरा ही है। यह न केवल राजनीतिक आरक्षण का मुद्दा है, बल्कि सामाजिक न्याय का सवाल है।

दरअसल सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी तभी कारगर मानी जा सकती है जब यह महिला अधिकार जागरूकता के प्रसार का आधार बने। पारंपरिक से लेकर सोशल मीडिया तक को इस विषय पर मंथन की ज़रूरत है। ताकि युवा पीढ़ी को स्त्री अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके। नीति निर्माताओं को भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहना चाहिए। महिलाओं को आख़िर कब तक वोट बैंक बनाए रखा जाएगा? चुनाव आए तो सिर पर बिठा लिया; वरना टोकरी में भी जगह नहीं! पर असर। 33 प्रतिशत आरक्षण को यथाशीघ्र अमल में लाया जाना चाहिए। तभी तो लिंग-संवेदनशील कानूनों का जन्म हो सकेगा न! इससे वैश्विक स्तर पर भी भारत की छवि निखरेगी। ध्यान रहे कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में लैंगिक समानता के लिहाज से भारत बहुत नीचे है!

अंततः, सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी अपने आप में एक आह्वान है - महिलाओं को विशालतम अल्पसंख्यक से बहुमत की मुख्यधारा में लाएँ। हमारा संविधान समानता का वादा करता है, लेकिन उसे अमल में लाना हमारी जिम्मेदारी है। महिलाएँ न केवल माताएँ और बहनें हैं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता हैं। यदि वे सशक्त होंगी, तो भारत सशक्त होगा। नारी शक्ति जागे, तभी भारत जागेगा।

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डॉ. ऋषभदेव शर्मा

सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा

हैदराबाद

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

सामयिक टिप्पणी

 

1.

लाज़्लो : सर्वग्रासी अँधेरे में साहित्य की अदम्य लौ

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

जैसे ही नोबेल समिति ने 2025 का साहित्य पुरस्कार हंगरी के लेखक लाज़्लो क्राज़्नाहोरकाई को देने की घोषणा की, वैसे ही विश्व साहित्य के आकाश में एक तारा मानो गुमनामी के बादलों को फाड़कर जगमगा उठा! कहा गया कि उनकी सम्मोहक और दूरदर्शी कृतियाँ सर्वनाशी आतंक के बीच ‘कला की शक्ति’ की पुष्टि करती हैं! पता चला कि उनकी क़लम ने न केवल हंगरी की धुंधभरी घाटियों को आवाज़ दी है, बल्कि मानव मन की गहरी उदासी और आकांक्षा को एक ऐसी भाषा दी है, जो सीमाओं को लाँघकर हर दिल तक पहुँचती है।

लाज़्लो क्राज़्नाहोरकाई का जीवन एक तपस्वी की कहानी है। 1954 में हंगरी के ग्युला शहर में जन्मे इस लेखक ने सोवियत दमन के साये में अपनी आँखें खोलीं। वह दौर था जब आज़ादी एक सपना थी, और ख़ुफ़िया पुलिस ने उनका पासपोर्ट तक छीन लिया था। लेकिन इस अँधेरे ने उनकी आत्मा को और निखारा। क्राज़्नाहोरकाई एकांत के साथी हैं। उनकी आँखों में बौद्ध दर्शन की शांति और झेन की गहराई झलकती है। मगर उनके भीतर एक ऐसी उदासी बसी है, जो उनकी रचनाओं में सिसकती है। वे कहते हैं, "मैं दुनिया को देखता हूँ, लेकिन उसका हिस्सा नहीं बनता।" (शायद ही उन्हें मालूम हो कि हम भारतीय इसे साक्षीभाव कहते हैं! लेकिन) यह वाक्य उनकी जिंदगी का दर्शन है। एक लेखक, जो अपने दर्द को काग़ज़ पर उकेरता है, ताकि हमारी आत्माएँ उसमें अपनी छवि देख सकें। उनकी हँसी में हल्का-सा व्यंग्य है, पर बातों में करुणा है, जो हमें अपनेपन का अहसास दिलाती है।

सयाने बता रहे हैं कि क्राज़्नाहोरकाई का कृतित्व एक ऐसी नदी है, जो गहरे जंगलों से होकर बहती है - रहस्यमयी, जटिल, और फिर भी मन को बाँध लेने वाली। 1985 में प्रकाशित उपन्यास ‘सैटनटैंगो’ (शैतान का नाच) में उन्होंने एक गाँव की टूटती साँसों को उभारा, जहाँ हर किरदार अपनी हार और उम्मीद के बीच जूझता है। 'द मेलान्कोली ऑफ रेसिस्टेंस' (1989) में एक सर्कस के बहाने सत्ता और अराजकता की तस्वीर खींची, जो बेला तार की फिल्म 'वर्कमास्टर हार्मनीज' में जीवंत हो उठी। ‘वॉर एंड वॉर' (1999) एक भटकती आत्मा की कहानी है, जो प्राचीन शहरों में अपनी पहचान तलाशती है। उनकी हालिया कृति 'बारन वेंकहाइम्स होमकमिंग' (2016) हंगरी के ग्रामीण जीवन की विडंबनाओं को हृदयस्पर्शी ढंग से बयान करती है। क्राज़्नाहोरकाई के लंबे, सर्पिल वाक्य पाठक को थकाते हैं, लेकिन यही उनकी जादुई शक्ति है। (बाणभट्ट की कादंबरी की तरह!) वे आपको कहानी में खींच लेते हैं, जैसे कोई मंत्रमुग्ध कर देने वाला स्वप्न।

कथाकार क्राज़्नाहोरकाई की विचारधारा मानवता के लिए एक करुण पुकार है। वे दुनिया को एक ऐसे चश्मे से देखते हैं, जहाँ सभ्यता का अंत करीब लगता है। लेकिन निराशा के इस समंदर में, वे कला को एक टिमटिमाता दीया मानते हैं - "साहित्य वह रोशनी है, जो अँधेरे को चीरती है!” बौद्ध और झेन प्रभाव उनकी रचनाओं में क्षणभंगुरता का बोध जगाते हैं। दमन, पर्यावरणीय संकट और मानव का अकेलापन - ये उनके लेखन के मूल स्वर हैं। फिर भी, उनकी कहानियाँ हार नहीं मानतीं। वे हमें सिखाती हैं कि सबसे गहरे दु:ख में भी आशा की किरण छिपी होती है। आज के दौर में जब युद्ध, महामारी और जलवायु संकट से दुनिया त्रस्त है, क्राज़्नाहोरकाई का साहित्य हमें हिम्मत देता है। कला के सहारे जीने की हिम्मत!

कहना न होगा कि विश्व साहित्य में क्राज़्नाहोरकाई का योगदान अप्रतिम है। आज जब साहित्य बाज़ार की चमक में खो रहा है, उनकी जटिल, गहरी रचनाएँ एक विद्रोह हैं। वे पाठक को एक ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जो आत्मा को झकझोर देती है। भारतीय पाठक को उनकी रचनाएँ प्रेमचंद की ग्रामीण ट्रैजेडी और मंटो की बेचैनी की याद दिला सकती हैं। हिंदी लेखक उनसे सीख सकते हैं कि स्थानीय दर्द को वैश्विक कैनवास पर कैसे उकेरा जा सकता है।

भारत की धरती से, हिंदी साहित्य प्रेमियों की ओर से, लाज़्लो क्राज़्नाहोरकाई का हार्दिक अभिनंदन!

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2.

मारिया कोरिना मचादो यानी लोकतंत्र की लौ!

दस अक्टूबर, 2025 को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए वेनेज़ुएला की साहसी विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचादो के चयन की घोषणा हुई। बेशक़, नॉर्वे की राजधानी ओस्लो से आई खबर ने पूरी दुनिया को लोकतंत्र की ताक़त का अहसास कराया। ग़ौरतलब है कि नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने उन्हें यह सम्मान 'लोकतंत्र के अधिकारों को बढ़ावा देने और शांतिपूर्ण परिवर्तन के संघर्ष' के लिए दिया है। मारिया कोरिना को हार्दिक बधाई! आपकी यह जीत न सिर्फ वेनेज़ुएला की, बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका और दुनिया की उन आवाज़ों की जीत है, जो अँधेरे में भी रोशनी जलाए रखती हैं!

सयाने बता रहे हैं कि मारिया कोरिना मचादो का जन्म 1967 में वेनेज़ुएला के वैलेंसिया शहर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे राजनीति के मंच पर उतरीं। 2002 में उन्होंने सुमेटे नामक संगठन की स्थापना की, जो नागरिकों को मतदान और लोकतंत्र की समझ सिखाता है। यह संगठन अमेरिकी फंडिंग से जुड़ा रहा, लेकिन इसका मक़सद वेनेज़ुएला में पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करना था। 2012 में वे संसद पहुँचीं, जहाँ उन्होंने ह्यूगो शावेज़ के शासन के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की। शावेज़ के बाद निकोलस मादुरो के आने पर तो उनका संघर्ष और तेज़ हो गया। 2023 में विपक्षी प्राइमरी चुनावों में उन्होंने भारी बहुमत से जीत हासिल की और राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनीं। लेकिन मादुरो शासन ने उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया। फिर भी, मारिया ने हार नहीं मानी। वे भूमिगत हो गईं, लेकिन सोशल मीडिया और गुप्त सभाओं के सहारे लाखों लोगों को एकजुट किया। उनकी पार्टी वेंते वेनेज़ुएला ने 2024 के राष्ट्रपति चुनावों में मादुरो के ख़िलाफ़ अभियान चलाया। याद रहे कि मारिया ने हमेशा अहिंसक रास्ता अपनाया। प्रदर्शन, अंतरराष्ट्रीय दबाव और कानूनी लड़ाई! नोबेल समिति ने कहा कि वे 'लोकतंत्र की लौ जलाए रखने वाली' हैं; तानाशाही के बढ़ते अँधेरे में भी उम्मीद की किरण हैं! उनके प्रयासों से वेनेज़ुएला में लाखों लोग सड़कों पर उतरे, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मादुरो पर प्रतिबंध लगाए। मारिया की यह यात्रा एक ऐसी साधारण महिला की असाधारण हिम्मत की कहानी है, जो आर्थिक संकट, दमन और निर्वासन के बावजूद डटी रहीं।

स्वाभाविक ही, वेनेज़ुएला के विपक्ष ने मारिया को शांति का नोबेल दिए जाने की घोषणा को 'लोकतंत्र की नैतिक जीत' बताया। पूर्व राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार एडमुंडो गोंजालेज ने कहा, 'यह हमारी साझा लड़ाई का सम्मान है।' रोचक तथ्य यह है कि मारिया ने यह पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को समर्पित किया। व्हाइट हाउस ने भी उन्हें बधाई दी और कहा कि यह 'लोकतंत्र की रक्षा का संदेश' है। यूरोपीय संघ और कनाडा जैसे देशों ने इसे तानाशाही के ख़िलाफ़ वैश्विक संकेत माना। अचरज नहीं कि भारत में भी इसे 'गांधीवादी अहिंसा की याद' कहा जा रहा है। दुनियाभर में लोग मारिया को 'आयरन लेडी' कह रहे हैं। मारिया की भावुक प्रतिक्रिया वायरल हो रही है -  'मेरे पास शब्द नहीं, लेकिन यह जीत सबकी है!'

दूसरी ओर, विवाद भी कम नहीं। मादुरो शासन ने इसे 'अमेरिकी साज़िश' करार दिया। कहा कि मारिया 'तेल के लिए विदेशी एजेंट' हैं! कुछ वामपंथी समूहों का आरोप है कि नोबेल समिति अमेरिकी हितों की पिट्ठू है! यह भी कि यह पुरस्कार रिजीम चेंज के लिए है, शांति के लिए नहीं! मारिया के इज़राइल समर्थन और बिटकॉइन को 'तानाशाही के ख़िलाफ़ हथियार' बताने पर भी बहस छिड़ी है। और हाँ,  इस पुरस्कार के प्रबल प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों की हताशा तो जगज़ाहिर है ही! फिर भी, ये प्रतिक्रियाएँ साबित करती हैं कि नोबेल शांति पुरस्कार प्रायः विवादास्पद होता है! इसके बावजूद,  मारिया का चयन दुनिया को चेतावनी देता है –

“तानाशाही को चुनौती दो, वरना अँधेरा फैलेगा!’

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डॉ. ऋषभदेव शर्मा

सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा

हैदराबाद

 

शनिवार, 30 अगस्त 2025

सामयिक टिप्पणी

सुनो ट्रंप जी : इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 6 अगस्त, 2025 को भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा करके वैश्विक व्यापार और कूटनीति में नया तनाव पैदा कर दिया है। यह बढ़ोतरी पहले से लागू 25 प्रतिशत टैरिफ के अतिरिक्त है।  ट्रंप महोदय का कहना है कि उन्होंने यह कदम भारत के रूस से कच्चे तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद के जवाब में उठाया है। लगता है, वे हर उस देश को दंडित करने पर तुले हैं, जो उनकी सनकभरी नीतियों का आँख मूँदकर समर्थन करने से इनकार करे। लेकिन भारत दृढ़ता किंतु शालीनता से उन्हें यह जता चुका है कि भारत राष्ट्रीय हितों से समझौता करने और झुकने को तैयार नहीं। यह शायद केवल संयोग नहीं कि अतिरिक्त टैरिफ की इस घोषणा के वक़्त भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल रूस की यात्रा पर थे। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक संतुलन को रेखांकित करता है और अमेरिका को याद दिलाता है कि, इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं!’

ग़ौरतलब है कि अमेरिका, और ख़ासकर राष्ट्रपति ट्रंप न तो कभी विश्वसनीय दोस्त थे और न हो सकते हैं। इसलिए भारत उन्हें कूटनैतिक संकेत दे चुका है कि उनकी ख़ातिर वह अपने परखे हुए दोस्त रूस की बलि नहीं दे सकता। (इनकार नहीं कि इससे भविष्य में ‘क्वाड’ अप्रासंगिक हो सकता है!) भले ही ट्रंप अब यह साबित करने पर तुले हों कि भारत का रूस के साथ व्यापार बढ़ाना रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस की आर्थिक मदद करना है। इसी को कहते हैं उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। पूरी दुनिया जानती है कि यूक्रेन की पीठ पर अमेरिका का हाथ है। लेकिन चूँकि शांति का मसीहा बनने के ट्रंप के सारे पैंतरों को रूस ने व्यर्थ कर दिया है, तो ट्रंप भारत की बाँह मरोड़कर खीझ निकाल रहे हैं। डोभाल की मास्को यात्रा (जो पहले से निर्धारित थी)  इस संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि यह भारत-रूस रक्षा सहयोग और ऊर्जा आपूर्ति पर केंद्रित है। यह यात्रा भारत की स्वतंत्र नीति का संदेश देती है, जो किसी एक ध्रुवीय गठबंधन में विश्वास नहीं करती।

ट्रंप का दावा है कि भारत अमेरिकी सामानों पर ‘दुनिया में सबसे ऊँचा’ टैरिफ लगाता है, जिससे व्यापार असंतुलन पैदा होता है। उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि यह दावा तथ्यों से मेल नहीं खाता। भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के आरोपों को ‘अनुचित’ बताते हुए कहा भी है कि भारत का रूस से तेल आयात राष्ट्रीय हितों और उपभोक्ता जरूरतों के लिए अनिवार्य है, और खुद  अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश भी रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं। इसके बावजूद ट्रंप बड़े ‘सम्मान’ के साथ झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। मानो ‘झूठ’ ही नई विश्व व्यवस्था का बीज बनने जा रहा हो!

अंततः यह दोहराना ज़रूरी है कि भारत पर दोहरा टैरिफ ठोकने का ट्रंप महोदय का फैसला अनुचित, अन्यायपूर्ण और अतार्किक तो है ही, कालांतर में ख़ुद अमेरिका के लिए आत्मघाती भी साबित हो सकता है। रही बात भारत की तो यक़ीनन डोभाल की मॉस्को यात्रा से रूस के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी को और बल मिलेगा, जो अमेरिकी दबाव के खिलाफ संतुलन बनाए रखेगा। भारत को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में टैरिफ के इस मुद्दे को उठाना चाहिए और अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार वार्ता को तेज करना चाहिए। साथ ही, आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए यूरोप और जापान जैसे वैकल्पिक बाजारों पर ध्यान देना होगा। हम किसी भी स्वयंभू वैश्विक चौधरी की कठपुतली नहीं बन सकते, क्योंकि हमारे लिए हमारे  अपने आर्थिक और सामरिक  हित सर्वोपरि हैं।

 


डॉ. ऋषभदेव शर्मा

सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा

हैदराबाद

 

 

बुधवार, 30 जुलाई 2025

सामयिक टिप्पणी

 



एक थी रिधन्या!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

एक थी रिधन्या। लेकिन रुकिए! यह किसी पुराने ज़माने की कोई सुखांत कहानी नहीं। बल्कि आज, इक्कीसवीं सदी, के तमिलनाडु के तिरुप्पुर की 27 साल की नवविवाहिता रिधन्या की दुखांत गाथा है। उसने दहेज की बलिवेदी पर अपनी कुर्बानी दे दी!

रिधन्या के परिवार ने दहेज में सोने के 300 सिक्के और 70 लाख की वॉल्वो कार दी थी। 2.5 करोड़ शादी का खर्च दिया था। फिर भी उसके पति और सास-ससुर ने 200 और सोने के सिक्कों की माँग कर उसे प्रताड़ित किया। पति के घर में रहना नारकीय हो चुका था। पिता के घर भी तो नहीं लौट सकती थी। वहाँ से उसे सहन करने और समझौता करने की सीख जो मिली थी! यों, शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न हद से गुज़र गया तो 29 जून, 2025 को उसने आत्महत्या कर ली! कहानी खतम, पैसा हजम?!

भारत में आर्थिक तरक्की और कानूनी सुरक्षा के बावजूद दहेज की जड़ें आज भी कितनी गहरी हैं! 1961 के दहेज निषेध अधिनियम के बावजूद दहेज-दानव लगातार और अधिक दुर्दांत होता गया है। तमिलनाडु जैसे सुशिक्षित राज्य में इंसानियत पर भौतिकवाद को इस तरह भारी पड़ते देखना दुर्भाग्यपूर्ण है! रिधन्या का मामला कोई अकेला नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, देश भर में 2022 में 6,000 से ज्यादा दहेज से जुड़ी मौतें हुईं। यानी, अकेला कानून कुछ नहीं कर सकता। हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है। दहेज की माँग (जिसे अक्सर उपहार या पारिवारिक सहायता के नाम पर छिपाया जाता है) लालच और हकदारी का जहरीला चक्र बनाती है। दूसरे परिवारों का उदाहरण देते हुए रिधन्या के ससुरालवालों का करोड़ों की कथित माँग इसका सबूत है।

रिधन्या की कहानी आर्थिक असमानता, पुरुषवादी सोच और सामाजिक दबाव के मेल की कहानी है। उसके गारमेंट व्यवसायी पिता ने भारी-भरकम दहेज दिया, लेकिन ससुराल वालों का लालच खत्म नहीं हुआ। यह मामला दिखाता है कि दहेज सिर्फ पैसों का लेन-देन नहीं, बल्कि एक ऐसी भयावह काली शक्ति है जो महिलाओं को गुलाम बनाती है और उन्हें शादी में सौदेबाजी का सामान बना देती है। रिधन्या ने पिता को भेजे अपने अंतिम ऑडियो संदेश में अपनी पीड़ा और शारीरिक-मानसिक यातना का जिक्र किया है।  उससे इस क्रूर सच का पता चलता है कि पीड़िताएँ कितनी अकेली और असहाय होती हैं। उसका कहना कि- मैं बोझ नहीं बनना चाहती - दिखाता है कि समाज बेटियों पर परिवार की तथाकथित इज्जत बचाने का कितना बड़ा बोझ डालता है!

इस त्रासदी का आर्थिक पहलू भी अहम है। तमिलनाडु को औद्योगिक प्रगति और मानव विकास सूचकांक के लिए जाना जाता है, फिर भी वह रूढ़िगत प्रथाओं का शिकार है!

भव्य विवाह और दहेज से वहाँ प्रचलित शादी के बाजारीकरण की संस्कृति (विकृति!) को समझा जा सकता है। ऐसे अनेक परिवार सामाजिक दबाव में अपनी हैसियत दिखाने के लिए कर्ज में डूब जाते हैं, फिर भी माँगें खत्म नहीं होतीं। क्या यह अचरज की बात नहीं कि इस दहेज के भिखारी परिवार की मासिक आय 20 लाख बताई जा रही है! कहना न होगा कि दहेज का रिश्ता जरूरत से ज्यादा, वर्चस्व की चाहत से है।

सयानों की मानें तो, दहेज के मामलों में सिर्फ 34 प्रतिशत में सजा होती है। साथ ही, घरेलू हिंसा का कलंक अक्सर पीड़िताओं को चुप करा देता है। रिधन्या के साथ भी तो यही हुआ न कि  माता-पिता ने उसे बोलने के बजाय सहने की सलाह दी! आखिर कब तक समाज इस तरह बहू-बेटियों की बलि लेता रहेगा?

रिधन्या की मौत समाज के लिए एक चेतावनी है। यह हमें उस भारत की सच्चाई से रू-ब-रू कराती है, जो आधुनिकता और रूढ़ियों के बीच झूल रहा है। ऑडियो संदेशों में कैद रिधन्या की आवाज़ हमसे सुनने, कदम उठाने और यह सुनिश्चित करने की माँग करती है कि कोई और बेटी अपनी जिंदगी खत्म न करे। समाज को यह मानना होगा कि बेटियों की कीमत सोने या कार से नहीं, उनकी गरिमा से है। 

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा

हैदराबाद

 

गुरुवार, 26 जून 2025

सामयिक टिप्पणी


ऑपरेशन सिंदूर : भारतमाता की जय!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

पहलगाम हमले के जवाब में भारतीय सशस्त्र बलों ने 6-7 मई, 2025 की रात ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को अंजाम देकर आतंक के आकाओं को करारी चोट दी है। यह ऑपरेशन भारत की आतंकवाद के प्रति ‘शून्य सहिष्णुता’ नीति और सैन्य शक्ति का प्रतीक बन गया है।

याद रहे कि 22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए बर्बर आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ द्वारा अंजाम दिए गए उस हमले में 26 निर्दोष नागरिक क्रूरता से मारे गए थे। पहलगाम हमले ने न केवल भारत की संप्रभुता को चुनौती दी थी, बल्कि पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के घृणित चेहरे को एक बार फिर उजागर किया था। पहलगाम हमला 2008 के मुंबई हमले, 2016 के उरी हमले और अन्य आतंकी घटनाओं की शृंखला में एक और कड़ी था। इन सब हमलों के तार पाकिस्तान से जुड़े थे। भारत ने बार-बार पाकिस्तान को आतंकी तंत्र को नष्ट करने की चेतावनी दी थी। लेकिन उसकी निष्क्रियता ने भारत को निर्णायक कार्रवाई के लिए बाध्य किया।

कहना न होगा कि पहलगाम हमला कोई सामान्य घटना नहीं थी। आतंकियों ने जानबूझकर हिंदू पुरुषों को निशाना बनाया। उनकी पत्नियों का सुहाग छीन लिया! इस भावनात्मक आघात को ध्यान में रखते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके जवाबी ऑपरेशन का नाम ‘सिंदूर’ रखा, जो भारतीय संस्कृति में सुहाग का प्रतीक है।

ऑपरेशन सिंदूर का उद्देश्य पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों के नौ आतंकी ठिकानों को नष्ट करना था। ये ठिकाने भारत के खिलाफ हमलों की साजिश के मुख्य केंद्र थे। इनके खिलाफ भारत की कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत आत्मरक्षा के अधिकार और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के अनुरूप थी।

अब यह एक घोषित सच्चाई है कि भारतीय वायुसेना ने राफेल विमानों के साथ स्कैल्प मिसाइलों और हैमर बमों का उपयोग कर 23 मिनट में बहावलपुर, मुरीदके, कोटली, सियालकोट और मुजफ्फराबाद आदि में 9 ठिकानों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। खुफिया एजेंसी रॉ की सटीक जानकारी और सेना, नौसेना तथा वायुसेना के संयुक्त प्रयासों ने इस ऑपरेशन को अभूतपूर्व बनाया। कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने प्रेस ब्रीफिंग में वीडियो साक्ष्य प्रस्तुत कर साबित किया कि हमले केवल आतंकी शिविरों तक सीमित थे, किसी नागरिक या सैन्य ढाँचे को नुकसान नहीं पहुँचा। वैश्विक समुदाय - विशेष रूप से अमेरिका, रूस और इजरायल -  ने इस सटीकता की सराहना की है।

इसमें संदेह नहीं कि ऑपरेशन सिंदूर ने तात्कालिक रूप से आतंकी संगठनों की कमर तोड़ दी है। जैश-ए-मोहम्मद के नेता मसूद अजहर के परिवार के 10 सदस्यों समेत अनुमानित 90 से अधिक आतंकी मारे गए। पाकिस्तान को कूटनीतिक और सैन्य रूप से बैकफुट पर ला दिया गया। उसका यह दावा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा खारिज कर दिया गया कि हमले में मस्जिदों या नागरिकों को नुकसान पहुँचा।

            दूरगामी प्रभाव की बात करें तो मानना होगा कि इस ऑपरेशन ने भारत की सैन्य और कूटनीतिक ताकत को विश्व पटल पर स्थापित किया। चीन को किनारे रखने और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की शिकायत को तवज्जो न मिलने से भारत की कूटनीतिक जीत स्पष्ट हुई। इस ऑपरेशन का आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों के लिए स्पष्ट संदेश है कि भारत न तो भूलता है, न माफ करता है!

यहाँ यह कहना बेहद ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृढ़ नेतृत्व, रातभर ऑपरेशन पर नजर रखने की प्रतिबद्धता और महिला सैन्य अधिकारियों को प्रेस ब्रीफिंग के लिए चुनना, भारत की सशक्त और समावेशी छवि को दर्शाता है। रक्षा मंत्री का ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष और सेना की त्रुटिहीन रणनीति ने देशवासियों में गर्व की भावना जागृत की है। भारतीय सेना ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि वह विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में से एक है।

ऑपरेशन सिंदूर’ केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की अटल प्रतिबद्धता, संकल्पशक्ति और एकजुटता का प्रतीक है। यह देश के लिए गर्व का क्षण है, जो आने वाली पीढ़ियों को आतंक के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देगा। … और हाँ यह अंत नहीं, शुरूआत है। कवयित्री वर्षा शर्मा के शब्दों में –

आज सहिष्णू भारत ने, बदला अपना किरदार है!

नींदों में भी काँप रहा, दुश्मन जो सीमापार है!!

 

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा

हैदराबाद

 

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

सामयिक टिप्पणी

पहलगाम हमला : अमानुषिक, जघन्य और निंदनीय!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में बैसारन की खूबसूरत वादी में आतंकियों ने निर्दोष पर्यटकों पर  हमला कर दिया। कम से कम 26 लोग मारे गए, जिनमें दो विदेशी नागरिक भी शामिल थे। अनेक घायल हुए। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े ‘द रेसिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) के आतंकियों का यह क्रूर, अमानुषिक, जघन्य और निंदनीय हमला न केवल आम लोगों पर हमला है, बल्कि कश्मीर की शांति, पर्यटन और भारत के संकल्प के खिलाफ गहरी साजिश का सूचक है। यही वजह है कि हर ओर कायरतापूर्ण हमले की कड़ी निंदा और पीड़ितों के लिए न्याय की माँग की आवाज़ें उठ रही हैं।

कहना न होगा कि आतंकियों ने इस हमले का समय बहुत शातिराना ढंग से चुना। यह कोई इत्तिफाक नहीं है कि हमला उस समय हुआ जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस भारत आए हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन की यात्रा पर सऊदी अरब में थे। आतंकियों ने भारत को दुनिया के सामने शर्मिंदगी में डालने की कोशिश की। साथ ही, यह हमला उस वक़्त हुआ जब कश्मीर में पर्यटन जोर पकड़ रहा है। अमरनाथ यात्रा भी शुरू होने वाली है। पर्यटकों को निशाना बनाकर आतंकी कश्मीर की अर्थव्यवस्था और शांति की छवि को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। खासकर 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद बनी सामान्य स्थिति को भंग करने की उनकी दुष्टतापूर्ण मंशा तो खैर जगज़ाहिर है ही।

ज़ाहिर है कि इस हमले से देशभर में शोक और गुस्से की लहर व्याप गई है। पहली बात तो यह कि इस भीषण त्रासदी ने भारत के इस दावे को और पुख्ता कर दिया है कि सीमा पार से आतंकवाद अभी भी एक बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान से जुड़े समूहों, जैसे लश्कर-ए-तैयबा, पर शक है। चश्मदीदों ने बताया कि आतंकियों ने नाम पूछ-पूछ कर गैर-मुस्लिमों को निशाना बनाया, जिससे सांप्रदायिक तनाव फैलाने और कश्मीर की साझा संस्कृति को नुकसान पहुँचाने की कोशिश हुई। यह कश्मीर की मेहमाननवाजी के खिलाफ है। यह हमला पर्यटकों को डराने और स्थानीय रोजगार को नुकसान पहुँचाने की गहरी साजिश है।

दूसरी बात, यह हमला पहले के हमलों से अलग और बड़ा है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सही कहा है कि यह हाल के वर्षों में आम नागरिकों पर सबसे बड़ा हमला है। आतंकी पहले सुरक्षाबलों या प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाते थे, लेकिन इस बार उन्होंने सैर-सपाटे और मौज-मस्ती के लिए आए पर्यटकों को चुना। पास में एक संदिग्ध गाड़ी और आतंकियों के सैन्य कपड़े मिलने से पता चलता है कि यह हमला बहुत सोच-समझकर किया गया। यह भी कहा जा रहा है कि  कहीं न कहीं सुरक्षा और खुफिया तंत्र से भारी चूक हुई है!

उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस हमले का  कड़ा और समझदारीभरा जवाब देगी। देना ही चाहिए! प्रधानमंत्री ने आतंकियों को सजा देने का वादा किया है, और गृह मंत्री ने तुरत-फुरत श्रीनगर में सुरक्षा समीक्षा की है। सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस का साझा अभियान जारी है। लेकिन सिर्फ सैन्य कार्रवाई काफी नहीं। पाकिस्तान पर चौतरफा कूटनीतिक दबाव जरूरी है। कश्मीर में पर्यटकों के लिए 24/7 हेल्पलाइन और सहायता अच्छा कदम है, लेकिन पर्यटक स्थलों और अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा बढ़ानी होगी।

            दुनिया ने इस हमले की निंदा की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और यूएई के क्राउन प्रिंस ने इस विषम घड़ी में भारत के साथ एकजुटता दिखाई है। भारत को इस समर्थन को आतंक के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई में बदलना होगा। देश में भी सभी को दलगत आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर एकजुटता प्रदर्शित करनी होगी।

अतंतः यही कि कश्मीर में शांति की राह मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं। इस त्रासदी को आतंकवाद के खिलाफ मजबूत रणनीति, नागरिकों की सुरक्षा और कश्मीर की खूबसूरती को बचाने के लिए प्रेरणा बनाना होगा।

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पहलगाम नरसंहार के बाद : सिंधु में उबाल

खूनी मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले में 26 निर्दोष पर्यटकों की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस हमले की जिम्मेदारी 'द कश्मीर रेजिस्टेंस' नामक एक नए आतंकवादी संगठन ने ली है, जिसके पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क से जुड़े होने के संकेत मिले हैं।

भारत सरकार ने इस बर्बर नरसंहार के जवाब में कई कड़े कदम उठाए हैं। एक, सिंधु जल संधि को निलंबित किया जा रहा है। 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई यह संधि अब तक तीन बड़े युद्धों के बावजूद लागू रही थी। लेकिन अब भारत ने इसे अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया है। आखिर सब्र की भी कोई तो सीमा होती है न! दो, वाघा-अटारी सीमा  बंद की जा रही है। यानी, भारत ने पाकिस्तान के साथ अपनी एकमात्र भूमि सीमा को बंद कर दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापार और आवाजाही पर असर पड़ना स्वाभाविक है। क्या करें, हालिया नाज़ुक हालात में यह ज़रूरी हो गया था! तीन, पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द किए जा रहे हैं। सार्क वीजा छूट योजना के तहत भारत में रह रहे पाकिस्तानी नागरिकों को 48 घंटे के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया गया है। भला यह कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है कि पाकिस्तान तो आतंकियों को पाले-पोसे और भारत भला पड़ोसी बना अपने सब दरवाजे खुले छोड़ दे! चार, राजनयिक संबंधों में कटौती की जा रही है। भारत ने इस्लामाबाद स्थित अपने उच्चायोग के स्टाफ को घटाया है और पाकिस्तानी रक्षा सलाहकारों को निष्कासित किया है। वरना और कब तक पानी सिर से गुजरने दिया जाए!

कहना न होगा कि सिंधु जल संधि का निलंबन एक ऐतिहासिक कदम है। यह संधि पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा मानी जाती है, क्योंकि उसकी कृषि और जल आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। इस संधि के निलंबन से पाकिस्तान में जल संकट गहरा सकता है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था और समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। भारत का यह निर्णय न केवल पाकिस्तान पर दबाव बनाने की रणनीति है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि अब आतंकवाद के प्रति भारत की सहनशीलता समाप्त हो चुकी है। यह कदम अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी यह संदेश देता है कि भारत अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर कोई समझौता नहीं करेगा।

सयाने अनुमान लगा रहे हैं कि भारत के इन कदमों से भारत-पाकिस्तान संबंधों में और अधिक तनाव आ सकता है। पाकिस्तान ने भारत के इन निर्णयों की आलोचना की है और संभावित प्रतिकार की चेतावनी दी है! इससे दोनों देशों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंध और बिगड़ सकते हैं। इसके अलावा, सिंधु जल संधि का निलंबन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चर्चा का विषय बन सकता है। विश्व बैंक, जो इस संधि का मध्यस्थ था, और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इस पर प्रतिक्रिया दे सकती हैं। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके कदम अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संधियों के अनुरूप हों।

अंततः, पहलगाम हत्याकांड न केवल एक आतंकवादी कृत्य है, बल्कि भारत की सुरक्षा और संप्रभुता पर सीधा हमला भी है। भारत की कड़ी प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि अब वह आतंकवाद के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरतेगा। हाँ, इन कदमों के दूरगामी प्रभावों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। भारत को अपनी रणनीति में संतुलन बनाए रखना होगा, ताकि वह आतंकवाद के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई कर सके, साथ ही क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी बनाए रख सके। यह समय है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर कार्रवाई करे और ऐसे कृत्यों के लिए जिम्मेदार देशों पर दबाव डाले। भारत की यह पहल एक चेतावनी है कि अब आतंकवाद को सहन नहीं किया जाएगा, और इसके खिलाफ निर्णायक कदम उठाए जाएँगे –

उबला समुद्र शांति का, थामे न थमेगा;

इसको न और आँच दो, किस ओर ध्यान है!

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पहलगाम के घाव और अटारी का बंद दरवाज़ा!

पहलगाम की वादियों में 26 मासूमों की जान लेने वाली आतंकी आग की चिनगारियों ने हर भारतीय के दिल को छलनी कर दिया है। खून से सनी वह धरती आज केवल शोक में ही नहीं, बल्कि एक उफनते हुए रोष के सैलाब में भी डूबी है। इस दर्द के बीच भारत सरकार ने अटारी-वाघा सीमा बंद करने और सिंधु जल समझौते को स्थगित करने का कड़ा फैसला लिया। यह कदम न सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा की पुकार है, बल्कि उन माँओं, बच्चों और परिवारों के आँसुओं को पोंछने की कोशिश भी, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। लेकिन सवाल यह भी है कि इस फैसले के सामाजिक, आर्थिक, सामरिक, राजनीतिक और कूटनीतिक परिणाम क्या होंगे।

इस फैसले के औचित्य को समझने के लिए यह याद करना ज़रूरी है कि पहलगाम की त्रासदी कोई पहला घाव नहीं। बार-बार सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद ने भारत की धरती को लहूलुहान किया है। अटारी-वाघा, जो कभी दो पड़ोसियों के बीच दोस्ती का प्रतीक था, आज आतंक के साये में है। भारत का यह फैसला उस आक्रोश का प्रतीक है, जो उस समय हर भारतीय के सीने में धधक रहा है। यह पाकिस्तान को कड़ा संदेश है कि खून की होली खेलने वालों को अब बख्शा नहीं जाएगा।

सामाजिक दर्द को महसूस करने वाले याद दिला रहे हैं कि अटारी-वाघा की ‘बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी’ हर शाम अमृतसर और लाहौर के लोगों को जोड़ती थी। वह डुगडुगी, वह जोश, वह देशभक्ति का ज्वार - अब सब खामोश है। स्थानीय लोग, जो इस सीमा पर पर्यटकों के भरोसे जीते थे, अब उदास हैं। फिर भी, पहलगाम में बिखरे शवों के सामने यह खामोशी ज़रूरी है। हर भारतीय जानता है कि सुरक्षा से बड़ा कोई सुख नहीं।

 

इस कठोर फैसले के आर्थिक पहलू की बात करें तो, बेशक सीमा बंद होने से दोनों देशों का व्यापार ठप होगा। पंजाब के किसान, छोटे व्यापारी और ट्रांसपोर्टर इसकी मार झेलेंगे। लेकिन क्या मासूमों के खून से सने चंद सिक्के हमें सुकून दे सकते हैं? भारत की मज़बूत अर्थव्यवस्था इस झटके को सह लेगी, पर पाकिस्तान की कमज़ोर अर्थव्यवस्था शायद इस आर्थिक चोट को इतनी आसानी से न झेल पाए। उनके लिए यह एक सबक है कि आतंक का रास्ता  आखिर सर्वनाश  के अंधे कुऍं तक पहुँचता है।

दरअसल वाघा बॉर्डर को बंद करना आतंकवाद की फैक्टरी चलाने वाले देश पाकिस्तान को भारत के चौतरफा सामरिक और राजनीतिक जवाब का अहम हिस्सा है।  यह फैसला भारत की आक्रामक रक्षा नीति का ऐलान है। सिंधु जल समझौते के स्थगन के साथ यह कदम पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका है; जीवनरेखा का खंडित जो जाना है। घरेलू मोर्चे पर, यह कदम हर उस भारतीय को संतोष देगा, जो आतंक के खिलाफ कड़ा जवाब चाहता है। यह बात अलग है कि इससे इस इलाके में तनाव भी बढ़ जाएगा। यों, भारत को अब और सजगता से अपने कदम रखने होंगे।

रही कूटनीतिक असर की बात, तो यह कहा जा सकता है कि  वैश्विक मंचों पर भारत का यह कदम आतंकवाद के खिलाफ उसकी अटल आवाज़ को और बुलंद करेगा। अमेरिका, यूरोप जैसे देश, जो आतंक के खिलाफ हैं, भारत के साथ खड़े होंगे। लेकिन, यह भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान खीझभरी जवाबी कार्रवाइयों से बाज़ नहीं आएगा। अतः, भारत को अपनी कूटनीति को और धार देनी होगी, ताकि दुनिया हमारी पीड़ा और रोष को समझे।

कुल मिलाकर, पहलगाम के घाव गहरे हैं। हर भारतीय का दिल आज शोक और गुस्से से भरा है। अटारी-वाघा का बंद दरवाजा उस दर्द की गूँज है, जो हमें बार-बार निर्दोष पर्यटकों के खून की कीमत वसूलने को मजबूर करतीर है। यह फैसला सही है, क्योंकि भारतमाता के बच्चों का खून सस्ता नहीं। अब वक़्त है कि भारत एकजुट होकर  अपनी ताकत और कूटनीति से दुनिया को बताए कि हम शांति चाहते हैं, पर कमज़ोर नहीं हैं।

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डॉ. ऋषभदेव शर्मा

सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा

हैदराबाद



जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...