वसन्त
जब आता है
पार्वती
देवी ‘गौरा’
सच
है वसन्त जब आता है
विरहिन
को ही तरसाता है
पुष्प
महकने जब लगते
प्रियतम
की याद दिलाता है।
सच
है----
दिन
बीतता गिन-गिन कर
करवट
लेकर बीते रातें
आँखों
की निदिया लेकर वह
जाने कहाँ उड़ जाता है ।
सच
है ---
अश्रु
गिरे नैनों से झर-झर
मन
व्याकुल हो जाता है
विह्वल
होकर इधर-उधर
फिर
खुद को समझाता है।
सच
है--
पापी
पपिहा जब भी बोले
दिल
को बहुत जलाता है
चमक
चांदनी नभ में ऊपर
लगता
उसे चिढ़ाता है।
सच
है--
कोयल
की मीठी बोली
तन-मन
आग लगाता है
आम्र
मंजरी की सुगंध
सुधियों
को सरसाता है।
सच
है---
पार्वती
देवी ‘गौरा’
देवरिया


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