आलेख
विश्व-शांति की जन्मदात्री - ‘लुम्बिनी’
श्रीराम
पुकार शर्मा
लुम्बिनी, वर्तमान में नेपाल राष्ट्र के दक्षिण-मध्य छोर पर
स्थित, कभी प्राचीन भारतीय शाक्य गणराज्य का एक छोटा-सा गाँव मात्र हुआ करता था, जो बौद्ध-धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध की पावन जन्म-स्थली
होने के कारण, आज यह विश्वभर में शांति का प्रतीक, बौद्ध तीर्थ-स्थल और विशेष पर्यटक-स्थल
के रूप में विशेष प्रसिद्ध प्राप्त कर चुका है । यह लुम्बिनी, विश्व-शांति और बौद्ध-आध्यात्मिक
आस्था का केंद्र बना हुआ, दुनिया भर से शांति के आग्रही अन्वेषकों और बौद्ध-भिक्षुओं,
बौद्ध-अनुयायियों तथा असंख्य पर्यटकों को वर्षों से अपनी ओर प्रबल आकर्षित करते
रहा है । यहाँ विभिन्न देशों के आकर्षक बौद्ध-मठ व विहार स्थापित हैं । इसके साथ
ही कई प्राचीन राजवंशों से सम्बन्धित अनगिनत ऐतिहासिक स्मारक, प्रस्तर-स्तम्भ, शिला-लेख,
भवन-खंडहर आदि भी मौजूद हैं, जो सम्मिलित रूप से लुम्बिनी को, आज बौद्ध-आध्यात्म
और इतिहास का एक अनुपम संगम-स्थल बनाते हैं, या फिर दोनों ही लुम्बिनी में एकाकार
हो गए हैं ।
लुम्बिनी, भगवान महात्मा बुद्ध की पावन जन्म-स्थली, नेपाल
में हिमालय के तराई-प्रदेश के अंतर्गत रूपन्देही जिले के दक्षिणी छोर पर स्थित समृद्ध
और व्यवस्थित भैरहवा (सिद्धार्थनगर) से लगभग 22 किलोमीटर की पश्चिमी में दानों नदी के दाहिने किनारे पर स्थित
है । बताया जाता है कि जब कपिलवस्तु के शाक्य राजा शुद्धोधन की गर्भवती पत्नी महामायादेवी,
परम्परानुरूप अपनी संतान को जन्म देने के उद्देश्य से अपने मायके देवदह, प्राचीन कोलिय गणराज्य की राजधानी, जा रही थी, उसी क्रम में इसी
लुम्बिनी के आम्र और शाल से परिपूर्ण वन में एक शाल वृक्ष के नीचे ही शिशु
सिद्धार्थ को जन्म दी थी ।
शाक्य महारानी महामायादेवी ने अपनी बढ़ती प्रसव-पीड़ा के कारण
लुम्बिनी के उसी आम्र-शाल वन में, अपने मायके जाने की यात्रा को अल्प विराम देने
का आदेश दिया । शाही यात्रा वहीं पर थम गई । तत्काल में अतिशीघ्र ही आवश्यक कुछ
व्यवस्था की गई । वहीं पर भूमि-सेज पर वह पसर गईं । प्रसव-पीड़ा अपने चरण उत्कर्ष
पर जा पहुँचा और फिर शाक्य-वंशज दिव्य संतान स्वरूप सिद्धार्थ अर्थात, बोधिसत्व का
इस धरती पर अवतरण हुआ था । उस पवित्र अलौकिक घटना के साथ ही माता महामायादेवी की
वह परम प्रसव-पीड़ा, अब मधुर संतुष्टि और मुस्कान के रूप में परवर्तित हो गई और उस
पावन घड़ी में यहाँ पर उपस्थित सबके चेहरे पर मधुर प्रसन्नता की आभा चमक उठी थी । शाक्यमुनि
राजकुमार सिद्धार्थ, अपनी माता महामायादेवी सहित सभी प्राणियों के दु:खों को हरने के
लिए इस पवित्र धरती पर जो, प्रगट हो चुके थे ।
इस पवित्र स्थान के बहुत ही पास में ही शाक्यों को स्नान
करने वाला, शीशे के समान अत्यंत ही उज्ज्वल जल और खिले रक्तिम कमल पुष्पों से
शोभायमान एक पवित्र जलकुंड था । बोधिसत्व के जन्म के पहले, उसी पवित्र जलकुंड में माता
महामायादेवी स्नान करने के लिए अपनी सेविकाओं की मदद से उतरी थीं । स्नानकर वह उस
पवित्र जलाशय से निकलकर उत्तर की ओर बाहर आईं । वहाँ से लगभग बीस कदम आगे बढ़ने पर असहनीय
प्रसव-पीड़ा की अवस्था में उन्होंने अपने हाथ को बढ़ाकर पास के एक अशोक वृक्ष की
लटकती एक शाखा को थाम ली थी । फिर गंभीर साँसें लेने के बाद, वह पूर्व की ओर मुखकर
अपनी सेविकाओं के साथ वहाँ से आगे सात कदम चलीं और फिर वहीं पर बैठी गई थीं । वहीं
पर विश्व-प्राणियों के दु:खों को हरने वाले देव-पुत्र बोधिसत्व का अवतरण हुआ था। बोधिसत्व
के जन्म के उपरांत माता महामायादेवी को उनकी सेविकाओं ने पुनः उसी पवित्र जलाशय
में स्नान करवाई थीं । जन्म के उपरांत नवजात शिशु बोधिसत्व को भी प्रथम जल-स्नान
उसी पावन जलकुंड में करवाया गया था । देव-पुत्र को स्नान करने के बहाने कुछ पल के
लिए अपने में अंगीकार कर, वह जलाशय भी अनंतकाल के लिए पवित्रता और अमरत्व को
प्राप्त कर लिया है । वह पवित्र जलाशय आज भी उनकी जन्म-स्थली के बहुत ही पार्श्व
में विद्यमान है ।
यह सहस्त्राब्दियों पूर्व की बात है । इस बीच कालानुसार
बोधिसत्व के लुम्बिनी के पवित्र जन्म-स्थली पर, उनके स्मरण में कई बार स्मारक बने
और काल के कुचक्र से खंडहर में परिणत भी हुए । वर्तमान में इस पवित्र स्थान पर एक श्वेत
चतुर्भुजी ‘महामायादेवी मंदिर’ निर्मित है । उसके निकट ही वह पवित्र जलकुंड है और
उसके किनारे बहुत पास में ही एक प्राचीन बौद्धि-वृक्ष भी है । बौद्ध-अनुयायी
प्रार्थना करने के लिए यहाँ सर्वदा एकत्रित होते ही रहते हैं । वे अपनी मनोकामना
की पूर्ति हेतु, उस बौद्धि-वृक्ष से सम्बद्ध रंगीन झंडा बाँध जाते हैं । फलतः विविध
रंग के असंख्य फहराते झंडों के कारण यह बौद्धि-वृक्ष तो, ‘झंडों का ही वृक्ष’-सा
आभास देता है । इस पवित्र बौद्धि-वृक्ष के नीचे और इसके इर्द-गिर्द सहृदय आस्थावान
लोग आम तौर पर ईश-ध्यान में मग्न दिखाई देते हैं । यहाँ का शांतिपूर्ण वातावरण आगत
दर्शनार्थियों में भी आध्यात्मिक भाव को स्वतः ही जागृत कर देता है ।
इस बारे में, ह्वेन-त्सियांग
ने भी अपने लेख में लिखा है, - ‘वहाँ शाक्यों का नहाने का तालाब था, जिसका पानी शीशे जैसा साफ़ था और जिसकी सतह फूलों ढकी हुई
थी । इसके उत्तर में 24 या 25 कदम की दूरी पर बोधिसत्व के जन्म की जगह पर एक गिरा
हुआ, अशोक का वृक्ष था । इस स्थान के पूरब में, मगध सम्राट अशोक
का बनाया हुआ एक स्तूप था,
जहाँ दो ड्रैगन ने राजकुमार के शरीर को नहलाया था ।
बोधिसत्व बिना किसी मदद के उस दिशा में चले गए । पास के ही पवित्र जलाशय में माया
देवी स्नान की थी । जलाशय के किनारे के अशोक वृक्ष की एक शाखा को पकड़कर, वह
धीरे-धीरे जलाशय से बाहर आई, जिसे
सिद्धार्थ के जन्म के समय महामायादेवी ने पकड़ा था । यहाँ पर एक अशोक स्तंभ है,
जिस पर महात्मा बुद्ध के यहीं पर जन्म होने की बात लिखी गई है ।’
सम्राट अशोक द्वारा स्थापित प्रस्तर-स्तम्भ, आज भी मौजूद है,
जो नेपाल प्रांत का सबसे पुराना शिला-लेख माना गया है । यह प्रसिद्ध शिला-लेख भले
ही सहस्त्राब्दियों से मौन खड़ा है, परंतु पुरातन इतिहास के विशद स्वरूप को यह निरंतर
संकेतित कर रहा है । शिला-लेख की मौन बातें या ध्वनि को सुनने वाले विद्वजन, उसे
सुनकर और गुनकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं । अशोक-स्तम्भ पर इस स्थान का नाम ‘लुमिनीगेम’
और ‘लुम्बिनी वनाई’ लिखा हुआ है । इस सम्बन्ध में सबसे पहला पुस्तकीय उल्लेख बौद्ध-विद्वान
सुत्तनिपात द्वारा किया गया है । जबकि कुछ बौद्ध-पुस्तकों में इस स्थान को ‘रुम्मिनदेई
रूपंडेई’ (खूबसूरत पवित्र महिला) के नाम से भी उल्लेख मिलता है । फिर कुछ पुस्तकों
में उसे ‘पदेरिया’ या ‘परारिया’ के नाम से भी पुकार गया है । आज भी ‘पदेरिया’ नामक
एक गाँव-कस्बा इसके दक्षिण-पश्चिम में बहुत पास में बसा हुआ है । चीनी यात्री फाहियान
(लगभग 399-412 ई० में
भारत-यात्रा) के अनुसार पवित्र लुम्बिनी, शाक्य-राजधानी कपिलवस्तु के बाण-कुएँ से
लगभग 40 या 50 ली (21.729 या 24.445 किलोमीटर)
दक्षिण-पूर्व में स्थित था । बाद में ह्वेन-त्सियांग (लगभग 629-645 ईo
में भारत-यात्रा) ने भी लुम्बिनी को कपिलवस्तु से लगभग उतनी ही दूरी पर स्थित होने
की बात का समर्थन किया है । उस समय बौद्ध-संस्कृति से सम्पन्न लुम्बिनी, कपिलवस्तु, रामग्राम और अन्य दूसरे प्रमुख शहर भी तत्कालीन लोकप्रिय राजमार्ग
'उत्तरा पथ' से परस्पर सम्बद्ध
होने के कारण आवागमन के लिए सुगम थे ।
लुम्बिनी स्थान का उल्लेख बौद्ध-साहित्य और बौद्ध-दर्शन में
प्रचुर मिलता है । साथ ही चौथी, पाँचवीं, सातवीं और आठवीं सदी में भारत और नेपाल भ्रमण हेतु आए, विभिन्न
चीनी-यात्रियों और तीर्थ-यात्रियों के लेखों में भी इसका उल्लेख मिलता है । बौद्ध-ग्रंथों
जैसे; ललितविस्तर, दिव्यावदान, महावंश, जातकनिदानकथा आदि में भी लुम्बिनी
को महात्मा बुद्ध की जन्म-स्थली स्वरूप एक पवित्र स्थान के रूप में उल्लेख किया
गया है । कुछ जातक कथाओं में बताया गया है कि लुम्बिनी का वह शाल और आम्रवन, भगवान बुद्ध के जीवनकाल में शाक्यों और
कोलिय लोगों के मिले-जुले कब्ज़े में ही हुआ करता था । शाक्यों और कोलिय लोगों के
राज में वह वन, उनके क्रीड़ा और मनोरंजन के लिए विशेष जगह हुआ करती थी । अश्वघोष ने
अपनी ‘बुद्धचरित’ रचना में महात्मा बुद्ध की जन्मभूमि लुम्बिनी को ‘हर तरह के सुंदर
वृक्षों वाले अत्तरथ (स्वर्ग) के बगीचे जैसा ही सुंदर’ बताया है ।
बौद्ध-दार्शनिक जलानसोल दिव्यावदान के अनुसार, मगध सम्राट अशोक ने अपने इस अधिकार क्षेत्र में उस समय एक
लाख सोने वाला एक पगोडा को स्थापित किया था । उन्होंने लुम्बिनी के इसी स्थान (महात्मा
बुद्ध की जन्म-स्थली) पर पत्थर का एक स्तम्भ और उसके ऊपर पत्थर का ही बना हुआ, एक
घोड़े को भी स्थापित किया था । उस स्तम्भ पर ब्रहमी लिपि में लिखा हुआ है कि यह
लुंबिनी ही वह जगह है, जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था । उस पत्थर के स्तम्भ के
आधार से 48-50 सेंटीमीटर की दूरी पर ईंट की रेलिंग लगाई गई थी, जो आज भी टूटे हुए
रूप में यहाँ पर परिलक्षित होती है । कालांतर में अलग-अलग खुदाई के दौरान यहाँ पर मौर्य, शुंग, कुषाण और गुप्त काल
की बहुत सारी वस्तुएँ मिली हैं । इससे स्पष्ट होता है कि लुम्बिनी, तीसरी सदी
ईस्वी पूर्व से ही बौद्धों के लिए एक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल के रूप में प्रतिष्ठित
रही थी । इस लुंबिनी में शुरुआत से लेकर मध्यकाल तक अच्छी आबादी भी रही थी । विश्व-भर
से साधु-संतों तथा साध्वियों का निरंतर यहाँ पर आवागमन हुआ करता था । सम्राट अशोक ने
लुम्बिनी गाँव और इसके आस-पास के कई गाँवों को सरकारी कर से बिल्कुल मुक्त कर रखा था
।
चीनी-यात्री ह्वेन-सियांग के लेख भी अशोक-स्तम्भ के ऊपरी
हिस्से में घोड़े की आकृति होने की बात को प्रमाणित करता है । बाद में 19 वीं सदी
के प्रसिद्ध जर्मन विद्वान, भाषाविद् और भारतविद् जार्ज बुहलर ने भी वहाँ
पर एक पत्थर के स्तम्भ पर पत्थर का बना हुआ घोड़ा स्थापित रहने की बात को बताया है
। सन् 2003 में वह पत्थर से निर्मित घोड़ा, आकाशीय बिजली गिरने की चोट से अपने मूल
आधार पत्थर-स्तम्भ से टूटकर नीचे गिर पड़ा था । वह पत्थर का टुकड़ा आज भी अशोक
स्तम्भ के पास ही संरक्षित किया हुआ है, जो इतिहासकारों और विद्वानों के लिए विशेष
कीमती सूचना प्रदान करने वाला ऐतिहासिक स्रोत है ।
चीनी बौद्ध-विद्वान शुई-चिंग-चू ने लिखा है कि लुंबिनी में
अशोक का वह पेड़,
जिसे सिद्धार्थ के जन्म के समय, महामायादेवी ने पकड़ा था, अभी भी (उसके यात्रा के समय) ज़िंदा हालत में है । उसी के
नीचे महामायादेवी की एक प्रस्तर निर्मित मूर्ति रखी हुई है, जहाँ स्थानीय भक्त लोग
विभिन्न चढ़ावा चढ़ाया करते हैं । जिस स्थान पर बोधिसत्व के कोमल पैर धरती पर सबसे
पहले पड़े थे,
उनके पवित्र पैरों के उन निशान के महत्व को ध्यान में रखते
हुए, मगध सम्राट अशोक ने उन्हें पत्थरों से ढकवा दिया था, ताकि उसे अनंतकाल तक संरक्षित
कर चिह्नित किया जा सके । सन् 1993 से 1997 तक पुरातत्व विभाग, लुम्बिनी विकास ट्रस्ट और जापानी बौद्ध-संघ के संयुक्त
उत्खनन के दौरान मिली उल्लेखनीय खोजों ने भी इस बात की पुष्टि की है । फिर इस महत्वपूर्ण
तथ्य को नेपाल के तत्कालीन माननीय प्रधान मंत्री शेर बहादुर देउबा ने 4 फरवरी 1996
को सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी ।
महात्मा बुद्ध की इस पावन जन्म-स्थली लुम्बिनी, वर्तमान में
उत्तर-दक्षिण में तीन किलोमीटर लंबी और पूर्व-पश्चिम में एक किलोमीटर चौड़ी
आयताकार जगह चारदीवारी और सघन वृक्षों से घिरी हुई, पूर्णतः सरकारी संरक्षित
क्षेत्र के रूप में व्यवस्थित कर दिया गया है । इसके चतुर्दिक ‘विष्णुपुरा रोड’
नाम की पक्की सड़क बनी हुई है । इस विशेष क्षेत्र की धार्मिकता और पर्यटक महत्व को
देखते हुए नेपाल सरकार ‘ग्रेटर लुम्बिनी परियोजना’ के तहत इसका निरंतर विकास कर
रही है । इस पावन वृहद आयताकार संरक्षित क्षेत्र में देश-विदेश के अनेक धार्मिक बौद्ध
मठ और विहार स्थापित हैं । सबसे दक्षिण भाग में वृहद अर्ध वृताकार जलाशय और अर्ध
वृताकार सड़क के संयोग से बने वृहद वृताकार क्षेत्र के मध्य में ही बोधिसत्व की
पावन जन्मस्थली युक्त महामाया देवी मंदिर है । हरीतिमा युक्त विभिन्न पेड़-पौधों और
पुष्पीय पौधों से सुसज्जित यह व्यापक वृताकार क्षेत्र मन को परम शांति प्रदान कर
महात्मा बुद्ध के शांति-सिद्धांत को स्वतः ही प्रचारित करने में पूर्ण सहायक है ।
बोधिसत्व की जन्म-स्थली, महामाया देवी मंदिर स्थल पर तीसरी
शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान शताब्दी तक बने, विभिन्न समय और काल के अनुरूप अनेक
बौद्ध-विहारों, स्तूपों और ईंटों से बनी अनेक परतों के
अवशेष इस बात को प्रमाणित करते हैं कि लुम्बिनी प्राचीन काल से ही पवित्र तीर्थयात्रा
का समृद्ध केंद्र रहा है । वर्तमान में ‘ग्रेटर लुम्बिनी आयताकार संरक्षित
क्षेत्र’ में देश-विदेश के अनेक बौद्ध-मठ या विहार बने हुए हैं । उसमें सबसे पहला
विदेशी बौद्ध मठ एक वियतनामी बौद्ध-भिक्षु थाय ह्यूएन
डियू द्वारा बनाया गया था । जबकि लुम्बिनी में सबसे बड़ा मठ चीनियों द्वारा जोंग-हुवा
मठ निर्मित है । उसके उत्तर की ओर बढ़ने पर म्यांमार का गोल्डन टेम्पल, अमेरिका का
मठ-विहार, कोरिया बौद्ध मठ, भारतीय मठ, थाईलैंड का रॉयल थाई विहार, चीन का जोंग-हुवा
मठ, रसियन बौद्ध-स्तूप, सिंगापूर का उरगेन डोरजी चोलिङ्ग मठ, जर्मन का विशाल
डरिगूनग कागयु लोटस स्तूप, लुम्बिनी संग्रहालय, श्रीलंका का दुतुगमुनऊ मठ, विश्व
शांति स्तूप आदि विशेष आकर्षणीय हैं । इसके अतिरिक्त महात्मा बुद्ध तथा बौद्ध-दर्शन
से सम्बन्धित प्रस्तर स्तम्भ, पुष्करिणी जलाशय, स्तूप, विहार, पुराने अवशेषों, कलाकृतियों आदि से वह संरक्षित
क्षेत्र परिपूर्ण है । लुम्बिनी संग्रहालय में उस अञ्चल से प्राप्त ऐतिहासिक अवशेषों
को समय के क्रम में सजाकर विशेष धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है । लुम्बिनी
को तथा उसके सम्बद्ध क्षेत्र को सन् 1997 में यूनेस्को के ‘वर्ल्ड कल्चरल हेरिटेज साइट’ के रूप में शामिल किया गया है ।
बौद्ध-धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ, उनके
उपरांत सहस्त्राब्दियों के बाद आज भी विश्व-शांति के लिए प्रासंगिक बनी हुई है ।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, विश्व भर के जनजीवन से लेकर विभिन्न राष्ट्र-मंडलों के
सामाजिक और सामूहिक जीवन हेतु उनकी शिक्षाएँ, एक विशेष नीति-रेखा बनकर, आज
विश्व-शांति की स्थापना की परिकल्पना को यथार्थ स्वरूप प्रदान कर रही हैं । परस्पर
शांति,
प्रेम, ज्ञान, दया,
करुणा, सहनशीलता और सहयोग ही
तो, आज विश्व-मानव की प्रमुख आवश्यकता बन गई हैं, जिसे सदियों पहले महात्मा बुद्ध
ने स्थापित किया था । फलतः आज भगवान महात्मा बुद्ध और उनके द्वारा प्रशस्त
बौद्ध-दर्शन से सम्बद्ध विभिन्न पवित्र स्थानों, यथा; लुंबिनी, कपिलवस्तु, सारनाथ, कुशीनगर, रामग्राम आदि का
महत्व भी निरंतर बढ़ते ही जा रहा है । ये सभी बौद्ध-सर्किट-स्थान, स्वयं मौन रहकर
भी निरंतर विश्व-मानव को विश्व-शांति के लिए विशेष पाठ को पढ़ा रहे हैं । अतः ये
सभी स्थान वर्तमान में विश्व-मानवता के प्रबल पीठ के रूप में विकसित हो रहे हैं ।
फलतः आज लुम्बिनी बौद्ध-दर्शन से सम्बद्ध एक प्रसिद्ध और आवश्यक ऐतिहासिक केंद्र है । लुम्बिनी की शांति और सर्वत्र का पवित्र वातावरण किसी भी सहृदय के आत्म-निरीक्षण और आध्यात्मिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है । ऐसे में कोई भी व्यक्ति विशेष, स्वयं को बुद्ध और उनकी शिक्षाओं के अति निकट होने का गर्व प्राप्त करता है ।
स्रोत -
1)
एंटीक्विटीज़ ऑफ़ द
बुद्धाज़ बर्थप्लेस इन द नेपालीज़ तराई; - ए. फ्यूहरर, (1972) रीप्रिंटेड इंडोलॉजिकल बुक हाउस,
2)
लाइफ़ ऑफ़ बुद्ध, रीप्रिंटेड, - डब्ल्यू.
डब्ल्यू. आर. हिल, (1972) ओरिएंटेल इंडिका,
3)
बुद्ध का जीवन; (रिप्रिंटेड), - एच.सी.
वॉरेन,
(1986). ईस्टर्न बुक लिंकर्स,
4)
“रुम्मिनदेई शिलालेख, अशोक के पदरिया शिलालेख, द इंडियन एंटीक्वेरी, वॉल्यूम XXXIV - ए.वी. स्मिथ, (1905)
अध्यापक व लेखक,
24, बन बिहारी बोस रोड,
हावड़ा – 711101
सम्बन्धित चित्र -








लुंबिनी, नेपाल राष्ट्र का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र, जो महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है। आज भी वहां चतुर्दिक महात्मा बुद्ध द्वारा प्रशस्त गंभीर शांति का अनुभव होता है।
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