बीज
डॉ.
सुरिन्दर कुमार
बीज,
तुम
में,
छिपे हैं,
निर्विकल्प
आकार ।
तुम
हो स्रष्टा,
नव-सृष्टि
के ।
तुम्हीं
हो,
प्रारब्ध,
इति
के।
तुम्हीं
हो,
अस्वादित,
स्वादों
का आधार।
तुम
हो,
त्रिकाल
दर्शी,
भूत,
भविष्य,और वर्तमान के।
तुम
हो,
त्रिगुणी।
सत्व,
रजस, तमस से है,
अटूट
सम्बन्ध,
तुम्हारा ।
***
डॉ. सुरिन्दर कुमार
पंचकूला


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