धर्मेन्द्र
राजा
दुबे
उनका
साथ छूटा मगर
संस्मरण
में वे मौजूद हैं
मेरे
एक अभिन्न मित्र थे – सुनील मिश्र, आला दरजे के फिल्म समीक्षक । इस विधा के लिये उन्हें राष्ट्रीय फिल्म
पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था । मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग में उप संचालक पद पर
कार्यरत सुनील, धर्मेन्द्र
के जबर्दस्त फैन थे । वे हर साल धर्मेन्द्र
के जन्मदिन , 08 दिसम्बर को मुम्बई उन्हें जन्मदिन की
शुभकामनाएँ देने जाते थे । अपने साथ भोपाल से कुछ नमकीन और ग़ज़क लेकर जाते थे ।
उन्होंने कई बार मुझसे भी आग्रह किया कि मैं उनके साथ मुम्बई चलूँ मगर मैं ऐसा कोई
योग नहीं बना पाया ।
सुनील
और मैं,
हम दोनों धर्मेन्द्र को लेकर खूब चर्चा करते और लगभग हर चर्चा का
समापन इस
एक संयुक्त घोषणा
के साथ होता था कि धर्मेन्द्र को वो यश वो सम्मान बॉलीवुड में नहीं मिला जिसके वो
हकदार थे । धर्मेन्द्र की फिल्म – ‘सत्यकाम’ का जब-जब टीवी पर प्रसारण होता हम
हफ्ते दस दिन तक हम उसी की बात करते । धर्मेन्द्र के अभिनय,उनके अभिनय में हास्य के एक अन्तर्प्रवाह और अभिनय करते समय चेहरे पर
मनोभाव को जीवंत कर देने वाले मूर्धन्य कलाकार के बेजोड़ होने परहम दोनों हमेशा
एकमत रहते और हम दोनों धर्मेन्द्र के ख्यालों में डूबे रहते ।
धर्मेन्द्र के उस विलक्षण प्रशंसक , सुनील मिश्र का कोरोना की तीसरी लहर में निधन हो गया । फिल्म के लिये लेखन की विधा के लिये तो यह अपूरणीय क्षति थी ही ,मेरे लिये भी यह एक व्यक्तिगत क्षति थी । सुनील से मैं अक्सर कहा करता था कि वो धर्मेन्द्र के अवदान पर एक किताब लिखे ,मगर हमेशा सुनील यही कहता कि मैं इस बारे में जब भी पापाजी, ( सुनील उन्हें इसी नाम से पुकारता था) से बात करता वो इस विषय को टाल जाते । वर्ष में जब धर्मेन्द्र को मध्यप्रदेश सरकार के राष्ट्रीय किशोर कुमार सम्मान से सम्मानित किया गया तब धर्मेन्द्र अस्वस्थता के चलते भोपाल नहीं आ पाये थे । संस्कृति विभाग के एक अधिकारी उन्हें यह सम्मान सौंपने मुम्बई गये थे । तब धर्मेन्द्र ने सुनील को नम आँखों और भर्राई आवाज़ में याद किया था ।
सुनील
के स्तर के समकक्ष तो नहीं मगर उससे कुछ कमतर मैं भी फिल्म पर लिख लेता था । धर्मेन्द्र पर फिल्माये गये फिल्म- ‘आये दिन
बहार के’ के एक गीत – ‘मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे , मुझे ग़म देने वाले तू खुशी को तरसे’ पर हम दोनों काफी विमर्श करते । मैं और सुनील भी
उसे हिन्दी फिल्मों में किसी नायक द्वारा अपनी नायिका को बेवफाई के लिये कोसे जाने
वाला अप्रतिम गीत मानते थे ।
रफी सा’ब ने इस गीत को जो स्वर दिये थे वो स्वर नायक की नायिका के प्रति वितृष्णा
भाव को इस कदर अभिव्यक्त करता था कि लगता था कि वितृष्णा की "सुनामी " आ
गई हो । रफी सा’ब के इस गीत पर धर्मेन्द्र ने जो मनोभाव अपने
चेहरे से व्यक्त किये हैं वो विलक्षण थे ।
आनन्द
बक्षी की इस रचना में नायिका के लिये जब उन्होंने यह लिखा कि - "तू फूल बने पतझड़ का,
तुझ पे बहार न आए कभी, मेरी ही तरह तू तड़पे,
तुझको क़रार न आए कभी, जिये तू इस तरह की
ज़िंदगी को तरसे.." तो लगा कि यह किसी को बद्दुआ का चरम नहीं तो और क्या है ? इस गीत
की एक-एक पंक्ति पर धर्मेन्द्र के चेहरे की भाव प्रवणता नायक के मन में उमड़ती
घृणा को इस सघनता के साथ प्रस्तुत करती है कि देखने सुनने वाले चकित रह जाते हैं ।
इसी
भावभूमि का एक गीत - "जब प्यार किसी से होता है " फिल्म में देवानंद पर
भी फिल्माया गया था । " तेरी जुल्फों से जुदाई तो नहीं माँगी थी,
कैद माँगी थी रिहाई तो नहीं माँगी थी " । इस गीत को भी रफी सा’ब ने गाया था मगर इसमें नायिका की बेवफ़ाई को लेकर कोसने वाले भाव में
वितृष्णा की सघनता नहीं थी , बेबाकी थी । इसीसे हसरत जयपुरी ने वैसी ही शब्द रचना की थी और शंकर जयकिशन
का उसीसे तारतम्य बैठाया संगीत था । धर्मेन्द्र पर फिल्माया गया गीत उस फिल्म में
उनके चरित्र कोलेकर सर्वथा उपयुक्त था । इस गीत पर इतना श्रेष्ठ अभिनय सिर्फ
धर्मेन्द्र ही कर सकते थे । सुनील ने इस गीत को लेकर धर्मेन्द्र से मेरी ओर से यह
पूछा भी था कि आपके निजी जीवन में कभी आप किसी के प्रति इतना घृणाभाव रख ही नहीं
सकते फिर इस गीत में ? तब उन्होंने कहा था कि वहाँ तो फिल्म
का एक चरित्र था , में कहाँ था ? आज जब
धर्मेन्द्र महाप्रयाण को प्राप्त हो गये हैं उनकी स्मृति हम सबको साल रही है ।
सादर नमन धर्मेन्द्रजी ।
राजा
दुबे
13
- रुबी भगवान इस्टेट,
मानसरोवर
हास्पीटल के पीछे
कोलार
,
भोपाल (मध्यप्रदेश)
पिन
462042
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