साढ़े
चौहत्तर
सुरेश
चौधरी
बचपन की बात है शायद 10-12 वर्ष का रहा होऊँगा हल्की
स्मृति है, एक
चिट्ठी आयी थी उस पर 74½ लिखा था मैंने बाबू जी से पूछा था यह क्या है तब उन्होंने बताया था कि यह
साढ़े चौहत्तर एक कसम है गोपनीयता की जो सरकारी
सील से भी ज्यादा महत्व पूर्ण है यह कहती ही कसम तुम्हे उन साढ़े चौहत्तर मन जनेऊ की जो तुमने इस पत्र की गोपनीयता को
तोड़ा।
तब मैंने पूरे इतिहास को और इसके पीछे की कहानी को जानना
चाहा और फिर जो जाना तो रौंगटे खड़े हो गए तब विस्तृत कहानी नहीं जानता था। अंतराल
में चितौड़ पर एक महाकाव्य के लेखन के क्रम में विस्तार से जाना तो यह कथा पता चली
शायद आपका भी लहू खौलने लगे ।
इतिहास का वह दिन था 23 फरवरी 1568 का जी हाँ 23 फरवरी
ठीक आज से 458 वर्ष पूर्व , ऐसी घटना हुई थी जो भारत के इतिहास का कलंक थी परंतु किसी इतिहासकार ने
इसका उल्लेख नहीं किया है न हमे किसी पाठ्यक्रम में पढ़ाया गया है।
भारत के इतिहास में कुल 12 जौहर और साकाओं का विवरण है
उसमें 3 चित्तौड़ में हुए पहला रानी पद्मनी का दूसरा राजा उदय सिंह की माता रानी
कर्णावती का जब उसने उदय सिंह को पन्ना धाय को सौंप कर किया था। इन तीन में सबसे
खूंखार और विभत्स था इस दिन 23 फरवरी को अकबर द ग्रेट" के सौजन्य से ।
हमारे इतिहास की बुनियाद डिस्कवरी ऑफ इंडिया है जिसे
लिखा है श्री नेहरू ने और श्री नेहरू ने पढ़ा यह इतिहास पाश्चत्य देश की शिक्षा से।
देखिये "अकबर द ग्रेट" के खुद के इतिहासकार अबुल फजल चितौड़ विजय के बारे
में क्या लिखते हैं:
“अकबर के आदेशानुसार प्रथम ८००० राजपूत योद्धाओं को बंदी
बना लिया गया और बाद में उनका वध कर दिया गया। उनके साथ-साथ विजय के बाद प्रात:काल
से दोपहर तक अन्य ४०००० किसानों का भी वध कर दिया गया जिनमें ३००० बच्चे और बूढ़े
थे।”
(अकबरनामा, अबुल फजल, अनुवाद एच. बैबरिज)
जिस समय युद्ध का बिगुल बजा तब 25 अक्टूबर 1567 में उदय
सिंह उदयपुर की सुरक्षा के लिए पीछे हट गए और किले के अंदर रहने वाले 60,000
नागरिकों के साथ चित्तौड़ की रक्षा के लिए 8,000 योद्धाओं को छोड़ दिया। इनमे
राजपूतों के दो प्रमुख योद्धा जयमल राठौर और पत्ता चुंडावत थे। किले के अंदर अन्य
लोग सैदास रावत, बल्लू
सोलंकी,
ठाकुर सांडा और ईसरदास चौहान थे। राजपूतों ने इतने दिनों
मुग़लों को रोक रखा पर जब राशन की समाप्ति हो गयी तब इन्होंने चितौड़ के किले का
द्वार खोल दिया। चित्तौड़ की पराजय होगी यह सोच
महारानी जयमाल मेतावाड़िया समेत १२००० क्षत्राणियों ने मुगलों के
हरम में जाने की अपेक्षा जौहर की अग्नि में स्वयं को
जलाकर भस्म कर लिया। जरा कल्पना कीजिए विशाल गड्ढों में धधकती आग और दिल दहला देने
वाली चीखों-पुकार के बीच उसमें कूदती १२००० महिलाएँ ।
८००० युवक राजपूतों ने माथे पर इस जोहर की राख लगा शाका किया,
शाका कहते हैं कि वे युद्ध मे मरने के लिए निकल पड़े,
एक एक योद्धा ने सैकड़ों का वध किया पर मुग़ल की सवा लाख
की सेना के सामने कैसे टिकते।
उस एक दिन में मुग़लों ने 8000 राजपूतों के वीरगति
प्राप्त होने के बाद 60000 किसानों,
वृद्ध और बच्चों का कत्ल आम किया । बच्चों को भले की नोक पर उछाल उछाल कर मारा गया
वृद्धों को तड़पा तड़पा कर। ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड लिखते हैं -
"अकबर ने अपनी सफलता को मारे गए हिंदुओं की गर्दन से ली गई जनेउ की मात्रा से
मापा जो कि साढ़े चौहत्तर मन हुई। एक मन
40 सेर का होता है। तो उस काले दिन में मारे गए हिंदुओं पर जनेऊ के धागों
का भार 2,980 सेर था।अंदाज एक जनेऊ एक छंटाक की होती है तो 47680 हुए। ऐसा कत्ले आम भारत के इतिहास
में कभी न हुआ। सुन कर पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
उसके बाद भी जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ”डिस्कवरी
ऑफ इण्डिया” में अकबर को ‘महान’ कहकर उसकी प्रशंसा की है। हमारे कम्युनिस्ट
इतिहासकारों ने भी अकबर को एक परोपकारी उदार, दयालु और धर्मनिरपेक्ष शासक बताया है।
अकबर के जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकार विंसेट स्मिथ
ने साफ़ लिखा है कि अकबर एक दुष्कर्मी, घृणित एवं नृशंस-हत्याकांड करने वाला क्रूर शासक था।
चित्तौड़ की विजय के बाद अकबर ने कुछ फतहनामें प्रसारित
करवाये थे। जिससे हिन्दुओं के प्रति उसकी गहन आन्तरिक घृणा प्रकाशित हो गई थी।
उनमें से एक फतहनामा पढ़िये-
“अल्लाह की ख्याति बढ़े,, इसके लिए हमारे कर्तव्य परायण मुजाहिदीनों ने अपवित्र
काफिरों को अपनी बिजली की तरह चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर दिया।
“हमने अपना बहुमूल्य समय और अपनी शक्ति घिज़ा (जिहाद एक
अरबी शब्द अर्थात् धर्म युद्ध अर्थ गैर मुस्लिमों का छल कपट से कटाई और गैर
मुस्लिम स्त्रियों को वेश्या बनाना) में ही लगा दिया है और अल्लाह के सहयोग से
काफिरों के अधीन बस्तियों, किलों, शहरों
को विजय कर अपने अधीन कर लिया है। कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और उन सभी का
विनाश कर दे। हमने पूजा स्थलों उसकी मूर्तियों को और काफिरों के अन्य स्थानों का
विध्वंस कर दिया है।”
(फतहनामा-ई-चित्तौड़ मार्च १५८६,नई दिल्ली)
हमे अपने इतिहास को फिर से पढ़ना होगा लिखना होगा। बाद
ताज्जुब होता है जब हम स्कूल में पढ़ते हैं कि मुग़ल कालीन डेढ़ सौ वर्ष सर्वाधिक
विकास के दिन थे। हम खाली 1000 वर्ष मेवाड़ के इतिहास पढ़े,
अहोम को पढ़े, गुप्त पढ़े विजयनगर राज्य पढ़े सब के शासन काल के उत्थान
को पढ़े और ये शासन डेढ़ सौ साल नही 300 से 700 वर्ष के थे। परन्तु इतिहास के पन्नो
से इनके नाम गायब हैं और मुग़ल महान हैं।
***
सुरेश चौधरी
एकता
हिबिसकस
56 क्रिस्टोफर रोड
कोलकाता
700046


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