शनिवार, 31 जनवरी 2026

चोका

 

ख़ामोशी

प्रीति अग्रवाल

 

कैसे कह दूँ

तुम ही ग़लत थे

बीच हमारे

फासले बहुत थे

कहती रही

नयनों से अपने

जी की बतियाँ

सारे असमंजस

सारे सवाल

न पाकर जवाब

बुझती रही

बिखरती रही मैं

टूटती रही

सुबकती रही मैं

कब जानोगे

कभी तो समझोगे

लंबा जीवन

प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा

नादानी मेरी

क्यों समझ न पाई

तुम ठहरे

मौन के उस पार

शब्दों के आदि

जो मैं कह न सकी

सुनते कैसे

खामोशी बहुत थी

बीच हमारे

ना ग़लत मैं

ना ग़लत तुम थे

सच तो है ये,

ग़लत हम दोनों

हम दोनों सही थे!

 

–0–



प्रीति अग्रवाल

कैनेडा


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