बिरसा मुंडा
सुशीला भूरिया
‘‘मैं केवल देह
नहीं
मैं जंगल का
पुश्तैनी दावेदार हूँ
पुश्तें और उनके
दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं
सकता
मुझे कोई भी
जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता
उलगुलान !
उलगुलान !! उलगुलान !!!’’
कवि हरिराम
मीणा की ये पंक्तियाँ आदिवासियों के हक और अधिकारों के साथ-साथ उनकी संघर्ष गाथा
को व्यक्त करती है; जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, महाजन, ठेकेदार, दलाल, दिकू, राजा,
नवाब या मैदानी लोगों की अमानवीय नीतियों पर कडा प्रहार करती हैं। भारत के दो
तीहाई क्षेत्र पर हक जमाएँ ब्रिटिश सरकार ने जब आदिवासियों पर वन कानून लादकर उनके
जल-जंगल-जमीन के अधिकारों को नियंत्रित करने की कोशिश की तब अपने कुदरती अधिकारों
की रक्षा हेतु उलगुलान का नारा देते हुए अपने निरक्षर आदिवासी भाइयों में क्रांति
की लहर फैलाने वाले बिरसा मुंडा की यह कथा बड़ी ही प्रेरणादायी है।
बिहार का दक्षिणी क्षेत्र जो मौजूदा
झारखंड राज्य के राँची जिले का पहाड़ी और जंगली इलाका है। इसी क्षेत्र के एक छोटे
से आदिवासी गाँव उलीहातू, खूँटी में 15 नवबर, 1875 में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ। मुंडा रीति-रिवाज के
अनुसार बृहस्पतिवार यान उनकी प्रचलित भाषा में बिरवार के दिन जन्म होने के कारण
इनका नाम बिरसा रखा गया। इनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू
था। इनके तीन पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं। इनमें से बिरसा का स्थान चौथा था। इनके
परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी ऐसे में परिस्थिति से मजबूर होकर खेत में
काम करने वाले मजदूरों या बटाईदार के रूप में काम की तलाश में बिरसा का परिवार
उलीहातू छोड़कर घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करते हुए चलकद आकर बस गया। बिरसा का बचपन भी
यहीं बीता। वह बचपन में भेड़ चराते, बाँसुरी बजाते, अपनी मुंडारी
भाषा में गीत गाते। उन्हें अपने मुंडा समुदाय और जंगल के प्रति अपार स्नेह था।
गरीबी के कारण कुछ बड़े होने पर बिरसा
को अपने मामा के घर अयुबहातु ले जाया गया। वहीं रहते जयपाल नाग द्वारा संचालित
सलेगा पाठशाला में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। वे पढ़ाई में काफी तेज थे। चूँकि
बिरसा अपनी मौसी का बड़ा प्यार था इसलिए शादी के बाद वह उसे अपने साथ खंटगा ले गई।
वहाँ उनका परिचय एक ऐसे ईसाई प्रचारक से हुआ जो मुंडाओं की पुरानी धर्म व्यवस्था
की आलोचना किया करता था। बिरसा यह बिलकुल सहन नहीं कर पाते थे और इस चिंता में
भाव-मग्न होकर पढ़ाई में इतने तल्लीन रहते कि वे सौंपे गए कार्यों को ढंग से नहीं
करते थे। जिस कराण उन्हें अपनी मौसी और अन्य लोगों से बहुत डाँट पड़ती। फलतः वहीं
कुछ समय रहने के बाद उनका दाखिला जर्मन मिशन स्कूल में हुआ। इस विद्यालय में दूसरे
धर्मों के छात्रों को पढ़ने की अनुमति नहीं थी फिर ना चाहते हुए भी बिरसा मुंडा को
धर्मांतरण करना पड़ा। जर्मन ईसाई मिशन स्कूल चाईबासा में प्रवेश पाते ही बिरसा का
नामकरण बिरसा डेविड कर दिया गया। अंग्रेजी शिक्षा के दौरान ही बिरसा मुंडा को
अनुभव हुआ कि ब्रिटिश सरकार हम भूमि पुत्रों को जबरन धर्मांतरित करके उनके बाइबिल
हमें सौंपकर हमारी ज़मीनें छीनना चाहती हैं।
कहा जाता है कि मिशनरियों की इस नीति के
कारण बिरसा को बहुत धक्का लगा और उसी समय बिरसा ने बहुत ही तीखे शब्दों में
मिशनरियों की आलोचना की। फलस्वरूप बिरसा को स्कूल से निकाल दिया गया। इस घटना के
बाद उन्होंने अंग्रेजी शासन और मिशनरियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। इसमें इनके
सहपाठी मित्रों ने भी इनका साथ दिया। यहाँ चाईबासा में रहकर बिरसा ने उच्च
प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की और हिंदी और अंग्रेजी भाषा से जुड़े ज्ञान को प्राप्त
किया। वह हिंदी बोल लेते थे पर अंग्रेजी में बातचीत नहीं कर पाते थे।
सन् 1890 में बिरसा तथा उनके पिता
चाईबासा वापस अपने गाँव आ जाते है। इस दौरान अंग्रेज सरकार ने इंडियन फॉरिस्ट
एक्ट-1882 पारित कर आदिवासियों को जंगल के अधिकारों से वंचित कर दिया। परिणाम
स्वरूप जंगल से सटे इलाकों में ब्रिटिश सरकार और उनके दलालों की आवाजाही जरूरत से
ज्यादा बढ़ गई थी। कई क्षेत्र दलालों द्वारा हथिया लिए गए थे। भोलेभाले आदिवासियों
को जंगल संपदा का इस्तेमाल करने पर रोका जा रहा था। अपनी साझा संपत्ति के
स्वामित्व का हरण होते देख बिरसा व्यथित हो उठे।
आज की तरह तब भी आदिवासियों का जीवन अभावों से भरा था। न खाने को भात था न
पहनने को कपड़े, एक तरफ गरीबी थी और दूसरी तरफ इंडियन फॉरिस्ट एक्ट-1882 ने
उनके जंगल छीन लिए थे। जो जंगल के दावेदार थे वही जंगलों से बेदखल कर दिए गए। यह
देख बिरसा ने हथियार उठा लिए। उलगुलान शुरू हो गया था।
सन् 1886 से 1890 तक बिरसा का चाईबासा
मिशन के साथ रहना उनके व्यक्तित्व का निर्माण काल था। वही वह समय था जिसने बिरसा
मुंडा के अंदर बदले और स्वाभिमान की ज्वाला पैदा कर दी। मुंडा सरदारों ने जब
1886-87 में भूमि वापसी का आंदोलन किया तो इस आंदोलन को न केवल दबा दिया गया बल्कि
ईसाई मिशनरियों ने इसकी भी निंदा की। बिरसा मुंडा की बगावत के पीछे की वजहों में
एक वजह वादाखिलाफी एवं फरेब भी था। जो मिशनरियों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों के
साथ किया गया। बिरसा मुंडा पर संथाल विद्रोह, चुआड़ विद्रोह, कोल विद्रोह आदि का
गहरा प्रभाव पड़ा था। अपने समुदाय की दुर्दशा, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक
अस्मिता को खतरे में देख उनके मन में क्रांति की भावना जाग उठी। उन्होंने मन ही मन
तय किया कि मुंडाओं का शासन वापस लाएँगे तथा अपने समुदाय में जागृति पैदा करेंगे।
सन् 1891 के आसपास बिरसा वैष्णव धर्म की
ओर मुड़ गए। वजह आनंद पांड नामक एक धार्मिक व्यक्ति थे। वह बिरसा के गुरु समान थे।
जिनके साथ वह तीन वर्ष तक रहे थे। जो आदिवासी किसी महामारी को दैवीय प्रकोप मानते
थे उनको वे महामारी से बचने के उपाय समझाते। मुंडा आदिवासी चेचक, हैजा, बाघ के खाए
जाने, साँप के काटने को ईश्वर की मर्जी मानते, बिरसा उन्हें सिखाते कि चेचक-हैजे
से कैसे लड़ा जाता है। ऐसे में सुशिक्षित बिरसा अपने आदिवासी लोगों को स्वच्छता और
सावधानी के तौर तरीके समझाकर इन महामारियों से काफी हद तक बचाने में सफल होते हैं।
इसलिए लोग उन्हें सिंगबोगा का दूत अर्थात भगवान का दूत समझकर उनको पूजने लगते हैं।
बिरसा अब ‘धरती आबा’ यानी ‘धरती पिता’ हो गए थे। बिरसा ने धार्मिक बुराइयों का
विरोध करते हुए कहा भगवान एक है सिंगबोगा। बिरसा ने अंधविश्वासों पर भी कड़ा
प्रहार किया। उन्होंने अपने भाषणों से मुंडा आदिवासियों को ब्रिटिश शासन और ज़मींदारों
की शोषक नीतियों से अवगत कराया।
देखते ही देखते बिरसा के समर्थकों की
संख्या हजारों में पहुँच गई। उन्होंने अपने अनुयायियों का एक दल स्थापित किया
जिसका नाम ‘विरसाइट’ रखा। सन् 1895 में बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गई ज़मींदारी
प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन की लड़ाई छेड़ दी
थी। बिरसा ने सूदखोर, महाजनों के विरुद्ध भी जंग का ऐलान किया। यह मात्र विद्रोह
नहीं था। यह आदिवासी अस्मिता, स्वायतता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था।
उलगुलान ! उलगुलान ! मतलब प्रचंड विद्रोह।
बिरसा ने ‘अबुआ दिशूम... अबूआ राज’ यानी
‘हमारा देश हमारा राज’ का नाम दिया। छोटानागपुर के सभी आदिवासी जंगल पर अपनी
दावेदारी के लिए संगठित हो गए। यह देख अंग्रेज सरकार, ज़मींदार, महाजन, सामंत आदि
उलगुलान के भय से काँपने लगे। ब्रिटिश सरकार ने बिरसा के विद्रोह को दबाने की हर
मुमकिन कोशिश की लेकिन आदिवासियों के गुरील्ला युद्ध के सामने उनकी कुछ नहीं चली।
25 दिसंबर, 1899 की
रात को पूर्ण क्रांति की घोषणा करते हुए अंग्रेजों और दलालों के ऊपर भारी आक्रमण
कर देते हैं। बिरसा ने छापामार लड़ाई का सहारा लिया। राँची और उसके आसपास के
इलाकों में पुलिस उनसे परेशान थी। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने के लिए पाँच सौ
रूपये का इनाम रखा था। बिरसा मुंडा और अंग्रेजों के बीच अंतिम और निर्णायक लड़ाई
1900 में राँची के पास दूम्बरी पहाड़ी पर हुई। हजारों की संख्या में मुंडा आदिवासी
बिरसा के नेतृत्व में लड़े। इस भीषण संघर्ष में बंदूक, तोप का सामना तीर-धनुष-
भाला कब तक कर पाते। औरतों और बच्चों सहित बहुत से लोग मारे जाते हैं। 25 जनवरी,
1900 में स्टेटसमैन अखबार के अनुसार इस लड़ाई में 400 लोग मारे गए थे।
अंत में बिरसा को 3 फरवरी, 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ्तार कर लिया जाता है। जल-जंगल-ज़मीन के अधिकार को प्राप्त करने निकला यह तूफान अंग्रेज सरकार की हिरासत में आ जाता है। इन्हें राँची की जेल में कैद करके रखा जाता है। वहाँ कई अत्याचार सहने के बाद 9 जून, 1900 को बिरसा को वीरगति प्राप्त होती है। बिरसा मुंडा ने केवल अपनी 25 साल की उम्र में समस्त देशवासियों को स्वाभिमान और स्वतंत्रता का अदभुत पाठ पढ़ाया। बिरसा मुंडा के अदभुत संकल्प और साहस को हम नमन करते है।
हाल ही में
प्रधान मंत्री जी की अद्यक्षता में केंद्रीय मंत्रीमंडल ने 15 नवम्बर को राष्ट्रीय
जनजातीय गौरव दिवस के रूप में घोषित किया। 15 नवम्बर बिरसा मुंडा की जयंती की
तारीख है, जिन्हें पूरे भारत में आदिवासी समुदायों द्वारा भगवान के रूप में माना
जाता है। आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों की याद में राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस
मनाया जाएगा। यह आने वाली पीढ़ियों को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आदिवासी
स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किए गए बलिदानों से अवगत कराएगा। सांस्कृतिक विरासत
को संरक्षित करने, राष्ट्रीय गौरव और आतिथ्य के भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए
आदिवासियों द्वारा किए गए प्रयासों को मान्यता देने के लिए हर साल यह दिवस मनाया
जाएगा।
पीएच.डी. शोधछात्रा
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
सरदार पटेल विश्वविद्यालय,
वल्लभ विद्यानगर
बहुत अच्छा,👍
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रस्तुति।
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