डॉ.
योगेंद्रनाथ मिश्र : भाषा, संवेदना और आत्मीयता का अविस्मरणीय आलोक
डॉ.
ऋषभदेव शर्मा
::1:: स्मृतिदीर्घा
हिंदी
भाषा के संसार में डॉ. योगेंद्रनाथ मिश्र
(15 जनवरी, 1953 - 18 सितंबर, 2025) एक ऐसे दीप्तिमान व्यक्तित्व थे, जिनकी विद्वत्ता और
विनम्रता एक-दूसरे की पूरक थीं। वे केवल व्याकरण के शिक्षक नहीं
थे, बल्कि भाषा के संवेदनशील साधक थे - ऐसे व्यक्ति जिनके संपर्क में आते ही ज्ञान, सहजता और
मनुष्यता तीनों का अद्भुत संगम अनुभव होता था। उनके जाने के बाद यह स्मृति और भी स्पष्ट
हो उठती है कि वे अपने ज्ञान के बल पर नहीं, बल्कि अपनी आत्मीयता
और मानवीयता के बल पर हृदय में घर बना लेते थे।
मेरे
लिए उनका स्नेह और विश्वास शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं। उन्होंने भले ही मेरे साहित्य
का समग्र अध्ययन न किया हो, लेकिन जैसा वे स्वयं लिखते
हैं - उन्होंने “मुझे” बहुत गहराई से पढ़ा था। यह वाक्य मेरे लिए किसी अलंकरण से अधिक, मेरे व्यक्तित्व को समझने वाले एक सच्चे हितैषी का स्नेह-संकेत है। उन्होंने मेरे संपादकीय लेखन को जिस सूक्ष्मता, आलोचनात्मक दृष्टि और दुलारपूर्ण भाषा में पढ़ा और विश्लेषित किया,
वह केवल किसी भाषाविद् का मूल्यांकन नहीं था; वह
एक बड़े भाई की आत्मीयता थी। मेरे लेखों के शीर्षकों, भाषा-शैली, व्यंग्य, शिल्प और संतुलन
पर उनकी विस्तृत टिप्पणियाँ आज मेरे लिए केवल साहित्यिक संकेत नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत धरोहर हैं।
डॉ.
मिश्र की दृष्टि सूक्ष्म थी, और उनका विवेक अद्भुत।
उन्होंने मेरे शीर्षकों के चुटीलेपन में वह सर्जनात्मकता देखी जो सामान्य पाठक के लिए
केवल एक आकर्षण होती है। उन्होंने मेरे गद्य में छिपी कविता को पहचाना, मेरे व्यंग्य में निहित करुणा को समझा, और मेरी टिप्पणियों
में संतुलन की उस रेखा को पकड़ा जिसे वे व्याकरण और अभिव्यक्ति - दोनों के लिए अनिवार्य मानते थे। यह उनका स्नेह ही तो था कि उन्होंने अपने
लेख में मेरे कई शीर्षकों और अंशों को इस तरह उद्धृत किया मानो वे किसी अपने प्रिय
विद्यार्थी या शिष्य की रचना पर गर्व कर रहे हों। ऐसी प्रशंसा केवल विद्वत्ता से नहीं
आती; वह आती है हृदय के विस्तार से।
उनका
फेसबुक पृष्ठ देखकर हमेशा लगता था कि उनके भीतर का मनुष्य कितना विशाल है। वे शब्दों
के ही नहीं, चित्रों के भी गहरे पारखी थे। प्रकृति की
छोटी-छोटी छवियाँ - किसी पेड़ का झुकना,
खेतों की हवा, किसी राहगीर की सहज मुस्कान,
या किसी संध्या का उदास रंग - इन सबमें वे अर्थ
खोज लेते थे। वे दुनिया को केवल पढ़ते नहीं थे, उसे जीते थे।
उनकी टिप्पणियों में कहीं भी दिखावा नहीं होता था; वे जितना देखते,
उतना ही कहते - और उनकी कहन में इतना अपनापन होता
था कि वह पाठक की स्मृति में उतर जाती थी। यही सहजता उन्हें अन्य विद्वानों से अलग
बनाती थी। वे बड़े होकर भी सरल बने रहे - बड़े विद्वान,
पर भीतर से अत्यंत विनम्र।
एक
शिक्षक और भाषाशास्त्री के रूप में वे जितने कठोर अनुशासनप्रिय थे,
उतने ही असीम उदार भी। वे भाषा के नियमों पर पूरा अधिकार रखते थे,
पर नियमों को लाठी बनाकर नहीं, दीपक बनाकर उपयोग
करते थे - अभिव्यक्ति को रोशन करने के लिए। वे कहते थे कि व्याकरण
का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, अभिव्यक्ति को सक्षम बनाना है।
और सच यही है कि उनके व्यवहार में कोई अकादमिक दंभ नहीं था। विद्यार्थी उनसे छोटा-सा प्रश्न पूछता, तो वे उसी मनोयोग से उत्तर देते जैसे
किसी शोधार्थी के जटिल प्रश्न का देते। यह उनका शिक्षकीय धैर्य मात्र नहीं,
उनका मनुष्यत्व था।
डॉ.
मिश्र ने मेरे संपादकीय लेखों पर जो विस्तृत टिप्पणी लिखी, उसमें केवल विश्लेषण ही नहीं था; उसमें एक अध्यापक के
गर्व और एक बड़े भाई के वात्सल्य का मिलाजुला स्वर था। उन्होंने मेरे शीर्षकों के ध्वनि-विन्यास, व्यंग्य, व्याज-स्तुति, वाक्य-संरचना और भाषा की
तर्कपूर्णता को जिस प्रकार परखा, वह मुझे आज भी विस्मित कर देता
है। जब वे लिखते हैं - “मैंने उनका लिखा हुआ भले न पढ़ा हो,
लेकिन मैंने ऋषभदेव जी को बहुत बारीकी से पढ़ा है” - तो यह वाक्य मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं। कोई भी रचना तब सार्थक होती
है जब उसे पढ़ा ही नहीं, समझा भी जाए; और
डॉ. मिश्र ने समझने की इस प्रक्रिया को प्रेम में बदल दिया था।
मुझे
यह स्वीकार करने में संकोच नहीं कि उनके जाने के बाद मेरे लेखन की हर उपलब्धि उनके
आशीर्वाद की स्मृति से गुज़रती है। ऐसा लगता है कि उन्होंने मेरे शब्दों में वह भरोसा
पढ़ लिया था, जो मैं कभी-कभी स्वयं
भी नहीं देख पाता। उनका स्नेह अब एक मौन मार्गदर्शक की तरह है - जो बताता है कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, संबंध
का सेतु भी है।
आज
जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब उनकी अनुपस्थिति केवल एक
विद्वान का अभाव नहीं, एक आत्मीय उपस्थिति का विरह है। वे एक
उत्कृष्ट भाषा-विशेषज्ञ थे, पर उससे अधिक
एक अपूर्व मनुष्य थे - सहज, सौम्य,
संवेदनशील और स्नेह से भरे हुए। उनका जाना हिंदी-जगत की क्षति है, लेकिन मेरी व्यक्तिगत क्षति उससे कहीं
अधिक है, क्योंकि मेरे लेखन को समझने वाला, सराहने वाला और सुधारने वाला इतना आत्मीय कोई दूसरा नहीं रहा।
डॉ.
योगेंद्रनाथ मिश्र की स्मृति मेरे हर शब्द में जीवित रहेगी -
क्योंकि वे केवल वैयाकरण नहीं, बल्कि मनुष्यता
की उस भाषा के मर्मज्ञ थे, जो किसी पुस्तक में नहीं मिलती। वे
केवल भाषा के शिक्षक नहीं थे; वे जीवन को भाषा की तरह सुंदर और
सार्थक पढ़ने की कला सिखाने वाले दार्शनिक थे। उनकी पावन स्मृति में, मेरी ओर से अत्यंत विनम्र, भावपूर्ण और कृतज्ञतापूर्ण
श्रद्धांजलि! …
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दीर्घा
डॉ.
ऋषभदेव शर्मा
सेवा
निवृत्त प्रोफ़ेसर
दक्षिण
भारत हिन्दी प्रचार सभा
हैदराबाद





















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