पत्थर
की बंदरिया
प्रेम
नारायन तिवारी
“मोनी! ए मोनी! जरा सुन तो। “
कुसुम जंगले के पास आकर बोली।
“आती हूँ। “मोनी का जबाब सुनकर
कुसुम धीरे- धीरे कदम धरते अपने कमरे में आकर बैठ गयी। कुसुम की उम्र छब्बीस साल
है। वह तीन महीने की गर्भवती है। उसकी सास और पति एक शादी में गये हैं। जाते-जाते
वह लोग आवश्यकता पड़ने पर जंगले से मोनी को बुला लेने को कह गये हैं।
मोनी अठारह- उन्नीस साल की
मजदूर लड़की है। मोनी और उसके घर के लोग मकान बनाने वाले मिस्त्री मजदूर हैं जो
ठेके पर काम करते हैं। इन दिनों यह लोग कुसुम के मकान का दूसरी मंजिल बना रहे हैं।
“आपने मुझे बुलाया था, क्या काम है?” मोनी आकर के बोली। कुसुम ने उसे ध्यान
से देखा, वह किसी युद्ध में जाने को तैयार सैनिक जैसी लग रही
थी।उसका पेट थोड़ा सा बाहर निकला था, उसे नजरंदाज कर दें तो
एकदम से स्लिम।
“काम पर जा रही थी क्या?
“कुसुम ने पूछा। “हाँ, बिना काम किये रोटी कब
मिलेगी? कोई काम हो तो बताइए जल्दी से कर दूँ, देर होने पर ठेकेदार टेंटें करने लगेगा। मजदूरी काटेगा अलग से।” उसके
बोलने के अंदाज पर कंचन हँस पड़ी।
“ऐसा कर पहले जाकर ठेकेदार से
बोलकर आ कि आज पूरे दिन तुम्हें मेरे साथ रहना है। फिर बताती हूँ तुम्हें क्या
करना है। और आने से पहले यह सिर का टोपा उतार कर आना यहाँ ईंट बालू नहीं उठाना है।
“
“मैं आ गई, काम बताइए।” थोड़ी देर बाद मोनी आके बोली।
“मेरे सामने बैठ मुझसे बातें कर,
मुझे अकेले अच्छा नहीं लग रहा है।”
“फिर कुछ काम करिए, अच्छा भी लगेगा समय भी कट जायेगा। मुझे भी बैठे रहना अच्छा नहीं लगता, कुछ काम बताइए। “वह खड़े खड़े बोली।
“मुझे डाक्टर ने काम करने से
मना किया है, मैं कोई काम करूँगी तो मेरी सासू माँ मुझे
मारेगी। “कुसुम हँसकर बोली।
“हाय दैया, काहे मना किया डाक्टर और सासू ने, मेरी सास तो काम
ना करने पर डाँटती है। ठेकेदार के काम से लौट कर घर का सारा काम मुझको करना पड़ता
है।” मोनी आश्चर्य से बोली।
“इसके कारण। “कुसुम अपना पेट
दिखाकर बोली। “अरे इससे क्या हुआ, यह तो मेरा भी है। पाँचवाँ
चल रहा। नौ ईंट लेकर खट-खट करती ऊपर चढ जाती हूँ।” मोनी शर्माते हुए अपने पेट पर
हाथ फेरकर बोली।
“लगता तो नहीं पाँचवाँ महीना। मेरा
तो खाने का जी ही नहीं करता, कुछ भी खाओ उल्टी होने लगती है।
तुम पर तो कुछ फर्क ही नहीं, कुछ खायेगी?” कुसुम बिस्तर से उठते हुए बोली।
“सुबह से उठकर इसी पेट की सेवा में
तो लगी थी। चार लोगों के लिए दो किलो आटे की रोटी और सब्जी बनाई है। पेट भर खाने
के बाद दोपहर की भी व्यवस्था कर ली है। आप खा लीजिए। “मोनी ने ऐसे अंदाज में पेट
पर हाथ फेरा कि कुसुम को जोर से हँसी आ गयी। हँसते-हँसते उसके पेट में गैस-सी बनी
और उल्टी आ गयी।
उल्टी से बेहाल कुसुम को
मोनी ने संभाला। हाथ मुँह धुलवाकर कपड़े बदलवाने का काम किया। किचन से नमक, चीनी और नींबू का शरबत बनाकर
पिलाया।
“आप तो इतने मे ही फूल की तरह
कुम्हला गयीं। लगता है जैसे किसी ने गमले से उखाड़ दिया हो। आप बहुत नाजुक हैं ।”
मोनी कुसुम का माथा सहलाते हुए बोली।
“यह परेशानी तुम्हें नहीं होती?
“कुसुम ने मोनी से पूछा। “होती क्यों नहीं! सुबह ही तो चार बार
उल्टी की हूँ। मगर क्या फर्क पड़ता है। ऐसे में ही खाना बनाई खिलाई हूँ । खुद भी
आधी रोटी खाके निकल पड़ी हूँ।” मोनी मुस्कुरा कर बोली।
“न जाने किस मिट्टी की बनी हो,
इस हालत मे ईंट-बालू भी ढोती हो। मेरा तो अपना शरीर ही ढोने में दम
निकल जा रहा है।” कुसुम जबरदस्ती मुस्कुराते हुए बोली।
“मिट्टी तो एक ही है मालकिन,
अन्तर बनाने का है, भगवान ने आपको फूल बनाया है। और--” बोलते बोलते मोनी चुप हो
गयी।
“चुप क्यों हो गयी भगवान ने तुम्हें
क्या बनाया बताओ। “कुसुम ने पूछा।
“बंदरिया
वह भी पत्थर की, जो बच्चे को पीठ पर बाँध, सिर पर टोकरी रख दूसरी, तीसरी मंजिल तक चढ जाती है।”
***
प्रेम
नारायन तिवारी
रुद्रपुर
देवरिया


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