कविता
डियर
दिसंबर, तुम जा रहे हो…
डॉ. अनु
मेहता खन्ना
डियर
दिसंबर,
तुम जा रहे हो,
तो
जाते-जाते सारे दर्द, सारे दुख, सारे ग़म लेते जाना,
बहुत
ज़्यादा ना ले जा सको तो
थोड़े
ही सही-कुछ कम लेते जाना।
इस
सूने मन की चौखट पर पड़े
अनचाहे
पछतावों की धूल भी हटाते जाना,
और
बीते साल की कड़वी यादों को
धीरे-धीरे
हवाओं में उड़ाते जाना।
डियर
दिसंबर,
तुम था रहे हो
तो
जाते-जाते
वास्तविकताओं
के कुरुक्षेत्र में घायल बचे चंद सपनों को ज़रा सहलाते जाना,
उनके
थके पंखों में थोड़ी-सी उड़ान फिर से सजाते जाना।
निराशा,
हताशा और कशमकश सेआहत मन को ज़रा-सा बहलाते जाना,
उसके
आँगन में हौसलों की दीपशिखा जलाते जाना।
डियर
दिसंबर,तुम जा रहे हो
मगर
जाते-जाते कुछ अच्छी यादें
मेरे
दामन में छोड़ते हुए जाना,
इस
आँगन में फूल बिछाकर
काँटों
का मुँह मोड़ते हुए जाना।
डियर
दिसंबर,
तुम जा रहे हो तो
आने
वाले इस नए साल को भी अपने ढंग से समझाते जाना,
थोड़ी
नरमी बरते और सख्ती से पेश न आए, जनवरी को यह बतलाते
जाना।
देखो
तुम पहले दिन ही जनवरी के कान में चुपके
से कह देना कि हमें और ना आजमाएँ,
इन
थके ठिठुरते दिनों को अब थोड़ी धूप और थोड़ी राहत बख्शी जाए।
और
हाँ…डियर दिसंबर एक विनती और है तुमसे कि
अगले
साल फिर जब तुम लौटकर आओ,
तब
हमारी दहलीज पर
आशाओं
के फूल और उम्मीद की शबनम लेकर आना।
खुशियों
की बारिश और दुआओं का मौसम लेकर आना,
डियर
दिसंबर
इस
बार हम खुली बाहों से अपनाना चाहते हैं,
ए
जिंदगी,
हम अब खुलकर मुस्कुराना चाहते हैं।
***
डॉ. अनु
मेहता खन्ना
प्राचार्य
एवं विभागाध्यक्षा,
आणंद
इंस्टिट्यूट ऑफ़ पीजी स्टडीज इन आर्टस,
आणंद


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