आलेख
वसंत
पंचमी:
प्रकृति,
चेतना और आत्म जागरण का उत्सव
डॉ. घनश्याम बादल
भारतीय
परंपरा और श्रीमद् भागवत गीता में वसंत को
ऋतुराज कहा गया है,’ऋतूनां कुसुमाकरः अर्थात्
ऋतुओं में मैं वसंत हूँ, जहाँ सृजन, सौंदर्य
और चेतना अपने चरम पर होती है। बसंत का सौंदर्य एवं महत्व देखकर ही इसे ऋतुराज की
संज्ञा दी गई है। वसंत पंचमी भारतीय जीवन-दर्शन का सजीव प्रतीक है- जहाँ धर्म,
विज्ञान, मनोविज्ञान और प्रकृति एक-दूसरे से
अलग नहीं, बल्कि एक ही चेतना के विविध रूप हैं।
तिथि
मात्र नहीं बसंत
वसंत
पंचमी केवल पंचांग में अंकित एक तिथि मात्र नहीं, अपितु
भारतीय चेतना का वह क्षण है जब जड़ता के लंबे शीतकाल के बाद जीवन पुनः मुस्कुराने
लगता है। यह ऋतु परिवर्तन का संकेत भर नहीं, बल्कि आत्मा,
प्रकृति और समाज तीनों के नवजागरण का पर्व है। श्वेत शीत के बाद
पीत वसंत का आगमन जैसे कहता है-अब भीतर और बाहर, दोनों ही
स्तरों पर ऊर्जा को जगाने एवं सृजन का समय है।
धार्मिक
और आध्यात्मिक संदर्भ
वसंत
पंचमी को माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस माना जाता है। सरस्वती केवल विद्या की देवी
नहीं,
बल्कि चेतना की धारा हैं। वह चेतना जो अज्ञान के तम को चीरकर विवेक
का प्रकाश फैलाती है। इसीलिए इस दिन पुस्तकों, वाद्ययंत्रों
और लेखन-कार्य का पूजन होता है।
या
कुन्देन्दु तुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या
वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना
श्लोक
हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का स्वरूप शुद्ध, शांत और
उज्ज्वल होता है, ठीक उसी तरह जैसे वसंत का प्रकाश।
आध्यात्मिक दृष्टि से वसंत पंचमी आंतरिक ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। जैसे धरती के
भीतर बीज फूटते हैं, वैसे ही साधक के भीतर सुप्त चेतना जागती
है। योग और तंत्र परंपरा में इस काल को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है ।
प्रकृति
और विज्ञान का संगम
वैज्ञानिक
दृष्टि से वसंत पंचमी के आसपास पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में दिनों की अवधि
बढ़ने लगती है, सूर्य की किरणें अधिक सीधी और
ऊर्जा-समृद्ध हो जाती हैं। इसका प्रभाव सीधे मानव शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है।
मौसम
विज्ञान के अनुसार भी वसंत ऋतु में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे “प्रसन्नता दायक
हार्मोन” का स्तर बढ़ता है अवसाद, जड़ता और आलस्य में
कमी आती है। सृजनात्मकता और सीखने की क्षमता तीव्र होती है । इसीलिए प्राचीन भारत
में गुरुकुलों में नए अध्ययन सत्र, संगीत-नाट्य अभ्यास और
शास्त्रार्थ इसी काल में प्रारंभ होते थे।
मनोविज्ञान
और आत्मिक चेतना
मनोवैज्ञानिक
रूप से वसंत पंचमी आशा का पर्व है। शीतकाल मानव मन में एक प्रकार की संकुचनशीलता
ले आता है। कम प्रकाश, कम ऊर्जा, अधिक अंतर्मुखता। वसंत इस संकुचन को तोड़ता है। पीला रंग, जो वसंत पंचमी का प्रतीक है, ऊर्जा, ऊष्मा,आशावाद, बौद्धिक
स्पष्टता और आत्मविश्वास का रंग माना जाता है।
इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले पकवान
(केसरिया खीर, बेसन के लड्डू) परंपरा में शामिल हैं। यह रंग
मन को संदेश देता है- संकुचन एवं आलस का समय यानी शीतकाल अब चला गया इसलिए आगे बढ़ो,सीखो और रचो।”
भौगोलिक
परिवर्तन और जीवन
भौगोलिक
दृष्टि से वसंत पंचमी कृषि चक्र का महत्वपूर्ण पड़ाव है। रबी की फसलें पकने लगती
हैं,
सरसों के खेत पीले फूलों से भर जाते हैं। यह दृश्य केवल सौंदर्य
नहीं, बल्कि अन्न, समृद्धि और जीवन की
निरंतरता का संकेत है। उत्तर भारत से लेकर पूर्वी भारत तक लोकजीवन में वसंत का
स्वागत गीतों के माध्यम से होता है-
फागुन
आयो रे,
रंग बरसाओ रे,
सरसों
फूली,धरती बोली,जीवन गुनगुनाओ रे
जैसे
लोकगीतों में किसान की आशा, प्रकृति से उसका संवाद और
जीवन के प्रति उसका उल्लास समाहित होता है।
वसंत
और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा
वसंत
पंचमी के साथ ही फाग, होली, रास और प्रेम-उत्सवों की शृंखला आरंभ होती है। कालिदास ने ‘ऋतुसंहार’ में
वसंत को प्रेम और सृजन की ऋतु कहा है। यह प्रेम केवल दैहिक नहीं, बल्कि आत्मा का प्रकृति से, मनुष्य का मनुष्य से और
साधक का ब्रह्म से प्रेम है। आधुनिक संदर्भ में वसंत पंचमी
आज
के यांत्रिक और तनावग्रस्त जीवन में वसंत पंचमी हमें रुककर देखने,
महसूस करने और स्वयं से जुड़ने का अवसर देती है। यह पर्व याद दिलाता
है कि ज्ञान केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि संवेदनशीलता,
संतुलन और प्रकृति-संगति में भी निहित है। यदि हम वसंत पंचमी को
केवल रस्म न बनाकर, आत्मचिंतन का दिन नई सीख शुरू करने का
संकल्प, भीतर की नकारात्मकता त्यागने का अवसर बना लें,
तो यह पर्व वास्तव में आत्मिक पुनर्जन्म का उत्सव बन सकता है।
यह
पर्व संदेश देता है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नया करती है,
वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर नवीनता, विवेक और
करुणा का वसंत ला सकता है। वसंत पंचमी
शाश्वत संदेश है-
तम
से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतना की ओर,
और अस्तित्व से आत्मबोध की ओर बढ़ना । दुखों के पुराने पत्तों को
त्याग कर प्रसन्नता एवं नवीनता के नए अंकुरण को धारण करना।
***
डॉ. घनश्याम बादल
215,
पुष्परचना कुंज,
गोविंद
नगर पूर्वाबली
रुड़की
- उत्तराखंड - 247667


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