आनंदवर्धक छंद
1
कुटुंब
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश
एक चूल्हा एक
बर्तन थे कभी ।
दो अलग तन एक से मन थे कभी ।।
एक आँगन में कभी सोते सभी ।
दुःख दूजे का मगर रोते सभी ।।
स्वप्न से धूमिल हुए क्यों दृश्य ये ।
गर्दिशों
की धूल में
अदृश्य ये ।।
पीढियाँ ऐसे कहाँ अब मिल रहीं ।
प्रेम की कलियाँ नहीं अब खिल रहीं ।।
नंद भौजायी कहाँ
अब साथ हैं।
काम में बँटता नहीं अब हाथ है ।।
अब रसोई भी कहाँ पर एक है ।
मन हृदय सबके नहीं अब नेक हैँ ।।
सब हुए अपने
पराये अब यहाँ ।
ये घरौंदे टूटकर
जाये कहाँ ।।
बन रहीं सबकी अलग अब रोटियाँ ।
अब नहीं अपनी लगें सब बेटियाँ ।।
***
विधाता
छंद
2
श्री
रामचरितमानस
पुरातन
ग्रन्थ ये अपना,
हमें जीना सिखाता है।
सिया
श्रीराम-अमृत नित,
हमें पीना सिखाता
है।।
चले जो
दम्भ से तन के,
उसी की हार होती
है।
जहाँ
हैं शील मर्यादा ,
वहीं जयकार होती है।।
रहे आदर्श अंतस में,
वही तो राम है बनता ।
जपे
जो राम की माला,
उसी का काम भी बनता ।।
नहीं
आसान है मुख को,
सभी से मोड़ के जाना।
निभाने
पितृ-वचनों को,
सुखों को छोड़कर जाना।।
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश
जबलपुर



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