रमण
रेती, रेती में लोटता है आस्था का सैलाब
डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’
मथुरा
की पावन भूमि का कण-कण पावन है पवित्र है। कण-कण में भक्ति,
ज्ञान और कर्म की अविरल धारा अनवरत चौबीस घंटे प्रवाहित होती रहती
है। कौन-सा कोना ब्रज भूमि का अछूता है जहाँ भगवान की उपस्थिति दर्ज न हो। जहाँ
लीलाधारी श्री कृष्ण का बाल्यकाल भी इसी रेती में क्रीड़ा करता हुआ व्यतीत हुआ। उस
परम नारायण की क्रीड़ा स्थली के कण-कण भक्ति ,प्रेम और आस्था
का रस सराबोर है जहाँ पहुँचने पर ऐसा प्रतीत होता है कि इस नश्वर संसार में उस परम
अलौकिक सत्ता की रचनाधर्मिता और अलंकारों से झंकृत माटी की महक और उसमें से निकलती
ध्वनि तरंगें स्वयमेव किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर रही हैं।
लगभग
साढ़े पाँच हजार साल पहले द्वापर युग में एक मनुष्य की आकृति में अवतरित हुए स्वयं
नारायण ने अनेक बाल लीलाएँ करते हुए सभी को सुख प्रदान किया। जीवन की विभिन्न
अवस्थाओं में नियत कर्मों को संपादित करने की जो व्यवस्था सनातन संस्कृति में
निर्धारित है वासुदेव कृष्ण ने भी उन नियमों का पालन किया। और हो भी क्यों न?
जिन नियमों को सनातन संस्कृति ने युगों युगों से अपनाया तो भला लोक
हित एवं सर्व कल्याण की भावनाओं से युक्त जीवन व्यवस्था से धर्म के रक्षक उसकी
उपेक्षा क्यों करें ? हाँ इतना जरूर है उनके कर्मों को देखकर
स्वयं मैया यशोदा भ्रमित ह़ोती हैं, कभी साक्षात् ईश्वर समझ
बैठती हैं, कभी मात्र मनुष्य या अपना सुत, सिर्फ और सिर्फ कान्हा। यही स्वरूप और मातृत्व के बीच का जो रहस्य है, इस कठिन अन्वेषण और जीजिविषा का गहन तोष है। क्या अजीब है कि निश्चित रूप
से जब मैया अवतार समझती हैं तो अवाक रह जाती है लेकिन अपनी माँ को सत्य की भित्ति पर लौकिक आवरण का मुखौटा
समुपस्थित करना भी जरूरी था जिसे उस परम पुरुष की वास्तविक सत्ता और सांसारिक आवरण
के लिए आवश्यक था।
जिन गलियों में बाल लीलाएँ हुईं, बाग, वन, तड़ाग, सभी में खेलना कूदना और बाल अवस्था में भी अपने अस्तित्व को छिपाए हुए
अपने अवतार के उद्देश्यों को पूरा करने का अवसर जिन्होंने नहीं छोड़ा अर्थात
उद्देश्य ही धर्म और मानवता को नष्ट करने वाले असुरों का सफाया। बखूबी और एक
उत्कृष्ट योद्धा के समान उन्होंने पूर्ण किया। जो केवल वही जानते थे। ऐसा वर्णन है
कि श्रीकृष्ण अपने बाल्यकाल में महावन जिसे आज रमण रेती भी कहा जाता है, उस माटी में खूब खेले। गोप गोपिकाओं को असीम सुख को प्रदान किया। ब्रज साहित्य के प्रिय कवि रसखान जी ने इसी वन
में पुरूषोत्तम श्री कृष्ण की उपासना की थी और उन्हें भगवत् स्वरूप का दर्शन हुआ
था उनकी समाधि भी बनी हुई है जहाँ बड़ी श्रद्धा से लोग माथा टिकाते है। वहीं एक और
संत गिरी ने भी बारह वर्ष तक कठिन तपस्या किया उन्हें भी श्री कृष्ण जी का दर्शन
हुआ वहीं प्रभु श्रीकृष्ण का मंदिर बनवाया गया जो बहुत जीर्ण-शीर्ण होने के बाद
कालांतर में नव निर्माण किया गया है जो घने वन में ही है।
मंदिर
में राधा कृष्ण जी की साक्षात् मनमोहक मूर्ति स्थापित है जहाँ हजारों लोग हर रोज
दर्शन करते हैं। वहीं बगल में जमीन पर रेत में स्त्री पुरुष बाल वृद्ध हर कोई
लोटता है। अपने शरीर को एक ऐसी सत्ता के पद रज में समर्पित करता है और दुनिया में
क्या है यह भूलकर मिट्टी में अपनी काया को लपेटता है।लोटता है आस्था का सैलाब।
प्रेम के उमड़े सैलाब में वहाँ हर कोई राधा मय, कृष्ण मय
हो जाता है। सांसारिक हैसियत दरकिनार हो जाते हैं, सारी
हस्ती, झूठ की चमक दमक सब तुच्छ हो जाते हैं, कहाँ? जहाँ यह विश्वास की यमुना प्रवाहित हैं,
जहाँ नारायण की लीला हुई थी, जहाँ बाल कृष्ण
ने अपने बाल्यकाल में ही धर्म की स्थापना और प्रेम की धारा का पाठ शुरू किया
था।पशु पक्षी, वनस्पति, पेड़,पहाड़, नदी नाले सभी में प्राण फूंक दिया था उस बाल
कृष्ण ने जो हजारों साल बाद आज भी उसी तरह से लोग उस शक्ति का अहसास करते हैं भले
ही साक्षात उनकी उपस्थिति न हो लेकिन कण कण में भगवान, राधे
कृष्णा की सत्ता को विराजमान समझना भारतीय संस्कृति की गहरी मिठास और सच्चाई हूं।
आखिर श्री कृष्ण ने जो समाज को दिया आज वही प्रेम, भक्ति,
ज्ञान और कर्म की अविरल धारा अनवरत प्रवाहित हो रही है। यहाँ ब्रज
भूमि पर हर कोई अपने सांसारिक जीवन के कर्मों को करतो हुआ भी अर्थात कर्म योग,
ज्ञान और भक्ति का योग समस्त नियमों से सराबोर है। हर हाल मे राधा
रानी और श्रीकृष्ण ही जीवन के सहारा हैं, आदि से जीवन
पर्यन्त सिर्फ और सिर्फ वही हैं,वही हैं। यहाँ आस्था और
प्रेम का सैलाब श्रीकृष्ण के पद रज के कण-कण में लोटता है।सब कुछ भूलकर। श्रीकृष्ण
के चरणों में।
डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’
ब्रज भूमि,श्री धाम वृंदावन
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