हिन्दी सिनेमा का अनमोल मोती - मदर इंडिया
गौतम कुमार सागर
“लाला मेरी माँ के कंगन लौटा दे”
“मैं एक औरत हूँ, मैं बेटा दे सकती हूँ, लाज नहीं”
ये संवाद हिन्दी सिनेमा के प्रेमियों के कानों में आज भी गूंजते होंगे।
हिन्दी साहित्य में जो क्लाससिक दर्ज़ा गोदान को प्राप्त है वही दर्ज़ा हिन्दी
सिनेमा में “ मदर इंडिया” को मिला है। यह फिल्म एक फिल्म न होकर आज़ादी के बाद के
भारत के ग्रामीण जीवन के दुर्घष संघर्षों का बहुरंगी ( मल्टी कलर ) दस्तावेज़ हैं ।
एक स्त्री के विभिन्न पहलुओं को रजत पर्दे पर उतारा गया। उस पुरातन पंथी
समाज में जहाँ स्त्री को केवल ममता की मूरत या प्यारी पत्नी/असहाय प्रेमिका के रूप में देखा जाता था , इस चलचित्र ने प्रचलित मानकों को ध्वस्त करते हुये, यह भी दिखाया कि वह भी एक पुरुष की भाँति अपने खेतों में हल चला सकती है।
वह भी अपने प्रिय पुत्र को किसी औरत पर हाथ डालने की कोशिश में उसकी जान ले सकती
है।
यह चलचित्र एक विमर्श की तरह है जहाँ चरम पर पहुँची साहूकारी से त्रस्त
ग्रामीण जीवन को दर्शाया गया है तो कृषि जीवन के आपदाओं को भी बड़ी सूक्ष्मता से
निरूपित किया गया है।
‘मदर इंडिया’ महमूद खान की बनाई हुई मास्टर पीस है जो 1957 में रिलीज हुई थी। महबूब खान को
इस फिल्म के निर्माण की प्रेरणा ‘द गुड अर्थ’ (1931) और ‘द मदर’ (1934) नामक किताबों से मिली। ये दोनों ही किताबें प्रसिद्ध अमेरिकन लेखक पर्ल
एस. बक ने लिखी थीं।
कहा जाता है कि यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे महँगी फिल्म थी और उस समय किसी भी भारतीय फिल्म ने सबसे ज्यादा कमाई की थी। मुद्रास्फीति को समायोजित कर के देखा जाए तो, मदर इंडिया अभी भी सभी भारतीय बॉक्स ऑफिस हिट्स में शुमार है। तब फिल्म
निर्माण का बजट 40 लाख रखा गया था, जो बढ़ कर 60 लाख के पार चला गया था।
फिल्म के तीन प्रमुख किरदार राधा ( नर्गिस ) , रामू ( राजेंद्र कुमार ) और बिरजू ( सुनील दत्त) के इर्द गिर्द घूमती है।
इसमें सुखी लाला ( कन्हैयालाल ) लालची साहूकार के किरदार में तत्कालीन ऋण
–व्यवस्था को दिखाया गया है कि कैसे महाजन और साहूकार ग्रामीणों को ऋण –दुष्चक्र
में फँसाकर उसका ही नहीं बल्कि उनकी नस्लों का भी शोषण करते थे।
फिल्म की कहानी संक्षिप्त में इस प्रकार है :-
फिल्म की शुरुआत में राधा (नर्गिस), गाँव की माँ के रूप में, नहर का
उद्घाटन करती है और फिर कहानी फ़्लैश बैक
में चली जाती है।
राधा और शामू (राज कुमार) की शादी का ख़र्चा राधा की सास ने सुखीलाला से
उधार लेकर उठाया था। इस के कारण गरीबी और मेहनत के कभी न खत्म होने वाले चक्रव्यूह
में राधा फँस जाती है। उधार की शर्तें विवादास्पद होती है परन्तु गाँव के सरपंच
सुखीलाला के हित में फैसला सुनाते हैं जिसके तहत शामू और राधा को अपनी फ़सल का एक
तिहाई हिस्सा सुखीलाला को 500 रुपये के
ब्याज़ के तौर पर देना होगा। अपनी गरीबी को मिटाने के लिए शामू अपनी ज़मीन की
जुताई करने की कोशिश करता है परन्तु एक पत्थर तले उसके दोनों हाथ कुचले जाते है।
अपनी मजबूरी से शर्मिंदा व औरों द्वारा बेइज़्ज़ती के कारण वह फैसला करता है कि वह
अपने परिवार के किसी काम का नहीं और उन्हें छोड़ कर हमेशा के लिए चले जाता है।
जल्द ही राधा की सास भी गुज़र जाती है। राधा अपने दोनों बेटों के साथ खेतों में
काम करना जारी रखती है और एक और बेटे को जन्म देती है। सुखीलाला उसे अपनी गरीबी
दूर करने के लिए खुद से शादी करने का प्रस्ताव रखता है पर राधा खुद को बेचने से
इंकार कर देती है। एक सैलाब गाँव को अपनी चपेट में ले लेता है और सारी फ़सल नष्ट
हो जाती है। तूफ़ान में राधा का छोटा बेटा मारा जाता है। सारा गाँव पलायन करने
लगता है परन्तु राधा के मनाने पर सभी रुक कर वापस गाँव को स्थापित करने की कोशिश
करते है।
फ़िल्म कई साल आगे पहुँचती है जब राधा के दोनों बचे हुए बेटे, बिरजू (सुनील दत्त) और रामू (राजेंद्र कुमार) अब बड़े हो चुके है। बिरजू
बागी किस्म का है , वह सुखी लाला से बदला लेना चाहता है। इसके विपरीत रामू
बेहद शांत स्वभाव का है। बिरजू का वर्षों पुराना प्रतिशोध आख़िरकार ख़तरनाक रूप ले
लेता है और उकसाने पर सुखीलाला और उसकी बेटी पर हमला कर देता है। उसे गाँव से
निकाल दिया जाता है और वह एक डाकू बन जाता है। सुखीलाला की बेटी की शादी के दिन वह
बदला लेने वापस आता है और सुखीलाला को मार कर उसकी बेटी को भगा ले जाने की कोशिश
करता है। राधा, जिसने यह वादा किया था कि बिरजू किसी को कोई हानि नहीं
पहुँचाएगा, बिरजू को गोली मार देती है जो उसकी बाँहों में दम तोड़
देता है। फ़िल्म वर्तमान काल में राधा द्वारा नहर खोले जाने पर लाल रंग के बहते
हुए पानी से समाप्त होती है जो धीरे धीरे खेतों में पहुँच जाता है।
यह फिल्म भारतीय ग्रामीण स्त्री की जिजीविषा को एक बड़ा फलक देती है। साथ ही
इंसानी रिश्तों और इंसानी मूल्यों के बीच की कशमकश को भी दर्शाती है कि एक माँ
अपने बेटे को इसलिए गोली मार देती है कि वह उसके दुश्मन की बेटी को जबरन उठाकर ले
जा रहा था। यह स्त्री का गौरवमयी पक्ष है जिसके लिए भारतीय संस्कृति जानी जाती है।
यह चलचित्र एक महाकाव्य है, जो समय की
सीमाओं से परे हो चुका है।
इस कहानी से इतर बात करें तो आज़ादी के बाद भी भारतीय किसान की दशा में अधिक
सुधार नहीं आया था और इसका सबसे बड़ा कारण साहूकारों का ऋण-दुष्चक्र था। 1969 में बैंकिंग के राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग मुख्य धारा से जुड़ीं और 1990 के बाद किसान ऋण की सुविधा ने कृषकों को साहूकारों के ऋण-दुष्चक्र से बाहर
आने में मदद की। इस तरह हम देख सकते हैं कि बैंक की अनुपस्थिति में ग्रामीण किस
प्रकार शोषकों द्वारा प्रताड़ित किए जाते थे।
यह फिल्म पहली फिल्म थी जिसे भारत द्वारा सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के
लिए अकादमी पुरस्कार के लिए प्रस्तुत किया गया था
और केवल एक वोट से यह पुरस्कार हार गयी। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म
के लिए ऑल इंडिया सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट, 1957 के लिए
फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार जीता और नरगिस और खान ने क्रमशः सर्वश्रेष्ठ
अभिनेत्री और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता।
रोचक बातें
इस फिल्म की शूटिंग के दौरान एक दृश्य में आग फैलने की
वजह से नरगिस फँस गई थीं, तभी सुनील
दत्त ने आग में कूदकर नरगिस की जान बचाई
थी. इस दौरान नरगिस, सुनील दत्त से प्रेम करने लग गई और कालांतर में दोनों ने
विवाह कर लिया।
फिल्म की अपार सफलता के बाद उस दौरान भारत के राष्ट्रपति
डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के लिए इस फिल्म की
स्पेशल स्क्रीनिंग भी रखी गई थी.
सन् 1954 में गुजरात, महुवा तहसील के उमरा गांव में अंबिका नदी के तट पर ‘मदर इंडिया’ फिल्म की
शूटिंग की गई थी। सुनील दत्त, नरगिस, राजकुमार, डायरेक्टर मेहबूब खान और राजेंद्र कुमार जैसे प्रख्यात
कलाकारों की झलक पाने पूरा गांव उमड़ पड़ा था।
फिल्म में दिलीप कुमार को नरगिस के बेटे का रोल आॅफर
किया गया था। लेकिन कहानी पसंद आने के बावजूद दिलीप साहब ने ये रोल करने से मना कर
दिया था।
इस फिल्म का संगीत( संगीतकर :- नौशाद) भी अप्रतिम था।
फिल्म में कुल 12 गाने थे और सभी आज भी बड़े चाव से सुने जाते हैं।
गौतम
कुमार सागर
मुख्य
प्रबंधक,
बैंक ऑफ बड़ौदा
वड़ोदरा
उम्दा!
जवाब देंहटाएंसुंदर समीक्षा
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया!
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