आलेख
अनादि
सूर्य
डॉ.
सुशीला ओझा
हमारी
भारतीय संस्कृति की आधारशिला प्रकाश है, ज्योति
है, ऊर्जा है। हम प्रकाश के उपासक हैं, हम गुरु के उपासक हैं। इस ब्रह्माण्ड में सूर्य जैसा ऊर्जस्वित कोई नहीं
है जो ऊर्जा प्रदान करता है, अंधकार से प्रकाश में लाता है।
उस सूर्य के प्रति कृतज्ञता का महान पर्व है मकर संक्रांति। सूर्य दक्षिणायन से
उत्तरायण में प्रवेश करते हैं, धनु से मकर राशि में प्रवेश
करते हैं और शुभ, मंगल, दिव्य, भव्य प्रकाश का वरदान देते हैं। दक्षिणायन के दिन सर्दी से सिमट जाते हैं।
सम्पूर्ण सृष्टि शीत से सिमट जाती है। ये वनस्पतियों, साग-सब्जियों
के बाहुल्यता के दिन हैं। मकर राशि मंगल का प्रतीक है। माघ मास में सूर्य मकर राशि
में एक महीने तक रहते हैं। प्रयागराज के संगम में डुबकी लगाने का बड़ा महत्त्व है।
तिल, गुड़, उड़द दान करने की बड़ी
महिमा है। एक महीने तक संगम के किनारे लोग कल्पवास करते हैं। मकर संक्रांति आस्था
और विश्वास का पर्व है। सम्पूर्ण देश की विविधता को एकता के सूत्र में पिरोने का
पर्व है। उत्तर प्रदेश एवं बिहार में खिचड़ी के रूप में, पंजाब
में लोहड़ी के रूप में, दक्षिण भारत में पोंगल के रूप में
अग्नि के समक्ष कृतज्ञता प्रकट करते हैं। अग्नि ऊष्मा और शक्ति की प्रतीक है।
राजस्थान में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल तो आसाम में बिहु
के रूप में इसे मनाया जाता है। अन्नपूर्णा सर्वदा पूज्य हैं। नवीनता, मंगलता, शुभता के लिए अन्न की उपासना होती है। अन्न
कोष ही प्रथम कोष है, आनंदमय कोष है और तिल, गुड़, शीतनाशक हैं। हमारे वैदिक ऋषियों ने संस्कारों
की आधारशिला में प्रकाश को प्रथम स्थान दिया है-
“तमसो मा ज्योतिर्गमय”
गीता
में श्रीकृष्ण ने विवस्वान को अपना प्रथम संदेश सुनाया है। वे देवताओं में अपने को
सूर्य मानते हैं। हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम सूर्यवंशी हैं। ब्रह्माण्ड में सूर्य
का विशेष महत्त्व है। वे हमारे प्रथम गुरु हैं जो अंधकार से हमें प्रकाश की ओर ले
जाते हैं। ये सृष्टि में चैतन्यता, ज्ञान-विज्ञान
और आध्यात्म के समन्वयक हैं। सूर्य मोक्षदायक हैं। भागीरथ ने गंगा को धरती पर
अवतीर्ण किया था। आज ही के दिन गंगा स्वयं को
गंगासागर में विलीन कर लेती हैं। यह गंगा और सागर का महामिलन गंगासागर में
स्नान दान का अभ्युदय और श्रेयस को मोक्ष प्रदान करता है।
हमारे ऋषियों ने महान पर्वों
के माध्यम से दो संस्कृतियों के मिलन को, ऊर्जा को, आनंद को संक्रान्ति से विभूषित किया है। हम अधोमुखी से ऊर्ध्वमुखी होकर
अपनी चैतन्यता को विकसित करते हैं। आध्यात्म और विज्ञान दोनों का महामिलन है
संक्रान्ति पर्व। हम सूर्य की पूजा, अर्चना, अभ्यर्थना एवं उत्तरायण का अभिनंदन करते हैं। हिम रूपी अंधकार को दूर करने
की क्षमता सूर्य में है। सूर्य पूजा हमारी संस्कृति में शुभता, दिव्यता, मंगलता का आग्रही है। भगवान भास्कर के
प्रति आस्था, कृतज्ञता का दीप अर्पण करना ही मकर संक्रान्ति
है। आनंद, उत्साह, उमंग से हवा में
पतंग उड़ाते हैं और जीवन की डोर को नियंत्रित करते हैं। ऊर्ध्वमुखी होकर भी अपनी
जड़ों से बाँधे रहने की सीख मिलती है। अपनी जड़ों से कट जाओगे तो तुम्हें ठिकाना
कहाँ मिलेगा? सभी को मकर संक्रांति की समस्त शुभकामनाएँ
प्रेषित हैं।
डॉ.
सुशीला ओझा
पूर्व
विभागाध्यक्ष,
हिन्दी
विभाग,
माहेश्वरनाथ
महामाया महिला महाविद्यालय,
बेतिया,
प० चम्पारण, बिहार



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