बुधवार, 31 दिसंबर 2025

काव्य

ताटंक छंद

1

शब्दों की महिमा

डॉ. अनिल कुमार बाजपेई काव्यांश

शब्दों को निष्प्राण न जानों, उनमें जीवन होता है।

उनमें भी मुस्कानें होतीं, उनका  मन भी रोता है।।

कभी बने वो विरह-वेदना, पलकों से बह जाते हैं।

बोल नहीं पाते जो बातें, शब्द उन्हें कह जाते हैं।।

 

शब्दों  का संसार निराला,सब आपस में भाई हैं।

उनमें ना हिन्दू मुस्लिम  है, ना कोई ईसाई हैं।।

शब्द  बनाएँ  वेद-ऋचायें, उनने  गीता गाई   है।

बनी ग्रंथ साहिब शब्दों से, बाइबिल भी समाई है।।

 

शब्द बनाते राम कृष्ण भी,वही मोहम्मद के प्यारे।

ईसा भी शब्दों से बनता,नानक नाम लगे न्यारे।।

शब्दों से दरगाहें  बनतीं, शब्दों  से  काबा काशी।

शब्दों से माता रानी हैं, शब्दों से शिव अविनाशी।।

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पूर्णिका-2122 2122 212

2

रो पड़ा ख़ुद भी खुदा...

 

रो पड़ा ख़ुद भी खुदा ये देखकर ।

बेखबर था आदमी का ये शहर ।।

आज भी तो घोर काली रात है ।

कौन कहता हो गई है अब सहर ।।

क्या खुदा भी अब सितमगर बना गया ।

सो गया मुँह चादरों से ढाँककर ।।

व्यर्थ है बातें करोड़ों लाख की ।

एक कपड़ा भी नहीं जब देह पर ।।

हैं अगर पिछले जनम के कर्म ये ।

सो रहे पापी सभी क्यों सेज पर ।।

वोटरों में बँट गए कम्बल सभी ।

छोड़ क्यों इनको दिया दुर्भाग्य पर ।।

मिल न पाये उम्र भर कपड़े जिन्हें ।

शान से फिर आखिरी होगा सफर ।।

रोज ही गुजरे यहाँ से काफिला ।

क्यों नहीं उनकी पड़ी इनपर नजर ।।

मौत को भी अब शरम आने लगी ।

हाल ऐसा जिंदगी का देखकर ।।

फर्क कुछ पड़ता नहीं उनको अनिल ।

पाँच सालों तक नहीं उनको फिकर ।।

 


डॉ. अनिल कुमार बाजपेई काव्यांश

जबलपुर

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