रामकथा में ‘लक्ष्मण-रेखा’ प्रसंग
श्रीराम पुकार शर्मा
विश्व भर में रामकथा का मूल स्रोत आदिकवि महर्षि वाल्मीकि
द्वारा प्रणीत “रामायण” ही है । उसी की कथा-वस्तु को केंद्र कर विविध भाषाओं में
परवर्तित अनगिनत रामकाव्यों की रचना हुई है, जिनमें कुछ क्षेत्रीय परंपराओं,
रीति-नीतियों और कवि भाव-विचारों के अनुरूप कुछ प्रसंगों में कमोवेश कुछ अंतर
अवश्य ही रहा है । ऐसा ही अंतर विविध रामकाव्यों में ‘लक्ष्मण-रेखा’ प्रसंग
सम्बन्धित भी रहा है । उत्तर भारत या फिर हिन्दी बहुल क्षेत्रों में सर्वमान्य
रामकथा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित “रामचरितमानस” ही है । इसमें श्रीराम
भक्त-प्रवर गोस्वामी जी ने सीता-हरण प्रसंग में ‘लक्ष्मण रेखा’ की घटना का उल्लेख
तो, न किया है, पर बाद में लंका-कांड में मंदोदरी के माध्यम से ‘लक्ष्मण रेखा’ के
सम्बन्ध में अभिव्यक्त अवश्य ही किया है । यह घटना मानस-प्रेमियों के लिए एक जटिल
साहित्यिक-धार्मिक प्रश्न बन गया है । जबकि कई रामकाव्यों में ‘लक्ष्मण रेखा’
संबंधित प्रसंग का उल्लेख हुआ है । अब तो रामकथा में यह ‘लक्ष्मण रेखा’ प्रसंग
सामाजिक आवश्यकता बन गई है, जिसके बिना रामकथा ही अपूर्ण प्रतीत होती है ।
गोस्वामी तुलसीदास ने आदिकवि वाल्मीकि कृत “रामायण” को ही
आधार बनाकर अपनी “रामचरितमानस” की रचना की है, जो भारतीय संस्कृति का संवाहक मात्र
ही नहीं है, अपितु यह विश्वजनीन (विश्व भर के लिए हितकर) वृहद आचार-शास्त्र और
मानव-धर्म भी है । फलतः विश्वभर की हिन्दू-संतति, इसे
अपना धार्मिक ग्रंथ के रूप में सम्मान देते और पूजते रहे हैं । हलाकी गोस्वामी जी
ने विभिन्न पुराण निगमागम सम्मत, जागतिक और पारमार्थिक पूर्व
लोकशास्त्रों का विशद सम्यक अवेक्षण कर ही अपने अन्तः सुख के लिए रघुनाथ जी की
गाथा संपूरक ‘रामचरितमानस’ की रचना की है, जो ज्ञान और धर्म जनित अलौकिक एक पवित्र
पयोनिधि ही है, जिसमें ज्ञान-पिपासु जन डुबकी लगा-लगाकर अलौकिक सुधा-रस का पान
करते हुए अपनी जिज्ञासा को शांत करते हैं ।
‘नाना पुराण निगमागम सम्मत यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्योऽपि ।
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ भाषा निबंधमति मंजुलमातनोति ॥’
सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों कालों में विद्यमान, श्रीराम के समकालीन और
प्रत्यक्षदर्शी महर्षि वाल्मीकि थे, जिन्हें श्रीराम के जीवन में घटित समस्त घटनों
का पूर्ण ज्ञान था । उन्होंने भी अपनी “रामायण” में सीता-हरण प्रसंग में रामानुज
लक्ष्मण द्वारा सीता जी की रक्षा सम्बन्धित कोई विशेष रेखा या ‘लक्ष्मण रेखा’
खींचने का कोई उल्लेख न किया है । बल्कि उस प्रसंग में सीता जी की कटु बातों को
सुनकर लक्ष्मण जी ने अपने पूज्यनिय भ्राता श्रीराम के आदेश के विपरीत, अपने मन को
वश में कर, दोनों हाथों को जोड़े, मातृ-सदृश सीता जी को प्रणाम कर श्रीराम जी के
पास चल दिये । आदिकवि ने लिखा है –
‘ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः कृताञ्जलिः किंचिदभिप्रणम्य
।
अवेक्षमाणो बहुशः स मैथिली जगाम रामस्य समीपमात्मवान् ॥’
40 अरण्यकाण्ड,‘रामायण’
अर्थात, - ‘तब मन को अपने वश में रखने वाले लक्ष्मण जी
दोनों हाथों को जोड़े कुछ झुककर मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम किए । फिर बार-बार
उनकी ओर देखते हुए वे श्रीरामचन्द्रजी के पास चल दिये ।’
विश्वभर में विविध भाषीय हजारों प्रसिद्ध राम-काव्य ग्रंथ
हैं और रामकथाओं से सम्बन्धित पुस्तकों की संख्या लाखों में है । उन सभी का मूल
आधार आदिकवि वाल्मीकि कृत “रामायण” ही है, जो सर्वकालिकसमादृत सर्वगामिनी,
सर्वव्यापिनी तथा अजर-अमर रचना है । उसके पश्चात के प्रसिद्ध राम-काव्यों में
महर्षि वेदव्यास कृत ‘अध्यात्म रामायण’ और फिर उसके बाद में प्रथम शताब्दी ईसा
पूर्व कालिदास कृत ‘रघुवंशम्’, चौथी शताब्दी में प्राकृत भाषा में विमलसूरि कृत ‘पउमचरियम्’
आदि हैं, जिनमें आदिकवि वाल्मीकि की रामकथा को ही मूल रखा गया है । उनमें
सीता-रक्षा हेतु कोई विशेष रेखा या ‘लक्ष्मण-रेखा’ का उल्लेख नहीं हुआ है ।
संभवतः पहली या तीसरी शताब्दी में जैन महाकवि विमलसूरि द्वारा
महाराष्ट्रीय प्राकृत भाषा में ‘पउमचरियम्’ नामक रामकाव्य लिखा गया है, जो रामकथा का सबसे पुराना जैन संस्करण है । इसमें राम को ‘पउम’
या पद्म’ शब्द से संबोधित किया गया है । इसमें सीता-हरण प्रसंग में एक ‘सीमा-बंध’
या ‘मर्यादा-वृत्त’ के रूप में उल्लेख मिलता है, जो कालांतर
के ‘लक्ष्मण रेखा’ से कुछ मेल भी खाता है । परंतु इसमें स्पष्ट ‘लक्ष्मण रेखा’ का
कोई उल्लेख नहीं है । हलाकी परवर्तित रामकथाकारों ने इसे ‘लक्ष्मण-रेखा’ ही माना
है । जैन परंपरा में यह सबसे प्राचीन प्रसंग है, जो ‘लक्ष्मण-रेखा’ के पूर्व रूप
का संकेत देता है ।
‘सीयाहिं परिक्खित्तो त्ति रक्खावळओ कइओ’
- (सर्ग – 43, प्राकृत लिपि,
संपादक - एच जकोबी)
हिन्दी रूपांतर – ‘सीता को घेरकर एक सुरक्षा-वलय बनाया ।’
जैन कथाओं में रावण को अत्यधिक चमत्कारी पात्र के रूप में
नहीं, बल्कि एक वीर और नैतिक दोष वाला मानव मात्र
ही चित्रण किया गया है । इसलिए इसमें उल्लेखित ‘सीमा बंध’ भी अलौकिक नहीं, बल्कि सामान्य गृह-सीमा मात्र ही है । रावण उसे पार करने के लिए सीता के ‘अतिथि
देवो भवः’ विश्वास को ही तोड़ता है, जिसे जैन नैतिकता के लिए बड़ा दोष माना जाता है
।
लेकिन 11वीं शताब्दी में
काश्मीर के राजा अनन्त (1028-1063) तथा उनके पुत्र राजा कलश
(1063-1089) के दरबारी विद्वान आमात्य, प्रसिद्ध दार्शनिक और
महाकवि क्षेमेंद्र द्वारा रचित ‘रामायण मंजरी’ है, जो आदिकवि वाल्मीकि कृत
“रामायण” के अनुरूप ही सात काण्डों में विभक्त तथा 6186 पदों में रचित एक प्रसिद्ध
रामकाव्य है । इसे ‘काश्मीरी रामायण’ भी कहा जाता है । इसमें ही सर्वप्रथम रामानुज
लक्ष्मण द्वारा सीता की रक्षा हेतु खींची गई ‘लक्ष्मण-रेखा’ का स्पष्ट उल्लेख
मिलता है । ‘लक्ष्मण रेखा’ दृष्टव्य सम्बन्धित यह सबसे प्राचीन संस्कृत-स्रोत
ग्रंथ है । उसके अरण्य काण्ड में एक स्थान पर उल्लेखित है -
‘सीतां प्रति तदा लक्ष्मणो रक्षितुं कृतवान् रेखाम् ।
तां तीर्त्वा न कश्चिद् प्राणिभिर्विष्टुम् अर्हति ॥’
- (अरण्यकाण्ड, ‘रामायण-मञ्जरी’)
अर्थात, - ‘रामानुज लक्ष्मण जी ने सीता की रक्षा के लिए
भूमि पर एक रेखा खींच दी, जिसे कोई भी प्राणी पार करके उसके भीतर
प्रवेश नहीं कर सकता है ।’ उसी के साथ एक अन्य श्लोक भी दर्शनीय है –
‘सीतां प्रति समुपेत्य सौमित्रिरिदमब्रवीत् ।
इयं सिमा मया देवि विनिर्मिता सुरक्षिताम् ॥’
– (अरण्यकाण्ड, ‘रामायण-मञ्जरी’)
अर्थात, - ‘हे देवी ! यह सीमा मैंने आपकी रक्षा के लिए खींच
दी है । आप इसका उल्लंघन न करें । इसके अंदर आप पूर्णतः सुरक्षित रहेंगी ।’
“रामायण मंजरी” में लक्ष्मण द्वारा तंत्र-सिद्धि से संधानित
अत्यंत ही शक्तिशाली रेखा खींची गई, जिसे कोई भी प्राणी या फिर दानव-राक्षस पार
नहीं कर सकता । इसका उद्देश्य सीता जी की रक्षा और वन-प्रदेश में आगत कोई भी
मायावी प्रवंचना को रोकना ही था । रावण ब्राह्मण याचक बनकर उस रेखा तक पहुँच तो
जाता है, पर वह उसे पार नहीं कर पाता है । फलतः वह
छलपूर्वक सीता का हरण करता है । इस ‘लक्ष्मण रेखा’ के पीछे मूल कारण काश्मीर की
शैव-तांत्रिक परंपराओं में रक्षा-वृति व मर्यादा-चक्र जैसे प्रचलित तांत्रिक घेरों
की परंपरा ही है । संभवतः इसी दार्शनिकता ने परवर्तित रामकाव्य तथा रामकथाओं में ‘लक्ष्मण
रेखा’ नाम से एक नये प्रसंग को जन्म दिया है ।
जबकि परवर्तित 12 वीं शताब्दी में दक्षिण भारत के चोल राजा
कुलोतुंग के दरबारी महाकवि कविचक्रवर्ती कंबन ने तमिल भाषा में ‘रामावतारम्’ की
रचना की, जिसे ‘कंबन रामायणम्’ भी कहा जाता है । इसे दक्षिण भारत की एक महत्वपूर्ण
‘रामायण’ माना जाता है । इसमें महाकवि कंबन ने अपनी व्यापक दृष्टि और
लोक-मान्यताओं के अनुसार कुछेक घटनाओं में कुछ परिवर्तन भी किया है । परंतु
उन्होंने सीता-हरण के प्रसंग में लक्ष्मण द्वारा खींची गई, कोई भी जादुई
सुरक्षा-रेखा का वर्णन नहीं किया है ।
‘रामवतारम्’ या ‘कंबन रामायण’ के अनुसार, सीता जी के आग्रह
पर, स्वर्ण-हिरण को पकड़ने हेतु राम जी उसके पीछे जाते हैं । परंतु उसके मायावी
स्वरूप को पहचानते ही उसे बाण से आहत कर देते हैं । अब वह मायावी मारीच ‘हे
लक्ष्मण ! हे सीता !’ कहकर चीत्कार करने लगता है, जिसे सुनते ही सीता जी अपने
स्वामी पर आगत कोई अनहोनी घटना की बात को समझकर, व्याकुल मन से लक्ष्मण को उनकी
रक्षा के लिए अतिशीघ्र ही जाने के लिए प्रेरित करती है । लक्ष्मण जी अपने भ्राता
श्रीराम को सर्वशक्तिमान बताकर, पहले तो सीता जी को बहुत समझाते हैं, पर उनके न
मनाने पर, उन्हें सावधान रहने का परामर्श देते हुए कहते है, - ‘यदि कोई अनिष्ट
हुआ, तो एखराव (जटायु) अपनी शक्ति भर आपकी रक्षा करेंगे । फिर वे वहाँ से उदास चल
देते हैं । लेकिन महाकवि कंबन ने अपनी ‘रामावतरम्’ या ‘कंबन रामायण’ में कोई ‘लक्ष्मण
रेखा’ का कोई उल्लेख नहीं किया है ।
बाद के कुछेक दक्षिण भारतीय रामकाव्यों तथा रामकथाओं में ‘लक्ष्मण रेखा’ सम्बन्धित कुछ उल्लेख अवश्य ही हुआ है । किसी एक में उल्लेखित है कि माता सीता जी के कठोर वचन को सुनकर लक्ष्मण जी अपने मन को काम, क्रोध और मोह के बंधनों से मुक्त और संयमित कर, अपने बाण से सीता जी के चारों ओर एक अदृश्य रेखा खींच देते है और कहते हैं, - ‘अम्मा ! आप इसे पार मत करना ।’ कुछ आचार्यों का मानना है कि सीता की रक्षा के लिए बनाई गई धर्म-सीमा, अर्थात, ‘लक्ष्मण रेखा’ कोई भौतिक रेखा नहीं, बल्कि धर्म की मर्यादा का संकेत मात्र है । किसी भी परिस्थिति में इस सीमा रेखा को लाँघने का परिणाम ही सीता-हरण रूप में सामने आता है ।
15 वीं शताब्दी में बंगला भाषा में कृतिबास ओझा द्वारा रचित
‘श्रीराम पंचाली’ या ‘कृतिबासी रामायण’ है, जिसे आदिकवि वाल्मीकि की “रामायण” का
ही बंगला अनुवाद कहा जाता है । यह बंगला भाषा-भाषियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना
है । इसमें तत्कालीन बंगाल की लोक-कथाओं, रीति-रिवाजों,
स्थानीय चरित्रों और मानवी-भावनाओं के आधार पर कुछ परिवर्तन हुआ है और कुछ नए
आख्यान भी जुड़े हैं । इसमें सीता हरण प्रसंग में लक्ष्मण द्वारा अपने धनुष के नोंक
से खींची गई विशेष रेखा या ‘लक्ष्मण रेखा’ का स्पष्ट वर्णन मिलता है ।
‘लखन खेंचिलो सीमर रेखा,
बोलिलें जानकि, एरे न देखा ।
ए रेखा लंघिले देवी, अनर्थ होबी भारी ।’
(अरण्य कांड,
पर्व 22-23, कलकता विश्वविद्यालय संस्करण)
अर्थात, - ‘लक्ष्मण जी कुटिया के बाहर एक सीमा रेखा खींचकर,
सीता से बोले । हे देवी ! आप इस सीमा रेखा को न लाँघिएगा, इसको लाँघने पर आपके साथ भारी अनर्थ होगा ।’
एक अन्य उदाहरण विद्वान बेनी माधव सील संस्करण के अरण्य काण्ड से -
‘प्रबोध ना माने सीता, आरों बोले रोषे । आजि मोजिबेक सीता आपनार दोषे ।।
गन्डी दिया बेड़ीलेन लक्खन से घर । प्रवेश ना कोरे केह घरेर भीतर ॥’
अर्थात, - ‘सीता जी समझाने पर भी लक्ष्मण की बात नहीं मानी,
बल्कि वह और भी कटु वचन बोलने लगी । निश्चय ही सीता को अपनी इस गलती के कारण कोई
बड़ी विपत्ति जनित दुख को सहन करना पड़ेगा । तब लक्ष्मण ने अपने धनुष के नोंक से उस
कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा रेखा खींच दी, जिसको लाँघकर कोई भी अंदर प्रवेश
नहीं कर सकता है ।’
चुकी बंगाल में तांत्रिक-मंत्र, बाधा-निवारण रेखा, शक्ति-चक्र जैसी प्रथाएँ, प्राचीन काल
से प्रचलित रही है । बंगाली लोक-कथाओं में ‘रक्षा-घेरा’ नाम से सांस्कृतिक-तत्व भी
मिलते हैं । महाकवि कृतिबास ने उन्हीं तांत्रिक-प्रथाओं के प्रति लोगों की आस्था
और विश्वास के अनुकूल तांत्रिक-मंत्र से संधानित अग्नि-सदृश, प्रकाशमय और अभेद्य सीमा के रूप में ‘लक्ष्मण रेखा’ को दर्शाया है । साथ
ही उस ‘लक्ष्मण रेखा’ के माध्यम से उन्होंने समाज को भी नैतिक चेतावनी प्रदान किया
है । महाकवि कृतिबास का ‘लक्ष्मण रेखा’ प्रसंग परवर्तित रामकथाओं को बहुत प्रभावित
किया और फिर वह लोक-स्मृति में स्थायी रूप से स्थापित हो गया है ।
15 वीं शताब्दी में उड़िया भाषा के महाकवि
बलराम दास द्वारा रचित ‘जगमोहन रामायण’ एक प्रसिद्ध राम-काव्य है, जो उत्कल प्रदेश
में ‘दंडी रामायण’ के नाम से लोकप्रिय है । इसमें भी ‘कृतिबासी रामायण’ के अनुरूप
ही सीता-हरण प्रसंग में लक्ष्मण जी, सीता जी की रक्षा हेतु उनके चारों ओर एक ‘रक्षा-वृत्त’
बनाते हैं और कहते हैं - ‘इस सीमा को छोड़ कर आप बाहर न जाइएगा । यह आपकी रक्षा की
मर्यादा है ।’ - (दण्डी रामायण, अरण्यकाण्ड)
16 वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ अपनी सरलता और सुबोधता के कारण हिन्दी भाषीय प्रांतों और विश्व भर के हिन्दी भाषा-भाषी लोगों के बीच सर्वाधिक प्रसिद्ध है । इस महाकाव्य में वर्णित घटनाओं को लोग यथार्थ और प्रामाणिक मानते हैं, क्योंकि यह महाकाव्य आदिकवि वाल्मीकि की “रामायण” के ही पूर्ण अनुरूप है । माना गया है कि आदिकवि वाल्मीकि श्रीराम जी के समकालीन थे । सम्पूर्ण रामकथा के वे अन्तः चक्षुदर्शी रहे हैं । अतः गोस्वामी जी ने वाल्मीकि की “रामायण” को अपने प्रभु श्रीराम की वास्तविक जीवनगाथा मानकर ही उसके मूल भाव को केवल भाषान्तर स्वरूप ही प्रदान किया है । फलतः मूल “रामायण” के अनुरूप ही गोस्वामी जी ने अपनी ‘रामचरितमानस’ में सीता-हरण प्रसंग में ‘लक्ष्मण रेखा’ जैसी कोई नवीन उद्भावना का वर्णन नहीं किया ।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी ‘रामचरितमानस’ में सीता-हरण
प्रसंग में ‘लक्ष्मण रेखा’ जैसी कोई घटना का उल्लेख नहीं किया, इसका कारण तो
स्पष्ट हो गया । लेकिन बाद में उन्होंने ‘लंका
काण्ड’ में रानी मंदोदरी के मुख से ‘लक्ष्मण रेखा’ सम्बन्धित
उक्ति को अभिव्यक्त ही भला क्यों करवाया
है ?
लंका के राज दरबार में आगत रामदूत बालि-पुत्र अंगद की धमकी
से निराश होकर दशग्रीव रावण शाम को मंदोदरी के पास पहुँचा । तब मन्दोदरी अपने कंत
रावण को एक बार फिर समझाने का प्रयास करती हुई कहती है, - ‘हे कन्त ! आप मन में
स्वयं विचारकर राम के साथ युद्ध की कुबुद्धि को छोड़ दीजिए । आपका, रघुनाथजी से
युद्ध शोभा नहीं देता है । आप स्वयं सोचकर विचारिए कि उनके छोटे भाई लक्ष्मण ने एक
जरा-सी रेखा खींच दी थी, उसे भी तो, आप पार ही न कर पाये थे । ऐसा
तो आपका पुरुषत्व है ! फिर आप राम का सामना किस पुरुषार्थ से करेंगे ?
‘कंत समुझि मन तजहु कुमतिही । सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही ॥
रामानुज लघु रेखा खचाई । सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई ॥’
(लंका काण्ड, रामचरितमानस)
इस प्रकार हम पाते हैं कि बाद की रामकथाओं, लोककथाओं और
नाटकों में विशेष चमत्कार प्रदर्शन हेतु ही ‘लक्ष्मण-रेखा’ को एक महत्वपूर्ण
नाटकीय तत्व के रूप में जोड़ा गया है । इस सम्बन्ध में कुछ तत्कालीन साहित्यिक,
धार्मिक, सामाजिक, लोक-परंपरा और चरित्र-विन्यास पर गौर करना अधिक समीचीन होगा ।
तत्कालीन साहित्य – जैसे कि पूर्व में विवेचना की गई, 11वीं
शताब्दी में काश्मीर के प्रसिद्ध दार्शनिक और संस्कृत के महाकवि क्षेमेंद्र द्वारा रचित ‘रामायण मंजरी’ जिसे ‘काश्मीरी रामायण’ भी
कहा जाता है, उसमें सर्वप्रथम रामानुज लक्ष्मण द्वारा सीता की रक्षा हेतु खींची गई
‘लक्ष्मण-रेखा’ का स्पष्ट रूप में उल्लेख मिलता है । फिर दक्षिण भारतीय कई
रामकाव्यों तथा रामकथाओं में, 15 वीं शताब्दी में उड़िया महाकवि बलराम दास कृत ‘जगमोहन
रामायण’ या ‘दांडी रामायण’ में तथा 15 वीं शताब्दी में ही बंगला महाकवि कृतिबास
ओझा कृत ‘श्रीराम पंचाली’ या ‘कृतिबासी रामायण’ में ‘लक्ष्मण रेखा’ का बड़ा ही
स्पष्ट चित्रण हुआ है । परवर्तित कई रामकथाकारों ने अपने पूर्व के महाकाव्यों का
अनुसरण करते हुए ‘लक्ष्मण रेखा’ प्रसंग को अपने ग्रंथों और कथाओं में सादर उल्लेख
किया है ।
धार्मिक कारण – लक्ष्मण जी को भगवान शेषनाग का अवतार माना जाता है, जो श्रीहरि विष्णु जी तथा माता लक्ष्मी जी की सेवा हेतु हर
युग में उनके साथ ही रहते आए हैं । इसी तरह से त्रेता युग में भी शेषनाग जी,
लक्ष्मण के रूप में, श्रीराम (श्रीहरि) और उनकी भार्या सीता (लक्ष्मी) जी की सेवा
हेतु अवतरित हुए । संभवतः उनकी देव-महत्ता को दर्शाने के लिए ही रामकाव्यों और
रामकथाओं में ‘लक्ष्मण-रेखा’ जैसे प्रसंग को सम्मिलित किया गया है, जिसे लोगों ने
सहर्ष स्वीकार भी किया है ।
सामाजिकता – चूँकि रामकथा के लगभग सभी राम-पक्षीय पात्र, समाज में आदर्श पात्रों के रूप में स्वीकार किए गए हैं । फलतः उनकी क्रिया-कलाप, जनसाधारण के लिए अनुकरणीय ही हैं । ऐसे ही आदर्श के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान है, रामानुज लक्ष्मण जी हैं । रामकथा में अपने भ्राता श्रीराम और मातृ सदृश भाभी सीता जी के प्रति उनका अटूट निष्ठा, निस्वार्थ सेवा और त्याग जग चर्चित है । वनवास के दौरान उन्होंने अपने हर सूखीं को त्यागकर राम-सीता की सेवा की और राक्षसों से युद्ध किया । फलतः लक्ष्मण जी भारतीय लोक-कथाओं में एक आदर्श भाई और कर्तव्यनिष्ठ सेवक के रूप में पूजनीय बन गए हैं । संभवतः उनके आदर्श के माध्यम से मानव जाति को सामाजिकता की सीमा में बाँधने के लिए ही ‘लक्ष्मण रेखा’ की प्रयोजनीयता को सिद्ध की गई है ।
साहित्यिक व लोक परंपरा – काश्मीरी महाकवि क्षेमेन्द्र की ‘रामायण मंजरी’ ने लगभग उत्तर भारत को,
बंगला भाषी महाकवि कृतिबास ओझा की ‘श्रीराम पंचाली’ ने लगभग पूर्वी भारत को और
दक्षिण भारत की कुछ रामकथाओं ने दक्षिण भारत को, अर्थात समग्र भारतवर्ष के साहित्य
और लोक परंपराओं को ही प्रभावित किए हैं । इन प्रसिद्ध रामकाव्यों ने भारतीय
जनमानस में ‘लक्ष्मण रेखा’ को स्थायी स्वरूप प्रदान किया है । अब तो ‘लक्ष्मण रेखा’
प्रसंग के बिना रामकथा ही अधूरी प्रतीत होती है ।
चरित्र-विन्यास – जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि रामानुज लक्ष्मण का आदर्श चरित्र, अपने
परिजन के प्रति अटूट निष्ठा, निस्वार्थ-सेवा,
त्याग, पूर्ण समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक स्वरूप हैं,
जो हमें विषम परिस्थितियों में अपनों का साथ देने, सीमाओं का
सम्मान करने और धर्म-न्याय के मार्ग पर सदैव अडिग रहने की प्रेरणा देते हैं ।
लक्ष्मण जी ने सीता के प्रति हमेशा सम्मानजनक व्यवहार किया, जो
समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शन का महत्वपूर्ण पाठ है । संभवतः इसी भाव
के प्रचार के लिए रामकाव्यों के विद्व महाकवियों ने अपने रामकाव्यों में ‘लक्ष्मण
रेखा’ का उल्लेखकर उनके प्रति अपने सम्मान को दर्शाया है ।
अब एक बार फिर से उसी प्रश्न पर लौटते हैं कि गोस्वामी
तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ के ‘लंका काण्ड में ‘लक्ष्मण रेखा’ का उल्लेख क्यों
किया है ? जहाँ तक प्रतीत होता है कि इसके पीछे भी कई संभावित कारण रहे होंगे -
प्रथम, गोस्वामी तुलसीदास
तक आते-आते रामकथा के प्रति जनमानस के मन-मस्तिष्क में ‘लक्ष्मण रेखा’ प्रसंग
स्थायी स्वरूप में स्थापित हो चुका था । चुकी गोस्वामी जी, आदिकवि वाल्मीकि कृत
“रामायण” को ही अपना आदर्श मानते हुए अपनी ‘रामचरितमानस’ की रचना कर रहे थे, लेकिन
तबतक जनसाधारण में स्थापित ‘लक्ष्मण रेखा’ सम्बन्धित स्थापित प्रबल जन भावना को वे
निरादर नहीं कर पाये । उन्होंने लोकविश्वास का सम्मान करते हुए इस प्रसंग को
स्वीकारा किया है और लंका काण्ड में इस प्रसंग का उल्लेख किया है ।
द्वितीय, मंदोदरी पंचकन्याओं
में से एक रही थी । उसका चरित्र एक आदर्श, बुद्धिमान और धर्मपरायण रानी का है, जो लंकापति रावण की पत्नी होती हुई भी, उसे
हमेशा अधर्म से दूर रहने, सीता को लौटाने और श्रीराम से बैर-भाव त्यागने की सलाह
देती है । वह भी सामान्य नारियों की तरह ही चाहती होगी कि उसका पति रावण हमेशा
जीवित रहे । अतः वह रामानुज श्रीलक्ष्मण के एक बाण की शक्ति का भी सामना करने में
असमर्थ अपने पति रावण की शक्ति पर व्यंग्यात्मक चोट करती है, ताकी वह श्रीराम की
शक्ति को पहचान सके और उनसे बैर को त्याग देवे ।
तृतीय, गोस्वामी जी ने
मंदोदरी के उस कथन के माध्यम से पूर्व महाकवियों द्वारा मानव सीमा सम्बन्धित
मर्यादा व्यवस्था ‘लक्ष्मण रेखा’ की महता को स्थापित किया है । किसी भी शक्तिशाली
व्यक्ति, चाहे वह रावण ही क्यों न हो, उसका कर्म और धर्म होता है, असहायों की
सहायता और रक्षा करना, न कि उसका हरण करना । बहुत संभव है कि महाकवि गोस्वामी जी
ने जनमानस को नैतिकता की चेतावनी देने के लिए ही मंदोदरी से उक्त कथन को कहलवाया
है ।
चतुर्थ, “रामायण” या ‘राम की लीला’
की घटना केवल एक बार ही नहीं, बल्कि इसके पहले भी कई बार हो चुकी थी । ‘रामचरितमानस’
के ’काकभुशंडि-प्रसंग’ में स्वयं काकभुशुंडि जी ने बताया है कि
उन्होंने “रामायण”
को 11 बार और “महाभारत”
को 16 बार होते देखा चुका है । उनमें घटनाएँ और उसके परिणाम अवश्य ही कुछ अलग-अलग हुए थे । कहा
जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी रामकथा में काकभुशंडि
द्वारा देखी गयी 4 कल्पों की ‘रामकथा’ को समाहित किया है । विविध युगों और कालों में सम्पन्न ‘रामकथा’ के बारे में
आदिकवि वाल्मीकि ने अपने “योग वशिष्ठ” में भी लिखा है
-
‘राक्षसक्षतये विष्णोर्महीमवतरिष्यतः । अधुनाकादशं जन्म रामनाम्नो भविष्यति
॥’ 30
अर्थात, - ‘राक्षसों के नाश के लिए, भगवान विष्णु, जो कई बार पृथ्वी पर
अवतरित होते हैं, ग्यारहवीं बार राम
के नाम से जन्म लेंगे ।’
गोस्वामी तुलसीदास ने भी अपनी ‘रामचरितमानस’ के ‘उत्तर
काण्ड’ में लिखा है –
‘हरि प्रेरणा जेहिं कल्प जोइ जतुधानपति होइ । सूर प्रतापी अतुलबल दल सहित बस
सोइ ॥’
(178 ख, बालकाण्ड)
अर्थात, - ‘भगवान की प्रेरणा से, जिस कल्प में, जो राक्षसों
का राजा (रावण) होता है, वही शूर, प्रतापी,
अतुलित बलवान अपनी सेना सहित उस पुरी (लंका) में बसता है ।’
इसका आशय यह हुआ कि “रामायण” में उल्लेखित ‘रामकथा’ से पहले
भी दसग्रीव रावण दस बार, राम के हाथों से पराजित हो चुका था । ऐसे में यह संभावना
बनती है कि ‘रामचरितमानस’ में सीता हरण सम्बन्धित जो प्रसंग है, वह किसी एक कल्प
के रामावतार का है और मंदोदरी, जो रावण को बता रही है, वह किसी अन्य कल्प के “रामावतार” का है । इस तथ्य की बहुत कुछ
संभावना ही है ।
कारण चाहे, जो भी रहा हो
। पर रामकथा में उल्लेखित ‘लक्ष्मण-रेखा’ का आशय, पंचवटी में कुटिया के बाहर खींची
गयी, कोई रेखा मात्र न होकर, मानव मात्र के लिए सनातनी ऋषियों-मुनियों के द्वारा
निर्धारित नियमों, मर्यादाओं और आदर्शों का पालन ही संबंधित सीमा रेखा है । आज ‘लक्ष्मण-रेखा’
का सबसे बड़ा आशय जीवन, परिवार, समाज, देश, संस्था, संविधान सम्बन्धित विभिन्न
सीमाएँ हैं, जिन्हें पार करना, अनुचित है । इसी भाँति
विपत्ति-काल में धैर्य साधे रखना और सोच-समझकर कार्य करना ही जीवन की सीमा रेखा है
। माता सीता जी उस विपत्ति काल में अपने स्वाभाविक व् शास्त्र-सम्मत लक्षणों,
धैर्य और विनम्रता के विपरीत सच्चरित्र व् श्रीराम की आज्ञा का
अक्षरतः पालन करने वाले अपने देवर श्री लक्ष्मण को, जो क्रोधवश मार्मिक वचन कही,
उसे ही सीता द्वारा सुलक्षण और सामाजिकता की रेखा का उल्लंघन कहा जा सकता है,
जिसके प्रतिफलन में ‘सीता-हरण’ और आगे चलकर राम-रावण के बीच युद्ध जैसी दारुण
विभीषिका के रूप में घटित हुए । इस तथ्य को महाकवि गोस्वामी जी ने भी स्वीकार किया
है । अतः रावण के द्वारा हरण किए जाने के बाद उन्होंने सीताजी से कहलवाया हैं –
‘हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा, सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा !’
(अरण्य काण्ड)
अर्थात, - श्री जानकीजी बहुत प्रकार से विलाप करती हुई कहती हैं, - ‘हा लक्ष्मण ! तुम्हारा कोई दोष नहीं है । मैंने ही क्रोध किया, उसका ही फल मुझे प्राप्त हुआ है ।’
श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक व लेखक,
24, बन बिहारी बोस रोड,
हावड़ा – 711101
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