विनोद
कुमार शुक्ल के न होने का अर्थ!
डॉ.
ऋषभदेव शर्मा
तेईस
दिसंबर,
2025 को हिंदी साहित्य का एक प्रकाशपुंज तिरोहित हो गया। वरिष्ठतम साहित्यकार
विनोद कुमार शुक्ल का निधन रायपुर के एम्स में मल्टीपल ऑर्गन फेलियर से हो गया!
88 वर्ष की आयु में वे हमसे विदा भले हो गए हों, लेकिन उनकी रचनाओं में बसी गहन संवेदना सदैव जीवित रहेगी। यह समूचे हिंदी साहित्य
की अपूरणीय क्षति है। एक ऐसे साहित्यकार का जाना, जिन्होंने साधारण
शब्दों से असाधारण संसार रचा, हमें उदास तो करता ही है;
उनकी कविताओं की गहराई में उतरने का संकल्प भी जगाता है।
विनोद
कुमार शुक्ल का जन्म 1 जनवरी, 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव में हुआ था। एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में
पले-बढ़े वे बचपन से ही प्रकृति और दैनिक जीवन की बारीकियों से
परिचित थे। रायपुर में निवास करते हुए उन्होंने अपना सारा जीवन सरलता से जिया;
एक नौकरीपेशा व्यक्ति के रूप में। अभिजात चकाचौंध से दूर! उनकी शिक्षा और प्रारंभिक जीवन की कठिनाइयों ने उन्हें वह निजी रचना दृष्टि
दी। साधारणता में छिपी महानता! मैं धीरे चलता हूँ ताकि ज़िंदगी
पीछे न छूट जाए - यह उक्ति उनके जीवन का सार है। एक धीमा लेकिन
गहन प्रवाह!
शुक्ल
जी की साहित्यिक यात्रा 1971 में ‘लगभग जयहिंद’ कविता संग्रह से आरंभ हुई। उन्होंने हिंदी
साहित्य को एक नए मुहावरे में ढाला। जादुई यथार्थवाद का ऐसा मुहावरा - जहाँ एक साधारण दीवार में खिड़की रहती है, जो जीवन की
अनंत संभावनाओं को खोल देती है! उनके उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ (1979) में एक साधारण सेवक की कमीज के
माध्यम से वर्ग-संघर्ष और मानवीय गरिमा उभरती है। यह रचना इतनी
सरल लगती है कि पाठक को लगता है, यह उसकी अपनी कहानी है। फिर
आया ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ (1998), जो साहित्य अकादमी पुरस्कार (1999) से सम्मानित हुआ।
इस उपन्यास में एक परिवार का दैनिक जीवन इतनी बारीकी से बुना गया है कि पाठक घर की
चुप्पी, सड़क की धूल और पेड़ों की सरसराहट में खुद को खोज लेता
है।
उनकी
कविताएँ तो मानो जीवन की साँसें हैं। ‘सब कुछ होना
बचा रहेगा’ या ‘खुला मेला’ जैसे संग्रहों में वे रोज़मर्रा की वस्तुओं - कुर्सी,
किताब, सड़क - को काव्य का
माध्यम बनाते हैं। मैं ज़िंदा रहना चाहता हूँ - कहने वाले कवि
विनोद कुमार शुक्ल ने मृत्यु के भय से ऊपर उठकर जीवन की प्यास को अभिव्यक्ति प्रदान
की। उनकी रचनाओं में कोई बनावटी भावुकता नहीं है। बस एक ईमानदार चुप्पी गूँजती है और
पाठक के हृदय को छू जाती है। छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़े होने के कारण उनकी रचनाएँ
स्थानीयता को वैश्विक बनाती हैं। एक छोटे शहर की गलियों में छिपा मानवीय संघर्ष!
उन्होंने तीन उपन्यास, अनेक कहानी संग्रह और दर्जनों
कविता संग्रह दिए, जो कई भाषाओं में अनूदित होकर विश्व साहित्य
की धरोहर बन चुके हैं।
सयाने
याद दिला रहे हैं कि विनोद कुमार शुक्ल को साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा
2023 का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, जिसने छत्तीसगढ़
को ज्ञानपीठ की पंक्ति में सम्मिलित होने का गौरव दिलवाया। 2023 में ही उन्हें पीईएन/नाबोकोव अवॉर्ड से भी सम्मानित किया
गया, जो उनकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति का प्रतीक है। लेकिन वे कभी
सम्मानों-पुरस्कारों के मोह में नहीं पड़े। उनके लेखे कविता पुरस्कार
की कामना नहीं, जीवन का हिस्सा थी। उनके योगदान ने नई पीढ़ी के
लेखकों को प्रेरित किया कि कैसे सरल भाषा में गहन जीवन दर्शन बुना जाए। कोलाहल भरे
साहित्य जगत में उनकी चुप्पी व्यावसायिकता के शोर के विरुद्ध एक विद्रोह थी!
अंततः यही कि विनोद कुमार शुक्ल के जाने का अर्थ है एक ऐसे साहित्यकार का जाना जो शब्दों से नहीं, संवेदनाओं से लिखते थे! यही वजह है कि वे सदा अपने पाठकों के साथ रहेंगे - दीवार में एक खिड़की की तरह, खुली और अनंत!
डॉ.
ऋषभदेव शर्मा
सेवा
निवृत्त प्रोफ़ेसर
दक्षिण
भारत हिन्दी प्रचार सभा
हैदराबाद



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