शनिवार, 31 जनवरी 2026

कविता

 

इंद्र कुमार दीक्षित

1. महाप्राण निराला

 

हे वसन्त के अग्रदूत!

तुम अजस्र स्वर बन वीणा के

बजते रहे,काव्य मंचों पर

और ढुलकते रहे अश्रु बन

संगम में  गंगा यमुना के

'परिमल' रहे लुटाते

'अणिमा ' 'अनामिका' पर

'गीत कुन्जमें  उग आये

तब 'पत्ते  नये' भोर 'बेला' में

गूंज उठी  'गीतिका' तुम्हारी

भरती बादल राग -रोर

'सांध्य काकली ' की 'आराधना' 'अर्चना' में

हे महाप्राण!

इस युग के तुलसीदास  बन

तुम किये 'राम की शक्ति पूजा'

साहित्य- रूढ़ि-अरिदल

को दलने  परशुराम बन

हुए अवतरित

शोषित, पीड़ित,वंचित-जन

को दिया त्राण

हे नारी की  गरिमा के साधक,

श्रमिक-कृषक गो-धन  आराधक

जीवन भर तुम सहते रहे अभाव,

पर देते रहे भाव,

विचित्र रहा तुम्हारा स्वभाव

पीते  रहे व्याधि-बाधा और

संघर्षो का विष -प्याला

पर न डरे,डग भरे,

अड़े  जो उन्हें चूर कर डाला

तुम चले अकेले  कंटक

पथ पर लिये हास

होने न दिये मुख मलिन

मनुज को मुक्ति दिलाने का

रहे तुम करते अथक प्रयास

कदाचार लघुता पशुता का,

सहते रहे स्वयं  उपहास

न माने हार अनय से

लड़ते  लड़ते असमय

चले गये तुम दिव्य-धाम

हे महा-मनीषी!

तुम्हें  प्रणाम!!

तुम्हें प्रणाम!!

***

2. स्वामी विवेकानंद

भारत  के  आध्यात्मिक चिंतक

संस्कृति के उद्धारक तुम

यवन और अंग्रेजों की चक्की में पिसकर

जब मर चुका था

देशवासियों का स्वाभिमान

आत्म सम्मान

कुचल दी गई  थी

देश वासियों की आत्मा

खो चुके थे लोग अपनी अस्मिता

आत्म विश्वास  जीवन में विश्वास और भरोसा

तब तुम उभरे  चमकीले नक्षत्र बन

भारत के आकाश में

ज्योति पुंज बन कर छा गए

विश्व पटल पर  हे नरेंद्र !

 

तुम्हारे अंतस में दहक रही

ज्ञान, विवेक , आत्मोत्थान

की ज्वाला खोज रही थी गुरु

जिसे राम कृष्ण के रूप में तुमने पाया

गुरु के स्पर्श से तुम बने लोहे से कंचन

आ गए बाहर जगत के प्रवंचना से

लिए संन्यास  पारंगत हुए

ज्ञान भक्ति कर्म योग साधना में

‘आत्मवत सर्व भूतेशु पर द्रव्येन लोष्ठवत’

का समझे मर्म  छोड़ दिया लाज शर्म

 

खोज में निकल पड़े  भारत की आत्मा के

घूमे पूरा देश , शस्य श्यामला कंचन गर्भा धरती

पयस्विनी नदियों का छल छलाता निर्मल जल

हर हराते महार्णव की उद्दाम उर्मियाँ

उत्तुंग गिरि शिखरों  के क्रोड में शांत गुफाएँ

घोर अभाव में देखा तुमने  भाव की निर्मलता

नारियों की दुर्दशा, बच्चों की बुझी आँखें

वृद्धों की  अशक्तता, संतों की मस्ती,

कृषकों की दुर्दशा ने उद्वेलित किया हृदय

देवालयों में मूर्तियों का जखीरा,भक्ति शक्ति

नदारत  अनाचार दुराचार पाखंड का घटाटोप

मानवता गायब,!

 

चल पड़े कदम विश्व मानवता की खोज में

शिकागो में `भाइयों बहनों `का उदघोष

उठो जागो! और  लक्ष्य को साधो!

अपने को पहचानो!

बाहर नहीं भीतर हो तुम यह जानो

ईश्वर की चिंता से पहले पेट की रोटी की चिंता करो!

आत्मा को तृप्त करो वहीं से शक्ति भक्ति ज्ञान

का संचार होगा, तब बनोगे दानव से मनुष्य

हे भारत के नव युवक युवतियों!

शरीर से बलिष्ठ आत्म से पुष्ट शक्ति पुंज बनो!

भीतर से बदलो बाहर की दुनिया बदल जाएगी

 

दिया अक्षय संदेश

जाग्रत किया देश की गरिमा स्वाभिमान को

प्रचारित किया गीता ज्ञान का रहस्य,योग की शक्ति

वेदांत  अध्यात्म  कर्म  के मर्म को,

समझाया दानवता पर  मानवता के विजय

का रहस्य, उज्ज्वल है देश का भविष्य!

कह कर विलीन हुए  शून्य में पाया महाआनंद!

हे विवेकानंद! हे विवेकानंद!!

हे विवेकानंद!!!

***

3. प्रभु श्रीराम

प्रणमामि नमामि  नमामि हरे,

जय दशरथ-नंदन-राम  हरे।

जन- जन- दुख-नाशक-नाम हरे

जय कौशल्या- सुखधाम हरे।।१।।

 

जग- बोधि- प्रबोधि- सुबोध जयं,

शुभ- सुन्दर, सुभग- प्रबोध मयं।

जय क्लेश विनाशक दोष- भयं

जय बाल रूप - परितोष स्वयं।।२।।

 

जय उमा महेश  के ईश हरे

जय अन्तर्तम- अनिमेष हरे।।

जय शारद- शेष- अशेष हरे,

जय ब्रह्म- अनादि-विशेष हरे।।३।।

 

जय कोटिक काम- अनामप्रभुं

जय रावणारि - सतनाम  प्रभुं

प्रगटे निजधाम श्रीराम प्रभुं

जय हे रघुनंदन राम प्रभुं।।४।।

 

जय तुलसी- मीरा- सूर हरे

नानक- रैदास- कबीर हरे।।

जय द्रुपदसुता  के टेर हरे

शबरी के जूठे  बेर हरे।।६।।

 

हे विश्व- विमोहन- रूपमयं

उद्धारक  हे भवकूप- भयं।

अविशेष- अचिंत्य- अरूपमयं,

जय सुन्दर- शांत-स्वरूपमयं।।५।।

 

गज- गीध-निषाद-विषाद हरे,

गुण-निर्गुण-सगुण-प्रसाद हरे।

जय हनुमत-ध्रुव-प्रहलाद हरे,

शिव - पारबती- संवाद हरे।।७।।

 

ब्रह्मांड- विधायक- नायक हे,

विज्ञान- ज्ञान- अधिनायक हे,

वाणी- विनिवेश- विनायक हे।

युग-पाणि धरे धनु- सायक हे।।८।।

 

जय  शब्द- सृष्टि- सन्धान हरे,

कवि  वाल्मीकि के गान हरे।

जय  गीता - वेद - पुरान हरे,

गुरु व्यास-वशिष्ठ-सुजान हरे।।९।।

 

मुद मंगल दायक रूप धरं ,

खल-शत्रु विनाशन भूप वरं ।

करुणा वरुणालाय हे श्रीधरं,

सुख शांति निकेतन सीयवरं।।१०।।

 

अवतरित- सुचरित- ललाम हरे,

जन- संकुल वसुधा-धाम हरे।

राधिका- कृष्ण- बलराम हरे,

जय जय जय सीता- राम हरे।।११।।

°°°°°°•••°°°°°°

इंद्र कुमार दीक्षित

 देवरिया

2 टिप्‍पणियां:

  1. नितेश तिवारी 'श्याम'31 जनवरी 2026 को 10:50 pm बजे

    श्रीमान महोदय आपने मुझे बहुत प्रभावित किया है। यद्यपि मैं अठारह वर्षीय ही हूं, जीवन के विविध अनुभवों से अभी अनभिज्ञ हूं परन्तु आप की कविताएं पढ़कर स्वयं की अनुभूति कर पाया हूं। आप पर भगवन् की असीम अनुकम्पा है। वाग्देवी सतत सहाय हो। धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. तीनों ही कविताएँ अपने आप में उन महापुरुषों के शब्दचित्र की तरह। अतिसुन्दर। प्रणाम।

    जवाब देंहटाएं

जनवरी 2026, अंक 67

  शब्द-सृष्टि जनवरी 2026, अंक 67 परामर्शक [प्रो. हसमुख परमार] की कलम से… संपादक [डॉ. पूर्वा शर्मा ] की ओर से.... – नन्हे कदम....नया साल! द...