यमुना
में भाई बहन का स्नान और दीप दान (मथुरा जी)
डॉ.
मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’
पुराणों
में यह कथा आती है कि एक बार यमुना जी ने अपने भाई यम देव से आने का निमंत्रण
दिया। यमदेव जिस दिन यमुना जी के पास पहुंचे उस दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की
द्वितीया तिथि थी। यमुना जी ने भाई यमदेव की बहुत आव भगत किया और आत्मिक आतिथ्य
किया जिससे खुश होकर यमदेव ने कहा कि बहन आशीर्वाद माँ गो।बहन की इच्छा जानकर
यमदेव ने वर दिया कि इस द्वितीया तिथि को यमुना में जो भाई बहन स्नान करेंगे
उन्हें यमदूतों का भय नहीं रहेगा और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। तभी से भाई
बहन एक साथ मथुरा जी के यमुना में स्नान कर दीप दान कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं
और बहनें भाई को तिलक कर आशीर्वाद देती हैं।
लोक संस्कृति में इस पावन पर्व पर यमुना तट पर
जो आस्था की भीड़ दीखती है वह सदा मनोहारी और सुखकारी है। मथुरा की पावन धरा पर पहुँचने
पर लगता है कि सब कुछ भूलकर यहीं का याद है। झुण्ड में नंगे पांव चलते लोग यह
साक्षात् साबित करने के लिए काफी है कि आज भी भक्ति और आस्था भारतीय संस्कृति की
परिपाक हैं। भीड़ लेकिन कोई समस्या नहीं। कोई हो हल्ला नहीं। सरकारी मुलाजिम भी
सहयोग की भावना से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।
घाट के सरल और सहज पुजारी भी सहयोग और आस्था
से सबकी पूजा कराते हैं यह यमुना जी की बड़ी कृपा है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि के निकट
डीग चौक पर से पैदल जाना होता है जहाँ से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर विश्राम घाट है
वहीं यम देव एवं यमुना जी का मंदिर भी स्थित है जहाँ लोग पूजा अर्चना करते हैं।
आधुनिकता के इस चकाचौंध के दौर में भी हमारी
संस्कृति की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है यह इतनी गहरी हैं कि इसकी जड़ों से
प्रस्फुटित कोंपलें सदियों से निर्मलता से आगे बढ़ रही हैं।
हमारे पूर्वजों ने जो रास्ता दिखाया वह आपसी
सद्भाव,
आपसी प्रेम, अपने तीर्थस्थलों पर जाकर लोक
कल्याण के साथ ही साथ अपने गांव, समाज और कुल की भलाई की
मन्नत माँ गने की रही है वह इस घाट पर जाकर अनेक जनपदों, राज्यों
से आये तीर्थ यात्रियों को देखकर ही पता चलता है।
डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’
ब्रज
भूमि,श्री धाम वृंदावन
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