मछलियाँ और आदिवासी कविता
प्रो शिवप्रसाद शुक्ल
कविता सभ्यता एवं संस्कृति को संपोषित करती है । जैसे-जैसे
सभ्यता का विकास हो रहा है, वैसे-वैसे कवि कर्म जटिल होता जा रहा है । बाल्मीकि रामायण
को एवं व्यास महाभारत को मानवता की रक्षा के लिए लिखते हैं। जिन आदिवासियों को जल,
जंगल, जमीन का रखवाला माना गया, उनके साथ तथाकथित सभ्य लोगों ने जो कुछ किया, उससे
हम सब परिचित हैं । प्रकृति के अनुसार बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है । देश के
स्वतंत्र होने के 77 वर्षों में तथाकथित सुसभ्य लोगों ने आदिवासियों के साथ जो कुछ
किया, किसी से छिपा नहीं है । आदिवासियों की भाषा, संस्कृति, जल, जंगल, जमीन
को विकास के नाम अधिगृहीत करके स्वयं के लाभ में लाना बौद्धिक काँइयाँपन की निशानी
है। यहाँ हम आदिवासी कवयित्री वंदना टेटे
के काव्यसंग्रह ‘आदिम राग’, ‘किनिर’, उज्ज्वला ज्योति तिग्गा के ‘धरती के अनाम
योद्धा’, जवाहर लाल बांकिरा के ‘देशाउलि और इमली का पेड़’, विनोद कुमार राज ‘विद्रोही ‘के ‘मुटरा मुंडा
तुम ज़िंदा हो’ एवं वाहरू सोनवड़े के काव्यसंग्रह ‘पहाड़ हिलने लगा है’ के माध्यम से
आदिवासी कविता एवं आदिवासियत को समझेंगे । हमारे सभी राष्ट्रीय हस्ताक्षर अपने भावात्मक
वक्तव्य से आदिवासियों का नुकसान करते हैं । सभी इतिहासकार 1857 के पहले के
आदिवासियों के किसी भी विद्रोह को इतिहास में खतियाया होता तो इतिहास पर प्रश्न
चिह्न नहीं लगता । जैसे 1995 के पहले एस. सी.,एस.टी. की जगह को तीन या पाँच बार
विज्ञापित करके सामान्य श्रेणी में कर दी जाती थी । नौकरियों में यह हाल है तो विकास के नाम विशेष
आर्थिक परिक्षेत्र [ SEZ],हरे आर्थिक परिक्षेत्र [GEZ] के
नाम आदिवासियों की जगहें औने -पौने भाव में उद्योगपतियों या निगमिक पूँजी वालों को
दी जा रही हैं । भले ही ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ या ‘गायब होता देश’ या ‘मरंग गोडा नीलकंठ
हुआ’ या ‘काला पादरी’ जैसी रचनाएँ लिखी जाएँ
। फिलहाल महात्मा गाँधी या रमणिका गुप्ता या राजेन्द्र यादव या बजरंग बिहारी
तिवारी या राज्य या भारत सरकार का प्रदेय माना जाय या वोट बैंक की राजनीति या
आदिवासियों के आत्म जागरण को,लेकिन उपनिवेश कई स्तर पर देखा जा सकता है। वाहरू सोनवड़े लिखते हैं कि “उनमें कुछ बूढ़ी औरतें
भी थीं । वे कविता क्या है, समझते नहीं थे । - - - -मैंने अपनी कविताओं की डायरी निकाली
और अपनी भिलोरी कविताएँ पढ़ने लगा । मेरी
कविताएँ सुनने के बाद उन आदिवासी खेत मजदूरों ने वाह-वाह नहीं की,किन्तु वे खूब जोर
से हँसने लगें और मुझे फिर से कविता पढ़ने का आग्रह करने लगे । मैंने पुनः वही
कविता पढ़ी । वे फिर हँसे । आखिर में बहुत गंभीर होकर वे कहने लगे -‘सही है भाई !बिल्कुल
सही है !सच है । ये कविता नहीं -यह तो हमारा जीवन ही है, जिसे
तुमने जस का तस उतार कर रख दिया है ।”1 सुषमा असुर का मन्तव्य है कि “आदिवासी
की पहचान उसकी संस्कृति है । लोग अपनी भाषा में लिखें और बात करें तभी हमारी
संस्कृति बचेगी । ”2 यानी भाषा ही सभ्यता एवं संस्कृति की द्योतक है । वंदना
टेटे का मन्तव्य है कि “जंगल आदिवासियों का प्राण -तत्व है । - - -जल और जंगल के
बीच जो मजबूत कड़ी है, वह जंगल है । पेड़ यानी जंगल और जंगल यानी पेड़ । मतलब पेड़ या
जंगल ही वह तत्व है जो जल और जमीन दोनों को बाँधकर कर रखता है । ”3 आदिवासी
प्रकृति से अटूट प्रेम करते हैं । विश्व के किसी भाग का आदिवासी पर्वत,नदी,पोखर,गढ़ही,नाले,झरने,वृक्षों एवं
वनस्पतियों से आत्मा एवं परमात्मा की तरह जुड़े रहते हैं । वंदना टेटे की कविता ‘हम
धरती की माड़ हैं ‘द्रष्टव्य है :हम/ सब इस धरती की माड़ /इस सृष्टि के हाड़ /हमारी
हड्डियाँ /विंध्य,अरावली और नीलगिरि /हमारा रक्त /लोहित,दामुदाह, नरमदा और कावेरी
/हमारी देह /- - -सनसनाती हवाओं और तूफ़ानों -सी /हमारी ध्वनियों -भाषाओं को /कौन
विलोपित कर सकता है /- - -कौन हिला सकता है /कह गई है पुरखा बुढ़िया /कह गया है
पुरखा बूढ़ा /कोई नहीं कोई नहीं । ”4 विकसित भारत या स्टार्ट अप,आत्म निर्भर
भारत के नाम आदिवासियों की थाती जल,जंगल एवं जमीन का दोहन बहुत कुछ कह जाता है । आदिवासी
अपनी भाषा,काव्यशास्त्र में बहुत कुछ रच रहे हैं । यहाँ उज्ज्वला
ज्योति तिग्गा की कविता ‘कब तक ‘द्रष्टव्य है :”कब तक गाऊँगी /मैं तुम्हारे गीत
/या किसी दूसरे के गीत /क्यों न तलाशूँ मैं अपने सुर -ताल /और रचूँ अपना संगीत
/भले हो बेसुरे /ताल -लय ज्ञान -विहीन /और शब्द भी हों टूटे -फूटे /अनगढ़ और कमजोर ।
”5 अब्दुल रहमान भी संदेशरासक में
टूटी -फूटी प्राकृताभास हिन्दी का प्रयोग करके आशा करता है कि आने वाली पीढ़ी पढ़ेंगी । आदिवासी
भी अपनी -अपनी पीढ़ियों के लिए लिख रहे हैं । यह बात अलग है कि दलाल प्रोफेसर आदिवासियों
के नाम प्रोजेक्ट लेकर शैक्षणिक प्रवास छुट्टी के बहाने विश्वविद्यालयों से वेतन
लेते हुए शोध परियोजना के नाम आदिवासियों का हर तरह से शोषण कर रहे हैं । जवाहर
लाल बांकिरा की कविता ‘देशाउलि और इमली का पेड़ ‘द्रष्टव्य है :”अगर किसी रिसर्च स्कालर
को /गरीबी,पिछड़ेपन और तंगहाली का /अध्ययन करना हो तो /मैं उन्हें
आदिवासी अंचलों के /सुदूर देहातों का पता देना चाहूँगा /जहां मानव का सारा समय और
श्रम /दो जून की रोटी की जुगाड़ में /रोज बीतता रहता है /- - - -सादगी से भर जीवन
/भोलेपन का विस्तार लिये /छले जाने के बावजूद /आहिस्ता -आहिस्ता उनका जीवन /किसी
कछुए की तरह /रेंगता रहता है । ”6 शोधकर्ता रूपए ऐंठ रहे हैं और आदिवासी
भूखों मर रहे हैं । इस बिडम्बना को
आदिवासी ही समझ सकता है । महुआ माझी,रणेन्द्र,जैसे सांसद या पुरस्कार
ले रहे हैं आदिवासियों के नाम और वंदना टेटे उत्सवों में किताबें बेच रही हैं । बदलते परिवेश के कारण आदिवासियों का जीवन एवं
अस्मिता संकट में है । विनोद कुमार राज ‘विद्रोही’
की कविता ‘मुटरा मुंडा तुम जिंदा हो ‘द्रष्टव्य है :” पिछले बरस बंगला भट्टे से
गिरकर मरे थे । मुटरा कका /तबसे काकी ही बनाती हैं ईंटें /चलाती है घर -परिवार /देखती
है रिश्ते -नाते /संभालती है ‘आईल -गेल ‘/बेटी की शादी के लिए बचाती है पैसे / - -
- -और यह सोचकर /काकी का मन तृप्त हो जाता है /भूख मिट जाती है /दुःख नहीं होता कि
/दो दिनों से पूरे परिवार ने कुछ भी नहीं खाया है /घर में एक दाना भी नहीं है
/ठेकेदार दस दिनों से कहीं बाहर गया है - - -”7 भारतीय समाज में वसुधैव
कुटुम्बकं कहा तो जाता है परंतु उसका अक्षरशः पालन नहीं होता है । यहाँ तक कि
गरीबों,आदिवासियों के नाम आबंटित धन राशि ग्राम प्रधान या सरपंच या
तलाटी या लेखपाल या पटवारी खा जाते हैं । ग्लैडसन
डुंगडुंग ने अपने लेख ‘आदिवासी दर्शन के पास ही दुनिया को लौटना है ‘में लिखते हैं
कि “आदिवासी दर्शन नीड [आवश्यकता ]बेस [आधार ]है । वह कहता है उतना ही लो जितनी
जरूरत है । - - -आदिवासी दर्शन के केंद्र में न्याय है । - - -आदिवासी समुदाय के
गणतंत्र में नेता का चुनाव भी बिना पैसे के होता है । - - -आधुनिक डेमोक्रेसी में
नेता चुनने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं । - - -यह सारा पैसा कॉर्पोरेट लगाता
है । - - -इसीलिए आदिवासी साहित्यकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे आदिवासी दर्शन आधारित
साहित्य सृजन से अपने नालायक भाई -बहनों की घर वापसी के लिए पुरजोर अभियान की
शुरुआत करें । इसी के साथ गैर -आदिवासी लेखकों को भी यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि
उन्होंने स्टार बनने के क्रम में आदिवासी समाज के साथ जो अन्याय किया है,उसकी भरपाई वे
आदिवासी दर्शन वाले साहित्य को रच कर करें । ”8 राहुल जी इसीलिए
महात्मा गाँधी को पूँजीपतियों का एजेंट कहा था । लोकतान्त्रिक चुनाव दिन -प्रतिदिन
महँगा होता जा रहा है । सिब्बू सोरेन या
हेमंत सोरेन या चंपई सोरेन क्या जयपाल सिंह मुंडा के जीवन दर्शन को उतार पा रहे
हैं ?जयपाल मुंडा को ईसाई बनाने की कोशिश की गई परंतु वे ईसाई नहीं बने जबकि
रामकथा पर शोध करने वाले फादर कामिल बुल्के ने तमाम आदिवासियों को ईसाई बनाया । जयपाल
मुंडा ने 1938 ई में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को पत्र लिखकर आदिवासियों की स्थिति से
अवगत कराया । जयपाल मुंडा लिखते हैं :जो लाभ आदिवासियों को मिलना चाहिए था और जिसके अभाव में वे विद्रोही बने हुए
हैं,आदिवासियों का यह विद्रोह एक दिन पूरे बिहार के लिए त्रासदी
बन जाएगी । ”9 आदिवासी अपराधी कानून के तहत शंकर गुहा नियोगी या अन्य
आदिवासियों का आए दिन कत्लेआम हो रहा है । वंदना टेटे अपनी कविता ‘मदइत माँगती हूँ ‘में लिखती
हैं :”अपने समुदाय समाज को /मजबूत बनाना चाहती हूँ /भाषा -संस्कृति को बचाना चाहती
हूँ /- - -जल जंगल जमीन ही है /हमारी भाषा -संस्कृति /इन्हीं से पाते हैं हम /जीने
की ताकत भी /ये नहीं बचेंगे तो /- - -मछली की तरह /इसलिए ज़िंदा रहना,रखना चाहती हूँ
/इसलिए आप सबसे मदइत माँगती हूँ /- - -इसे कोई वनस्पतिविज्ञानी नहीं /उसकी जड़ें तो
करती हैं /जो धँसी होती हैं /भाषा -संस्कृति की पुरखा जमीन में “10 गाँधी
का रुख भी आदिवासियों एवं नस्लीय लोगों के
प्रति नकारात्मक था । कलमघिस्सु जो मन में आए लिखते रहें । डॉ कुजूर कहते हैं कि “गाँधी
के सख्त [हिन्दुवादी शुद्धता ]आदर्शों का प्रभाव छोटानागपुर के टाना भगत आंदोलन पर
पड़ा है । उरांव टाना भगत,जो अपने सामाजिक -आर्थिक हितों के लिए ब्रिटिश से लड़ रहे थे,उन्होंने ‘शुद्धि
‘का एक और तत्त्व जोड़कर पवित्रता -प्रदूषण के आधार पर अपने ही आदिवासी समुदाय में
विभाजन किया । इस प्रकार कुछ हद तक आदिवासियों में विभाजन के लिए और आदिवासियों के
हिन्दूकरण के लिए क्या गाँधी जिम्मेदार नहीं ठहरते हैं ?”11 गाँधी की
सहानुभूति भी एक प्रकार से छलावा थी । सुषमा असुर की कविता में इस दर्द को समझा
/देखा जा सकता है :पठारी क्षेत्र में तुमने /हमें [असुरों को ]जन्म दिया /पर जिंदा
रहने के लिए रास्ता नहीं बतलाया /पठारी क्षेत्र में तुमने /हमें [असुरों को ]मजदूर
बनाया /- - - -ही धरती के पुरखों,ही आसमान के पुरखों /ओ हमारे माता -पिता,ओ सभी असुर बूढ़ा
-बुढ़िया /हम सीखेंगे तुम्हारी तरह बोलना /हम सीखेंगे तुम्हारी तरह नाचना /हम
करेंगे शिकार तुम्हारी तरह /- - -हम जरूर जिएँगे तुम्हारी तरह ही /पठार की तरह निश्चिंत
निश्छल /तुम्हारे रचे इस असुर दिसुम में”12
जाति,पद एवं नस्ल के
नाम पर उसी वर्ग का व्यक्ति उसी वर्ग के नाम सतत शोषण कर रहा है । अश्विनी कुमार पंकज का मन्तव्य है कि “गाँधी का
अवदान हिन्दू समाज के सन्दर्भ में बेशक ऐतिहासिक है । नस्लीय और धार्मिक सवाल पर उनमें
और आर एस एस में बस बारीक -सा फर्क है । आवरण का फर्क । ईसाई मिशनरियों की तरह ही
धर्मांतरण की शर्त पर बस उदारता का आवरण ओढ़े हुए हैं । ”13 आदिवासी
कविता की संघर्षभरी दास्तान किसी से छिपी नहीं है । आदिवासियों के साथ विकास के
नाम होनेवाली ठगी काफी भारी पड़ेगी । सुंदरा पहाड़िया की कविता ‘पहाड़ की तरफ देखो
‘ध्यातव्य है :दुनिया वालों पहाड़ की तरफ देखो /पहाड़ का सब फल फूल खत्म हो गया । /उसके
बिना हम पहाड़ वाले कैसे जियेंगे /और क्या खायेंगे क्या पीयेंगे /हमारी सब फसलें
खत्म होती जा रही हैं । ”14 आदिवासियत को बचाना मतलब पर्यावरण एवं
प्राणियों को बचाना है । आदिवासी कविता गूढ गंभीर अभिजात्य काव्यभाषा में नहीं
लिखी जा रही है परंतु अपनी बोलियों में हिन्दी के ढर्रे में लिखकर सहृदयों की
सहभागिता को बढ़ाया जा रहा है । वंदना टेटे की कविता ‘मैं चाहती हूँ ‘ध्यातव्य है :पालना
चाहती हूँ मैं /अपने बच्चे को /थेथर की तरह /ताकि जब भी तुम उखाड़ो /जहाँ भी तुम फेंको
/वह अपनी जड़ जमा ले /- - -हम पालना चाहती हैं /अपने बच्चे /कागज की तरह नहीं
/मिट्टी की तरह /जो मेहनत,अनुभव और संघर्ष की आग में /जल -जल कर /पक -पक कर /सदियों
तक नहीं मरता “15 आदिवासी कविता वैश्विक रचाव -बचाव की कविताएँ हैं । सभी
आदिवासी कवि कहीं -कहीं प्रकृति,मिट्टी,पहाड़ के पूजक हैं । जयपाल सिंह मुंडा का वक्तव्य
ध्यातव्य है :”हिंदुस्तान हमारी समस्या है । पाकिस्तान समस्या है । आदिवासी भी
समस्या हैं । अब अगर ऐसे में भिन्न -भिन्न दिशाओं में चिल्लाते हुए लोग एक -दूसरे
से भिड़ने लगें,एक -दूसरे से अलग -अलग भावनाएँ रखने लगें,तो हम सभी खत्म हो
जाएँगे और देश कब्रस्थान बन कर रह जाएगा । पंडित नेहरू के शब्दों पर विश्वास करते
हुए भी मैं कहूँगा कि हमारे लोगों का पूरा इतिहास गैर -आदिवासियों के अंतहीन
उत्पीड़न और बेदखली को रोकने के लिए किए गए विद्रोहों का इतिहास है । - - -हमारे
आदिवासी लोग भी भारतीय हैं और उनका भी उतना ही इस देश से सरोकार है जितना किसी और
का । ”16 आदिवासियों पर बहसें संसद में होती हैं परंतु उनका
क्रियान्वयन आदिवासी इलाके में नहीं होता है । इसीलिए आदिवासी नक्सलवादी या ईसाई
बनते जा रहे हैं । लोकतान्त्रिक बंदर बाँट कहीं न कहीं राष्ट्रीयता के लिए घातक है
। वाहरू सोनवड़े की कविता ‘घास का खलिहान ‘ध्यातव्य है :घास की क्यारी खोदते -खोदते
/दिन ढल गया /अभी तक रोटी का अता-पता नहीं /खोदते -खोदते - - -/मरघट में पहुँच गई
हड्डियाँ /बित्ते भर पेट के खातिर”17 आदिवासियों की साक्षरता,मानवता,अस्मिता एवं
राष्ट्रीयता पर अँगुली उठाने के पहले हम जैसे बुद्धिजीवियों को हजार बार सोचना
पड़ेगा आदिवासियों के प्रदेय को । उनके हक एवं संसाधन उन्हें मिलने चाहिए । आदिवासी
कवि पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं । आदिवासियों के पुनर्वास पर या रोजगार पर
ध्यान नहीं दिया जा रहा है और श्रेष्ठ भारत विकसित भारत का नारा बुलंद किया जा रहा
है । विनोद कुमार राज ‘विद्रोही ‘की कविता ‘बेरोजगारी ‘ध्यातव्य है :”पीठ पर
लाठियों के निशान /मौजूद हैं अब भी /लेकिन मैं फिर आऊँगा /बार -बार जाऊँगा /इंकलाब
का बिगुल फूँकने /अब पुलिस की लाठियों से डर नहीं लगता हमें”18 पूँजी
वाले हों या उद्योगपति या सरकार या व्यवसाय या नौकरी वाले या आम जन या आदिवासी या
स्त्री इस तरह का बँटवारा केंद्र,राज्य की शिक्षा व्यवस्था जैसा काफी घातक होगा । सांस्कृतिक
राष्ट्र की दुहाई देने वालों को वसुधैव कुटुम्बकं ध्यान देना होगा । आदिवासियत,आदिवासी भाषा,संस्कृति,जल,जंगल,जमीन एवं
सभ्यताओं पर जिस तरह से बलात्कार किया जा रहा है या यों कह लीजिए नौकरियों में
अंग्रेजी हिंदी को बढ़ावा देकर आदिवासियों की भाषा के मारफ़त हकालपट्टी काफी भारी
पड़ेगी । जवाहर लाल बांकिरा की कविता ‘सांस्कृतिक आतंकवाद ‘द्रष्टव्य है :”कब तक
सांस्कृतिक आतंकवाद के नाम पर /घुटने टेकती रहेंगी सभ्यताएँ /तेज होते वैश्वीकरण
के दौर में /क्यों संकुचित हो रही हैं मान्यताएँ /क्यों रोते हैं चौपाल में कबीर
/क्यों रह गये लोग लकीर के फकीर ?”19 वनवासी योजना या अन्य राज्य,केंद्र सरकार की
योजनाएँ कहीं न कहीं आदिवासियों के नाम पर होने से उनको लाभान्वित नहीं करा पा रही
हैं । इस अंतराल को दूर करना होगा । आदिवासियों को बार -बार इंकलाब का नारा न
लगाना पड़े,इसका पूरा ध्यान रखा जाय । मानवता,राष्ट्रीयता एवं
विश्व बंधुत्व सर्वोपरि होना चाहिए ।
आदिवासी भीख नहीं माँग रहे
हैं बल्कि अपने अधिकार जल,जंगल एवं जमीन चाहते हैं । आदिवासी मुख्य धारा के मारफ़त
सर्वांगीण विकास करना चाहते हैं । भारतीयता,राष्ट्रीयता एवं
इंसानियत उन्हें काफी प्रिय है परंतु हरामखोर तथाकथित मत्स्य न्यायी बौद्धिक
उन्हें मुख्य धारा में नहीं आने दे रहे हैं । शासकीय मगरमच्छ सारी योजनाओं को डकार
जाते हैं । मानवाधिकार एवं आदिवासी आयोग वाले भी कुछ न्याय दिलाते नहीं हैं । आदिवासी
कवि उज्ज्वला ज्योति तिग्गा की कविता ‘हौसला टूटता नहीं ‘द्रष्टव्य है :” सभी
आश्वासनों की असलियत परख /मिथ्या सच और अर्द्धसत्य को जान समझ /किसानों का हौसला
टूटता नहीं /- - - -ऊबड़ -खाबड़ धरती को चीरकर /उगलता है धन धान्य रूपी सोना /अन्याय
शोषण के विरुद्ध छेड़ता है युद्ध /सभी शोषित आम जनों के खातिर /छेड़ता है जंग /लूट
मुनाफाखोरी शोषण के खिलाफ /युग बोध चेतना सहित”20 आदिवासी तो मुख्य
धारा से जुड़ना चाहते हैं परंतु राजनेता एवं अधिकारी इस कार्य को होने देंगे । जंगलों,प्राकृतिक
स्रोतों का दोहन,पर्वतों में सुरंग लगाकर क्षत -विक्षत करके धूल मुक्त
स्मार्ट गाँव,शहर एवं महानगर बनाने की मुहीम,नदियों को जोड़ने
या बाँध बनाने से विकसित लोगों का विकास होगा परंतु विस्थापन एवं पर्यावरण की
समस्या और बढ़ेगी । इसीलिए अंग्रेजों के रक्त बीज कहीं न कहीं आदिवासियों से डरते
हैं । विनोद कुमार राज ‘विद्रोही ‘की कविता ‘भट्ठी ‘में बहुत कुछ कह जाते हैं :”लोहार
की भट्ठी /सुलगती आँच /धधकती आग /उड़ती चिंगारी /घाने की चोट /नसों में दौड़ता लहू /छन
से बजती /पसीने की बूंदे /बनता औज़ार /चाकू,कटार,भाले,गड़ासे /फरसा,तलवार,नुकीले तीर /नए
अंग्रेज डरते हैं - - -!”21 आदिवासी कविता में उनके प्रति हो रहे
अन्याय का संघर्ष के माध्यम से पूरी तैयारी के साथ मुँहतोड़ जबाव देने की तैयारी स्पष्ट
पढ़ी एवं देखी जा सकती है । ’नए अंग्रेज ‘की व्यंजना काफी व्यापक है । पुलिस या
सैन्य या पैरामिलिट्री के सहारे अधिकारी या नेता कब तक आदिवासियों का शोषण करते
रहेंगे ?आदिवासी भी अब काफी जागरूक हो गए हैं । इसलिए आदिवासी साहित्य के माध्यम
से शोषण का पर्दाफ़ास करते हुए बीच -बीच में आक्रोश,जोश की कविताएँ
लिख कर शोषकों को सावधान कर रहे हैं । आदिवासियों
का एक वर्ग सशस्त्र क्रांति कर रहा है । आदिवासी साहित्य शांति के रास्ते से
समरसता लाना चाहता है । लेकिन अभिजात्य आलोचक इसे खारिच या उपेक्षित कर रहे हैं । आदिवासियों
की विभिन्न बोलियों में लिखने के कारण काव्यभाषा जटिल हुई परंतु अनुवाद के मारफ़त
बोलियों की ध्वन्यात्मकता से आदिवासी दर्द को काव्यभाषा के मारफ़त समझ सकते हैं । यों
देखा जाय तो शास्त्र,संस्कृति एवं सभ्यता कहीं न कहीं शोषण के मूलाधार हैं । अपनी जड़ों से भली प्रकार जुड़ना आदिवासियों की
प्राथमिकता में है जबकि सरकार या पूँजी वाले या उद्योगपति या योग या आध्यात्म वाले
आदिवासियों की जमीन प्राकृतिक संसाधन हथिया रहे हैं । निर्मला पुतुल,महुआ माझी,रणेन्द्र एवं
अनुज लुगुन सरकार एवं उद्योगपतियों के दलाल बनकर आदिवासियत को विकास के नाम खत्म
कर रहे हैं । उज्ज्वला ज्योति तिग्गा की कविता ‘बाँस की नन्ही सी टहनी ‘के मारफ़त
बहुत कुछ कह जाती हैं :”पर छोटे से झुरमुट /की खामोश दुनिया में /बाँस की टहनी /रहती
है अपनी जड़ों के करीब /अपनी दुनिया की सच्चाईयों से सराबोर /कि टिकी रहे /हर
चुनौती के सामने /अपने मजबूत इरादों के साथ /वह कमजोर मुलायम -सी टहनी”22
आदिवासियों की आदिवासियत उनकी प्रत्येक कविता में यथार्थ काव्यबोली एवं काव्यभाषा
के मारफ़त आद्यंत दिखायी देती है । फिलहाल मानवता एवं पर्यावरण को बचाने के लिए
आदिवासी साहित्य का गंभीरता से अध्ययन किया जाय । कहीं विकास कोरोना की तरह विनाश
कारक न बन जाए । बौद्धिक प्राणी बड़ी मछली की तरह संसाधन विहीन आदिवासियों,आदिवासियत को
छोटी मछली के रूप में अपने विकास का निवाला बनाते जा रहे हैं । इसीलिए विनोद कुमार
राज ‘विद्रोही ‘अपनी कविता ‘जंगल माफिया ‘में बहुत कुछ कह जाते हैं:”काश !मैं
/जंगल के किनारे -किनारे बह रही /नदी होता /या फिर नदी में तैरता मगरमच्छ होता /काश
कि मैं जंगल का करैंत होता /काश कि शेर होता /काश कि चीता -भालू -हाथी होता /दबोच
लेता /डंस लेता /नोच लेता /जंगल माफ़ियाओं को /उनकी बेरहमी को /बचा लेता /चितकबरा
रोशनी को /फूलों को -कलियों को /असंख्य जीव -जंतुओं को । ”23 इस
आदिवासी कविता के एक -एक अक्षर और शब्द में आक्रोश,प्रतिशोध साफ
झलक रहा है । चतुर के आगे झौआ रखने का मतलब तथाकथित बुद्धिजीवी एवं राजनेता समझने
के लिए तैयार नहीं हैं तो खूनी जंग के लिए तैयार हो जाएँ । सैन्य,पुलिस एवं
पैरामिलिट्री को सब कुछ पता है परतु अधिकारियों एवं राजनेताओं के सामने कोई बोलता नहीं
है। मेलन असुर की कविता ‘सिईग[असुरी भाषा ] या वृक्ष ‘ में लिखती हैं :”दतून से
लकड़ी तक /सभी तुमसे लाभ लेते हैं /तुम यही आदर्श /वृक्ष हमें सिखलाते हो /पर इस
आदर्श को /मानव कहाँ सीख पाता है ।”24 कुम्भ,अर्द्धकुम्भ,प्रवचन से लेकर
शिक्षा तक में इंसानियत की बात की जाती है परंतु सबका उद्देश्य ‘राम -राम जपना
पराया माल अपना ‘ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है । धर्म,शिक्षा,राजनीति,मेला,पर्व,त्योहार,चिकित्सा,योग,आयुर्वेद
चिकित्सा एवं व्यायाम सब दुधारू गाय बन गए तो आदिवासी कविता पढ़कर आमूल -चूल
परिवर्तन लाने वाला कोई नहीं है । डिजिटल,आध्यात्मिक,भावात्मक,शैक्षणिक,सामाजिक संस्था,राजनैतिक एवं
रिश्ते भी भ्रष्टाचार की लपेट में आ चुके हैं तो मेलन असुर की वृक्ष कविता को पढ़कर
जीवन में परिवर्तन आएगा,कह पाना मुश्किल है । आदिवासियों की बोली में लिखी गई कविताओं
की अर्थ क्षमता काफी व्यापक है । लक्ष्मी कान्त वर्मा ‘नयी कविता के प्रतिमान ‘या
नामवर सिंह ‘कविता के नए प्रतिमान ‘या परमानंद श्रीवास्तव ‘कविता का व्याकरण ‘या
प्रसाद ‘काव्यकला तथा अन्य निबंध’ लिखते रहें!। आदिवासियों की अपनी -अपनी बोली में लिखी या
लिखवाई गईं या संपादित कविताओं की बानगी देखते -पढ़ते जाइए कुछ नव्य सौन्दर्य हाथ
लगेगा । आदिवासियों की बोली /भाषा के अनुरूप सॉफ्ट वेयर बनाया जाय । जिससे बाल्मीकि की तरह उनकी बोली भाषा में कविता
के मारफ़त नूतन या नव्य ग्लोबल मानवता को विकसित किया जाय । शंकर शेष के नाटक ‘एक
और द्रोणाचार्य ‘के मारफ़त संभव है ?भले हि आदिवासी कविता का शैशवकाल हो परंतु उसकी
पहल एवं प्रस्तुति लाज़बाव है । आशा करते हैं कि आदिवासी कविता इसी तरह विश्व
मानवता,,जड़-चेतन की समानता एवं सद्भावना,बंधुत्व का पाठ तैयार करेगी। आलोचकों एवं समीक्षकों को आदिवासी कविता का
मूल्यांकन साहित्यिक औजारों के बजाय इंसानियतगत लोकआस्वाद के साथ अखिल ब्रह्मांड के
अस्तित्व का ध्यान रखना होगा ।
संदर्भ
1-वाहरु सोनवड़े –[अनूदित ]पहाड़ हिलने लगा है -पृष्ठ :11
2-सं. वंदना टेटे :आदिम राग :पृष्ठ -85
3-वंदना टेटे :किनिर काव्यसंग्रह :पृष्ठ -06
4-वंदना टेटे :किनिर :पृष्ठ -11:12
5-उज्ज्वला ज्योति तिग्गा:धरती के अनाम योद्धा:पृष्ठ -29
6-जवाहर लाल बांकिरा :देशाउलि और इमली का पेड़ :पृष्ठ -62:63
7-विनोद कुमार राज ‘विद्रोही ‘:मुटरा मुंडा तुम ज़िंदा हो :पृष्ठ -19,22
8-सं. वंदना टेटे :आदिवासी दर्शन और साहित्य :पृष्ठ -70:71
9-सं. अश्विनी कुमार पंकज :आदिवासियत :पृष्ठ -158
10-वंदना टेटे :किनिर -मदइत माँगती हूँ :पृष्ठ -83-84
11-जोसेफ मरियानुस कूजुर:गाँधीयन थाउट्स वाइस -वर्सा इंडिजिनस इडिओलॉजी :सम re flections फॉर
एन इंटीगरल हयुमिनिज़्म फॉर द थर्ड मिलेनियम [कुरुविल्ला पंडिकट्टू –‘गाँधी :द
मीनिंग ऑफ द मिलेनियम ‘:पृष्ठ -84
12-सं. वंदना टेटे :आदिम राग -हम जरूर
जिएँगे ही पठार की तरह निडर :पृष्ठ :28-30
13-अश्विनी कुमार पंकज :आदिवासी और गाँधी
:पृष्ठ -10
14-सं. वंदना टेटे पृष्ठ -73
15-वंदना टेटे : किनिर :पृष्ठ -78:79
16-सं. अश्विनी कुमार पंकज :आदिवासियत
:जयपाल मुंडा के वक्तव्य :पृष्ठ -87:88
17-वाहरू सोनवड़े :पहाड़ हिलने लगा है :पृष्ठ
-74
18-विनोद कुमार राज ‘विद्रोही ‘:मुटरा मुंडा तुम ज़िंदा हो :पृष्ठ -76
19-जवाहर लाल बांकिरा :सांस्कृतिक आतंकवाद :पृष्ठ -116
20-उज्ज्वला ज्योति तिग्गा :धरती के अनाम योद्धा :पृष्ठ -111
21-विनोदकुमार राज ‘विद्रोही ‘:मुटरा मुंडा तुम ज़िंदा हो :पृष्ठ -49
22-उज्ज्वला ज्योति तिग्गा :बाँस की टहनी :पृष्ठ -60
23-विनोदकुमार राज ‘विद्रोही ‘:मुटरा मुंडा तुम ज़िंदा हो :पृष्ठ -67
24-सं. वंदना टेटे :आदिम राग :[मेलन असुर :वृक्ष ]:पृष्ठ -35
प्रो. शिवप्रसाद शुक्ल
हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
आराजी सं. 18 चक तेजऊ दीक्षित,
गंगापुरम, नैनी, प्रयाग 211008
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