शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

कविता



आनंदवर्धक छंद

 

1

कुटुंब

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

एक  चूल्हा  एक  बर्तन  थे  कभी

दो अलग तन एक से मन थे कभी ।।

एक आँगन में कभी सोते सभी

दुःख  दूजे  का मगर रोते सभी ।।

 

स्वप्न से धूमिल हुए क्यों दृश्य ये

गर्दिशों  की  धूल  में  अदृश्य ये ।।

पीढियाँ ऐसे कहाँ अब मिल रहीं

प्रेम की कलियाँ नहीं अब खिल रहीं ।।

 

नंद  भौजायी कहाँ अब साथ हैं

काम में बँटता नहीं अब हाथ है ।।

अब  रसोई  भी कहाँ पर एक है

मन हृदय सबके नहीं अब नेक हैँ ।।

 

सब हुए अपने  पराये अब यहाँ

ये   घरौंदे  टूटकर  जाये  कहाँ ।।

बन रहीं सबकी अलग अब रोटियाँ

अब  नहीं  अपनी लगें सब बेटियाँ ।।

***

विधाता छंद

2

श्री रामचरितमानस 


पुरातन ग्रन्थ ये अपना,

             हमें जीना सिखाता है।

 

सिया श्रीराम-अमृत नित,

               हमें पीना सिखाता है।।

 

चले  जो  दम्भ से तन के,

                उसी की हार होती है।

 

जहाँ हैं  शील मर्यादा ,

              वहीं जयकार होती है।।

 

 

रहे  आदर्श अंतस में,

            वही तो  राम है बनता ।

 

जपे जो राम की माला,

         उसी का काम भी बनता ।।

 

नहीं आसान है मुख को,

             सभी से मोड़ के जाना।

 

निभाने पितृ-वचनों को,

        सुखों को छोड़कर जाना।।

 


डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

फरवरी 2026, अंक 68

शब्द-सृष्टि फरवरी 2026, अंक 68     मुक्तक – नव संवत्सर – डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा कविता – बसंत राग – दुष्यन्त कुमार व्यास विशेष – !!प्रेम न हा...