प्रो.
हसमुख परमार
शब्दसृष्टि
का 67वाँ और वर्ष 2026 का प्रथम अंक, एक
सामान्य अंक। सामान्य इस अर्थ में कि भाषा, साहित्य व समीक्षा
क्षेत्रत्रयी में से कोई एक या तीनों में से किसी एक से संदर्भित कोई विशिष्ट विषय
पर यह केन्द्रित नहीं, अपितु सृजन, समीक्षा
और भाषा को लेकर वैविध्यपूर्ण सामग्री से सुसज्जित है। बगैर एक की केन्द्रीयता अनेक
के साथ विविधता लिये हुए इस अंक में विविधता भी किसी खास विधा या शैली, संवेदना या विचार, कथा या प्रसंग तक मर्यादित नहीं
बल्कि इन सबसे लेखनी के सरोकारों में मिलती है, दिखती है।
इसी अर्थ व संदर्भ में शब्दसृष्टि के प्रस्तुत अंक के स्वरूप को हम देख सकते हैं।
साहित्य
से गुजरते हुए बतौर पाठक या सर्जक-समीक्षक हम साहित्य की वैयक्तिकता, सामाजिकता
तथा उसके सांस्कृतिक संदर्भ-संस्पर्श को बखूबी देखते हैं। हृदयतल से उठने वाली भावानुभूतियाँ,
मन-मस्तिष्क के विचार, सृष्टि-समाज से जुड़ाव तथा
प्रतीत-घटित व संभाव्य के साथ विषय के आदर्श रूप को सर्जक-लेखक
साहित्यिक-सर्जनात्मक अंदाज में निश्चित ढाँचे में शब्दबद्ध करता है। तभी हम देखते
हैं कि कभी सर्जक का ‘मैं’ अभिव्यक्त
होता है, तो कभी उसके ‘मैं’ के
सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार। निजी भाव की गहराई, समाज-संस्कृति
का परिवेश-परिदृश्य, चिंतन-मनन से उत्पन्न मत-मान्यताएँ सबकुछ
साहित्य को आकार देता है, उसे गढ़ता है, सजाता-सँवारता है। हृदय की गहराइयों का, मन-मस्तिष्क
के भरे हुए रूप का तथा सौन्दर्य के मानकों को हम जान सकते हैं, अनुभव कर सकते हैं, अंदाज-अनुमान कर सकते हैं किंतु इस
बारे में अंतिम सत्य को बताना असंभव। किसी दार्शनिक ने मन तथा उसके भरे हुए होने
के बारे में बड़ी ही महत्वपूर्ण बात को बड़ी ही सरलता से बताई है- “मन यानी भरा
हुआ। मन है क्या? मन है – विचार, वासनाएँ,
कल्पना, स्मृति, अतीत-भविष्य,
आपाधापी, बेचैनी, विडंबना,
प्रश्नों का ढेर, बेबूझ पहेलियाँ।” इसी विषय
में एक और संदर्भ में, एक और कोण से देखें तो मन-जो कभी भरता नहीं, क्योंकि वह
अनंत इच्छाओं से भरा है, यानी इच्छाएँ अनंत और वह पूरी होती
ही नहीं इस अर्थ में इसे कितना भी भरने का प्रयास करें, खालीपन
बना ही रहेगा। इस अर्थ में एक प्रतीकात्मक कहानी याद आती है – तपस्वी के भिक्षा
पात्र को राजा ने भिक्षा सामग्री से भरने का प्रयास किया पर वह भिक्षा पात्र भरा ही
नहीं। क्यों नहीं भरा? इसलिए नहीं भरा कि वह भिक्षा पात्र
मनुष्य की खोपडी से बना था।
साहित्य
की ज़मीन पर उजागर व उद्घाटित होता है हमारा हृदय, मन,
कल्पनालोक, सौंदर्यसृष्टि-सौंदर्य दृष्टि, समाज-संस्कृति,
इतिहास-पुराण, अतीत-वर्तमान-भविष्य, बहुविध विषयक ज्ञान .... आदि....आदि।
आज
30 जनवरी है। दो विशिष्ट व्यक्तित्वों – महात्मा गाँधी और माखनलाल
चतुर्वेदी को उनकी पुण्यतथि के निमित्त हम यहाँ विशेष रूप से याद कर रहे हैं। ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।’
कहने वाले और इसे जीने वाले महात्मा गाँधी का भारत देश,
भारतीय समाज-संस्कृति तथा मानव समुदाय को प्रदेय अविस्मरणीय है। इनके
इस राष्ट्रीय, सांस्कृतिक व मानवीय अवदान को कोटिश: वंदन।
हमारा देश, हमारा समाज कैसा होना चाहिए? महात्मा गाँधी के सपनों का भारत कैसा? उन्हीं के
शब्दों में – “मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूँगा, जिसमें गरीब
से गरीब लोग भी यह महसूस करेंगे कि यह उनका देश है - जिसके निर्माण में उनकी आवाज
का महत्त्व है। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूँगा, जिसमें
ऊँचे और नीचे वर्गों का भेद नहीं होगा और जिसमें विविध संप्रदायों में पूरा मेलजोल
होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता के या शराब और दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए
कोई स्थान नहीं हो सकता। उसमें स्त्रियों को वही अधिकार होंगे जो पुरुषों को
होंगे। सारी दुनिया के साथ हमारा संबंध शान्ति का होगा, यानी
न तो हम किसी का शोषण करेंगे और न किसी के द्वारा अपना शोषण होने देंगे।” कितना
सुख और सुकून से भरा हमारा जीवन होगा! कितना समतामूलक हमारा समाज होगा! कितना
बेहतर हमारा भारत होगा! ‘संस्कृति के चार अध्याय’
नामक पुस्तक में रामधारीसिंह दिनकर ने महात्मा गाँधी के सांस्कृतिक
अवदान संबंधी प्रकरण का शीर्षक ही दिया है – भूमि का स्वर्गीकरण: महात्मा गाँधी
का प्रयोग। गाँधी के समय में उनके व्यक्तित्व, उनके
विचारों व उनके कार्यों की उपयोगिता व अहमियत क्या थी, जिसे
देश-दुनिया जानती ही है। आज भी उनके विचारों व संदेशों की उपयोगिता उतनी ही है,
बल्कि उससे कहीं ज्यादा। “उनके बहुत-से परिवर्तनकारी विचार, जिन्हें उस समय असंभव कह कर परे कर दिया गया था, आज
न केवल स्वीकार किये जा रहे हैं, बल्कि अपनाए भी जा रहे हैं।
आज की पीढ़ी के सामने यह स्पष्ट हो रहा है कि गाँधीजी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक
हैं, जितने उस समय थे। यह तथ्य है कि गाँधीगीरी आज के समय का
मंत्र बन गया है। यह सिद्ध करता है कि गाँधीजी के विचार इक्कीसवीं सदी के लिए भी सार्थक
और उपयोगी हैं।” [ मेरे सपनों का भारत-पुस्तक के बैक कवर से]
हिन्दी
की राष्ट्रीय काव्यधारा और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दौर के प्रमुख कवि माखनलाल
चतुर्वेदी, जिन्हें हम ‘भारतीय
आत्मा’ के नाम से भी जानते हैं। इस ‘भारतीय आत्मा’ के जीवन व लेखन का एकमात्र उद्देश्य था – देशप्रेम-स्वतंत्रता की प्राप्ति।
हिन्दी
साहित्य जगत की एक बहुमुखी प्रतिभा जयशंकर प्रसाद,
जिनकी आज [30 जनवरी] जन्मजयंती है। इनके साहित्यिक योगदान को नमन
करते हुए उनकी निम्नांकित पंक्तियों के साथ हम अपने जीवनपथ पर अग्रसर होना चाहेंगे
–
इस
पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत भवन में टिक रहना
किन्तु
पहुँचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं!
प्रो.
हसमुख परमार
परामर्शक (शब्दसृष्टि)
स्नातकोत्तर
हिन्दी विभाग
सरदार
पटेल विश्वविद्यालय
वल्लभ
विद्यानगर ( गुजरात )


साहित्य में नये योगदान के लिए धन्यवाद सर।
जवाब देंहटाएंखालिद
बहुत सुन्दर आलेख।
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