हम
उस दौर के राही हैं
मोहिनी
शर्मा
हम
उस दौर के राही हैं
अनगिनत
रिश्तों का परिवेश मिला,
अनगिनत
रिश्तों का अहसास मिला।
अनगिनत
रिश्तों से पहचान मिली,
अनगिनत
रिश्तों से पनपे थे।
हम
उस दौर के राही हैं।
जब
तर्क का स्थान ज्ञान से था,
बुनियाद
विश्वास पर रहती थी।
आंगन
में अपना-पराया न था,
हर
काम में सांझ झलकती थी।
रिश्तों
की गोद में पले-बढ़े।
हम
उस दौर के राही हैं।
घर-आंगन
की बेटी,समाज की बेटी रहती थी।
ऐसे
अहसासों में ही रिश्ते जिंदा रहते थे।
बड़ों
का नाम ही ,वंश की पहचान बनती थी।
वंशावली
में रिश्ते सुरक्षित रहते थे।
हम
उस दौर के राही हैं।
गुरुजन
का स्थान विशेष था, भविष्य निर्माण में आज़ादी
थी।
शिष्य
आस्था से ज्ञान प्राप्त कर, मंजिल तक पहुंचते थे।
बड़ो
के दिए उपदेश ही, संस्कार बन जाते थे।
हम
उस दौर के राही हैं।
अब आंगन का स्थान लिया कमरे ने,
अनगिनत रिश्तों का एकल परिवारों ने।
भविष्य
दिशाहीन हुआ,
बेटी रिश्तों में ही असुरक्षित हुई।
अब
हम इस दौर के राही हैं।
रिश्तों
की पहचान नई पीढ़ी तक पहुँचाने में,
हमें
प्रयासरत रहना होगा।
शेष
रह गए रिश्तों की संभाल, आधुनिकता को सौंप पाएँ हम।
परंपराओं,संस्कारों,रिश्तों,अहसासों को
साथ लिए,
नई
पीढ़ी को दिशा दे पाएँ।
अब
इस दौर के राही बनें, अब इस दौर के राही बनें।
***
मोहिनी शर्मा
सेवानिवृत शिक्षिका
शिक्षा विभाग, चंडीगढ़


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