‘गुर्जरी पल्लव’
(गुजरात की समकालीन महिला हाइकुकार)
समीक्षक - डॉ. पूर्वा शर्मा
विश्व वाड्मय रूपी महासागर
को अत्यधिक विस्तार और गहराई प्रदान करने में अनेक देशों की असंख्य भाषाओं-बोलियों
के साहित्य का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।चीनी, जापानी आदि की तरह भारतीय साहित्य
का इतिहास भी बहुत पुराना रहा है। हिन्दी साहित्य की सुदीर्घ परंपरा को समृद्ध बनाने
में अनेक विधाओं का योगदान रहा है। इनमें से अधिकांश विधाएँ भारतीय परिवेश में ही
जन्मीं और समृद्ध हुई लेकिन कुछ आयातित विधाएँ भी हिन्दी साहित्य में अपने पैर
जमाने में सफल रही है। इनमें ग़ज़ल, सानेट आदि के साथ जापानी विधाएँ भी शामिल है। जापानी
विधाओं में विशेषतः ‘हाइकु’ काव्य ने पूरे विश्वभर में प्रसिद्धि प्राप्त की है। जापान
में जन्मा हाइकु आज पूरे विश्व साहित्य की निधि बन चुका है।
जापान से अपनी यात्रा आरंभ कर इस जापानी काव्य हाइकु का
भारत में प्रवेश एवं विकास सुखद रहा है। पिछले चार-पाँच दशकों में हिन्दी हाइकु ने
द्रुत गति से प्रगति की है। जैसा कि हम जानते हैं कविवर रवीन्द्रनाथ टैगौर (जापानी
जात्री, 1916) एवं अज्ञेय (अरी ओ करुणा प्रभामय,1959) द्वारा जापानी हाइकु को भारतीय ज़मीन प्राप्त हुई। जापानी हाइकु
भावानुवाद के माध्यम से भारत एवं अन्य देशों तक पहुँचा। शिल्प की दृष्टि से जापानी
हाइकु की संरचना 5-7-5 ओंजि है, अंग्रेजी में इसे 5-7-5 सिलेबिल माना गया है जबकि
हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में इसे 5-7-5 वर्ण की स्वीकृति प्राप्त हुई। भारत में हाइकु
अपने आरंभिक चरण में वर्णक्रम के बंधन से मुक्त रहा, धीरे-धीरे 5-7-5 वर्णीय
संरचना में हाइकु का सृजन होने लगा। भारतीय भाषाओं में सर्वप्रथम इस वर्णक्रम का निर्वाह
करते हुए मौलिक हाइकु की रचना का श्रेय गुजरात के झीणाभाई देसाई ‘स्नेहरश्मि’ को
जाता है। गुजराती भाषा में ‘स्नेहरश्मि’ द्वारा रचित ‘सोनेरी चाँद रूपेरी सूरज’ (वर्ष
1967) हाइकु-संग्रह भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पहला हाइकु-संग्रह था। गुजरात के डॉ.
भगवतशरण अग्रवाल का हाइकु संग्रह ‘शाश्वत क्षितिज’(वर्ष 1985) सर्वप्रथम हिन्दी
में प्रकाशित होने वाला हाइकु संग्रह बना। यह अत्यंत सुखद घटना है कि भारतीय भाषा
एवं हिन्दी दोनों में ही हाइकु का श्रीगणेश गुजरात की पावन भूमि से ही हुआ।
डॉ. भगवतशरण अग्रवाल ने हाइकु के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत
कार्य किया। उन्होंने ‘हाइकु-भारती’ मासिक
पत्रिका(प्रवेशांक-1998), ‘हाइकु-काव्य विश्वकोश’ (2009) के अतिरिक्त वर्ष 2002
में ‘हिन्दी कवयित्रियों की हाइकु काव्य साधना’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की। इस
पुस्तक में हाइकु का उद्भव, विकास, प्रयोग एवं औचित्य, शिल्प, वस्तुबोध, ऋतु-संकेत, जीवनदर्शन से संबद्ध महत्त्वपूर्ण जानकारी के साथ 57
कवयित्रियों के परिचय एवं हाइकु को प्रस्तुत किया गया। इसमें गुजरात की दो महिलाओं
– सुश्री मधु प्रसाद एवं डॉ. अंजु दयानंद के नाम सम्मिलित है। डॉ. अग्रवाल के एक अन्य
लेख में गुजरात की महिला हाइकुकार मधु प्रसाद दुलारी एवं डॉ. शांति शर्मा का जिक्र
है। एक लंबे अंतराल के पश्चात 2015 में डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा का हाइकु संग्रह ‘ओस
नहाई भोर’, 2016 में कान्ति अय्यर का ‘उत्कर्ष की ओर’ एवं डॉ. शांति शर्मा का ‘नवनिधि’
हाइकु संग्रह प्रकाशित हुआ। वर्ष 2020 में डॉ. पूर्वा शर्मा की ‘हाइकु की अवधारणा
और हिन्दी हाइकु संसार’ समीक्षात्मक पुस्तक प्रकाशित हुई। वैश्विक स्तर पर 2014
में प्रवासी भारतीय हाइकुकार डॉ. अनिता कपूर और रचना श्रीवास्तव ने ‘आधी आबादी का
आकाश’ शीर्षक से एक हाइकु संग्रह सम्पादित किया जिसमें 62 महिला हाइकुकारों के 14-14
हाइकु संकलित किए। हम देख सकते हैं कि हिन्दी हाइकु के विकास में गुजरात की कतिपय
महिला हाइकुकारों का ही उल्लेख मिलता है।
यदि हम वर्ष 1980 के पश्चात के हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात
करें तो एक बात लक्षित होती है कि कथा-साहित्य के क्षेत्र में जितनी लेखिकाएँ उभर
कर सामने आई है और उन्होंने जितनी लोकप्रियता प्राप्त की है उसकी तुलना में
कवयित्रियाँ उभर कर सामने नहीं आई है। इसका कारण भी स्पष्ट है कि कथा साहित्य की
अपेक्षा कविता अधिक सूक्ष्मताओं, अमूर्तताओं और व्यंजनाओं की विधा है। और जहाँ तक
हाइकु काव्य की बात है हाइकु वैसे भी अपने लघुकाय रूप, सांकेतिक प्रस्तुति, अनकहे
की महत्ता के कारण कठिन विधा मानी जाती है। कुछ गिनी चुनी कवयित्रियाँ ही कविता के
क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने में सफल हुई है। कहने का आशय यह है कि विशेषतः पिछले
तीन-चार दशकों के हिन्दी साहित्य में उपन्यास एवं कहानी विधा को लेकर महिला लेखन गुणवत्ता
और परिमाण दोनों दृष्टियों से हिन्दी साहित्य में कुछ आगे ही रहा है। इसकी तुलना में
काव्य सृजन में सृजन तो विपुल मात्रा में हुआ ही है परंतु कथा साहित्य की तुलना में
दो कदम पीछे ही रहा है। यह कहना अनुचित नहीं होगा। अहिंदी भाषी प्रदेश में तो हिन्दी
काव्य-सृजन में तो महिलाओं की संख्या और भी कम है। यदि हम गुजरात की बात करें तो गुजरात
का हिन्दी साहित्य समृद्ध है। इसे और अधिक समृद्ध बनाने में और समकालीन हिन्दी
साहित्य के महिला लेखन में गुणात्मक वृद्धि करने में कुछ प्रयास हो चुके हैं, हो
रहे हैं। इसी को आगे बढ़ाने में हाल ही में प्रकाशित हाइकु संग्रह – ‘गुर्जरी पल्लव’
को एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। प्रस्तुत संग्रह गुजरात की 35 महिला हिन्दी
हाइकुकारों के सृजनात्मक कौशल को एक बृहद् पाठक वर्ग तक पहुँचाने का सत्प्रयास है।
इस श्लाघनीय कार्य के लिए संपादिका मंजु महिमा जी बधाई की पात्र है।
‘गुर्जरी पल्लव’ में संकलित रचनाओं में विषय वैविध्य है। विविध
विषयों से संबंधित संवेदनाओं से सुसज्जित हाइकु प्रस्तुत संग्रह की शोभा बढ़ाने में
सफल है। लेकिन इस संग्रह की विशेषता अथवा आकर्षण तो गुजरात की अस्मिता को उजागर करने
वाले कतिपय हाइकु को ही कहा जा सकता है। इन हाइकु कविताओं से गुजरने पर एक ओर गुजरात
की समृद्ध संस्कृति के दर्शन होते हैं तो दूसरी ओर गुजरात के महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व
एवं विभिन्न स्थानों के सैर करना एक सुखद अनुभूति है।
प्रस्तुत संग्रह ‘गुर्जरी पल्लव’ में गुजरात की समृद्ध
संस्कृति को प्रस्तुत करते 46 हाइकु के साथ अन्य विषयों से संबंधित कुल 675 हाइकु
संग्रहीत है। ‘गुजरात की सांस्कृतिक महक’ शीर्षक से प्रस्तुत यह 46 बेहतरीन हाइकु गुजरात
के सांस्कृतिक जीवन – गीत-संगीत-नृत्य, गुजरात के स्वादिष्ट भोजन, गुजरात की रंगीली
पोशाकों और उस पर की गई उम्दा कढ़ाई, गुजरात का मौसम, गुजरात की शिल्प कला और
गुजरात में जन्में महापुरुषों की कथा यानी गुजरात की गौरव गाथा कहने में समर्थ है।
कुछ उदाहरण अपेक्षित है –
विक्रम, गर्व / वल्लभ
सा ‘दर्पण’ / यश गरवी। – मधु प्रसाद
सत्य-अहिंसा / गूँजती रामधुन / हर दिल में। – डॉ. ज्योत्स्ना
शर्मा
रानी का प्रेम / अड़ालज की वाव / शिल्प अनूठा। – शांति शर्मा
हमले कई / ‘सोम’-शिव अडिग / ध्वस्त न हुए। – डॉ. पूर्वा
शर्मा
बंजर भूमि / अंतहीन क्षितिज / आँखों में प्यास। – पद्मा मोटवानी
नर्म थेपले / खट्-मिट्ठी दाल संग / लौह इरादे। – डॉ. ज्योत्स्ना
शर्मा
कर्क की रस्सी / गुजरात झूलता / हो आगे-पीछे। – डॉ. रश्मि वार्ष्णेय
गुर्जरी धरा, / अनूठी जगत में / हीरे तराशे। – मंजु महिमा
भारत शिल्पी / कद छुए आकाश / ‘स्टैच्यू’ विशाल । – डॉ. पूर्वा शर्मा
यदि हाइकु के विषय की बात करें तो जापानी हाइकु के आधार
स्तंभ ‘बाशो’ का स्वयं का मत है कि ‘कोई भी विषय हाइकु के लिए अनुपयुक्त नहीं।’ प्रस्तुत
संग्रह बाशो के कथन की पुष्टि करता है। अध्यात्म, जीवन दर्शन एवं प्रकृति को तो हाइकु का मुख्य आधार ही रहा
है, इससे संबंधित हाइकु तो संग्रह में सर्वत्र दिखाई देते हैं। प्रकृति के कुछ
सुंदर बिम्ब देखिए –
सूरज थका / धूप गठरी बाँधे / निशा मुस्काए – आरती परीख
वृक्ष लताएँ / हवा की ताल पर / हुई बेसुध। – डॉ. पुष्पलता
शर्मा
वायु पिंजारा / धुन रहा
बादल / फ़ाहे बिखरे। – मंजु महिमा
भोर सुहानी / पलक झपकते / लिखे कहानी। – डॉ. दुर्गा सिन्हा
पहने शाम / कोहरे की चादर / ओझल सूर्य। – नीता व्यास
स्वच्छ चादर / बिछा रही चाँदनी / कच्छ रन में। – बीना कमल
आर्य
हरी दूब पे / केसरिया दुमका / पारिजात का। – मधु सोसि
गुप्ता
ओस की बूँदें / लटकी शाख पर / मुक्ताहार-सी। सुनन्दा भावे
जीवन दर्शन से संबंधित अनेक हाइकु संग्रह की शोभा बढ़ाने में
सफल है, कुछ उदाहरण इस प्रकार है –
ले गए कहाँ / जीवन के तजुर्बे / अजीब मोड। – प्रणव भारती
शून्य से शुरू / गणित या जीवन / शून्य पे खत्म। – प्रतिमा
प्रसाद
अंतिम पन्ना / सबका
है समान / मृत्यु के नाम। – डॉ. शांति
शर्मा
ज़िंदगी तू भी / सपऩो में दिखाती / महल ऊँचे। – सरला सुतरिया
मृग है मन / पूछता वन-वन / कहाँ कस्तूरी? – मालनी पाठक
इसके अतिरिक्त प्रेम के विविध रंग, मानवीय रिश्ते-आत्मीय
सबंध, नारी चेतना-नारी विमर्श, सामाजिक सरोकार एवं समसामयिक विषय जैसे कोरोना आदि को
प्रस्तुत करते हाइकु भी संग्रह में है। प्रेम से महकते कुछ हाइकु इस प्रकार है –
आज तलक / डायरी के गुलाब / रहे महक। – सरला भंसाली
मैं मुक्तक हूँ / तुम महाकाव्य / प्रवाह बना। – मधु प्रसाद
सन्दूरी सााँझ / रजनी का आह्वान / प्रिय मिलन। – मधु माहश्वेरी
यादों की बाढ़ / रौंदती है मन के / घाट पुराने। – सुमनलता
शर्मा ‘नीरजा’
रिश्तों की अहमियत, माता-पिता एवं नारी के महत्त्व को उजागर
करते कुछ हाइकु बहुत ही सुंदर बन पड़े हैं –
अदाकारा है / माँ ढाँप लेती दर्द / मुस्कुरा कर। – ममता
सिंह
बन्नो की डोली / संग पिता की साँसें / लेकर चली। – अल्पा
तन्ना
मीठी जुबान / अंतस में ज़हर / आज का युग। – नमिता सिंह
अनायास ही / पैरों तले रेत से / रिश्ते खिसके। – रेखा नायर
गृहस्थी चक्र / नारी बनी खेवैया / यही है सत्य। – दीपमाला
समाज के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं लेकिन समाज में व्याप्त
कुछ कुरीतियों, निम्न कोटि की मानसिकता, समाज में फैली गंदगी को प्रस्तुत करने में
हाइकुकार पीछे नहीं रहे। प्रकृति का चित्रण करने वाले हाइकुकार प्रकृति के भीषण
रूप, उसके दोहन को देख चिंतित है, पर्यावरण प्रदूषण से संबंधित हाइकु भी संग्रह
में नज़र आते हैं।
दहेज प्रथा / अनूठा भिक्षा पात्र / पिता लाचार। – पदमा
मोटवानी
बलात्कारी है / मानसिकता जहाँ / खिलौना नारी। – डॉ. सुषमा
सीताराम अय्यर
हिंसा की आग / फैला भय संत्रास / जीना दूभर। – डॉ. लता सुमंत
उड़ान रोके / मोबाइल टॉवर / चिड़िया काँपें। – श्रद्धा रावल
जंगल कटे / सूखा है चारों ओर / लुप्त घौंसलें। – नलिनी
अय्यर
तपे नौ तपा / धरती अकुलाई / राम दुहाई। – लीना खेरिया
ऑनलाइन / विस्तृत ई-संसार / सिमटा विश्व। – डॉ. रश्मि वार्ष्णेय
संवेदना के विविध आयामों को प्रस्तुत करते उपर्युक्त हाइकु
के अतिरिक्त हाइकु के शिल्पगत सौन्दर्य को भी यहाँ बखूबी देखा जा सकता है। अलंकारों,
शब्द-शक्तियों, प्रतीक, मिथक आदि को लेकर कुछ सुंदर उदाहरण देखिए –
संदेशे लिखे / चाँदनी में डुबोके / निशा भोर के। – डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा (व्यंजना शब्द शक्ति)
साँस भर है / ये पट ज़िन्दगी का / परछाई-सा। – डॉ. रंजना
अरगड़े (उपमा अलंकार)
रोशन तारे / कौन-सा उत्सव ये / मनाए निशा? – योगिता मेहता (रहस्यवादी
रूप)
धूप पड़ती / मखमली घास पे / मुस्काई ओस। – डॉ. मालती दुबे (मानवीकरण)
आकार की संक्षिप्तता के कारण हाइकु में प्रायः प्रतीकों का
प्रयोग देखा गया है। प्रतीकों के माध्यम से हाइकु कम शब्दों में पूरी कथा कहने में
समर्थ है। यक्ष के निर्वासन की कथा हो अथवा शिव के शाप से भस्म होकर बिना तन वाले
अतनु (कामदेव) की व्यथा, संकेतों-प्रतीकों के माध्यम से हाइकुकार ने बहुत कुछ कह
दिया है। पौराणिक प्रतीकों का प्रयोग देखिए –
बादल बैठा / रामगिरि शिखर / यक्ष बेचैन। – निर्झरी मेहता
फैली सुगंध / ये किसके तन की / आए ‘अतनु’? – डॉ. पूर्वा शर्मा
(विरोधाभास)
204 पृष्ठीय ‘गुर्जरी पल्लव’ में कुछ स्थानों पर वर्तनी एवं
टंकण की त्रुटियों के साथ कुछ अशुद्ध वर्णक्रम के हाइकु और कुछ हाइकु की
पुनरावृत्ति भी हुई है। इन त्रुटियों को यदि नज़र का काला टीका समझ लें तो यह संग्रह
सुंदर बन पड़ा है। पुस्तक का आवरण भी आकर्षक एवं प्रतीक के रूप में है। आवरण के मुख्य
एवं पृष्ठ भाग के चित्र को श्रद्धा रावल एवं नीता व्यास ने बनाया है।
हाइकु विधा के सृजन व अध्ययन से संबद्ध कतिपय विद्वानों ने मंजु
महिमा के इस बृहद कार्य की प्रशंसा करते हुए प्रस्तुत संकलन की महत्ता, हाइकु काव्यशैली
के वैशिष्टय, गुजरात में हिन्दी हाइकु विषयक सृजन एवं समीक्षा कर्म तथा गुर्जर धरा
की हिन्दी हाइकु कवयित्रियों को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण विचारों को अपने शुभकामाना संदेश
में रखा है। पुस्तक के प्रारंभ में दिए गए इन शुभकामना संदेश के कुछ अंश देखिए –
‘मानव को प्रकृति से जोड़ती है हाइकु कविता’... हाइकु
प्रकृति से दुबारा सम्पर्क करने की विधि है। हाइकु मानव को प्रकृति से जोड़ता ही नहीं
बल्कि पेड़-पौधों तथा समस्त प्राणियों के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाता है। हाइकु
के माध्यम से कवि अपने चारों तरफ की प्रकृति के ब्रह्माण्ड से जुड़ जाता है। हाइकु
एक मार्ग है यह याद रखने का कि कैसे हमारे संसार में सब कुछ जुड़ा हुआ है।... गुजरात
का हाइकु से गहरा संबंध रहा है। गुजरात के झीणाभाई देसाई ‘स्नेह रश्मि’ ने हाइकु लिखे हैं। डॉ. भगवतशरण अग्रवाल ने हाइकु पर
महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसी शृंखला में मंजु महिमा द्वारा संपादित हाइकु संकलन ‘गुर्जरी पल्लव’ आपके समक्ष है। आशा है कि... गुजरात की महिला हाइकुकारों की
चुनिंदा हाइकु कविताएँ दुनियाभर के हाइकु प्रेमियों के समक्ष आ सकेंगी।
– डॉ. जगदीश व्योम
गुजरात की धरती को आदरणीय डॉ. भगवतशरण अग्रवाल जी ने हाइकु
के अभियान से उर्वर किया और ‘हिन्दी हाइकु’ को सदैव अपने आशीर्वाद से पोषित किया।... प्रान्तीय स्तर पर
इस प्रकार कार्य करने से हाइकु को और अधिक विस्तार-प्रसार मिलेगा तथा बहुत सी नई
प्रतिभाएँ भी प्रकाश में आएँगी। भविष्य में कुछ हाइकुकारों के एकल संग्रह भी देखने
को मिलेंगे, ऐसी आशा है।
– रामेश्वर
काम्बोज ‘हिमांशु’
यह हर्ष का विषय है कि देश आज़ादी का पचहत्तरवाँ वर्ष
अमृतोत्सव के रूप में मना रहा है। देश की आज़ादी में जहाँ महिलाओं की भागीदारी
रही। वहीं देश की स्वतंत्रता के बाद भी देश के आर्थिक,
सामाजिक, राजनीतिक सांस्कृतिक क्रियाओं में उनका सहयोग प्रशंसनीय है।
गुजरात का इतिहास और संस्कृति की परम्परा सदा समृद्ध एवं गौरव रही है।... इस वर्ष
को यादगार बनाने में गुजरात की 35 सुप्रसिद्ध, चर्चित महिला हाइकुकारों का हिन्दी में प्रथम साझा हाइकु
संग्रह ‘गुर्जरी पल्लव’ निकालने का प्रयास सराहनीय है। प्रकृति,
मौसम, त्यौहार, नारी विमर्श, सामयिक समस्याओं तथा गुजरात की सांस्कृतिक महक को बिखेरते
हाइकु मन को बाँध लेने में समर्थ हैं।
– सुश्री
सुदर्शन रत्नाकर
गुजरात की धरा ने हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि में
प्रशंसनीय योगदान किया है। इसकी एक ताज़ा मिसाल ‘गुर्जरी पल्ल्व’ हाइकु-संग्रह में मिलती है, जहाँ सुंदर साहित्य के सृजन के साथ- साथ गुजरात-दर्शन भी हो
जाता है। इस हाइकु संग्रह की एक और सराहनीय बात यह है कि इसे महिला हाइकुकारों की
कलम ने सजाया है। मंजु महिमा भटनागर द्वारा सम्पादित ‘गुर्जरी पल्लव’ एक विस्तृत काव्य-फलक का परिचय देने में समर्थ है।… ‘गुर्जरी पल्लव’ पढ़ते समय पश्चिमी भारत के इस अनूठे गहने की चमक दिखाई
पड़ती है,
जिसमें गुजरात की समृद्ध संस्कृति का अनुभव होता है।... ‘गुर्जरी पल्लव’ हाइकु- संग्रह नवीन पत्तियाँ तथा कलियाँ खिलने जैसा ही तो
है,
जो हमें उस स्थल पर ले जाता है जहाँ ‘आवजो’ कहकर अलविदा ली जाती है।... ये स्वयं का यात्राबोध है,
जहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड में ईश्वर के दर्शन होते हैं।
– डॉ. हरदीप कौर
सन्धु
भविष्य में गुजरात के साथ भारतवर्ष में जिसे हाइकु पर शोध
कार्य करना है तो ‘गुर्जरी-पल्लव’ हाइकु संग्रह एक मील का पत्थर साबित होगा।... शोधार्थियों
को भी इस संकलन से अपने शोध कार्य में नई दिशा और नवजीवन मिलेगा ।
– निशा रम्पाल
गुजरात में हिन्दी साहित्य सृजन की समृद्धि,
समकालीन हिन्दी साहित्य के महिला लेखन में गुणात्मक वृद्धि
तथा हिन्दी में जापानी काव्यशैली हाइकु के प्रति सर्जकों के बढ़ रहे रुझान के लिहाज
से ‘गुर्जरी पल्लव’ की महत्ता को बखूबी देखा जा सकता है।... गुजरात की अस्मिता को
उजागर करते कतिपय हाइकु प्रस्तुत संग्रह के फलक को और अधिक गरिमामय बनाते हैं। आशा
की जा सकती है कि यह संग्रह हिन्दी काव्य जगत में लघुकाय काव्यरूप हाइकु के कद को
बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा।
– डॉ. हसमुख परमार
आशा है कि इन पैंतीस महिला हाइकुकारों में से अधिकांश
कवयित्रियाँ लंबे समय तक हाइकु विधा को समृद्ध करेंगी और कुछेक के स्वतंत्र हाइकु संग्रह
शीघ्र से प्रकाशित हो। गुजरात की महिला हाइकुकारों को एक ही स्थान पर प्रस्तुत
करने के श्रम साध्य कार्य के लिए संपादिका
मंजु महिमा जी एवं सभी महिला हाइकुकारों को बधाई तथा साधुवाद। यह संकलन पाठकों
में अपनी पहचान बनाएगा इसी कामना के साथ...... अस्तु!
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कृति : गुर्जरी पल्लव (हाइकु-संकलन), संपादिका : मंजु महिमा,
मूल्य : 299 /-, पृष्ठ : 204, संस्करण : 2022, प्रकाशक : ट्रू ड्रीमस्टर प्रेस
डॉ. पूर्वा शर्मा
वड़ोदरा
अति गूढ़ और गहन दृष्टि से लिखी सटीक समीक्षा.. बहुत बहुत साधुवाद डा. पूर्वा शर्मा को.
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर,सटीक,सारगर्भित समीक्षा। हार्दिक बधाई डॉ पूर्वा शर्मा जी। सुदर्शन रत्नाकर
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर व सारगर्भित प्रिय पूर्वा जी!
जवाब देंहटाएंहार्दिक बधाई आपको!
सुन्दर, सधी समीक्षा पूर्वा जी, बहुत-बहुत बधाई !
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