शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

सामयिक टिप्पणी

गाँधी जी की प्रतिमा को चोर ले गए!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

मेलबर्न के रोवविले में ऑस्ट्रेलियन इंडियन कम्युनिटी सेंटर के बाहर खड़ी महात्मा गाँधी की 426 किलोग्राम की कांस्य प्रतिमा चोरी हो गई! तीन मुखौटाधारी चोरों ने आधी रात एंगल ग्राइंडर चलाकर उसे पैरों से काट लिया। सीसीटीवी ने सब दर्ज किया - काटना, उठाना, भागना। बचे सिर्फ पैर, चप्पलों सहित; और उनके इर्द-गिर्द फूलों की माला। कोई ज़रूरतमंद ही रहे होंगे। तभी तो गाँधी जी बिना पैरों ही उनके साथ चलने को राजी हो गए! अस्तु, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) द्वारा 2021 में दी गई इस प्रतिमा की तलाश अब स्क्रैप मार्केट में की जा रही है। पुलिस ने डीलरों को अलर्ट जारी किया है - “कोई कांस्य गाँधी बेचने आए तो फौरन बताना।”

इस चोरी की भारत सरकार ने विदेश मंत्रालय के जरिए कड़ी निंदा की है- तत्काल कार्रवाई की जाए, अपराधी पकड़े जाएँ, प्रतिमा बरामद की जाए। कूटनीतिक बयान तो बनता है। इसके अलावा और किया भी क्या जा सकता है? हाँ, सयाने चाहें तो यह पूछ सकते हैं कि, जहाँ गाँधी के सिद्धांतों की लूट दशकों से खुलेआम चल रही है, वहाँ उनकी कांस्य प्रतिमा की चोरी पर इतना हल्ला क्यों? धातु अधिक मूल्यवान है या सिद्धांत?

चोरों ने कम से कम ईमानदारी तो दिखाई। सोचा होगा, यह कांस्य है, बाजार में अच्छी कीमत मिलेगी। पिघलाकर कोई बर्तन बन जाएगा, कोई हथियार, कोई उपयोगी चीज। गाँधी जी हैं, तो पिघल भी आसानी से जाएँगे - करुणा के अवतार जो ठहरे। आखिर हम भी तो बरसों से तपा-तपाकर पिघला ही तो रहे हैं - राजनीति की आँच में, चुनाव के भट्ठी पर! गाँधी जी तो कबके गल  गए। प्रतीक में ढल गए। चुनावी पोस्टरों पर, भाषणों में, जयंती पर फोटो सेशन में! सिद्धांत? वह तो सालों पहले स्क्रैप हो चुका! अहिंसा का उपदेश देते हुए हम हिंसा की राजनीति करते हैं! सत्य की बात करते हुए झूठ का कारोबार चलाते हैं! स्वदेशी का नारा लगाते हुए विदेशी सामान से महल भरते हैं! चरखा? वह अब सिर्फ संग्रहालय की सजावट है!

वैसे, सयाने बता रहे हैं कि यह प्रतिमा 2021 से, पहले दिन से ही, निशाने पर थी।  खालिस्तान समर्थकों ने जाने क्या-क्या लिखा, या उकेरा; या शायद किसी और ने। लेकिन अब चोरी। कोई नारा नहीं, कोई संदेश नहीं। सिर्फ लालच। दुनिया भले ही गाँधी को शांति का प्रतीक मानती रहे, चोरों ने तो उनके प्रतीक को स्क्रैप में बदल दिया न! क्या फर्क है उनमें और हममें? हमने भी तो गाँधी के सिद्धांतों को स्क्रैप में ही बदल छोड़ा है न!

शायद प्रतिमा के बचे हुए पैर अब किसी संग्रहालय में सजा दिए जाएँ। अलग-अलग कोणों से लिए गए उनके चित्र कलाप्रेमियों के ड्राइंग रूम की शोभा भी बन सकते हैं। गाँधी जी से महँगे उनके पाँव - जिन्हें चोर भी न हिला सके! जी हाँ, सिर्फ पैर बचे हैं। चप्पलें टूटी हुईं, पर मजबूत। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि! जैसे कह रहे हों- मेरे पैरों को, मेरी गति को न शस्त्र काट सकते हैं, न चोर चुरा सकते हैं! हिम्मत हो तो आओ चलो मेरे साथ! दुर्भाग्य हमारे समय का यही है कि गाँधी को चुरा तो सब रहे हैं, पर कोई उनके साथ चलने का जीवट नहीं जुटा पाता। गाँधी चाहते थे कि ज़मीन पर कहीं भी हिंसा के लिए जगह न बचे। लेकिन युद्धजीवी पीढ़ियों ने सारी धरती को हिंसा से पाट दिया है। सत्य, अहिंसा और प्रेम को पाखंड में बदल दिया है। जो युद्धों के सूत्रधार हैं, वे ही शांति पुरस्कार के दावेदार हैं। आज गाँधी की प्रतिमा के लायक जगह बची ही कहाँ है? हमने अहिंसा को इतना संकुचित कर दिया कि वह किताबों और मूर्तियों में कैद हो गई। अब चोरों ने उसका भी अपहरण कर लिया!

तो, हे मुखौटाधारी चोरों! अभिनंदन है तुम्हारा। तुमने गाँधी जी को उपयोगी बना दिया। हम तो उन्हें सिर्फ फूल चढ़ाते थे - अनुपयोगी! तुम पिघलाकर कुछ बनाओगे - शायद कोई उपयोगी वस्तु!  गाँधी तो सबके हैं न?




डॉ. ऋषभदेव शर्मा

सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा

हैदराबाद

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