बुधवार, 31 दिसंबर 2025

लघुकथा


गुनाहगार कौन’?

रागिनी अग्रवाल

लॉबी से अपने कमरे की तरफ जाते हुए यकायक मेरे कदम रुक गए । दादाजी के कमरे से सिसकियों की आवाज़ें आ रही थीं । मैं घबराया हुआ था । दादाजी के कमरे में गया तो देखा दादाजी आराम से अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे । हाथ में मोबाइल था जो अभी एक माह पहले मैंने उन्हें उपहार में दिया था । दादाजी ने कानों में ईयर फ़ोन्स लगा रखे थे । और पुराने ज़माने के गीतों का मज़ा ले रहे थे ।

फिर ये सिसकियों की आवाज़ कहाँ से आ रही थी । मेरे कान चौकन्ने हो गए । मुझे लगा कि आवाज़ दादाजी के कमरे की एक आलमारी से आ रही है । मैंने आलमारी खोली तो देखा कि कई चीज़ें वहाँ पड़ी हुई सुबक रही हैं ।

मैंने जब प्यार से उन्हें सहलाया, तो वे सब जोर जोर से रोने लगीं । ये चीज़ें थीं - एक टोर्च । एक अलार्म घड़ी । एक ट्रांजिस्टर । एक कैलकुलेटर । एक कैमरा और कुछ किताबें । मैंने उनसे इस तरह विलाप करने का कारण पूछा,तो वे सब मिलकर मुझ पर ही टूट पड़ीं और कहने लगीं ,’तुम्हीं तो हो हमारे विलाप का कारण,तुम्हीं ने अपने दादाजी को ये फुनवा लाकर दिया है । बस इसी में रम गए हैं ये । हम सबको उठाकर इस कालकोठरी में डाल दिया है इन्होंने ।

अलार्म घड़ी कहने लगी कि हर रोज रात को खाना खाने के बाद, तुम्हारे दादाजी मुझे अपने हाथों में लेते थे, प्यार से निहारते थे और फिर मेरा कान मरोड़कर कहते थे सुबह चार बजे जगा दियो,घूमने जाना है मुझे । और मैं बड़ी ख़ुशी से उनका कहना मानकर रोज सुबह चार बजे उन्हें जगा दिया करती थी । अब ये काम भी इनका फुनवा कर देता है तो मुझे उपेक्षित कर दिया है तुम्हारे दादू ने । रोने के अलावा बचा क्या है मेरे पास ।

तभी टोर्च सुबकता हुआ आगे आया और बोला । घड़ी दीदी ठीक कह रही हैं । इस मोबाइल ने तो हमारा ज़िन्दगी ही बर्बाद कर दी है । दिल तो करता है या तो इसे मार दें या फिर ख़ुदकुशी कर लें ।पहले हमेशा दादाजी मुझे अपने  तकिये के नीचे सुलाते थे । जब भी उनकी आँख खुलती तो सबसे पहले मुझे जगाते और फिर घड़ी दीदी के प्यारे से चेहरे को निहारते । और फिर सो जाते । कभी भी शाम को बाज़ार जाते या तड़के घूमने जाते थे तो हमेशा मुझे साथ लेकर जाते थे । मगर अब तो चौबीसों घंटों उनके साथ यही मुआ रहता है । नाश जाये इस कलमुँहे मोबाइल का । हम सबकी जगह छीन ली इस नाशपीटे ने ।

तभी दीन-हीन सा मुँह लिए बच्चन जी की मधुशाला बाहर  आयी । और अपने पन्नों को फड़ फड़ाते हुए बोली, " अब तो मेरा और मेरी बहनों का भी ख़्याल नहीं रखते तुम्हारे दादाजी । पहले तो हम हमेशा इनके अकेलेपन की साथी हुआ करती थीं । कई कई घंटे हमारे साथ बिताया करते थे तुम्हारे दादाजी । यहाँ तक कि तुम्हारी दादी हमें अपनी सौत तक कहने लगी थीं । अब तो हमारी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते। अब तो हमें भी इस फुनवा के अंदर ही तलाशते हैं । लेकिन हमें जो सुख उनकी बाँहों में, उनके सीने से लगकर मिलता था, तुम्हारे इस तोहफ़े की बजह से उससे वंचित हो गयीं हैं हम सब । "कहते कहते उसकी आँखों से धूल धूसरित आँसू झड़ पड़े । और बाकी पड़ी किताबें भी उससे लिपट कर करुण क्रंदन करने लगीं।

मेरा दिल बहुत भारी हो चुका था । भारी मन से मैं कैमरे, कैलकुलेटर और ट्रांजिस्टर की तरफ बढ़ा। देखकर अवाक् रह गया मैं । कैमरे ने तो गले में अपनी ही बेल्ट कसकर ख़ुदकुशी कर ली थी । ट्रांज़िस्टर ने अपनी ही बैटरी में आग लगाकर जान दे दी थी । और कैलकुलेटर भी ऐसे पड़ा था जैसे वेंटिलेटर पर आखिरी साँसे ले रहा हो ।

मैं अपने आप को बहुत बड़ा गुनाहगार समझ रहा था। क्या सचमुच मेरा दोष था यह या दादाजी का या समय की तकनीकी उड़ान का ? यही सोचते सोचते मैं भारी मन से अपने कमरे में लौट आया और फिर मैं खुद कब पब जी खेलने में मशग़ूल हो गया, पता ही नहीं चला ।

***


रागिनी अग्रवाल

राजीव भवन,गुरुद्वारा रोड

गोविंदनगर

कोटद्वार पौड़ी, गढ़वाल

उत्तराखंड




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