शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

मुक्तक

नव संवत्सर

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

 

स्वागत हो नवागत का, है बेला हर्ष की आई

गूँजे ज्ञान की वीणा, बजे खुशियों की शहनाई

किरण कलियों से कहती है गाओ, मुस्कुराओ तुम

पताका स्नेह-सौरभ की पवन ने आन फहराई ।

 

कटें कंटक सभी पथ के, रहे निर्मूल बाधाएँ

परस्पर प्रेम के बंधन, बंधे फिर छूट न जाएँ

हो दीपित आस का दीपक, रहे उजियार हर मन में

जगमग जगमगाए जग, विजय अँधियार पर पाएँ ।।

 

 

सरस सद्भावनाओं का, हृदय को घर बनाना है

दया, ममता से, धीरज से, फिर उसको सजाना है

नवल है वर्ष, लें संकल्प, सभी कल्याण से पूरित

सभी को प्यार देना है, सभी से प्यार पाना है ।

 

विश्व बन्धुत्व थाती है, इसे मन में बसाना तुम

चरण की रज जिसे समझा, माथे से लगाना तुम

क्षमा और शीलता की भी, बना करके हदें रखना

सबक इतिहास से सीखा, उसे मत भूल जाना तुम ।।

 

नियम से है बँधा जग ये, धर्म सारे बताते हैं जीवन-पथ के साथी हैं, सुख-दुख आते जाते हैं

निराशा और हताशा का, करें निस्तार निज मन से

आशा और उमंगों से चलो इसको सजाते हैं ।। 



डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

वापी, गुजरात

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