बसंत राग
दुष्यन्त कुमार व्यास
पुरवा बहती धीरे-धीरे, मद्धम-मद्धम शोर करे ।
प्रियतम के आने की बतियाँ, गाकर मन में भोर करे।।
पीला पहनो पीला ओढ़ो ,
और पिया की बात करो।
पीली सरसों खेत खड़ी है,
पिया संग में रास करो।
प्रियतम ने भेजी है पतिया,
पीले चावल भेजें हैं।
प्राणों से प्यारी हो पगली,
अगनित चुम्बन भेजें हैं।
ऋतु बदली है धीरे-धीरे,काम हृदय में ज्वार भरे।
इस कारण तो षड्ऋतुओं पर,यह बसंत अब राज करे ।।
पवन बसंती पीली चूनर ,
गेहूँ की पीली बाली ।
आज पपीहा पापी बोले,
पिहू-पिहू करके आली।।
पत्ता-पत्ता महक रहा है,
नवपल्लव की धूम लगी।
फगुनाहट के ढोल सुहाने,
पिया मिलन की आस जगी।
पहलौठी का सूरज गोदी, और महावर पैर धरे।
बेटे की माता कहलाकर, सारे घर में राज करे।।
टेसू केसर से दमके तो,
आज मदन ज्वाला भड़की।
सेमल के फूलों से जैसे ,
कुंजों में अगनी दहकी।
महुआ गमक रहा पेड़ों पर,
हवा नशीली हो आई।
आज पिया ने थामी बहियाँ,
अँगिया ढीली हो पाई।
कंगन बाजे नथनी काँपे, कमरबंद कटि को हेरे।
कामिनियों के मन पर मनसिज, पापी बन कर राज करे।।
मदन चलाता पंच बाण है,
हाथों में लेकर सायक।
कुसुमाकर के तीर मृदुल हैं,
और कुसुम उनके वाहक।
चाह जगाता, प्यास बढ़ाता,
लगा प्रेम की चिनगारी।
रसिक जनों के ह्रदय बींधता,
मन्मथ देता मधु-गारी।
तृषित जनों को देकर प्याला,नयनों से वह वार करे।
भू भृंगी से चैन चुराकर,अबला सब पर राज करे।।
छह ऋतुएँ हैं कालचक्र की,
करी
समय की शुभ गणना।
पतझड़ को पीछे छोड़ा था,
दिया धरा को नव गहना।
नवल पात नव कुसुम राग नव,
नव पर नव दी फुलवारी।
नव जीवन का नया मंत्र
दे ,
नई सृष्टि की तैयारी।
नव कानन में डाले झूले, नव प्यारी ज्यौं पैंग भरे।
जगे काम के सारे साथी, कुसुमाकर तब राज करे ।।
***
दुष्यन्त कुमार व्यास
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्राध्यापक(गणित)
कस्तूरबा नगर गली नंबर 6
रतलाम - मध्यप्रदेश


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