शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

गीत

 

मेरा मीत

      

इन्द्रकुमार दीक्षित 

   तुम प्रलय के राज पथ की स्वामिनी हो,

   हृदय- तल में  मैं तुम्हें कैसे बिठाऊँ।।

 

 

     दिया विधि ने रूप ये अंगार जैसा,

    फिर भला रत्नाभरण शृंगार कैसा।

    दीप्ति बनकर जो दिये में जल रही है,

    रश्मिरेखा ज्योतिपथ पर चल रही है।।

     मैं अगम पाताल तल का हूँ,बटोही ,

     मिलन का विश्वास मैं कैसे दिलाऊँ।।

 

      साँस में सुरभित पवन का बास लेकर,

  छ्लकती मधुयामिनी ,परिहास लेकर।

      वेदमंत्रों की ऋचा सी जो मुखर है,

      यज्ञ-ज्वाला की शिखा-सी जो प्रखर है।

      मैं मलिन हूँ  सिंधु के अहिफेन  जैसा,

      रत्न हूँएहसास मैं कैसे दिलाऊँ।।

 

      तुम अबींधे  मोतियों का हार लगती,

      पर्ण पल्लव-गुँथी  वंदनवार लगती,

 ओस के जल विन्दु-सी तुम झिलमिलाती,

     वन्दना के छंद बन तुम खिलखिलाती ।।

    एक पारावार भरकर अंजली  में ,

    तृषित अधरों से कहो कैसे लगाऊँ।।

 

      गंग धारा सी  चपल  गतिमान हो तुम,

  उर्मियों में दीप्ति का प्रतिमान हो तुम ।

       कूल से टकरा नहीं क्षण भर ठहरती,

   बाहुओं की परिधि लघु , उद्दाम हो तुम।।

   एक यवनिका सामने अदृश्य होकर तनी है,

    कहाँ कोई ठौर, सिर जिस पर झुकाऊँ।।

 

  तुम प्रलय के राजपथ की स्वामिनी हो ,

  हृदय ~ तल पर मैं तुम्हें कैसे बिठाऊँ।।

***

       

इन्द्रकुमार दीक्षित

देवरिया


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