शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

गीत

 

वासंती दिन आए

डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

वासंती दिन आए मोहक फूल खिले हैं

 सरसों अलसी फिर से गले मिले हैं।।

  बदला मौसम शिशिर हेमंत सब पीछे छूटे

 लहराती फसलों में नव कोंपल फूटे।

ऊर्जस्वित हो नयी कोंपलें आने वाली

बागों में दिख रही  छटा है यहां निराली।

पुरुवाई चल रही मंद रस घुले घुले हैं

 सरसों अलसी फिर से गले मिले हैं।।

    वासंती दिन आए...................।

अमराई की छटा चमक है मंजरियों से

कुछ की आभा चमक रही  नव कलियों से।

भ्रमर करें गुञ्जार शब्द से नये मिले हैं,

उड़ते ऐसे जैसे बरसों बाद मिले हैं।

दमक रहे वन में टेसू फूल खिले हैं

 सरसों अलसी फिर से गले मिले हैं।।

      वासंती दिन आए.................।।

करती वसुधा शृंगार वसन संग धानी चूनर

शस्य श्यामला हो बजते हैं जिसके घूंघर।

नव वसना धरणी के ऐसे भाग्य खुले हैं

करती कोयल कूक सुरों से जो निकले हैं।

नये रसों के आगम से हिय हिय पिघले हैं

 सरसों अलसी फिर से गले मिले हैं।।

    वासंती दिन आए.................।।

***


डॉ. मोहन पाण्डेय भ्रमर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

पुस्तक चर्चा

  हाना (हाइगा संग्रह) सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ प्रिय मित्र कंचन जी , आदरणीया ऋता शेखर दी एवं चित्रकार प्रियांशू डोकानिया जी का साझा   हाइग...